क्या यह सपना था! – गाई दी मोपासां

अनुवाद: सुधांशु गुप्त

‘मैं उसे पागलों की तरह प्रेम करता था! कोई क्यों प्यार करता है? क्यों करता है कोई प्यार? यह कितनी अजीब बात है कि आपको पूरी दुनिया में केवल एक ही शख़्स दिखाई दे, आपके ज़ेहन में केवल एक ही विचार हो, आपके दिल में केवल एक इच्छा हो, और आपके होंठों पर केवल एक ही नाम हो, एक नाम जो लगातार आपकी आत्मा की गहराइयों से उबरता है, आप इस नाम को बार बार दोहराते हैं, बुदबुदाते हैं, हर समय, हर जगह…मानो आप कोई प्रार्थना कर रहे हों।

‘मैं आपको अपनी प्रेम कहानी सुनाने जा रहा हूं, क्योंकि प्यार की एक ही कहानी होती है, हमेशा एक जैसी। मैं उससे मिला और प्रेम करने लगा। बस इतना ही। पूरा एक साल मैं उसकी कोमलता, प्रेम स्पर्शों, उसके बाजुओं, उसके परिधानों, उसके शब्दों में खोया रहा। मैंने ख़ुद को उसकी तरफ से आने वाली हर खुशबू से घिरा पाया। यहां तक कि मैं दिन और रात का अंतर तक भूल गया, भूल गया कि मैं इस पृथ्वी पर जीवित हूं या मृत।

‘और फिर एक दिन उसकी मृत्यु हो गई। कैसे? मुझे नहीं पता। मैं कुछ भी नहीं जानता: लेकिन एक शाम वह भीगी हुई घर लौटी, उस दिन बारिश बहुत तेज हुई थी, अगले दिन उसे खांसी हो गई, वह पूरे एक सप्ताह खांसती रही, उसने बिस्तर पकड़ लिया। इसके बाद क्या हुआ, अब मुझे ठीक से याद नहीं है। लेकिन शायद डॉक्टर आया था, उसने दवाइयां लिख कर दीं और चला गया। दवाई मंगवाई गई। कुछ महिलाओं ने उसे दवा पिलाई। उसके हाथ गर्म थे, माथा तप रहा था, आंखें चमकीली मगर उदास थीं। मैंने उससे कुछ पूछा, उसने जवाब भी दिया, लेकिन क्या यह सब मुझे अब याद नहीं है। मैं अब भूल गया हूं, सब कुछ भूल गया, सब कुछ! उसकी मृत्यु हो गई। मुझे उसकी कमजोर छवि और निर्बल आहें याद हैं। नर्स ने कहा था, आह!…मैं समझ गया, सब समझ गया।’

‘इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता, कुछ भी नहीं। मैंने एक पादरी को देखा, उसने कहा, यह तुम्हारी रखैल थी? मुझे ऐसा लगा जैसे वह उसका अपमान कर रहा हो। क्योंकि वह मर चुकी थी तो किसी को भी उसका अपमान करने का हक़ नहीं था। मैंने उस पादरी को घर से बाहर निकाल दिया। दूसरा पादरी आया। वह बहुत कोमल और दयालु था। जब पादरी ने उसके बारे में बात की तो मेरे आंसू निकल आए।’

‘उन्होंने अंत्येष्टि के बारे में मुझसे सलाह की, लेकिन उन्होंने क्या कहा मुझे कुछ याद नहीं है। मेरी स्मृतियों में बस ताबूत है, हथौड़े की आवाज है, जिससे ताबूत को बंद किया गया था और उसे ज़मीन के नीचे पहुंचा दिया गया था। हे ईश्वर…हे ईश्वर…यह क्या हो गया!

