नवान

प्रकृति करगेती

Prakriti Kargeti

चेतावनी:
इस कहानी में आत्महत्या से जुड़ी बातें हैं।अपने मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही इसे आगे पढ़े।
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पूरे गाँव में, सिर्फ़ एक ही दुकान में वो मिलता था। गाँव, जहाँ मक्खियाँ और खटमल बहुत थे। वो जो मक्खियों और खटमलों को मार सकता था। और उनके अलावा भी… गाँव वालों को नवान की ज़रूरत इसीलिए पड़ती ही रहती थी। गाँव वाले घरों में नवान छिड़का करते और कभी यूँ भी होता कि ख़ुद ही उसे गटक जाते। उस गाँव में बिजली नहीं थी, इसलिए पंखे नहीं थे। इसलिए पंखों से लटककर मरने का विकल्प भी नहीं था । अगर बिजली होती भी, तब भी पंखों से लटकने का विकल्प शायद ही रहता। वो पहाड़ी इलाका था। पहाड़ियों से कूदकर मरने का विकल्प बहुत दर्दनाक लगता था। इसलिए नवान काम आता। दुकानदार का नाम हरी ओम पड़ा था। हरी ओम इसलिए क्योंकि वो डकारने और पादने के बाद ‘हरी ओम’ कहता था। असली नाम उसकी डकार और पादों के साथ ही उड़ गया था। बीवी हमेशा ही ‘बसंती बाज्यू’ (बसंती के पापा) कहकर पुकारती, और बच्चे ‘बाज्यू’ कहते थे। गाँव के लोग अपने नाम के गुम हो जाने से डरते नहीं थे। उनकी गाँव की परंपरा में किसी का कुछ होना ही काफ़ी था। ‘श्यामुली इज’ (श्यामा की माँ), ‘ध्यान सिंह चौय्ल’ (ध्यान सिंह का बेटा), प्रकाशक नाति (प्रकाश का नाती), ऐसे ही कितने नाम उस गाँव में रोज़ ही बिना किसी दिक्कत लिए जाते।

पर ‘हरी ओम’ के हर बच्चे का नाम पूरे गाँव में सब जानते थे। सब के सब अपनी ज़िन्दगी के किसी न किसी पड़ाव पर नवान पी चुके थे। पुलिस केस भी बन चुके थे। पुलिस केसों के बाद लोगों के नाम गाँव में उभर आया करते। वो नाम जो बदनाम होते थे। वो नाम जो किसी का कोई होना छोड़ अपनी बदनामी का बोझ उठाने लगते। इसलिए हरी ओम के घर के हर बच्चे का अपना एक बदनाम नाम था। क्रमशः बसंती, दिगंबर, और सोनू। पर हरी ओम की बीवी ‘बसंती इज’ ही रही, शायद इसलिए क्योंकि बसंती नाम में भी बदनामी ही थी। बसंती, हरी ओम की सबसे बड़ी बेटी, कभी-कभी सोचती कि वो कैसा गाँव था जहाँ लोगों से ज़्यादा ज़रूरी लोगों की बदनामी होना था। उसके घर की बदनामी उसी से शुरू हुई थी। उसके नवान पीने के बाद। बसंती रोज़ सुबह नल पर पानी लेने जाती थी। नल के पास आसपास बहुत सी दुकानें थीं। आसपास की दुकानों का
पता था ‘नल के सामने’, ‘नल के बगल में’, ‘नल के पीछे’ या बस ‘नल के पास’। जैसे नील नदी के आसपास एक सभ्यता पनप जाती है, वैसे ही मानों उस एक अकेले नल के पास वो सारी दुकानें पनप गयी थीं। पर उस नल के आसपास दुकानों के अलावा बहुत कुछ और भी पनपता था। पानी की ये अपनी माया है , जो चिप-चिपी काई बनकर जीने की आस उगा देती है। काई जो फिसलन भरी होती है। उस काई पर बसंती के फिसलने की संभावना भी बहुत थी। असल में वो फिसलने से संभलते वक़्त फिसल गयी थी। बसंती ख़ाली घड़ा लेकर आती थी। भरा वापस ले जाती थी। और इन दो घटनाओं को जोड़कर रखने की एक और घटना भी रोज़ हुआ करती। बसंती का बस इतना कहना “ मुनौम धर दियो” (सिर पर रख दो) रामसिंह हवलदार के बेटे को दुकान से बाहर खींच लाता। वो रोज़ घड़ा भरने के बाद बसंती के सिर पर घड़ा रखता। बसंती के ख़ाली सिर पर घड़ा चढ़ते ही उसका संतुलन डगमगाता। रामसिंह हवलदार का बेटा संभाल लिया करता। थोड़ा पानी अक्सर छलक जाया करता। ये सँभलते हुए फिसलने का सदाबहार खेल था, जिसमें सदियों से खिलाड़ी बदले थे, खेल वही पुराना था। खेल का अंत बस एक, हार !

