अफ़सानों से जिया का किनु किनु- इम्तियाज़ अलीः‘मैं वापस आऊँगा’

सुमन शेखर

Suman Shekharउम्र भी कमाल की चीज़ है। बढ़ने को बहाने हों, तो तेज़ भागती है, अड़ने को फ़साने हों तो धीमे-धीमे राह चलती है। मैं इस उम्र में आकर भी उस उम्र की गिरफ्त में हूँ। अतीत वर्तमान को निचोड़ लेता है। साइकिल की घंटियों के साथ-साथ मेरी आँखें हरकारा सी ढूंढती रहीं तुम्हें। तुम मिल जातीं, आँखें पढ़ लेतीं, आँखें जाने और भी क्या-क्या कहना चाहतीं सब कह जाने के बाद, आँखें जानें क्या-क्या पढ़ जाती, सब पढ़ लेने के बाद।

तुमसे छूटा, छूटा हूँ पूरा का पूरा। जो बचा है, वह महज़ खंडहर, वीरान पड़ा घर है, जिसमें एक समय के बाद परिंदे भी पर उतारने से कतराते हैं। मैंने सुनी है आवाज़ों की चुप्पी, मुस्कुराने की हलचल, वादे की गर्माइश। दबी आवाज़ें चीख का आकार ले लेती हैं। खुद के साथ ज्यादती करने वाला दूसरों को भी उसकी आदत डाल देता है। मैंने देखा है अपने बेटे की आँखों में अपने बाप के लिए गुस्सा। अनकही बेचैनी। काश.. तुम्हारी आवाज़ों के सुर हवा पर बैठकर धीमे-धीमे आ पहुँचते, और बता जाते कैसी है जिया ? अब भी जिया का ‘किनु किनु..’ कितना याद है! कांप जाता हूँ इसके अगले सवाल का धुंधला चेहरा देख। 

“तुम वापस नहीं आये, क्यों किनु ?”

“…” 

“तुमने कहा था मैं वापस आऊँगा। वापसी के रास्ते इतने लंबे नहीं होने चाहिए। वादों को इतना बिगड़ैल नहीं होना चाहिए। प्यार को इतना बेतरतीब नहीं होना चाहिए। बंटवारे नहीं होने चाहिए। आख़िर एक ही ज़िंदगी है- कितना कुछ बाँट पाएंगे। किनु, बंटवारे में मेरे सीने पर खिंची लकीर के लिए कौन रोएगा! कौन मांगेगा माफी! कौन कहेगा कि लकीर यूं ही खींच दी तो यहीं से क्यों उतारी उसकी धार! कहीं और भी जा सकते थे! मुझे ही क्यों चुना!”   

धीमे बहुत धीमे
उतरती रही आवाज़ मेरे कानों में
जैसे धीमे धीमे से उतरती है धूप
जैसे धीमे धीमे से चढ़ता है शाख पर पत्ता
जैसे धीमे धीमे यादें सोखती जाती हैं साँस
कोई काम करता होता
एक आवाज़ बार बार कानों में फुसफुसाती
मैं किताब के पन्नों में हाथ डाल शब्द टटोलता
उंगलियों में संदेह और छूटे वादे का गाढ़ा द्रव चिपक आता
यकीन मानो, अफ़साने
वापस से संतुलन में आने में,
कितनी रातें काटे कटतीं
करवटें बदलते, याद करते, उन यादों से भागते बिस्तर गीले पड़ जाते 

 

Main wapis aaunga

फिर भी सीने पर वज़न इतना भारी है उस झूठे वादे का जिया
मेरे हिस्से की सांसें मैंने तुम्हें छूटकर पाई हैं
इन साँसों को मुक्ति भी तुम ही दे सकती हो
प्यार ज़हर की तरह होता है
मुझे ऐसे नहीं खोना था

मुझे ऐसे नहीं सोना था। 

**

 

छूटने के बाद शहर की दो यादें रहती हैं- एक जहां प्रेमिका छूट गई, दूसरा जहां छूट गया घर, परिवार छूट गया। दोस्त, बचपन और बचपना छूट गया। छूटे हुए चेहरे पर उतरी अमावस कौन हरेगा ! स्मृति बम का गोला है, जब भी फटता है, भीतर फटता है। कौन से आँसू का नमक किस दुख का लवण लिए है! 

शिव बतालवी ने सही ही कहा है-
भरी जवानी जो भी मरता है,
फूल बन जाता है या तारा
भरी जवानी आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।  

मैं आशिक़ रहा, या रहा बिन माँ का आवारा ! ख़ुद पर रोना वक़्त-बेवक़्त बांध तोड़ बाहर आने वाली नदी की तरह बार-बार क्यों चला आता है!  