‘ उसे दफ़्ना दिया गया था! वह ज़मीन में दफ़्न हो चुकी थी। वह धरती पर बने गड्ढे में जा चुकी थी। कुछ लोग मेरे पास आए-कुछ महिला मित्र, मैं उनसे बचने के लिए भागने लगा…भागता रहा…गलियों में भटकता रहा, इसके बाद मैं घर चला गया, और अगले दिन मैंने एक नई यात्रा की शुरुआत की।’

कल मैं पेरिस लौट आया, मैंने अपने कमरे को दोबारा देखा- हमारा कमरा, हमारा बिस्तर, हमारा फर्नीचर, वह सब कुछ जो किसी की मृत्यु के बाद भी सजीव बना रहता है… मैंने स्वयं को एक तीव्र दुख से घिरा पाया। मैं लगभग खिड़की खोलने ही वाला था। मैं उसमें से कूद कर भाग जाना चाहता था। मैं चाहता था गलियों में ख़ुद को ग़ुम कर लूं। क्योंकि अब मैं इन चीज़ों के बीच नहीं रह सकता था, इन दीवारों के बीच जिनके दरमियां वह रही थी। इन दीवारों में उसकी खुशबू बसी हुई थी। दरारों से उसकी सांस लेने की आवाज मुझे सुनाई पड़ रही थी। मैंने अपना हैट उठाया और वहां से भागने लगा, मैं अभी सिर्फ दरवाजे तक ही पहुंचा था, मेरी नज़र हॉल में रखे एक बड़े से आईने पर गई। यह आईना उसी ने यहां रखवाया था ताकि वह हर रोज़ बाहर जाने से पहले सिर से पांव तक ख़ुद को देख सके, देख सके कि उसका श्रृंगार ठीक और सुंदर हुआ है, वह अपने जूतों से लेकर टोपी तक ख़ुद को निहारती थी।

मैं कुछ पल उस आईने के सामने रुका, मैंने आईने में उसका प्रतिबिंब देखा। एक बार नहीं कई बार, मुझे लगा आईने की स्मृतियों में भी उसका प्रतिबिंब शेष है। मैं वहां खड़ा रहा, मैं कांप रहा था, मैंने अपनी आंखें आईने पर जमा दीं, उस सपाट, गहरे और खाली आईने पर-वह उसे पूरी तरह अपने भीतर समाहित किए था, वह उतना ही उन्मादी लगा जितना मैं। मैंने महसूस किया कि मैं आईने से प्रेम करने लगा था। मैंने उसे छुआ, वह बर्फ की तरह ठंडा था…ओह! उसमें थीं असंख्य स्मृतियां! दुखद…जलता हुआ आईना…भयानक आईना…ऐसा आईना, जो हमें दुखों से आक्रांत करता है! मुझे लगा वे पुरुष ख़ुश हैं, जिनका दिल हर उस बात को भूल जाता है जो उनके भीतर है, वह सब कुछ भूल जाते हैं जो पहले कभी हुआ, सब कुछ, जो उनके भीतर निहित है, वह सब कुछ प्रेम में जिसका प्रतिबिंब दिखाई देता है! और मैं यहां कितना पीड़ित हो रहा हूं। 

‘मैं बाहर निकल गया, बिना किसी इच्छा के अनजाने ही चलता रहा, कब्रिस्तान की ओर। मुझे उसकी साधारण सी कब्र मिल गई…एक सफेद मार्बल क्रॉस जिस पर लिखा थाः उसने प्रेम किया, प्रेम पाया और वह मर गई।

‘वह यहां है, ज़मीन के नीचे, नष्ट हो चुकी है! कितना भयानक है यह सब! मैं ज़मीन पर अपना माथा टिका कर सिसकता रहा, लंबे समय तक, बहुत लंबे समय तक। तब मैंने देखा कि अंधेरा बहुत गहरा हो चुका था, एक अजीब, पागलपन की इच्छा, एक निराश प्रेमी की इच्छा ने मुझे घेर लिया। मैं आख़िरी रात उसकी कब्र पर रोते हुए ही गुज़ारना चाहता था। एक इच्छा यह भी थी कि कोई मुझे देख ले और यहां से बाहर निकाल दे। मैं ख़ुद को कैसे संभाल सकता था? मैं समझदार था, वहां से उठा और मृत लोगों के इस शहर में भटकने लगा। चलता रहा और चलता रहा। जीवित लोगों के शहर की तुलना में यह शहर कितना छोटा था। फिर भी, मृतकों की संख्या जीवितों से कितनी अधिक थी। हम अपनी चार पीढ़ियों के लिए ऊँचे घर, चौड़ी सड़कें और बहुत कुछ चाहते हैं, ये सब एक ही समय दिन का उजाला देखते हैं, झरनों से पानी पीते हैं, मदिरा पीते हैं और मैदानी इलाकों से ब्रेड खाते हैं। ‘ मृत लोगों की आसमान से उतरी सभी पीढ़ियां, अब यहां खो चुकी हैं, पृथ्वी ने उन्हें वापस बुला लिया है, उन सबको अलविदा!