बसंती को पता भी नहीं चला कि रोज़ थोड़ा-थोड़ा पानी छलकाकर, वो ख़ुद को कब पूरी तरह वहाँ छलका गयी। लोगों ने भी छलकना देखा। छलके हुए पानी की छोटी-छोटी नदियाँ बनाईं और उन्हें रास्ता देकर हरी ओम के तलवों तक पहुँचाया। बाप मानों बेटी की इस गुस्ताख़ी के लिए तैयार था। बच्चों के बारे में शिकायतों के आने का अपना एक वक़्त होता है, एक उम्र होती है। जब छोटे होते हैं, तो बचपन की भोली-भाली शरारतों, ग़लतियों की शिकायतें आती हैं- जैसे किसी बच्चे से लड़ाई, किसी बच्चे का सामान हथियाना, या स्कूल न जाना। पर जवान होते-होते, शिकायतों का मिज़ाज बदल जाएगा, इसका अनुमान हरी ओम को भी था। और जवान बेटी की एक ही शिकायत आ सकती थी, या एक ही शिकायत के मायने थे। बचपन छूट गया था, पर जवानी की एक ग़लती होना अब भी बाकी था। किसी लड़के के साथ उसका ‘चक्कर’! गाँव की शब्दावली में ‘चक्कर’ एक सामान्य शब्द था, पर ऐसा शब्द जिसका इस्तेमाल अलग-अलग बातें कहने के लिए किया जाता, जैसे वो शब्द नहीं कोई औज़ार हो। ‘आज फलाँ-फलाँ जगह के चक्कर लग गए।’, ‘किन चक्करों में पड़ गए ?’, ‘फलाँ और धिमका का चक्कर है।’ वैसे तो सबके नकारात्मक अर्थ निकाले जाते थे, पर तीसरा ‘चक्कर’ सबसे लोकप्रिय, या कहिये बदनाम था।

‘बसंती का चक्कर’ भी होता ही, ऐसा हरी ओम का अनुमान था। बसंती सुन्दर थी। और सुन्दर लड़कियों के ‘चक्कर’ होते हैं ये उन गाँव वालों के लिए ‘सूरज पूरब से उगता है’ जैसा सच था। हरी ओम के पास इस सच को जानने समझने के तथ्य भी थे। जवानी में सुन्दर लड़कियों को वो भी देखा करता था। उसकी बेटी को भी जवान लड़के देखते ही होंगे। तभी तो उसने बसंती के खिड़की पर ज़्यादा देर खड़ी रहने पर अंकुश लगाया था, और कहीं भी ज़्यादा देर बाहर रहने पर भी। और तो और लड़कों से हँसते-खिलखिलाते बात करते देख लेता तो आग बबूला हो जाता। पर उस दिन वो आग बबूला नहीं हुआ। आज तो उसकी चिंताओं का घड़ा भरा था। उसके बाद घड़ा फूटने वाला था। चिंताएँ ख़तम होने वाली थीं। उसे पता था कि क्या करना था। कोई समाधान नहीं ढूंढना था। काम आसान था। एक थप्पड़ ने घड़ा फोड़ दिया, और कुछ लातों ने फूटे घड़े के टुकड़ों को मसल दिया। जवान लड़कियों के चक्करों के इतिहास का वो पहला थप्पड़ नहीं था। वो थप्पड़ भी, इतिहास के गुमशुदा पन्नों में दर्ज हो गया। बाप ने आगे कुछ नहीं कहा।

