तुम्हें पहचानने की कोशिश कर रही हूँ

Savita Pathak

सविता पाठक

भूमिका

अब आपको कहानी की भूमिका पढ़नी पड़ेगी,आपने ये सोचा नहीं होगा लेकिन मेरे लिए यह लिखना बहुत जरूरी है। रद्दी बेचते समय सारे कागज़ मेरे सिर पर नाचने लगते हैं। पहला ख्याल आता है सब कुछ रद्दी है दूसरा ख्याल आता है सब कुछ जरूरी है। सब कुछ रद्दी है के विचार से बहुत दिन से लड़ाई कर रही हूँ। दूसरे वाले ख्याल को जब भी पकड़ती हूँ तब ऐसा लगता है कि हर कागज़ चीख-चीख कर कुछ याद दिलाने की कोशिश कर रहा हो। कुछ तो इमोशनली ब्लैकमेल भी करते हैं। वो दिन तारीख के साथ खड़े हो जाते हैं जबरदस्ती वापस नाउम्मीद गलियों में जाकर छोड़ना चाहते हैं। जब वो ज्यादा करने लगते हैं तो मैं बेदर्दी से उनको फाड़ देती हूं। लो, अब ब्लैकमेल करो। लेकिन कुछ बड़े ही खामोश तबीयत होते हैं, हाथ में आते ही बगैर चीखे-चिल्लाये एक पूरी दुनिया लेकर बात करने लगते हैं। बहरहाल रद्दी वाला ऐसे में मुझे किसी दार्शनिक की तरह समझाता है- मैडम, जब-जब देखेंगी आपको जरूरी कागज़ लगेगा। अरे जरूरी होता तो यहां नहीं पड़ा होता। वैसे भी कोई चेकबुक हो, जमीन जायदाद का कागज़ हो-अगर हमको मिलता है तो हमलोग वापस कर देते हैं बाकि सब माया है।

फिर भी मैंने अपने दार्शनिक की सलाह नहीं मानी और वो पन्ना सहेज लिया। वही पन्ना आपको हूबहू पढ़ने के लिए दे रही हूँ।

अगर मैं कहूँ कि इस पन्ने के भी दो हिस्से हैं तो आपको अजीब लगेगा, लेकिन सच यही है। लिखने वाला मानो मेरी तरह उस पन्ने को पढ़ाने से पहले कोई भूमिका बांधना चाहता हो। पहला पन्ना थोड़ा साफ है लेकिन दूसरा पन्ना किसी डायरी का हिस्सा लग रहा है। पहले पन्ने पर किसी पुलिस वाले का कुछ लिखा हुआ लग रहा है लेकिन कागज फटा होने की वजह से उसकी भूमिका अधूरी रह गयी है। बहरहाल जैसा है वैसा पढ़िये।

केस नम्बर पांच सौ तीन

कुछ बातें ऐसी होती हैं कि उनसे आपका कोई सीधा वास्ता नहीं होता है। हो सकता है आप उस राह से गुजर रहे हों या हो सकता है कि आप किसी टपरी में चाय पी रहे हैं वो वहाँ आकर आप से  टकरा जाती है। ये टकराहट ऐसी हो जाती है जैसे आपके भीतर पड़े पत्थर के स्लैब पर किसी ने हथौड़ा मार दिया हो। अब तक जो सबूत था वह वैसा नहीं रहा। वह स्लैब चटख गई हो। इस हालत में सब कुछ उलट-पुलट हो जाता है। ऐसी ही एक सूचना ने मेरी यात्रा का कम्पास हिला दिला। मैं वो नहीं बचा जो था।

मैंने पाँच साल पहले पुलिस की नौकरी ज्वाइन की थी। अगर कहूँ कि पुलिस की नौकरी करना मेरी आखिरी च्वाइस थी क्योंकि मैंने तो बीए अंग्रेजी और राजनीतिशास्त्र से किया था। कविताओं की दुनिया में घूमता था कहानियों में उलझा रहता था। लेकिन एक दिन बिलकुल अचानक डयुटी के दौरान मेरे पापा की हार्ट अटैक से मौत हो गयी। जीवन की सारी योजनाओं ने यू टर्न ले लिया। रिश्तेदारों ने सोर्स-सिफारिश करके मेरी नौकरी पापा के डिपार्टमेंट में लगवा दी। मेरे पापा एस आई थे। नौकरी के कुछ ही दिनों बाद मुझे बीट मिली क्राइम की।

यही वो जगह थी जिससे मुझे पुलिस की दुनिया से डर लगता था। मैं उनकी तरह नहीं होना चाहता था। मुझे खाकी रंग से तो खुद ही डर लगता था, लेकिन क्या करता, ये बात तो किसी से कह भी नहीं सकता था। यह भी नहीं बता सकता था कि वर्दी और चमड़े का भारत सरकार का बिल्ला लगा बेल्ट कैसे मेरे घर का मूड तय करता था। एक ही फायदा हुआ कि इस बीच दूसरे शहरों में रहने का मौका मिला। लेकिन फिर भी किसी क्राइम सीन को देखना मेरे बस का नहीं था। पहले तो मुझसे देखा भी नहीं जाता था अगर दो लोग साथ हैं तो दरवाजे पर खड़े होकर ही बयान लेता था और सोचता था कि अगला ही बॉडी को देखे लेकिन ये तरीका बहुत दिन चला नहीं। बहुत दिन तक बॉडी मेरा पीछा करते हुए रात में सामने आकर खड़ी हो जाती थी,ऐसा लगता था कि वो मुझसे ही ढ़ेर सारे सवाल कर रही है लेकिन धीरे धीरे आदत हो गयी। इस बीच एक ऐसा केस आया जिसने मुझे

(स्पष्टीकरण-इस पेज को पेन्सिल से लिखा गया था। उसके आगे की लाइन पढ़ने में नहीं आ रही थी। बाकि अगले पन्ने से है साथ में एक फोटो कॉपी लगी हुई है। आगे पढ़िये)