सरकार के पास ब्योरा नहीं है, मगर सबसे बड़े पलायन का इतिहास है। पलायन कमरे से होता है, घर से होता है, परिवार से होता है, जमीन से होता है, मोहल्ले, शहर, स्कूल, कॉलेज, गलियां, यादें, मासूमियत, पढ़ने, लिखने, हंसने, रोने, बोलने, सुनने, चयन, शौक, जीने से भी पलायन होता है, देश और दुनिया से भी होता है पलायन।

पलायन प्यार से भी होता है। 

नाइजीरिया के किसी कवि ने कहा था- 

सारे पलायन पर प्यार का पलायन भारी है। इसकी कोई भरपाई नहीं। बचा सको, तो चुनने में सबसे पहले प्यार चुनना। 

रियो डिसूजा, जन्म 1865 में कराची में हुआ था। पुर्तगाली शांतिप्रिय लोग थे, लेकिन प्रगतिशील नहीं थे। इसलिए कई गोवावासी बेहतर आजीविका के लिए बंबई और अफ्रीका चले गए। डिसूजा के दादा ने कराची को चुना। वे 19वीं सदी के अंत में अपने कुछ गोवावासियों के साथ यहां आए थे। पेड्रो डिसूजा की स्मृति में घर शब्द का सही-सही अर्थ नहीं है, न ही उसकी सटीक आकृति है। पेड्रो कहते हैं-”उन दिनों कराची एक घना जंगल हुआ करता था। मेरे दादा रियो डिसूजा ने कुछ ज़मीन साफ़ करके वहाँ एक बस्ती बसाने का फ़ैसला किया। इसे ‘सिंसिनाटस टाउन’ कहा जाता था। उन्होंने उस कस्बे में ‘सेंट लॉरेंस चर्च’ की नींव भी रखी। 1912 में मेरे दादाजी के निधन के बाद, उनकी सेवाओं के सम्मान में, कस्बे की ओर जाने वाली सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया। हमारा वहाँ अपना एक छोटा-सा घर हुआ करता था। मेरे दादाजी के सात बेटे और तीन बेटियाँ थीं, जो वहाँ रहते थे। उनकी मृत्यु के बाद मेरी दादी ने वह घर बेच दिया और हम सदर चले गए, जहाँ मैंने अपने बचपन के अधिकांश वर्ष बिताए। उन दिनों कराची के लड़के दुल्हन की तलाश में गोवा जाया करते थे। उन्हें लगता था कि उनकी जड़ें वहीं हैं और पिता अपनी बेटियों की शादी शहरों में काम करने वाले पुरुषों से करने के लिए उत्सुक रहते थे। इसी तरह मेरे पिता का विवाह मेरी माँ से हुआ और वे कराची आ गए और यहीं स्थायी रूप से बस गए।”  

**

“सरदार लखमत सिंह, जन्म 1937, लाहौर के लिए बँटवारा जीवन में गहरी तबाही की तरह आया। उन्हें अपने दादा और पिता के साथ भारत लौटना पड़ा। उस वक़्त उनकी एक मात्र बहन गहरी नींद में सो रही थी। सोती बहन को जगाकर क्या कहा जाता! बिना कुछ कहे, लखमत सिंह निकल गए। माँ ने धक्के देकर सबको बाहर निकाला था ताकि उन सबकी जान बच सके। वे कहते हैं- “हमें रातों रात उन्होंने जीवित रहने के लिए गंदे तालाब का सड़ा हुआ पानी पिया। श्रीमती अख्तर के पिता और चाचा ने अपने परिवार के लिए रहने की जगह पाने के लिए मकान मालिक को तीन महीने का किराया अग्रिम दिया। श्रीमती अख्तर याद करती हैं कि विभाजन के कम से कम दो महीने बाद भी बैंक चेक स्वीकार कर रहे थे क्योंकि उनका परिवार लोगों को भुगतान करने और पैसे निकालने के लिए उसी मुद्रा का उपयोग करता था। पड़ोसियों को यह शक न हो कि वे भागे हुए राजनीतिक शरणार्थी हैं, इसलिए उन्होंने ऐसा व्यवहार किया जैसे वे वहीं रहते हों। उनके पास खाने को कुछ नहीं था, इसलिए उन्होंने मिट्टी के बर्तनों में काले पत्थर उबाले। कुछ गरीब किसान उन्हें कंबल और भोजन देने के लिए आगे आए। जब सेना का एक ट्रक, जो उत्तरी राज्य कश्मीर पर अधिकार के लिए होने वाले आगामी युद्ध में इस्तेमाल होने वाले गोला-बारूद से भरा हुआ था, उस इलाके से गुजरा, तो श्रीमती अख्तर के पिता और उनके चाचा ने ट्रक चालकों को अच्छी ख़ासी रकम देकर अपने परिवार को खाली ट्रकों में बिठाने के लिए मना लिया। 