बसंती मूक सी बनकर बैठी रही। पहले मार खाने के गुस्से को पिया। गुस्सा जो बहुत कड़वा था। गुस्सा जो नवान से पहले का ज़हर था। और नवान जो उसने गुस्से में गटक लिया, जो झाग बनकर गुस्से के ग़ुबार को बाहर लाया। गाँव में ख़बर फैली। ख़बर पटवारी तक पहुँची। पर बात को दबा दिया गया- छोटे से गाँव में ख़बर दबाना कितना मुश्किल हो सकता था? बिल्कुल नहीं। नवान तो आहत हुए अहम की एकमात्र दवाई थी। उस नवान से निकले झाग के बुलबुलों को फोड़ दिया गया।

रामसिंह हवलदार का बेटा नवान पीने वाली को घर में भी नहीं ला सकता था। उस गाँव में प्यार का हर ख़याल लोगों के कहने से पहले ही ‘लोग क्या कहेंगे?’ पर ख़त्म हो जाता था। गाँव की भाषा में बसंती अब भी ‘घर पर पड़ी हुई थी’। पड़ी हुई थी — जैसे दुकान में हफ़्तों पुराने टमाटर पड़े हुए थे, ‘पड़ी हुई थी’ — जैसे सालों से न बिकने वाला कोई रेडीमेड सूट, ‘पड़ी हुई थी’ — जैसे आख़िरी तारीख़ लाँघ चुकी कुछ दवाएँ। हरी ओम की दुकान पर सब मिलता था। नया, पुराना, सब कुछ। नया आया हुआ था, पुराना पड़ा हुआ था । बसंती पहले दुकान में बैठती थी, पर अब वो दुकान और घर के हर कोने में बस ‘पड़ी हुई थी’ । बसंती जब भी दुकान में सामान बेचने बैठती, वो हर ‘पड़ी हुई’ चीज़ के बारे में सोचती, और सोचती उनके बिकने की सम्भावना के बारे में। और उसे हरी ओम की हालत पर तरस आता कि दुकान की ‘पड़ी हुई’ चीज़ें देर सबेर शायद बिक जाएँ, या उन्हें फ़ेंक दिया जाए, पर ‘पड़ी हुई’ बेटी के लिए न कोई खरीददार था और न ही कोई कूड़ेदान बना था। बल्कि उसका घर ही एक कूड़ेदान था। पर बसंती के साथ हुई घटना के बावजूद, न तो दुकान में नवान आना बंद हुआ, न ही लोगों ने नवान खरीदना छोड़ा। हरी ओम के घर में भी नवान पीने की धमकियाँ और बढ़ गईं। पर उन्हें सिर्फ़ धमकी ही समझा गया। कभी-कभी बसंती सोचती कि अगर नवान पिया गया तो पहले कौन पिएगा- दिगंबर, जो गुस्से से तेज़ था, या सोनू, जो शांत स्वभाव की थी। पर इन तमाम विश्लेषणों के परे, इस बार नवान ‘बसंती इज’ ने पिया । बसंती की माँ के नवान पीने का कोई ‘ख़ास’ कारण नहीं था। बस इतना कि हरी ओम से लड़ाई हो गयी थी, और तैश में आकर नवान की शीशी गटक गयी थी। अफ़वाह ये भी थी कि हरी ओम ने ख़ुद बीवी को ज़बरदस्ती नवान पिलाया था क्योंकि उसके पास की ही दुकान में चूड़ी बेचने वाली से उसके सम्बन्ध बन गए थे। हरी ओम की बीवी को गठिया था, और उसे औरतों से जुड़ी कई बीमारियाँ अक्सर लगी रहती थीं। हरी ओम की रातें दुश्वार थीं। इसलिए विकल्प के तौर पर चूड़ी वाली के सहारे जीवन-व्यापन हो रहा था, ऐसा लोगों का कहना था। ऐसे सम्बन्ध बनाये गए थे , जिसके लिए बीवी को छोड़ने की ज़रूरत नहीं थी। बसंती की माँ को भी नहीं छोड़ा जाता। पर बसंती की माँ को जब पता चला, उसने ख़ूब हंगामा किया। बात आगे बढ़ती कि हरी ओम ने गुस्से में ज़बरदस्ती मुँह पकड़कर नवान की शीशी मुँह में उड़ेल दी। पर ये सब अफ़वाहें थीं। बसंती की माँ भी इन्हें अफ़वाहें ही कहती थी। गाँव वाले भी मान लेते थे। बस अफ़वाहों को अफ़वाहों की तरह जिंदा रखते, जो खुसुरफुसुर की भाषा के अलावा कभी असल भाषा में तब्दील नहीं हुई। अब घर के दो सदस्य नवान पी चुके थे। दोनों ही ज़िन्दा थे। पहले से ज़्यादा। मौत को छूकर वापस आने वाले आधे मरे हुए नहीं होते, बल्कि ज़िन्दगी में थोड़ा और जोड़ लेते हैं। उनके जीने में, उनका मरना भी जुड़ जाता है। बसंती और बसंती इज, दोनों ही जैसे जीवन की दौड़ की समापन रेखा से थक-हार कर अपने-अपने दौड़ के मैदान पर चलकर वापस आ रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि कितना वापस आना है। नहीं पता था कि जीवन अब कहाँ से शुरू होना था। दोनों को ही पुलिस केस की स्थिति से बाहर निकाला गया था। और दोनों ही दो दिन के आराम के बाद ठीक हो गए थे। पर वो थकान से चकनाचूर थे। हाँफते हुए ज़िन्दगी की दौड़ फिर से लगानी थी। वो भी उलटी दिशा में।