पुलिस डायरी-FIR No/307/046/19 सुमैया बनाम अरबाज़ सिद्दकी,

वादी कांस्टेबल सुमेर सिंह

बरामद-मौका-ए-वारदात से मिली कॉपी

उसने बोला है कि वह मेरे हज़ार टुकड़े कर देगा,वह मेरे हजार टुकड़े करके भी मेरे सोचने का ढ़ंग नहीं बदल सकता है। कुछ लोग मर कर भी ज़िन्दा रहते हैं,ख्यालों में,बातों में,यादों में, जज्बातों में और कुछ लोग जिन्दा होने के बाद भी,मरे की तरह हो जाते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि मैं आपको ये सब क्यों बता रही हूँ। फिलहाल इसलिए बता रही हूँ कि एक राज़ आपसे बताना है। आपको लग रहा होगा कि अगर कोई ऐसी बात है तो मुझे चुपके से अपनी किसी सहेली को बताना चाहिए। भला ऐसी बातें लिखकर सबके सामने थोड़ी ही बताई जाती हैं। पर मेरी भी बात सुन लीजिए, मुझे अकेले में किसी से कुछ नहीं पूछना है और न बताना है। अकेले में कौन भला सही सलाह देता है। असली सलाह तो वो होती है जो सबके सामने दी जाती है। भरे-पूरे सूरज की रौशनी में, रात में चांद के साये में तो दिमाग कुछ का कुछ होता है। हिम्मत हो तो अपनी सलाह दीजिएगा। वैसे कुछ नहीं भी कह सकते हैं। चुप रहना सबसे मुफीद तरीका है। उसका एक आजमाया हुआ तरीका है कि आप बात ज़बान तक ले आइए, फिर थूक की तरह घूंट निगल लीजिए। बेहतर होगा कि आप चुप ही रह जाइयेगा। चुप रहना बहुत बढ़िया तरीका होता है। सबकुछ बचा रहता है। वैसे मेरे पास दो तरीके थे चुप रहने का या फिर आपसे बात करने का। पर मुझे बातें करना पसंद है। हां तो मैं अपने बारे में बताती हूं।

आपको बता दूं कि मेरी शादी को सत्रह साल हो चुके हैं। हर एक साल में बारह महीने होते हैं। इन बारह महीनों में तीन सौ पैंसठ दिन—इन दिनों में कितने पल हैं? उन पलों में मैं बेवफा नहीं थी,वैसे तो मैं खुद को बेवफा मानती ही नहीं हूँ। आप जानते हैं मेरे ऊपर बेवफाई का चार्ज लगाया गया है। मैंने अपने शौहर से मोहब्बत की कि नहीं, क्या मालूम! मोहब्बत का मतलब आप सिर्फ हमबिस्तर होना समझते हैं, तो जी वो तो पहले दिन से ही हुई। लेकिन मेरी तई वही सिर्फ मोहब्बत नहीं है। मुझे पता है कि आप यहीं से मेरी गलती निकालना शुरू कर देंगे कि ‘इनको तो मोहब्बत की तलब लगी है बेवफाई तो करेंगी ही’। पहले दिन से तड़प रही हूँ कि इनसे बात करूँ। आपको अजीब लगेगा लेकिन जिन्दगी कुछ ऐसी थी जब मैट की कढ़ाई के खाने भरती थी तो हर पत्ता और फूल किसी अनजाने अजनबी की आँखों में प्यार पाने के लिए होता था। फिल्मों में देखा था कि सेज फूलों से सजी होती है। उस वक्त पता नहीं क्या था कि मेरे मोहल्ले की हर लड़की ने क्रोशिय़े की बेल बुनी उस पर हल्के गुलाबी और लाल रंग के फूल बनाये। ऊँगली में धागा लपेट लेती थी कभी बारीक क्रोशिया तो कभी मोटे हुक वाला क्रोशिया पकड़ कर हर फंदे में आने वाली जिन्दगी की रूमानियत बुनती गयी। अम्मी के घर पर हमेशा यही जाना कि जब अपने शौहर के यहाँ जाना तो जो मर्जी आए करना। मैंने न मालूम कैसे समझ लिया कि ऐसा ही होगा। मेरे दिल में दुनिया जहान की बातें थीं। मुझे सब कुछ बताना था, आदमी-औरत, जिन्न-जिन्नात हर चीज के बारे में। बातों की लज्जत का अंदाजा मुझे था, मैंने ये नशा थोड़ा तो चखा था। पता है, बातें करना हम बिस्तर होने की तरह, कई बार तो उससे भी कहीं ज्यादा सुंदर है। आप नहीं समझेंगे। शादी की पहली रात तो मैंने बड़ी हिम्मत करके इनसे बात करना चाहा, बिलकुल वही बातें जो मैं शाइस्ता से करती थी। तुमको कौन सा हीरो पसंद है? कौन सी हीरोइन पसंद है,अच्छा अपने बचपन के बारे में बताओ लेकिन थोड़ी देर में समझ आ गया कि इनको बात करना नहीं पसंद है। यकीन मानिए कि शादी के कुछ साल तक तो मैं समझती ही नहीं थी कि मोहब्बत क्या बला है। हर दिन कभी दीवान खिसका कर इधर सजाती तो कभी उधर। कभी गुलदान में रंगीन माड़ वाले कपड़े से फूल बनाकर रख देती थी। कितनी बार पर्दों के रंग आगे पीछे कर देती थी। हर दिन घर को यूं सजाती कि शायद ये चौंक जाएँ और कहें कि अरे ये तो मैंने सोचा ही नहीं था। लगता था कोई ऐसी चीज, कोई ऐसी बात जो इन्हें अच्छी लगे और उसी के बहाने हम बातें करें। उनको अखबार पढ़ना पसंद था। मै भी उनके जाने के बाद खूब ध्यान से अखबार पढ़ती थी,शाम को चाय पर किसी खबर का जिक्र छेड़ देती थी लेकिन उन्होंने एकाध बार हूं हां किया फिर कह दिया कि तुम्हारे पास बड़ी फुर्सत रहती है। शरीफ औरतें बातों में नहीं पड़ती हैं। मैंने शरीफ औरतों का जिक्र बचपन से सुना था। वह क्या करती हैं और क्या नहीं करती हैं, उनकी शाइस्तगी का भार उठाकर देखा था। उन्होंने पलक झपका कर भी नहीं देखा था और मैं बताती गई कि हमारे यहाँ बहुत कम लोगों का आना-जाना था। ऊपर से किसी से बातें करने पर मनाही थी। अभी मैं उन्हें अपनी परवरिश के पेंच बता ही रही थी कि उन्होंने सख्ती से कहा- औरतें ज्यादा बातें करती हैं इसीलिए शैतान उनको बहका लेता है और उनका दिमाग खराब करता है। कहा तो उन्होंने ऐसे जैसे वो किसी औरत से कभी बात नहीं करते हों। मेरा दिल कसक कर रह गया कि तुम जिन औरतों से इतनी फोन पर बातें करते हो तो क्या तुम शैतान हो। लेकिन ये सब बातें तो मैं गुस्से में खुद ही सोचती थी और खुद ही हवा कर देती थी। वो हिदायत देने लगे: अपना दिमाग घर में लगाओ। मेरे साथ अजीब सा घट रहा था। जिस सूरत में मेरे सपने की दुनिया थी जिसके सहारे मैं बड़ी हुई वही वहाँ नहीं था।  

