शिवप्रसाद जोशी की कविताएँ

  1. पहाड़

पहाड़ दरक रहा है अंदर ही अंदर 

तेज़ी से लुढ़कते आते हैं पत्थर

दिन-रात जारी रहती है 

यह बहुत धीमी फिसलन

हैं भूगर्भ-विज्ञान के क़ायदे 

बता रहे लक्षणदौर के।

2. काकड़

नाम से लगता है कोई पंछी होगा

लेकिन है हिरण की सबसे पुरानी

सबसे चपल सबसे द्रुत प्रजाति

जो दिखती कम अदृश्य ज़्यादा रहती है

कविता की तरह

और जिसके मुहावरे हैं अनेक

जैसे गढ़वाली में काकड़ की फाळ

मतलब उसकी छलाँग 

बाघ की गति को लाँघ जाती है

वह सूँघता रहता है कभी नहीं खींच पाता काकड़।

पर अभी तो वह सिर्फ़ एक आवाज़ है

घाटियों में मंडराती हुई

उस करुण पुकार की परछाई

जो न जाने पहाड़ के किस छेद से 

किस पेड़ की ओट से

किस चट्टान की तह से दिन-रात फूटती रहती है

और हम खोजते रहते हैं खोजते रहते हैं

उस आवाज़ का रहस्य

जब सुबह अपनी छींटें बिखेरती है हवा में 

तो साथ में बहती है वह आवाज़ भी

रात में जब हर तरफ़ ख़ामोशी छा जाती है

तब नदी में बसे पत्थरों की आवाज़

मानो उसे संगत देती चलती है

उस विकल स्वर के समर्थन में

काँपता है पहाड़ एक धार से दूसरी धार तक

खिंचे रहते हैं 

असद अली की रुद्रवीणा के अदृश्य तार।

और वे प्राचीन हिरण

धमाचौकड़ी मचाए रखते हैं हमारे भीतर

अपने सतत विरोध में

न दिखने की ठानकर।

3. वह तस्वीर

माँ मुझ मुश्टंड बालक को लिए गोद में

और दूसरा हाथ गाय की पीठ पर रखे मुस्कुराती 

पीछे मिट्टी-पत्थर, गोबर-लकड़ी और घास-फूस 

का घरजर्जर उसके बौंड ओबरा

फ़ोटो खींचने वाले ज़रूर होंगे पिता ही

वह तस्वीर रखी हुई है मेरे पास

ग्लानि की तरह।

याद यह दिलाती है मुझे

कि माँएँ कितना झोंक देती हैं ख़ुद को

सुखा देती हैं अपनी देह 

और सारा ख़ून खींच लाती हैं चेहरे तक

एक संपूर्ण निछावर भंगिमा के लिए

तस्वीर में ही दिख जाता है उनका पूरा जीवन

और हम जैसों का जीवन भी।

(कुछ पंक्तियां और भाव, रघुवीर सहाय और मंगलेश डबराल की कविताओं से प्रेरित)

(गढ़वाली शब्द बौंड यानी ऊपरी मंज़िल और ओबरा- नीचे का हिस्सा जिसमें अक्सर पशु रखे जाते है)

4. सेफ़्टी पिन

एक नन्हा सा वॉयलिन या रबाब या बानम

एक खिलौना चिमटासहसा खुलता और बंद हो जाता

मीन का मुख

जिसे कहाँ से कहाँ देखता रहा मैं

खादरे में बिस्तर पर पटरे पर रखी 

स्वेटर में लगाई हुई

न दिखती न चुभती 

चाभियों के बीच लटकती हुई

बटन की जगह काम आती हुई

फटी हुई जगहों को जोड़ती हुई

उँगुलियों और पाँवों में फंसे काँटों को निकालती हुई

अपने उस चमत्कारी घुमाव और नोक के बल पर।

जिसका आविष्कार 1849 में वॉल्टर हंट ने किया 

उसे सबसे पहले मैंने देखा माँ और ताई के पास 

बैठे थे जब हम एक दोपहर गाँव में

जाते हुए घाम की छाँह में

और पैर में धंसा अदृश्य सा काँटा निकालने को तत्पर था 

वो नन्हा सा औजार

इस तरह वे अपने काँटे निकालती तमाम 

किसी फ़ुर्सत में काम से लौटकर

और हम बिलबिलाते बदमाश बच्चों को गड़े काँटे भी 

जो घूमते थे आवारा से पिल्टु को पलटते

जहाँ हमसे भी ज़्यादा आवारा घास हमें डस लेती थी

हे बई, हे माँ के असली-नकली चीत्कार को अपने हास्य में सुनने के लिए।

बचपन के काँटे तो जैसे-तैसे निकाल दिए

वे चुभते थे पर निकल जाते थे मनुहार पर

सच कहूँ तो उनका न चुभना पता चलता था न निकलना

बस एक खरोंच जैसी रहती थी

इतने कोमल इतने नाज़ुक इतने बारीक इतने छोटे 

कि नहीं जानता उन्हें हम काँटे कहते ही क्यों थे

पर अब जो गड़ते जा रहे दिन-रात

पुकारता हूँ ओ माँ ओ ताई 

क्या सेफ़्टी पिन से निकल पाएँगे

ख़ून सुखा देने वाले

नफ़रत और उन्माद के ये ज़हरीले काँटे।

5. जीवित सुबह 

(नलिनी तनेजा और असद ज़ैदी के लिए)