अब नवान ख़ुद को पिलाने का नया बहाना ढूंढ रहा था। प्यार और अधिकार की लड़ाई के बहाने से अलग, वो बहाना मिला सोनू के साथ हुई एक घटना के बाद। सोनू, जो हमेशा चुप-चुप रहती थी। सोनू जो हमेशा चुपचाप घर के काम किया करती थी। जिसे बसंती के पानी लाने के काम को भी सौंप दिया गया था। वो जो ‘हरी ओम’ को नहाने के लिए गर्म पानी दिया करती थी। तो हुआ यूँ कि एक दिन, सोनू अपने रोज़ के कामों के बाद हरी ओम को पानी देने गई। शायद हरी ओम बहुत देर से बिना कपड़ों के बैठा था, नहाने की प्रतीक्षा में। शायद पानी आने में देर हो गई थी। सोनू दौड़ती हुई पानी लेकर गई, और हरी ओम उस पर ज़ोर से चिल्लाया। उसकी दौड़ को एक झटका लगा, संतुलन बिगड़ गया। उस दिन डेगची के सारे गर्म पानी से सोनू नहा गई — ऐसा नहाना, जिसमें जलना भी शामिल था। उसकी चमड़ी का रोम-रोम गर्म पानी से झुलस गया। और वह कुछ इस तरह नीचे गिरी कि छाती और जांघ की चमड़ी एक-दूसरे से चिपक गई। छाती ने जांघ छीली, या जांघ ने छाती — यह कहना मुश्किल था। उसे तुरंत एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया। जब वह होश में आई, तो खुद को पट्टियों में लिपटा हुआ पाया — जैसे वह मिस्र की कोई ममी हो। कई महीनों तक ममी बनी रही। जब पट्टियाँ खुलीं, तो उसने देखा — छाती और जांघ अपनी सारी समतलता खो चुकी थीं। क्योंकि प्लास्टिक सर्जरी के बाद की चमड़ियों में रफ़ू जितनी सफ़ाई भी नहीं होती।

सोनू की ख़ामोशी और ख़ामोश हो गई। उसे जैसे अब पता चल गया था कि उसके नवान पीने का सही वक़्त आ चुका था। उसने कभी नवान पीने की धमकी नहीं दी थी। पर उसके पास हर वो कारण था जिससे वो ये कदम उठा सकती थी। वो भी बसंती की तरह ‘पड़ी हुई’ हो चुकी थी। पर ‘पड़ी हुई’ में एक और विशेषण जुड़ गया था— ‘जली चमड़ी वाली, पड़ी हुई बेटी’। शादी के दरवाज़े, जिनसे वो दूसरे घर जा सकती थी, वो गायब हो चुके थे। सामने जो दिखती थी, वो थी हरी ओम के घर की दीवारें। हरी ओम, जिसे उसने फ़िर से गर्म पानी देना था। शायद ज़िन्दगी भर देना था। पर ये ध्यान रखते हुए कि अबकी बार देर न हो। हरी ओम जो दो ‘पड़ी हुई’ बेटियों के बोझ तले दब चुका था। हरी ओम जो दूसरी बेटी के फिसलने का कारण था, पर उसके नाम कोई सज़ा मुक़र्रर नहीं थी। वो तो बोझ तले दबा हुआ एक बाप था। पर सोनू के नवान पीने, और उसे बचाने की प्रक्रिया आसान थी। इस बार तो पटवारी ने भी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं ली- जैसे वो अपनी घूसखोरी के नए आयाम ढूंढ रहा हो। ये नवान गटकने का किस्सा अब पुराना हो चला था।