कब्रिस्तान के उपेक्षित अंतिम सिरे पर पहुंचकर मुझे अचानक महसूस हुआ कि जो लोग बहुत पहले मर गए हैं, वे मिट्टी में आत्मसात हो चुके हैं, मिट्टी में मिलने की उनकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब मनुष्य की लाशों पर एक उदास और ख़ूबसूरत बागीचा सा बना हुआ है, इसमें उपेक्षित ग़ुलाब और सरु के वृक्ष उग आए हैं। 

‘मैं अकेला था, नितांत अकेला, मैंने ख़ुद को एक हरे भरे पेड़ से घिरा पाया, मैंने ख़ुद को पेड़ की स्थूल और उदास शाखाओं के पीछे छिपा लिया, मैं पेड़ के तने से चिपक कर उसी तरह इंतज़ार करने लगा जैसे कोई इंसान लकड़ी के तख़्ते पर खड़ा होकर जहाज के नष्ट होने की प्रतीक्षा करता है। 

‘रात बहुत घनी हो गई थी, मैं उस स्थान से निकला, दबे पांव, धीरे धीरे बिना कोई आवाज किए चलने लगा, यह जगह मृत लोगों से भरी पड़ी थी, मैं बहुत देर तक यहां भटकता रहा, लेकिन मैं उसे दोबारा नहीं पा सका। मैं दोनों हाथों को खोल कर चलता रहा, मैं अपने हाथों, पैरों, घुटनों, यहां तक की अपनी छाती और अपने सिर से कब्रों पर दस्तक देता रहा, लेकिन मुझे उसकी कब्र नहीं मिली। मैं उन्हें छूता और मुझे महसूस होता कि कोई दृष्टिहीन व्यक्ति अपना रास्ता तलाश रहा है, मैंने पत्थरों, क्रॉस, लोहे की रेलिंग, धातु की मालाओं और फीके पड़ गए फूलों को महसूस किया! मैंने कब्र पर लिखे नामों को अपनी उंगलियां फेर फेर कर पढ़ा। कितनी अजीब रात है! कितनी अजीब! मैं उसे दोबारा नहीं खोज पाया!

आसमान में चांद नहीं था। मैंने सोचा, क्या रात है! मैं आतंकित था, दो कब्रों के बीच के इस संकरे गलियारे में चलते हुए…भयंकर आतंकित! मेरी दायीं ओर, बायीं ओर, मेरे सामने, मेरे चारों ओर, हर जगह कब्र थी। मैं वहीं बैठ गया, क्योंकि मैं अब और नहीं चल पा रहा था, मेरे घुटने कमजोर हो गए थे। यहां इतनी शांति थी कि मैं अपने दिल की धड़कन सुन सकता था! और मैं कुछ और भी सुन सकता था। क्या? एक भ्रामक, अनाम सा शोर। इस रहस्यमयी रात में क्या यह शोर मेरे मस्तिष्क से आ रहा था, या अभेद्य पृथ्वी के भीतर से, जहां मनुष्यों के शव सोए हुए थे? मैंने अपने चारों ओर देखा, लेकिन मुझे नहीं पता मैं कितनी देर वहां रहा; मैं भय से जड़ हो चुका था, आतंक की गिरफ्त में था, मैं चिल्लाने के लिए तैयार था, मरने के लिए तैयार था। 

अचानक मुझे लगा कि जिस कब्र पर मैं बैठा था, उसका ऊपरी हिस्सा हिल रहा है। निश्चित रूप से वह हिल रहा था। ऐसा लगा कि उस हिस्से को कोई ऊपर उठा रहा है। मैं उछल कर एक दूसरी कब्र पर पहुंच गया, मैंने देखा, हां जिस कब्र पर मैं अभी अभी बैठा था, उसका ऊपरी हिस्सा एकदम खुल गया है, उसमें से मृत व्यक्ति बाहर आया, एक नग्न कंकाल। वह झुककर पत्थर को पीछे की ओर धकेल रहा था। मैंने यह एकदम साफ देखा, हालांकि रात बहुत गहरी थी। मैं लेकिन मैं क्रॉस पर लिखा पढ़ सकता थाः 