जब लखमत सिंह की मृत्यु हुई, उनके मुंह से केवल एक ही वाक्य दुहराया जा रहा था- ‘बहन मुझे माफ करना।’ बंटवारे के बाद लाहौर जाकर उन्होंने चप्पा-चप्पा छान मारा, बहन का पता नहीं मिला। लाहौर के बाहरी सीमा पर उन्हे पता चला उनकी सात साल की बहन का निकाह मस्जिद के मौलवी साहब, जो छियालीस बरस के थे, उनसे हुई है। सोलस बरस के लखमत खाली हाथ लौट आए। ज़ाहिर है, वह उस सोई हुई अपनी बहन से कभी मिल नहीं पाए। ”    

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“श्री मल, जन्म पेशावर, रूबाई नाम की एक लड़की से प्यार करते थे, उससे शादी की बात भी तय हो चुकी थी, बंटवारा हुआ, रूबाई के साथ साथ, अपनी माँ, बहनें, बुआ, मौसी, दोस्त सबको इस भरोसे छोड़कर भारत आए कि वापस आकर सब को घर ले जाएंगे। 

विभाजन उन्हें केवल उस भय, दहशत और खालीपन की याद दिलाता रहा, जिसने अचानक रोहरी को घेर लिया था। कुछ ही दिनों में शहर लगभग वीरान हो गया। रोहरी के लगभग सभी हिंदू भारत चले गए। विभाजन के बाद श्री मल स्थायी रूप से सुक्कुर में बस गए और 30 वर्ष की आयु में झूले लाल मंदिर के रखरखाव और प्रबंधन में अपना जीवन समर्पित कर दिया। इससे पहले वे मंदिर में तीर्थयात्रियों के लिए रसोइया का काम करते थे। सिंध के अलावा, वे गुरुपर्व के लिए नानकाना साहिब की तीर्थयात्रा भी कर चुके थे। वे विभाजन के बाद से ही मंदिर में रह रहे हैं और उन्होंने कभी शादी नहीं की। किसी भी सिख स्त्री को देखकर वह सुबक सुबक कर रो पड़ते थे।“ 

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“विभाजन का पलायन मानव इतिहास का सबसे बड़ा पलायन था। लगभग डेढ़ करोड़ लोगों ने अपना घर, अपनी जमीन, अपना परिवार, अपनी दुनिया सब छोड़ा। हालांकि यह चयन उन लोगों का नहीं था, जिनसे सब छुड़ाया गया। सियासत, समय और भारत-पाकिस्तान के बंटवारे ने पलायन कर चुके लोगों के अतीत में इतने घाव दिए, हर रात नींद से गहरे सदमे से जागते-जागते सो गए। कई ऐसे लोग थे जिनको ज़िंदगी भर वह ट्रेन याद आती रही, जिसपर बैठकर वह लौटे। चीखों से बजबजाती आवाज़ों ने उनके सीने में महीन खंजर घोंपे। जिन्हें किसी मेंटल असाइलम में जगह नहीं मिली, न ही किसी से उन्होंने कभी सीने में धधकती टीस, अपराधबोध और खालीपन उहोने बयाँ किया। पलायन के बाद नई ज़मीन, नए लोगों से बने कैंप से बाहर निकलकर घर खड़ा किया, परिवार बनाया, पैसा बनाया और अंदर-अंदर चुप रहते हुए अपने हिस्से की त्रासदी लिए ही चले गए। ”

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ऊपर दिए गए ब्योरे, अलग-अलग लोगों की कहानी और उनके दुख हैं। हालांकि दुख शब्द, इनको सहने वालों के लिए सही शब्द नहीं हैं। इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ में इन सारे लोगों की कहानी को लेकर समेटे चलने वाला ‘एक’ शख्स है- जिसे विभाजन के पहले किनु और विभाजन के बाद ईशर सिंह ग्रेवाल के नाम से जानते हैं। ईशर सिंह क्या थे, इनके भीतर एक लंबे समय तक खालीपन, ग्लानि और टूटन की कितनी परतें हैं, इसे उनका पोता निर्वैर कुरेदता है और हम उसी के जरिए जानते हैं सब। निर्वैर न होता, ईशर की आवाज़ भी बेचैनी में दम तोड़ जाती। अपने दादा के सीने में छुपी गहराइयों के ज़रिए आज का निर्वैर कल के प्यार केसहारे दादा और ख़ुद को समझता है।  

एक शख्स के भीतर करोड़ों की पीड़ा ! कितना और किस हद तक सह सकता है कोई ! 