हरी ओम के लिए भी यह किस्सा पुराना था। पर वह एक बेटे का भी बाप था — दिगंबर, जो जवान हो रहा था, जिसे हरी ओम अपने जैसा बनते देखना चाहता था। इकलौता जवान बेटा। ये तीनों शब्द मिलकर दिगंबर को एक अमूल्य हीरा बनाते थे — वह हीरा जिसकी कीमत शादी के वक्त लगनी थी। पर यह अमूल्य हीरा अभी तक तराशा नहीं गया था। उसकी उम्र ही क्या थी — अठारह साल। बस। पर ‘सिर्फ़ अठारह साल’ की भी तो एक उम्र होती है। अठारह साल के अपने कायदे होते हैं। हरी ओम की चिंता यह थी कि अठारह साल की उम्र तक किसी का विकास सिर्फ़ कॉमिक्स के बंडलों में उलझकर कैसे हो सकता था? यूँ तो कॉमिक्स लाकर देने का पहला काम हरी ओम ने ही किया था, इस इरादे से कि बेटा शहरी बच्चों की तरह नए और फैशनेबल शौक पाले। और क्योंकि कॉमिक्स में पढ़ना भी शामिल था, इसलिए इस लत में कोई दिक्कत नहीं दिखी। पर यह शौक दस साल तक खिंच चुका था — यह हरी ओम नहीं जानता था। जिन किताबों को बच्चे एक उम्र के बाद छोड़ देते हैं, उन्हें दिगंबर सीने से लगाए रखता था। अगर इस लत को दोष कहा जा सकता था, तो बस यही एक दोष उसमें नज़र आता था। उसके गुस्सैल व्यवहार को दोष कम, बढ़ते आदमी के लक्षण ज़्यादा समझा जाता। और अभी तक उसका गुस्सा एक ही चीज़ से झलकता था — उसके कॉमिक्स-प्रेम से।