एक बहुत प्राचीन पहाड़ से

एक बहुत नये पहाड़ की ओर जाना 

आसान तो नहीं फिर भी 

क़यामत तक समतल न हो सकने वाले 

उस मलबे की धूल झाड़कर हम उठे 

और चल दिए अपने पहाड़ की ओर

जहाँ कई आकार बनाती और छिपाती है रात

और सुबह खुलती है एक तीव्र प्यास की तरह। 

(तभी कहा होगा शमशेर ने

‘मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो

जहां मैं एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ’)

और आँख खुलती है एक बहुत पुराने स्वप्न में

कहाँ तक देख सकती हैं

जब वे थक जाती हैं 

तो ढूँढती हैं पेसमेकर

दिल को देखने के लिए

अपनी जगह पर सही-सलामत

धड़कता उसी प्राचीन गति से

जैसे पृथ्वी के निर्धारित चक्कर

या फैलते ही जाते ब्रह्मांड की तरह

अपरिहार्य प्रेम

बरसता जैसे अमीर ख़ान के गाए मेघ की तरह

दूर से एक धागा लहराता है बस 

तुम्हें यही दिखता है

पास आओगे तो यक़ीनन एक पूरा समन्दर होगा

तुम्हारे आश्चर्य पर अपनी लहरें फेंकता हुआ।

कई कई कमरों से होकर गुज़रते हैं हम

कई कई कंधों पर हाथ रखे

कई कई गलियों में भटकते हुए

स्मृतियाँ हमें मिलाती रहती हैं 

बरसों के बिछड़ों और दिवंगतों से

बरसों के संघर्षों से

बरसों के षडयंत्रों से

बरसों के सवालों से

अरे, तुम भी हो यहाँ

उस पर भी जिसके छींटें पड़े रह-रह कर

वो तंज ही था भले आदमी 

वरना ‘काली ज़बान’ के किस्से बहुत हैं

थोड़ा शरारत तो बनती है बेटे। 

सहसा एक रोज़ न जाने क्या घटा

तुम हमसे खिन्न हुए और लगे पूछने  

अपनी प्राथमिकताओं और अपनी ज़रूरतों का

सारा हिसाब कहाँ रख आए बूढ़ों

क्यों छोड़ी अपनी जगह 

हम क्या बताते हमारा कुछ खो गया है

अपने सामान की तलाश करते जा रहे हैं 

कहाँ के बूढ़े 

इन सदियों को ढोते हुए 

देखो, कहाँ से कहाँ आ गए हम

अपनी जगह से भी हमें देखो। 

कविता कभी ख़त्म नहीं होती और हम

चलते जाते हैं अपने समतल से अपने पहाड़ की ओर

बूढ़े के भेस में जो करता है हमारा इंतज़ार

वहीं थिरकती है एक जीवित सुबह की चाहत

धड़कता है एक जीवित सुबह का राग

बिलावल।

6. मंगलेश डबराल का राग शुद्ध कल्याण  

एक पेड़ की जड़ों के पास बिछे हुए पानी

की मिठास थी उसकी आवाज़ में

बहता आया था जो उसके गाँव के धारे तक

उसकी आँखों में बनी रहती थी

अपार करुणा अपार उदासी अपार सवाल

और हाँ, हास्य की एक नन्हीं धधकती कौंध भी

उसके चलने की तरह जो धीमे-धीमे गुज़रती रहती थी

आपसी बातचीत में

बोलते हुए उसकी अटकन

बड़ी ज़ोरदार और टाइमली होती थी

जैसे गायक पक्का

अपनी किसी तान पर रुका ख़ुद ही बना संगतकार

अपने छोड़े हुए को पूरा करता आप ही

पढ़ता हुआ गुजरात के एक मृतक का बयान

लोग सोचते हकलाहट है

पर वो बुलबुले जैसी ख़ामोशी थी

किसी रहस्य में लौट जाने से ठीक पहले।

बेल्ट के साथ-साथ कहीं ज़्यादा बाहर

कहीं ज़्यादा मुड़ी-तुड़ी खोंसी हुई कमीज़

किसी वक्तव्य की तरह