 मुझे समझ ही नहीं आता था कि मेरे घर को मेरा कितना दिमाग चाहिए। मेरे दिमाग का कौन सा हिस्सा चाहिए।  मैं धीरे धीरे थकने लगी फिर घर का काम निपटा कर चुपचाप बिस्तर पर आ जाती थी। पति भी दिन भर अपने काम में लगे रहते थे और रात को भी प्यार काम की तरह करते थे। मुझे न मालूम क्या बीमारी सी पड़ गयी कि बिस्तरे पर सिर्फ नींद आती थी। उनको अपने ‘काम’ से फुर्सत होकर नींद पड़ती, हमको उससे पहले नींद पड़ती। वो हमको जगाते, हम जागे कि नहीं इससे भी उन्हें क्या मतलब। फिर भी, हम उनसे सारे जहान की बातें करने लगते और वो दो पल में सो जाते। हमसे पूछिए- हम मोहब्बत का नाम बातें रख सकते हैं। शादी के एक सवा साल बाद ही हमारा पहला बेटा हो गया। उसके बाद दो बार अबार्शन हुआ। अब अबार्शन की भी क्या बताऊं। पति बेपरवाह थे और मैं डरपोक। कभी हिम्मत नहीं हुई कि दुकान से जाकर कोई गर्भनिरोधक गोली खरीदूँ। जाकर क्या बोलूंगी, दुकानवाला क्या सोचेगा! मैं सच कह रही हूँ, मैं पहले बहुत संकोची थी। मेरे शौहर की जबान में पहले तुम्हारा दिमाग उतना खराब नहीं हुआ था। उसके बाद हमारा दूसरा बेटा हुआ। वह दो साल का नहीं हुआ कि मेरी तीसरी बार प्रेग्नेंसी हो गयी। मैं बहुत परेशान थी, अपने शौहर को बताया। उनको पीरियड्स और इस तरह की कोई भी बात जब तक वो न चाहे अगर मेरे मुँह से निकली तो बर्दाश्त नहीं होता था। वो थोड़ा चिड़चिड़ाये कि तुमको बहुत जल्दी प्रेगनेंसी हो जाती है। ये कैसा गुनाह था, मैं कह नहीं सकती हूँ। मेरी जिठानी की हालत मुझे मालूम है, जिसको प्रेगनेंसी न होने के चलते हर दिन तलाक की धमकी मिलती है। वह कब से कितने डॉक्टरों के चक्कर काट रही है। मुझे लगातार गर्भनिरोधक गोलियाँ खाने से बड़ी दिक्कत होती थी। न मालूम क्यों उलटी जैसा मन हो जाता था। मन तो करता था कि बोलूँ, तुम क्यों नहीं कंडोम ले आते? एक बार मुंह से निकल गया था उन्होंने मुझे जो कुछ कहा कि बता नहीं सकती जैसे मैं दुनिया की सबसे बदजात औरत हूँ। हराम-हलाल की ऐसी तकरीर सुनाई कि मेरा मन और चिढ़ गया। मैंने दवाई भी खायी लेकिन कुछ नहीं हुआ। अबार्शन टलता जा रहा था। खैर बहुत हुज्जत करने के ये बाद तैयार हो गये कि अबार्शन करवा लेते हैं। पड़ोस के एक प्राइवेट नर्सिंग होम में मेरा अबार्शन हो गया। मेरे शरीर से बहुत खून बह गया। अबार्शन के बाद भी मैं ठीक नहीं हुई भ्रूण का कोई कतरा रह गया था शायद वो मेरे शरीर से चिपक गया था। मेरी तबियत बहुत खराब हो गयी। ब्लीडिंग रुक ही नहीं रही थी। महीनों ब्लीडिंग होती रही। शरीर पूरी तरह सूखता जा रहा था। डाक्टरों को दुबारा अलग तरीके से क्लीनिंग करनी पड़ी। मैं पूरे महीने बिस्तर पर पड़ी रही। दवाई तो मिल रही थी, लेकिन दूसरी दवाई यानी बातें वो कहां मिल रही थीं। उसकी खुराक तो तकरीबन खत्म सी हो गई थी। मैं पूरा दिन सोचती कि वो आयेंगे और मेरा हाथ पकड़कर कहेंगे कि तुम्हें कितनी तकलीफ हो रही है। वो घर में आते थे तो मन ही मन मैं उनके डायलॉग दुहराती थी। फिर खुद ही झेंप जाती थी फिर खुद ही उदास हो जाती थी कि ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ। मेरी बीमारी और कमजोरी से घर का कामकाज हिल गया था। बिस्तरे पर कपड़ों का ढ़ेर लग जाता था। घर को भी जैसे खून की कमी हो गई हो। बच्चे भी खूब लड़ने लगे थे।