लंबी चौड़ी देह जब स्ट्रेचर पर घूमती है, कितनी छोटी दिखने लगती है-उसकी दुनिया। उसकी दुनिया में अब केवल वह और उसकी जिया है। जिया उसके मौन में है। जिया उसकी साँस में है। जिया सारे शर्म के पार है। जिया सारे अवसादों के पार है। जिया ईशर के प्राण में है, छूटी नहीं है, वरना कब का वह छोड़ चुका होता है प्राण। बार-बार लौट आता है जिया के मौन की मार से।  

गर्भ में सीखा गया मौन, कितना बड़बड़ाएगा कब्र के पहले! 

“दुनिया खत्म हो चुकी है, पीछे पलटकर देखना नहीं है वीरे।” 

पीछे पलटकर देखना, न देखना हमारे बस में है! फिर भी नासमझी में करता हूँ वादे।

बोलता हूँ, दूसरा वाक्य- “मुझे जाणा है” बार बार। 

दुहराता हूँ ख़ुद को जैसे टोबा आ बैठा हो जुबान पर। टोबा आकर सवार हुआ, जो भाग बैठा सीमा तालक। सारे टोबा बोल नहीं पाते, सारे टोबा वापसी के रास्ते भी नहीं ढूँढ़ पाते। सारे टोबा के चेहरे पर दुख की दिव्यता का पता कहाँ चलता है!

इस धरती पर सब मरने आते हैं

इस धरती पर मैं भी आया 

प्यार कर बैठा। 

मेरे आगे के सारे रास्ते बंद थे 

रास्ते जो भी खुलने थे मेरे बिन ही खुलने थे। 

**

“तुम मुझे भूल जाओगे।”

“ऐसे कैसे? तुम्हारा नाम अपनी कलाई पर उतार रखा है, जो मिटाए न मिटेगा। जहां घड़ी का फीता बंधा होता है, उसके ठीक नीचे समय तुम्हारे नाम के साथ साँस लेता रहेगा, घड़ी चलती रहेगी।”

“तुम वापस आओगे ना “

“मैं वापस आऊँगा”

“याद रखना कान की बाली, दालान..”

और वापसी के रास्तों पर पचहत्तर साल के आँसू की नदी गुजर गई।

अल्लाह अल्लाह ईं जफ़ा बा मा कुन*1

ख़ैर कुन इमरोज़ रा फ़र्दा कुन

(ख़ुदा के लिए ये ज़ुल्म हम पर न कर

मेहरबानी कर, और आज को कल पर न टाल)

वह आदमी उस लड़की का नाम भूलने की कोशिश करता है। भूलना सीखते सीखते कई बार मौत आ जाती है, भूलना नहीं आता। 

मन के भीतर बजते नाम को शायद जान-बूझकर अपनी ज़ुबान पर नहीं ला पाया था। उसके बच्चे भी कहाँ जान पाए वह नाम! एक नाम, जो उसकी रातों की नींद, जवानी से खून और आँखों से चमक सोखता रहा। भूलना और भूलने का अभिनय, दोनों में बहुत फ़र्क़ है। दबाई हुई स्मृतियाँ मिटती नहीं हैं; वे भीतर कहीं जीवित रहती हैं।

मिट्टी में जड़ की तरह 

धंसा हुआ तुम्हारा नाम जिया 

उम्मीद लिए किनु 

इस गमले में जंगल की तरह उगा रहा 

दिशाओं का भ्रम और स्मृति का दोष 

समय के लंबे इंतजार को भी 

समय से दूर नहीं कर पाया

जाना हो 

तो ऐसे जाना 

जैसे नींद में सोया शरीर प्राण त्यागता है।    

उसकी आवाज़ में केवल दुख नहीं, शर्म भी सुनाई देती है। जैसे वह स्वयं उन निर्णयों के लिए जिम्मेदार न होते हुए भी उनकी विरासत ढो रहा हो। 

**

मैं कौन हूँ! 