दर्जनों मकानों में मिलते थे उसके रहने के निशान

प्रशंसकों की चिट्ठियाँ गुमनाम हिदायतें मशविरे शौकीनों के

कैलेंडर डायरी कोई किताब समीक्षार्थ शादी का कार्ड

देर में पता चलता था कि बदल गया उसका पता

किसी को कभी पता नहीं चलता

डाक आती और वहीं पड़ी रह जाती

वो जा चुका होता किराए के अन्य मकान पर।

छूटा कोई सामान या खोयी कोई चीज़ ढूँढने

एक कमरे में दूसरे कमरे को जाता 

किताबों की धूल झाड़ता

तस्वीरें साफ़ करता

फ़ोन पर बात करता

चादर को ठीक करता

जब उसे किसी बात पर हँसी आ जाती

आँखें चमकती रहतीं

जैसे उन्हें भी हँसी आ जाती उन उदास आँखों को

रोता जब वो अँधेरे अकेले में

सड़क पर आते हुए चुपचाप बिस्तर पर

गुसलख़ाने में

वह किसी को खो देने की याद थी

या किसी से धोखा खाने की

अपने ही किसी अवगुण पर क्रोध

अपनी कविता की कोई कमज़ोर पंक्ति

कोई ग़लत निष्कर्ष कोई विरोधाभास

कोई नाकाम फ़ैसला कोईबेचैनी

अन्यायकाविरोध

या अपनी आलोचना का

याद आता कोई वाकया प्रेम का

जैसे आसमान में जलता बुझता कोई नक्षत्र

क्या कवि ने दुखाया कभी किसी का दिल

क्या कवि को याद आया होगा 

किसी के फटे जूतों पर अपना एतराज़

और पहनने वाले की दर्दभरी चौंक

कविता के पाठ की हड़बड़ी

अपनी मध्यवर्गीय सुविधा-दुविधा।

गुस्से में वो दनदनाता जैसे

अपने ही अंदर काँपता है पेड़ और 

गिराए चला जाता है अपने पत्ते

झपटता था वो अदृश्य कारणों पर

एक बार उसने फाड़ दिया अपना कुर्ता

जैसे न बन पा रही 

बार-बार ठहर जाती कविता का क़ागज़।

मंडराते थे उसके इर्दगिर्द

कपटी स्वार्थी और चाहते रहते कुछ न कुछ

कान लगाकर नोट करते षडयंत्रकारी

उसकी हर बात

उन्हें कभी कुछ नहीं मिलता

सिवाय एक विनम्र ख़बरदारी के

फिर वह चाहे एक नमस्ते हो

जैसे वो ख़ुद आया था कभी

कुछ लोग उसके पास आते थे दूर से

उम्मीद और गाँव घर की भेंट के साथ

मित्र परिचित रिश्तेदार अजनबी

कोई आता बीमार कोई खाली हाथ

उन्हें वो पानी देता था पीने के लिए

थकान उतारने के लिए जगह

ओढ़ने के लिए चादर

पढ़ने के लिए किताब 

किसी को पकड़ा देता कलम किसी कोपेंट ब्रश

दौर की खुरदुरी दीवार पर अभिव्यक्ति के लिए   

जिनके पास लौटने के पैसे नहीं होते

उन्हें बस का किराया देता अंततः 

वो सबको एक विचार देकर विदा करता था

एक रोज़ इसी तरह विदा हुआ ख़ुद भी।

लेकिन जाने से पहले के दिनों में

दोस्तों के बीच 

तब वह कोई भी पहर हो

कहताः शुद्ध कल्याण सुनो मेरा 

और फिर गाता ही चला जाता 

अपनी विख्यात ज़बानी अटकन के किनारे किनारे

दोस्तों की उतनी ही विख्यात दिल्लगी के बीच

क्या ही होता शुद्ध-अशुद्ध उस गाने में

झिलमिलाता था बस

एक स्वच्छ निश्छल मन मंगलेश का।

7. भिन्न समय

(पंकज बिष्ट के लिए)

जब एक दोस्त ने पूछाः 

‘पहल’ बंद होने के बाद ही तो 

तुम‘समयांतर’ में लिखने लगे?

सवाल पर मैं सकपकाया 

फिर उसने थोड़ा हँसते कहाः 

उकसाने को पूछा, बस यूँ ही!