कॉमिक्स-प्रेम, जो कभी-कभी उसे हाथापाई पर उतार देता था। एक दिन दिगंबर एक लड़के से लड़ाई कर रहा था। जब हरी ओम बीच-बचाव करने आया, तो उसने पास में गिरी एक कॉमिक्स उठाकर देखी। वो एक कॉमिक्स पत्रिका थी, जिसमें भड़कीले रंगों से बने छोटे-छोटे खानों में भरी तस्वीरें थीं। हर खाने के ख़त्म होते-होते मार-धाड़ शुरू हो जाती थी। तमाचे लगते तो चित्रों के चेहरों के पास ‘तड़ाक!!’ लिखा होता, घूंसे पड़ते तो ‘धिसूम!!!’ लिखा होता। हरी ओम हैरान होकर कुछ देर कॉमिक्स के पन्ने पलटता रहा। थोड़ी देर के लिए वह भी भूल गया कि उसे लड़ाई रोकनी थी। याद आने पर उसने दिगंबर को बस एक तेज़ थप्पड़ जड़ दिया था। दूसरा लड़का दुम दबाकर भाग गया। थप्पड़ों की भाषा पर उसे खासा भरोसा था। उसका थप्पड़ जैसे कोई मैग्नेटिक फ़ील्ड बना देता हो — सभी पंक्तिबद्ध हो उसके आसपास तैनात हो जाते। ऐसे सन्नाटे के बाद अक्सर हरी ओम मैदान छोड़ चला जाता था। उस दिन भी उसने मैदान छोड़ा, पर इस बार एक काम को अंजाम देने के लिए। दिगंबर की अलमारी से सारी कॉमिक्स उठाकर वह दुकान के सामने आया। ढेरों बंडल बरामदे में पटक दिए। दिगंबर दूर ज़मीन पर गिरा हुआ यह सब देख रहा था। वह दौड़कर आया, लेकिन तब तक हरी ओम ने कॉमिक्स के चिथड़े करने शुरू कर दिए थे। सस्ती बाइंडिंग वाली किताबों को फाड़ना आसान था। हरी ओम किसी दानव की तरह उन्हें फाड़ता और रौंदता गया। इस बीच उसकी लातें और घूंसे दिगंबर पर भी पड़े। पर दिगंबर फटे हुए कॉमिक्स के पन्ने सीने से चिपकाए बस रोता रहा। आसपास कुछ बच्चे जमा हो गए थे, जो उसकी इस हालत पर हँस रहे थे। उस समय दिगंबर की नन्ही-सी दुनिया पूरी तरह चकनाचूर हो चुकी थी। एक तरफ उसकी संजोई विरासत के चिथड़े उड़ रहे थे, दूसरी तरफ यह दुःख कि उन्हें उड़ाने वाला उसका अपना बाप था, और तीसरे, बाहर खड़े बच्चे — जिनके साथ वह रोज़ खेलता था — वही अब हँस रहे थे। बच्चों की दुनिया ही उसका दायरा थी; उसी में उसने अब तक दुनिया देखी थी। पर वह यह भूल गया था कि वे बच्चे थे और वह 18 साल का लड़का, जो यह सब सोच सकता था। फिर उसे याद आया कि वह एक और चीज़ सोच सकता था, जो वे बच्चे नहीं सोच सकते थे। उसके 18 साल वाला गुस्सा उबल रहा था। उसने दिमाग में बहुत से ख़याल गढ़े। फिर क्या था — मौका देखते ही, घर की पुरानी परंपरा निभाते हुए, दिगंबर ने भी नवान के चार-पाँच घूँट लगा लिए। फिर वही झाग, वही खुसर-पुसर, वही पटवारी के चक्कर, और वही ज़हर पीने के बाद मिली ज़िन्दगी।

अब हरी ओम के परिवार में सभी ज़हर के घूँट पी चुके थे। बचा था तो सिर्फ़ हरी ओम। पर गाँव वालों को नहीं लगता था कि उसके जैसा विशालकाय आदमी कभी भी नवान पी सकता है। उसने पिया भी नहीं — इसलिए नहीं कि बाकियों की तरह वो भी बच जाता, बल्कि इसलिए कि नवान बेचना उसका काम-सा हो गया था। उसने बहुतों को नवान बेचा था — प्रेमी युगलों को, गर्भवती लड़कियों को (कयास तो यहीं रहते थे), त्रस्त पतियों को, त्रस्त पत्नियों को। कहीं नवान काम कर जाता था, कहीं नहीं करता था — जैसे उसके घर में बिल्कुल भी असर नहीं किया।

लोग कहते, जैसे दूध वाले के बच्चों को कभी भी दूध नहीं लगता, वैसे ही शायद हरी ओम के बच्चों को भी नवान नहीं लगता। इस न लगने के डर से भी कई घरों में नवान बस हथियार बनकर दराज़ों में पड़ा रहता था। इंसान तो दूर, उससे खटमल या मक्खी भी नहीं मारे जाते थे। हरी ओम सोचता — क्या नवान के सिलसिले यूँ ही ख़त्म हो जाएँगे? क्या इतनी विफल मौतों के बाद उसका नवान बेचना बंद हो जाएगा? उसके घर में ही चार विफल मौतें थीं। ऐसा नहीं था कि वो अपनी बीवी या बच्चों की मौत चाहता था, पर एक दुकानदार होने के नाते उसे अपनी दुकान में बिकने वाले सामान पर शर्मिंदगी तो थी ही। क्योंकि दुकान में बिकने वाला झाड़ू झाड़ता था, दवाएँ असर करती थीं, थान से कटे कपड़े लंबे चलते थे। पर उसका नवान कितनी ही बार विफल हो चुका था। उस पर जो बदनामी हुई, सो अलग। एक दिन हरी ओम इन्हीं विरक्ति भरे ख्यालों में डूबा हुआ था कि तभी एक बड़े घर की लड़की वहाँ आई। वो भरी दुपहरी में आई थी — गर्मियों की वह दुपहरी जब चूल्हे-चौके के बाद पूरा गाँव सुस्ता रहा होता। वो लड़की नवान लेने आई थी। हरी ओम इतना गणित लगा ही सकता था कि नवान को ‘जवान लड़की के चक्कर’ को ख़त्म करने की दवा समझकर लिया जा रहा था। यह ख़याल उसकी सारी विरक्ति को रौंद गया। उसने एक छोटी-सी शीशी वाला नवान उस बड़े घर की लड़की को थमाया। लड़की ने घूरकर हरी ओम की तरफ देखा — जैसे पूछ रही हो, “गैरंटी है न?” हरी ओम बस मुस्कुरा दिया, बिना यह कहे — “ख़ुद ही देख लेना, मुझे भी पता चल जाएगा।” लड़की के जाते ही हरी ओम ने एक लंबी डकार ली, जैसे बरसों से रोककर रखी हो। उसे एहसास हो गया था कि इसी बड़े घर की लड़की की ख़बर उसके परिवार पर लगी कालिख को पोंछ डालेगी। वैसा ही हुआ भी।