चले जाने के बाद भी कितना चलना है! मेरी पसलियों में तुमसे किए वादे का कुचल जाना है। आत्मा पर समय के नाखूनों की खुरच अब भी जारी है। 

‘वापसी’ भाषा की उपज में निहायत क्रूर और झूठा शब्द है। 

घर की बहनों, बुआओं, सखियों को भेड़ की तरह काट दिया पालने वाले हाथों ने। 

समय के चाकू की धार 

बहुत धीमे धीमे उतरती है

समय के चाकू की धार 

एक वार में सब साफ़ कर देती है 

समय के चाकू की धार पर लोहा चलाया किसने! 

बंटवारे का असर इधर भी था, उधर भी था, सब पाकर गंवाना इधर भी था, उधर भी था। 

दोनों तरफ मिलाकर सात लाख से ज़्यादा गायब हुई महिलायें, बलात्कार के बाद मार दी गई महिलायें, धर्म बदलकर जीने की राह तलाशने वाली महिलायें, गले में फंदा, कुओं मे देह, यूप पर सर रखकर काट दी गई महिलायें-बच्चियाँ, अंधेरे मे चिंघारती-चीखती महिलाओं की आवाज़, बंटवारे में पार छूट गई महिलायें-बच्चियाँ उस घर और उस ज़मीन से अचानक एक रात में बेदखल हुई। इस वीभत्स नरसंहार का ब्योरा किसके पास है! 

ब्योरा न सही, उदास, चीखती आँखें लिए मृत्यु शैय्या पर पड़ा ईशर सिंह उन सब चेहरों की बयानी लिए आया है। दुख और पीड़ा कई बार दूसरों की चेहरों के जरिए भीतर अपनी जगह बना लेता है। 

उस्ताद दमन (चिराग दीन) लाहौर के एक मशहूर शायर थे। उन्होंने विभाजन के बारे में लिखा था- 

असीं लुट गए हुस्न दे नां उत्ते,

कुझ मुल्की बानरां, कुझ सियासी सियारां दे।

तमस, कितने पाकिस्तान, ट्रेन टु पाकिस्तान से पहले भी मंटो की स्याही से कागज़ स्याह हुआ पड़ा है। विभाजन का कहर जिसपर पड़ा जीवन भर उसकी आंच में जलता-गलता रहा। सिवाय मौत के कोई नहीं उबार पाया। स्याही और काग़ज़ उन जैसे के लिए मुक्ति का रास्ता थे या थे अपने दुखों को कुरेद कुरेद कर चखने और और ज़्यादा इच्छा मृत्यु का वरदान!  

जीवन भर त्रासद वाक्य चमगादर सा चिपका रहता है- क्या सचमुच उसके पास कोई और विकल्प नहीं था? 

अतीत के कई चेहरे होते हैं। हर सच के कई चेहरे होते हैं। सवालों का जवाब आखिर कितने चेहरों को टटोलकर मिलता है ! 

ख़ुद को दिए सांत्वना के बीज पर 

राख होते गए 

त्वचा पर लिखा तुम्हारा नाम 

द्रव में बदलकर बिछ गया है भीतर रुधिररुधिर, 

मेरी नाभी तुम्हारे छूटने की पीड़ा से भारी है

खोई हुई कान की बाली

जैसे मिल जाते हैं 

मिल पाते हम! 

चूका हुआ अतीत 

देर तक कांपता है जीवन की प्रत्यंचा पर

इतिहासप्रेमियों की त्वचा पर लिखे नाम नहीं पढ़ता।

हम भेड़ थे इस धरती पर, भूखे पेट सूखे घास के मैदान में चरा-चरा कर मार दिए गए। हमारी लाश पर लिखा है नाम- नए देश का। हमारी लाश पर लिखी है राजनीति की किताब, हमारी लाश से बनी राख इस धरती को हमें भूलने नहीं देंगे। बार बार आऊँगा, मैं वापस आऊँगा। मैं कहीं गया नहीं, मैं कहीं था भी नहीं, मैं कहीं का हूँ भी नहीं, मैं फिर भी वापस आऊँगा। 

मैं इस भूमि की भेड़ हूँ! 

*1 रूमी

***

सुमन शेखर 
मास कम्यूनिकेशन के बाद फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन, निर्देशन के साथ ही अभिनय में व्यस्त। देश-विदेश के बड़े फ़िल्म फेस्टिवल्स में फ़िल्में प्रदर्शित, अभिनीत फ़िल्म “ख़्वाबिदा” को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का अवार्ड। कई नाटकों का लेखन, अभिनय और निर्देशन। एक दशक से रंगमंच में सक्रिय।
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।

ईमेल- shekhers914@gmail.com

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