उधर मेरे शौहर का बर्ताव मेरे शरीर के हिसाब से तय होता रहा। अकसर ही खीजे से रहते थे अजब नाटक है तुम्हारा। औरतों का न मालूम कितनी सफाईया होती रहती है, तुम्हारा ही नखरा ज्यादा है। उनका हर बात पर यह कहना कि बाकी औरतों को दिक्कत नहीं होती है तुम्ही को क्यों होती है सुनकर मेरा कलेजा छिल जाता था। दिल कहता था कि कहूँ कि बाकी को भी होती है जान लेकिन तुम्हारी तरह ही उनके शौहर के कान बंद हो चुके हैं। कई बार दिल में आता कि पूछू कि तुमको बहुत पता है कि औरतों के कितने अबार्शन  होते हैं लेकिन डर के मारे पूछती नहीं थी। अब आपको अजीब लगेगा, लेकिन ऐसी कितनी बातें थीं जिनका मैं मन ही मन जवाब देती थी।

मेरा शरीर टूट गया था। लगता था अब मौत मेरे बिस्तर पर आकर बैठ गई। मैं मौत से  भी बातें करती थी,उसका चेहरा देखने की कोशिश करती थी। अकसर ही वो शाम घिरते घिरते मेरे बिस्तर पर आकर बैठ जाती थी। यह वही समय था जब मैं सोचती थी वो आयें और उसके सामने मेरा हाथ पकड़कर कहें कि तुम ठीक हो जाओगी। लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं हुआ उलटे मैंने मौत से मिन्नतें  करनी शुरू कर दी- देखो अभी तो बच्चे छोटे हैं तो कभी कहती देखो तो अभी ही तो मैंने काम शुरू किया है।

मेरा मायका सौ किलोमीटर दूर है। माइके में बस अम्मी और मेरा भाई और भाभी हैं,भाभी की भी प्रेग्नेंसी चल रही थी। उसकी पहली प्रेगनेंसी। बहरहाल, मेरी अम्मी आयीं उन्होंने मुझे संभाला। मम्मी बात बेबात पर कहती थीं कि मर्द तो ऐसा ही होता है, तेरे दिमाग में उलजलूल ख्याल आते हैं। अम्मी से पूछती थी अम्मी क्या आदमी सच में औरत को छोड़ देता है या फिर घर में रखने के बाद छोड़ देता है। अम्मी को जब कुछ नहीं समझ आता था तो कहने लगतीं कि तेरे ऊपर शैतान का साया पड़ गया है। जब औरत नाहक ये सब सोचती है तो समझो वो जन्नत में आग लगाने पर तुल गई है। कई बार वो फूंक भी मरवा के आती थीं।

खैर, तबीयत थोड़ी ठीक हुई, लगा कि मरकर जी गई हूँ। मैं आपको सच बोल रही हूँ, मरकर जीना बहुत ही बड़ी चीज़ होती है। मरता हुआ महसूस होते समय पूरे शरीर के खून का दौरा उलट कर बहने लगता है। सांसे अपने काबू में नहीं रहती हैं और दिमाग किसी अंधेरे गड्ढे को देखता जाता है।  बड़ा मुश्किल होता है मरकर जीना। लेकिन एक बार जी गए तो जिंदगी बड़ा बेधड़क बना देती है। अपने आपको नीम-बेहोशी में भी देखा था। पूरी तरह से नंग-धड़ंग स्ट्रेचर पर पड़े। न कपड़े का होश। न आगे-पीछे की कोई सोच। न कोई ये कहने वाला कि लौट आओ, तुम्हारे बिना कैसे जीऊँगा। यकीन मैं मेरा वजूद ही उनके बिना कुछ नहीं था जब उस वजूद को मेरी परवाह नहीं थी तो मैं क्या थी।

अबकी जो ठीक हुई, तो पता नहीं क्या हो गया। लगा कि मेरी मौत के वक्त मैं बिल्कुल अकेली थी। जिन हाथों को टटोल रही थी, वो वहां नहीं थे। जिस रात मैं उनके गले लगकर रोना चाहती थी वो गहरी नींद में थे। बातों की खुराक पर जिन्दा मेरा शरीर सूखकर हड्डी का ढ़ांचा हो चुका था। बीच-बीच में साहब ताने भी मारने लगे- तुम ऐसी लगने लगी हो जैसे बांस को सलवार-कमीज पहना दिया हो।  मुझे इस मजाक पर हंसी नहीं आती थी। 

 जब बीमारी से उठी तो मुझे लगा मैं कब्र से उठी हूं। पूरे बिस्तर में सीलन भरी सी थी। जिस जगह पड़ी रहती थी, उसके आसपास सिर्फ ठंड और सीलन थी। बिस्तर में ऐसा महसूस होता था जैसे आसपास हरी काई सी जम रही है,जब जगह नमी है। चादर में भी सीलन भर गई थी। घर के परदों में मानो धूल और काई जम गई हो। रसोई के डिब्बों में एक चिपचिपाहट भर गई थी। लग रहा था कि मानो ये घर भी सदियों से बीमार है। बच्चे अपनी ताई के यहाँ से स्कूल आ-जा रहे थे। घर एक बड़े ताबुत की तरह हो गया था जिसे कब्र में उतार दिया गया था। वहाँ पर अलविदा की नज्म भी नहीं थी जिसे सुनती, वैसे भी अलविदा की नज्म कौन गाता। मेरे निकाह के वक्त मेरे मोहल्ले के डाक्टर आफियान ने एक नज्म गायी थी। मुझे यकीन नहीं हुआ कि कोई मेरे लिए, हमारे लिए भी कुछ लिख सकता है। उन्होंने फ्रेम करवा कर वो नज्म हमें भेट की थी। अभी भी मैंने अपने कमरे में उसे लगाया है। उसकी ओर तो किसी ने झांका तक नहीं। उस पर भी कितनी गर्द जम गई है। लेकिन ज़िंदगी का देखिए ना, उसने इस ताबूत में जंगल सा बना दिया। और इसी जंगले से छनकर बातों की दवाई की रसद आने लगी। ताबुत ऊपर से उठने लगा। उसके खिड़की-दरवाजे जागने लगे।