पहल तो चलती ही चली गयी थी

और समयांतर में दाख़िल हो गयी थी

मैंने कहना चाहा था

देखने के तरीके 

कहाँ से कहाँ लिए जाते हैं जैसे 

80 पर पहुँच रहे आज़ाद मुल्क के दरवाजे पर खड़े

80 पार के एक बुज़ुर्ग को देखना

असहमति के साहस और सहमति के विवेक के साथ

कुछेक पतले, चरमराते से पन्नों की लाल बॉर्डर वाली 

एक किताब को लहराता 

एक पर्चे की तरह

एक रुमाल की तरह

एक ज़िद की तरह 

एक जुनून की तरह

जिसमें पड़ती रहती थीं सलवटें

एक सैलाब बन जाता था

और बनते रहते थे सवाल

या वे बहुत सारे ख़्याल थे बिखरे हुए हवा में

या वो कोई पंखवाली नाव थी

या वह कोई चिड़िया थी

अपनी उड़ान में 

कभी बैठती कभी फड़फड़ाती 

कभी टहोकती दरवाजे को अपनी चोंच से

क्या तो होगा उस चिड़िया का नाम?!

भूले तो नहीं? बताओ,

बताओ पंकज दाज्यु! 

हमारे कीनू रीव्स!

वह बर्फ़ की सफ़ेदी

सेमल के फूल के रुओं जैसी

उत्तरी गोलार्ध का वह प्रतिनिधि चेहरा 

वह आर्द्रता वह प्रश्नवाचकता

और वे आँखें खोजती रहीं न जाने कबसे

एक भिन्न समय

एक भिन्न समय की स्वर-लिपि

एक भिन्न समय का राग

समयांतर!

8. एक अपना रब्बीनामा 

(इब्बार रब्बी के लिए)

कवि जैसा तो बिल्कुल ही नहीं लगा वो

ऐसा झटके दे देकर कौन हँसता है भला

आख़िर बच्चों की तरह अपनी ही बात पर

रेल तो कब की पहुँच चुकी दिल्ली से देहरादून

पटपड़गंज़ की गप जितनी लंबी नहीं है वो।

चाँदनी चौक और जामा मस्जिद

और क़ुतुबमीनार और हुमायूँ का मक़बरा

पुराना क़िला रोड लोधी रोडख़ान मार्केट

लुटियन दिल्ली हाट ठाठ-बाट

सब अपनी जगह हैं, फिर आएँगे

अभी तो बस आईटीओ ही आया है

पर मुझे भी घर जाना है

चलता हूँ ध्यान रखिए आप

कहकर उठता हूँ जाने के लिए

सिंधु घाटी, मिस्र, फारस की 

सदियों पुरानी दावत से…।

इतना पढ़ना इतने दोस्त इतना चलना 

इतनी दिल्ली इतनी धूप और 

विस्फारित-सी वे आँखें

टटोलते ही चली जातीं

आदमी तो आदमी, दौर के दौर

स्मृति का अटक जाता धागा कभी

किसी ऊँची उठती नस के उभार में

फिर सहसा ही छूट आता और लहराने लगता 

प्रतिरोध की तख़्ती जैसा

और वह मुस्कान खिंची हुई

एक छोटी सी प्यारी कविता 

पंछी बनकर जा उड़ती बैठ जाती डाल पर

मैंने देखा है जादुई टोपी का यह कमाल 

जब पहनकर उतरे थे जनाब सर्दियों में

एक रोज़ घाटी के एक घर में।

मेहनत से तपे हुए एक राग जैसी बढ़त

और जो फैलाव है इब्बार में

महासागर जैसा

वैसा ही है बोलने में लिखने में सोचने में 

और अधीरता भी वही है समन्दर वाली

ज़ोर से बुलाओ तब जाकर कहीं पहाड़ से 

नहीं पटपड़गंज के पीछे से झाँकते-झेंपते निकलते हैं 

हमारे रब्बी।

***

परिचयः

हिंदी कवि, लेखक, अनुवादक और पत्रकार शिवप्रसाद जोशी करीब तीन दशकों से टीवी, रेडियो और ऑनलाइन पत्रकारिता करते रहे हैं. एमए राजनीति शास्त्र, एमए पत्रकारिता और जनसंचार, पीएचडी. दो कविता संग्रह (रिक्त स्थान और अन्य कविताएँ, गिनती के बाहर), जर्मनी के बॉन शहर में प्रवास पर केंद्रित एक डायरी/ट्रैवेलॉग (किनारे किनारे दरिया), और नोबेल रचनाकारों पर केंद्रित आलेखों और अनुवादों की पुस्तक (नोबेल के कुछ नाम) प्रकाशित. वेब पत्रकारिता और न्यू मीडिया पर दो किताबों के सह-लेखक. लातिन अमेरिकी कवियों इयुखेनियो मोंतेहो और युआन गेलमान कीप्रतिनिधि रचनाओं पर अनुवाद पुस्तिका तनाव के दो अंक. पत्रपत्रिकाओँ और वेबसाइटों में आलेख, ब्लॉग, निबंध, अनुवाद. डॉयचे वेले (जर्मन रेडियो) की वेब सेवा में फ्रीलांस कार्य।

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