‘यहां जाक ओलिवांत सो रहे हैं, इनकी मृत्यु 51वर्ष की उम्र में हुई। वह अपने परिवार से प्रेम करते थे, वह दयालु और ईमानदार थे, और प्रभु की कृपा से इनकी मृत्यु हो गई।’  

‘मृतक ने भी कब्र पर लगे पत्थर पर लिखे हुए को पढ़ा; उसने रास्ते से एक पत्थर को उठाया, नुकीला पत्थर, और लिखे हुए को सावधानी से मिटाने लगा। धीरे धीरे उसने लिखे हुए को पूरी तरह साफ कर दिया, उसने अपनी आंखों के गड्ढों से उस जगह को देखा, जहां पहले शब्द लिखे हुए थे, उसने अपनी तर्जनी, जो एक हड्डी दिखाई पड़ रही थी, की नोक से चमकदार अक्षरों में लिखाः

 ‘ यहां जाक ओलिवांत चिरनिद्रा में लीन हैं, इनकी मृत्यु 51वर्ष की उम्र में हुई। यह बड़ी कठोरता से अपने पिता की मृत्यु का कारण बने, क्योंकि उनकी इच्छा अपने पिता की विरासत पर कब्जा करने की थी, इसने अपनी पत्नी और बच्चों का उत्पीड़न किया, अपने पड़ोसियों को धोखा दिया, इसने हर उस व्यक्ति को लूटा जिसे लूट सकता था, और यह घृणित इंसान मर गया।’

जब उस मृतक ने लिखना बंद कर दिया तो वह बिना हिले डुले वहीं खड़ा रहा, अपने काम को देखता रहा, मैंने मुड़कर देखा तो पाया कि सभी कब्रें खुली हुई थीं, सभी मृत आत्माएं कब्रों से बाहर आ गई थीं, वे परिजनों और संबंधियों द्वारा कब्रों पर लिखे गये झूठ को मिटा रही थीं और उसकी जगह सच लिख रही थीं। मैंने देखा सभी अपने पड़ोसियों के उत्पीड़क थे- दुर्भावनापूर्ण, बेईमान, पाखंडी, झूठे, बदमाश, निंदक और ईर्ष्यालु थे; इन सबने चोरियां कीं, धोखे दिए, इन्होंने हर वह काम किया जिसे अनैतिक या शर्मनाक कहा जा सकता है, ये अच्छे पिता, ये वफादार पत्नियां, ये समर्पित पुत्र, ये पवित्र बेटियां, ये ईमानदार महाजन, लेकिन समाज ने इन सभी स्त्री-पुरुषों निष्कलंक कहा, अब उन्हीं की कब्रों से निकले कंकाल उनकी शाश्वत कब्रों पर भयानक और पवित्र सत्य लिख रहे थे, ऐसा सत्य जिससे, जिससे इन सभी लोगों के जीवित रहते, हर कोई अनजान था, या अनजान बने रहने का नाटक करता रहा। 

मैंने सोचा कि उसने भी अवश्य ही अपनी कब्र के पत्थर पर कुछ लिखा होगा, अब मैं बिना किसी भय के अध खुले ताबूतों के बीच दौड़ रहा था, लाशों और कंकालों के बीच, मैं उसकी तरफ बढ़ रहा था, मुझे यकीन था कि मैं उसे तलाश लूंगा। मैंने बिना उसका चेहरा देखे ही पहली नज़र में उसे पहचान लिया, उसका चेहरा शव को लपेटने वाली शीट से ढंका था। संगमरमर के क्रॉस पर जहां कुछ देर पहले मैंने पढ़ा थाः उसने प्रेम किया, प्रेम पाया और वह मर गई, वहीं अब मैं यह लिखा हुआ देख रहा थाः अपने प्रेमी को धोखा देने के लिए एक दिन यह घर से बाहर निकली, वह बारिश में भीग गई, उसे सर्दी लग गई और उसकी मृत्यु हो गई। 

‘ऐसा लगता है कि उन्होंने मुझे प्रातः काल कब्र पर बेहोश पड़ा पाया।’

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