 कुछ रिश्तेदारों को पता चल गया था कि मैं बीमारी से उठी हूं और यही से मेरी कहानी उलट गयी। जी, जिन लोगों का फोन आया उसी में मेरे दूर के रिश्तेदार शाहिद का भी फोन आया। शाहिद का नाम आते ही मेरा मन अब भी पंद्रह-सोलह साल की उस लड़की की हालत में पहुंच जाता है। जो यह नाम आते ही अपने चेहरे के जज्बात छुपाने लगती थी। लगता था कि पूरी दुनिया को पता चल जायेगा कि किसी के नाम से मेरे चेहरे पर रंग चढता-उतरता है। मैं सच्ची बोल रही हूं, शाहिद मेरे घर आया था, बहुत पहले आया था ,शायद मैं ग्यारहवीं में थी। तब वो बारहवीं में पढ़ता था। मेरे घर में म्युजिक की मनाही थी वैसे चोरी छुपे मैं अब्बू का रेडियो चलाती थी। शाहिद अपने साथ टेपरिकार्डर लेकर आया था। वो मेरी फूफी की ननद का बेटा है। मुझे लगता था कि वो जितने गाने सुनता है, वह सब मेरे लिए हैं। उसके जाने के बाद मैं हर गाने को ढ़ूढ़कर शाइस्ता के यहाँ जरूर दुबारा जरूर सुनती थी। बाद में अब्बा से जिदकर के टेपरिकार्डर मंगवाया। मेरी अम्मा को लगता था कि शैतान की रूह तो ये टेपरिकार्डर है। एक दिन तो उन्होंने गुस्से में टेपरिकार्डर फेंक दिया। लेकिन उनका क्या पता कि शैतान की खाला तो उन्हीं से पैदा हुई थी। मुझे लगता था कि शाहिद के पसंद के गानों में कोई मैसेज मेरे लिए इनकोडेड है। यकीन मानिये मैंने उसके जूठे गिलास में पानी पी कर देखा है- लोग कहते हैं कि इससे प्यार बढता है। मुझे लगता था कि इससे वो मुझे प्यार करने लगेगा। मैं सोचती थी कि उसने बस ये कह दिया कि कैसी हो? तो वही प्यार है। फिर जो जवाब मैंने कभी नहीं दिया उसको मन में कई तरह से देती थी। दरअसल कुछ साल पहले मैं उनके यहाँ शादी में भी गयी थी। वहां पर उसकी अम्मी ने मजाक में कह दिया था कि मैं तो तुम्हे अपने घर लाना चाहती हूं। हमारे यहाँ कई बार रिश्ते ऐसे ही तय हो जाते थे। अब आप कहेंगे कि ग्यारवीं में ही थी और शादी के बारे में सपने पालने शुरू कर दिये थे। मैं सच कह रही हूं मैंने सपने ही शादी के देखे थे,आप मेरे बारे में जो भी सोचे तब तक मैं ऐसे ही थी। मेरे ताई चाची की लड़कियां भी ऐसे ही थीं। मैंने तो यही जाना था कि शादी ही दुनिया की खुशियों की चाभी है लेकिन जब मेरे अब्बा ने सचमुच उस परिवार से शादी की बात की तो उन लोगों ने मना कर दिया। दिन बीत गये, साल बीत गया वो हमारे घर फिर नहीं आया। मेरा दिल बहुत टूट गया था लगा कि वही मेरे सपने का राजकुमार है जो मेरी बंद दुनिया से मुझे आजाद करायेगा। उसके साथ मैं घूमने जाऊंगी। वो मुझे पहाड़ दिखायेगा। झरने के ठंडे पानी में पांव उसके साथ डालूंगी। कुछ भी टोकाटाकी नहीं होगी। तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल के भीतर ही मेरी शादी तय हो गयी। तब मैं बीए कर रही थी। फिर क्या हुआ- वही जो हर शादी में अमूमन होता है। मेरा काम था घर की देखभाल। सास से मुझे कोई दिक्कत नहीं थी। ननद से भी कुछ दिक्कत नहीं थी। सचपूछो तो मुझे किसी से कोई दिक्कत नहीं थी। शहर भी बदला तो इनकी नौकरी की वजह से। मुझे तो दिक्कत अपने आप से थी। उस आप से जो मोहब्बत के ख्वाब देखता था। जिसकी क्रोशिये बनी बेल के फंदे हर दिन टूट कर उघड़ जा रहे थे। मेरे आप हर दिन इस ख्वाब के टूटने से परेशान रहने लगा। धीरे धीरे लगने लगा कि मैं कोई मशीन हूं। फिर बच्चों के बाद दूसरे अबार्शन वाला वाकया हुआ। मैं बहुत कमजोर हो गयी थी। मन से भी टूट गयी थी। कभी-कभार किसी फिल्म को देखकर मेरा भी मन करता था कोई मेरे लिए गाना गाये। कोई कहे कि बाजार से गुजरा तो तुम्हारा ख्याल आया कि कुछ तुम्हारे लिए लेते चलूँ। कोई मेरे लिए दीवाने की तरह फिरे शाहरूख खान न सही तो फव्वाद की तरह एक बार प्यार से देख तो ले। फिर ऐसे में उससे मेरी मुलाकात हुई जिसके प्यार में एकवक्त मैं पागल की तरह रहने लगी थी। अब आप इसे मेरा बचकानापन कहें या जिद। जो मर्जी आये कह दीजिए।