उस दिन से वह बड़े घर की लड़की कभी नहीं दिखी। हरी ओम ने मान लिया कि नवान ने अपना काम कर दिखाया। पर इस सफल काम के इश्तेहार बाँटे नहीं जा सकते थे। बस अफ़वाहें फैलाई जा सकती थीं। बसंती की माँ ने नल के आसपास से ही शुरुआत की। मानों बसंती की बदनामी की काई साफ़ करने का इंतज़ार वह कब से कर रही थी। पहले लड़की के ग़ायब होने की बातें — “कहाँ गई?”, “आजकल दिखती नहीं?”, “सब ठीक है न?”, वगैरह-वगैरह। और फिर चिंताओं में यह भी जोड़ दिया गया कि फलाँ-फलाँ दिन वह लड़की नवान लेने आई थी। धीरे-धीरे ख़बरों की लड़ी में लड़की की आत्महत्या भी जुड़ गई। एक ग़ायब हुए लड़के से उसका नाम भी जोड़ा गया। पर ख़बर वहाँ पर ख़त्म नहीं हुई। क्यों, कब, कैसे, — इन जानकारियों ने भी अपनी जगह बना ली। ख़बर की नियति थी हैरान करना। वह हैरानी जिसका गाँव वाले हमेशा इंतज़ार करते थे। ख़बर की नियति बढ़ते रहना भी थी। वह बढ़ती गई। जानकारियों का सच होना मायने नहीं रखता था, बस उनका होना मायने रखता था। पर यह भी सच था कि पुरानी जानकारियाँ इतिहास बन जाती थीं — धुंधली, कम ज़रूरी, जैसे अख़बारों की रद्दी।

हरी ओम के परिवार की ख़बरें रद्दी के नीचे दबती चली गईं, और बड़े घर की लड़की के नवान खरीदने और फिर ग़ायब हो जाने की बात ताज़ा अख़बार बनी रही। नवान की बिक्री भी बढ़ गई। अब बसंती बड़े उत्साह से नवान बेचती थी। अपनी बदनामी की कालिख उसने अपने ही हाथों से पोंछ डाली थी। बसंती की माँ को अफ़वाहों को हवा देने का ज़रूरी काम मिल गया था। बसंती अब भी वहीं पड़ी रहती, और सोनू अब भी गरम पानी हरी ओम को देती थी। थोड़ा लचकते हुए, पर ठीक समय पर। दिगंबर को बाज़ार में आई नई-नवेली सीडी-डीवीडी का चस्का लग गया था। हर कोई अपने-अपने काम में मग्न था। पर नई ख़बरें और अफ़वाहें अब भी अपने पर्चे बाँट रही थीं। बस इस बार उनमें हरी ओम का परिवार कहीं नहीं था। और इस सबका सबसे ज़्यादा आनंद ले रहा था हरी ओम। अपनी बढ़ती पादों और डकारों की तीव्रता के साथ।

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प्रकृति करगेती
कहानीकार, पटकथा लेखक, कवियत्री.
रचनाएँ : कहानी संग्रह : ठहरे हुए से लोग, कविता संग्रह -दो ध्रुवों के बीच, शहर और शिकायतें
prakriti.kargeti7@gmail.com

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