शाहिद से मेरी मुलाकात अरसे बाद एक शादी के फंक्शन में हुई थी। अबकी बार तो मैंने उससे उसका फोन नम्बर मांग लिया और अपना नंबर भी दिया लेकिन बात करने की हिम्मत नहीं पड़ी। बीमारी के बाद उसका फोन खैरियत के लिए आया बस यहीं से बातों का सिलसिला चल पड़ा। अब उससे फोन पर बहुत सारी बातें करने लगी। मैंने सोचा कि इसको मैं सब बताऊंगी कि कैसे मैंने उसकी एक-एक बात को ताबीज की तरह सहेजा था। पिछले छह दिन से उससे बात कर रही थी चूकिं वो मेरा रिश्तेदार था और बचपन का साथी भी तो उसकी-मेरी ढेरो बातें साझी थी। मैंने बहुत बातें कीं। अड़ोस-पड़ोस की दुनिया जहान की। उन छह दिनों में मैं चहकती रही। ऐसे लगा कि घर का काम कुछ कम हो गया है मेरे शरीर में खून बढ़ गया है।

यकीन मानिए, मुझे किसी को बताना था कि कैसे कोई उसके प्रेम में इतना पागल था। कैसे वो उस समय कुछ नहीं कह सकी- इसका मतलब कतई ये नहीं था कि उसे मैं फिर से पाना चाहती थी। मुझे कुछ नहीं चाहिए था। वैसे भी उसकी बातों से मैं समझ चुकी थी कि बाहर भले ही वो कमा कर आया है लेकिन जहनी तौर पर बहुत कुछ गवां कर आया है। लेकिन जो भी हो, मुझे तो बातें करनी थी।

मेरे लिए वह छह दिन की बातचीत किसी दवाई से कम नहीं थी। दवा से मेरे शरीर में जान आ रही थी, फिर एक रोज मैंने खुद ब खुद अपने शौहर से सबकुछ बताया कि कैसे छह दिन से मैं किसी से रोज बाते करती हूं। फिर क्या हुआ! यहां से कहानी अलग है। जिस आदमी को मेरी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। बोर करती थी। उसे मेरे किसी से बात करने से इतनी परेशानी हुई कि वो मेरे फोन की कॉल डिटेल निकलवा कर ले आया। उसमें मैंने एक रात छह घंटे बाते की थी। उस दिन उनकी नाइट ड्यूटी थी। पूरे घर में हंगामा हो गया। मेरी बीमारी नाटक हो गयी। मेरे शरीर में शक्ति नहीं थी कि बदले में कुछ कहती उन्होंने घर की चीजें तोड़ने-फोड़ने से लेकर मेरे मां-बाप तक को नहीं बख्शा। मैं आपको सच में कह रही हूँ—मैंने जितनी बातें की थीं, उनका एक-एक हर्फ तक उन्हें बताया था। और जब बता रही थी तो बहुत अच्छा लग रहा था। लग रहा था कि आज मेरी बातों को ये इतने ध्यान से सुन रहे हैं।

मैंने अपनी दुनिया खुद ही नर्क बना ली। वैसे सच ये है कि मैं पहले भी किसी स्वर्ग में नहीं रह रही थी। रोज एक जैसा किस्सा- जिसकी न शुरूआत थी न अंत। क्या बनाऊं- तीन पहर यही सवाल। फिर कल क्या खाना बनाऊंगी, सोचते-सोचते नींद आ जाती थी। लेकिन ये सच में ऐसा नर्क था जिसमें कब मुझे धकेल कर गिरा दिया जाएगा तय नहीं होता था। कब किसके सामने चांटा खा जाऊं, कहा नहीं जा सकता था। 

जो भी हो, उन्हें ये सच बर्दाश्त नहीं हुआ। वो मुझे रात को नींद से उठाकर बिठा देते थे कि बताओ तुम उसके साथ कैसे थी। तुमने क्या क्या किया- सिर्फ बातें ही नहीं की होंगी। तेरे शरीर की कितनी जरूरत है। बोल जल्दी बोल..। मैं कह नहीं पायी कि मुझे तो बातें करने वाला ही कोई चाहिए था शरीर की जरूरत तो तुम या तुम जैसा कोई भी पूरा कर सकता है। 

लेकिन कुछ नहीं कह पाई, फिर सोचा कि सच बताऊं कि उस लड़के में भी मुझे कुछ नहीं मिला। उसकी बातों में भी कुछ नहीं बचा है। छह दिन लगातार बात करने के बाद मुझे वहां वो नहीं मिला जिसके लिए मैं पागल थी। वैसे भी एक उम्र के बाद बचपन की पुरानी इमारत नहीं देखनी चाहिए जो इमारत सबसे सुंदर लगती थी वो अब वो अपनी रौनक कितनी खो चुकी है। मैंने कुछ भी नहीं कहा। शुरू में सफाई दी। बहुत सफाई दी, लेकिन बाद में जरूरत नहीं लगी कि कुछ बोलूँ, लेकिन इससे चीजें कहाँ ठीक होतीं। 

इस बात को बीते आठ साल हो गए हैं। मैंने छह दिन की बातचीत के लिए दिन-रात का दर्द झेला है। यकीन मानिये पूरे आठ साल मैंने उसे ये सोच कर माफ कर दिया कि उसका दिल दुखा है या मेरे बच्चों पर कोई आँच न आये। उसने मेरे बच्चों के आगे बेइज्जती की। मेरे बच्चों की कच्ची आँखों में माँ के लिए हिकारत का धागा पड़ गया। मुझे जरा सा खुश देख ले तो मेरी लानत-मलानत शुरू हो जाती थी। मेरे मां-बाप के आगे बेइज्जती की और अकेले में मुझे हर तरह की तकलीफ मिली है। वह वहशी की तरह मेरे साथ रहा। मेरी नींद, मेरे पीरियड्स किसी का कभी ख्याल नहीं रखा। उसने मुझे छोड़ा नहीं, लेकिन भीतर से तोड़ दिया। मेरे सामने मेरी उधड़ी बेलें थीं मैंने खुद उन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया। मैंने शादी के बाद प्यार जैसे अल्फाज़ को भुला दिया था। उसके बदले मैंने फर्ज,धर्म और इज्जत यही सोचकर हर लम्हा बिताया।  

फिर भी,जो भी हो मेरी सजा बहुत हो गयी थी। मेरे भीतर कोई था जो बार बार कहता था अब तु कितनी सजा भोगेगी। हर गुनाह की एक तय सजा है। एक कत्ल की सजा भी हजार बार फांसी तो नहीं है। यहाँ तो कत्ल भी मेरा हुआ है और सूली पर मैं ही चढ़ाई जाती हूँ। कुछ अर्से बाद मेरे दिल ने इस सज़ा से इंकार कर दिया। मेरे मन से अब वो बहुत दूर हो गया था। खुद मेरे भीतर से आवाज आने लगी कि मेरा गुनाह क्या है। वो मेरे करीब आने के लिए बहुत ही अजीब हरकत करता था जैसे कि मैं कोई ऐसी औरत हूं जिसके शरीर की ज़रूरत नामालूम कितनी है। जितना वो मेरे साथ ज्यादती करता था- मैं उससे उतनी ही दूर चली गयी। बहुत दूर। इतनी दूर की जितनी दूर कभी नहीं गयी थी। उतनी दूर गयी जहाँ से शौहर-बीवी का रिश्ता बहुत बौना सा दीखने लगा। मेरा शरीर भले बिस्तर पर पड़ा हो लेकिन मेरी रूह वहाँ से निकल कर भाग जाती थी। वह एक अजीब सी बैचेनी में भटकने लगी थी।

 मेरी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई है। यहां से मेरी जिन्दगी में एक नया मोड़ आ गया। मुझे सचमुच गुनाह करना था। एक ऐसा गुनाह जिसे करने के बाद मैं मुस्कुराते हुए सूली पर चढ़ती और कहती तुम मुझे मार सकते हो लेकिन रूह आजाद रहेगी। मेरी निगाह किसी ऐसे को ढ़ूढने लगी जिसे मुझसे बात करना पसंद हो। जो पहाड़ों की सैर करता हो। झरने देखकर खिलखिलाता हो। जो फूलों को प्यार से छूता हो। फिर एक दिन वो आदमी भी मिल गया। वो मेरे ही बिल्डिंग में नीचे की मंजिल में आया था मुझसे कुछ कम उम्र का। वो रोज सुबह किसी पसंदीदा गजल का रिकार्ड बजा देता-मुझे लगा ये गजल मेरे लिए है। ‘पूरा दुख और आधा चांद हिज्र की शब और ऐसा चांद..’। मैं तो ऐसे ही महसूस करती थी। मेरा दिल किया मैं भी कुछ ऐसा ही संगीत लगा दूं और कहूं कि मैं ये सुनती हूं और समझती हूं। मैंने भी एक दिन कुछ ऐसा किया। सुजात खान का सितार की झंकार से भरा गाना ‘रंगी सारी गुलाबी चुनरिया’ लगा दिया। बहुत दिन बाद सुन रही थी। मैं सच कह रही हूं- मेरे यहां म्युजिक सिस्टम धूल खा रहा था। कभी कभी बच्चे चलाते थे लेकिन उसमें मेरा दिल यूं नहीं लगा। फिर धीरे धीरे हमारी बात होने लगी। वो आफिस जाते नहीं थे कि मेरी बातचीत शुरू। आप कहेंगे कि मैं बड़ी ही बेवफा औरत हूं। यकीन मानिये मेरा मरने का दिल बिलकुल नहीं था। आपकी ज़बान में अब तो मुझे बेवफाई से ही चैन पड़ता था।

माटी पर बारिश की बूंदें पड़ें और उसमें से खुशबू न आए, भला ऐसे कैसे हो सकता है? मुझे ये इत्र खींच रहा था। 

मैंने अपने शौहर से झूठ बोला कि मेरी अम्मी बीमार है। वैसे मेरी अम्मी बीमार चल रही थीं लेकिन उस समय ठीक थीं। मैंने अपनी अम्मी से झूठ बोला कि ‘शाइस्ता के यहां तीन दिन के लिए जा रही हूँ, उसकी तबियत ठीक नहीं है। ‘तुम अरबाज़ से कहना कि तुम्हारे पास आ रही हूँ।’ शाइस्ता मेरी मौसेरी बहन थी और मेरी दोस्त है दूसरे हम दोनों मिलकर आनलाइन कपड़े का काम भी करते हैं। अरबाज़ को काम से एतराज़ नहीं था, बस बाहर आने-जाने से दिक्कत थी। मम्मी अरबाज़ का मिजाज़ जानती थीं। उन्होंने अरबाज़ को नहीं बताया। मैं तीन दिन बाहर रही।

मैंने कुल तीन दिन फिर से बिताये। तीन दिन-तीन रात सचमुच के। चार हजार तीन सौ बीस मिनट। वो सेकेंड मेरे थे।  मैं आपको दिल से कह रही हूँ। मुझे कोई पछतावा नहीं है। वो है कि अब भी आठ साल पहले के छह दिनों का हवाला देकर चिल्लाता है।

चूंकि मैंने उसे बता दिया है तो लगा कि आप को भी बता दूं, क्योंकि दूसरों की बातों से आपको कुछ पता चले ठीक नहीं। मुझे किसी तरह का पर्सनल अकाउंट नहीं खोलना था ये जिद जूनून या मेरी रूह की बेपरवाही थी कि उसे सबकुछ फिर से बताना था। 

उस दिन मैंने उससे कह दिया—छह दिन की बातें अब पुरानी हो गई हैं। जिस बात के लिए तुम मुझे रोज़ ज़लील करते हो—मैं उससे काफी आगे बढ़ गई हूँ।

पहले दिन उसने मेरी बात को मज़ाक समझा फिर दूसरे दिन से शुरू हो गया कि- कौन है, तुम किसके साथ घूमने गयी थी। मुझे बड़े दिनों बाद लगा कि कोई मेरे साथ अलग तरह की बातचीत कर रहा है। मैं कहने लगी कि हम रात भर पहाड़ की ठंड में टहलते रहे। तारे ऐसे दिख रहे थे कि सचमुच हाथ बढ़ाऊँ तो तोड़ लूँ। हवा के साथ जंगली गुलाब की पंखुड़ियां उड़ रही थीं। एक पंखुड़ी उड़ कर मेरे बाल में फंस गयी थी। उसने निकाल कर मुझे थमा दिया। मैंने उसे हवा में उड़ा दिया। उसके शरीर से मिट्टी की सोंधी महक उठती है। मैं खुद को रोक नहीं पाती हूं। सुबह की चाय जैसे कुल्लड़ में छनी और दोहरी खुशबू जैसे मन भीग जाए, मैं उसमें इतना भीग गई थी। मुझे फर्क नहीं पड़ रहा था कि मेरे शौहर के दिल पर क्या बीती, लेकिन मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। पिछले पंद्रह दिन से हम कुछ अलग बात कर रहे हैं।

 मैं चार हजार तीन सौ बीस मिनट को दुबारा तिबारा न मालूम कितनी बार जी रही थी। अब वो बिस्तर पर भी जल्दी सोता नहीं है। कभी रोने लगता है तो कभी कहता है कि तुम ऐसा मजाक मेरे साथ नहीं करो। मैं भी कुछ ऐसे नहीं कहती हूं कि लगे कि मजाक कर रही हूं लेकिन फिर बताने लगती हूं कि जहां गयी थी वहां पर एक पतली सी नदी की धार थी। उसके कंकड़-पत्थर तक साफ दिख रहे थे। क्या तुमने इतनी साफ नदी देखी है? 

वो कभी-कभी बहुत रोता है और कभी-कभी लगता है कि वो मेरा गला दबा देगा। कभी इस प्यार के लिए मैं तड़पती थी लगता कि किचेन में वो आये और मुझे प्यार से छूकर बात करे, रोउं तो गले लगा ले। बस थोड़ा सा प्यार और इज्ज़त चाहती थी। पहले मैं अकेले रोती थी, अकेले हँसती थी,तब उसे अहसास नहीं था।

जान मशीन में जान थी, उसे अब पता लग रहा था। उसे रिंच और स्क्रू नहीं चाहिए था, उसका ईधन तो बातें थीं।

अब मेरा दिल हलका है। मैं भी उसके रोने में शामिल हो जाती हूं वो मुझसे बातें करता है। हम इस बहाने बातें करते हैं। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि अब क्या होगा। मर तो मैं पहले ही गई थी। अब जिन्दा हूं अब वो जो करेगा वो मेरी हत्या होगी, जिबह तो मैं सत्रह साल से हो रही थी।

कल जब तुम्हें अखबार में पता चले कि फलां आदमी ने अपनी पत्नी की सीरत पर शक करने के चलते उसका गला दबा दिया तो बस कहना अरे उसे तो हम जानते थे। अब जान-पहचान हो गई है तो आप बताइए कि आपकी कोई कहानी है। मुझे पता है कि आपके पास फुर्सत नहीं है लेकिन देख लीजिए उनके आफिस जाने के बाद आप चाय लेकर मेरे साथ बैठ सकते हैं। अरे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप आदमी हैं या औरत। हाँ, तो बताइए—तो आपको तो मैं बेवफा लग रही हूँ? आखिरी जरूरी बात तो रह गयी। उस पर भले ही आप यकीन न करें, यही कि मैं अपने बच्चों अदनान और आदिल से बेपनाह मुहब्बत करती हूं…

उपसंहार

माफी चाहती हूँ। कहानी को यहीं रोकना पड़ेगा। कागज़ यहां पर खत्म हो गया। पता नहीं कहीं हड़बड़ी में मैंने रद्दी वाले को तो नहीं दे दिया। इस डायरीनुमा कागज के पहले मुझे बस पुलिसवाले का रोजनामचा और फटी हुई एफआईआर की कॉपी मिली थी। कुछ समझ नहीं आ रहा है। मुझे नहीं मालूम कि ऐसा कोई केस सच में था या नहीं। अंत में क्या हुआ, क्या आत्महत्या हुई या हत्या? या फिर किसी कमज़र्फ ने मेरे दिल की जांच के लिए ये सब लिखा है। कभी लगता है कि मदाम बावरी की तरह या अन्ना कैरोनिना की तरह औरत ने खुद को खत्म कर लिया होगा। कर ही लिया होगा, नहीं तो बच्चों की माँ और क्या करेगी। लेकिन फिर लग रहा है कि आदमी ने औरत का गला दबा दिया होगा। फिर लगता है कि कहीं औरत ने तो आदमी को नहीं मार दिया। फिर ये पुलिस वाला इस केस को क्यों इतना सीरियसली ले रहा था कहीं ये वही लड़का तो नहीं जिसके साथ वो औरत घूमने गयी थी। भगवान जाने, मुझे नहीं मालूम क्या हुआ होगा।

मेरी धड़कन कभी तेज़ तो कभी धीरे हो जा रही है। ऐसा लग रहा है कि इस औरत को कहीं देखा है, बस याद नहीं आ रहा है। 

***

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top