साहित्य-कला: रचनाशीलता के अन्वेषण का प्रयास

सुधांशु गुप्त

Sudhanshu Gupt 21वीं सदी के ढाई दशक बीत चुके हैं। 20 वीँ सदी के अंत में ये आशंकाएँ व्यक्त की जा रही थीं कि आने वाले समय में कलम, कागज़, किताबें एक हद तक असंगत हो जाएँगी। बेशक इन सबका इस्तेमाल कम हुआ लेकिन बोले गये शब्दों को हम वॉयस मेल के ज़रिए या स्क्रीन पर जीवंत परछाई तक रखना सीख गए। शब्दब्रह्मबना रहा। बेशक वह अलगअलग माध्यमों में अलग रूप में दिखाई दिया। अब रचनाओं के विषय में कहा जाने लगा किरचनाओं को देखा’, यह बहुत कम सुनाई देता किआपकी रचनाओं को पढ़ा’, यानीपढ़ना देखने मेंबदलता गया। ज़ाहिर है एक पूरी शताब्दी का सफ़र तय करने के बाद हम तकनीकी समृद्धि तक पहुँच गए। यह भी सच है कि इससे पहले की कई शताब्दियों के दौरान हमने पारंपरिक कही जाने वाली कहानी की श्रव्य विधा को सीमित शब्दों में रची जाने वाली एक सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्ति में बदलते देखा। इस तब्दीली ने दादीनानी से सुनी जाने वाली कहानियों को भी सीमित कर दिया। श्रव्य तत्वों में दृष्टव्य तत्वों को शामिल करके इसे और प्रभावशाली बनाया जाने लगा। यह तकनीकी समृद्धि का ही असर है कि आज सोशल मीडिया पर आपको नये पुराने, देसीविदेशी साहित्यकारों की असंख्य रचनाएँ सुनने को मिल जाएँगी। बहुतसी रचनाएँ वीडियो में भी उपलब्ध हैं, जिनके साथ कहानी की मांग के अनुरूप विजुअल्स का प्रयोग किया गया है। आज हमें ऐसे बहुत सेस्टोरी टेलरमिलते हैं जो ऐतिहासिक प्रेम कहानियों को सामने बैठे दर्शकों के सम्मुख सुनाते हैं। इन्हें सुनाने वाले, चेहरे पर अभिनेता के गुणों का भी इस्तेमाल करता है। यह पता करना मुश्किल है कि इसका कैसा प्रभावदर्शकोंश्रोताओंपर पड़ता हैया कितना पड़ता है। लेकिन यंग जेनरेशन का नयी तकनीक के प्रति प्रेम दिखाई दे जाता है। यह भी पता चलता है कि यंग जेनरेशन साहित्य को प्रचारितप्रसारित करने में इसका इस्तेमाल करना चाहती हैकर रही हैफेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य माध्यम।

थोड़ा सा पीछे मुड़कर देखते हैं। साहित्य की बात करें तो भारत में साहित्य की परंपरा 4000 सालों से भी अधिक पुरानी है, जो मौखिक श्रुति से लेकर वेदों के माध्यम से होते हुए लिखित रूप में विकसित हुई। और यह परंपरा संस्कृत पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास के साथ ऋग्वेद से लेकर रामायण, महाभारत, भक्ति साहित्य और आधुनिक काल तक निरंतर समृद्ध होते हुए आज डिजिटल युग में पहुँची है। संगीत, सिनेमा, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला और सभी अन्य कलाएँ  तकनीकी प्रगति को ही दर्शाती हैं। इनका इतिहास मानव सभ्यता के विकास का एक जीवंत दस्तावेज है, जो प्रागैतिहासिक काल से लेकर डिजीटल युग तक आया है। 

लेकिन आज इस तकनीकी विकास ने हमारे सामने अनेक चुनौतियाँ भी पेश की हैं। एआई (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस) यदि कविताएं, कहानियाँ लिखने लगा (लिख ही रहा है और वह निरंतर स्वयं को बेहतर बना रहा है) तो लेखकों के पास मौलिकता और इमोशंस कहां बचेंगे, क्या आने वाली नसलों के लिए पुराने लेखकों (दोस्तोव्स्की, तॉलस्ताय, चेखव, लू शुन, कामू, जैक लण्डन, हेनरी, ग्राहम ग्रीन…) का कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा, वे क्यों उनको पढ़ेंगेपढ़ना चाहेंगे। यह भी संभव है कि उन्होंने कभी इन लेखकों के नाम भी ना सुने हों। उस स्थिति में विश्व के सभी महान लेखक हाशिये पर चले जाएँ। एक अन्य चुनौती यह भी होगी कि क्या अच्छे और बुरे लेखन का विवेक बच पाएगा, हिन्दी का लेखक (जो आमतौर पर स्थानीयता की बात करता है) कैसे अपनी ग्लोबल छवि बना और बचा पाएगा? क्या हिन्दी केवल अपनी ही सरहदों तक सीमित रह जाएगी?

हमिंग वर्ड ऐसा ही एक डिजीटल प्लेटफॉर्म है, जो आपको ग्लोबल परिप्रेक्ष्य देगा। कहानियों, कविताओँ, समीक्षाओं, उपन्यासों, वैचारिक आलेखों, रीडिंग लिस्ट और ग्लोबल सोच के ज़रिए। हमिंग वर्ड ऐसे लेखकों पर भी बात करेगा, जिनकी मृत्यु को 100 या डेढ़ सौ साल हो गए हैं लेकिन उनकी कहानियाँ, उपन्यास या जीवन आज भी पैशन के साथ पढ़ा जाता है। हमिंग वर्ड हिन्दी की चर्चित कहानियाँ और उनपर आलेखजैसे वे क्यों चर्चित हुईं, कालजयी रचनाएं कौनसी होती हैं और क्यों, भी देगा। हमिंग वर्ड हिन्दी और विदेशी लेखकों के बीच पत्रों के ज़रिए जो संवाद हुआ, उन्हें भी देने का प्रयास करेगा। हमिंग वर्ड इनके ज़रिये उस कालखण्ड की सोच और लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को उजागर करेंगे।

हमिंग वर्ड ऐसे रचनाकारोंकलाकारों को सामने लाने का भी काम करेगा, जो महानगरों से दूर छोटे शहरों में, कस्बों या गाँवों में बैठकर सादगी से लिखपढ़ रहे हैं, जो बेशक धीमी आवाज़ में बोलते हैं (बिना किसी शोर शराबे के), जिनकी आवाज़ (लेखन या रचनात्मकता) महानगरों तक नहीं पहुँच पाती। हमिंग वर्ड को पूरा यक़ीन है कि ऐसी आवाज़ें कम नहीं होंगी और जब एक साथएक प्लेटफॉर्म से इन आवाज़ों को सुना जाएगा (उनकी रचनात्मकता को देखा जाएगा) तो ऐसी माहौल बनेगा जिससे हम सब उनकी रचनात्मकता से वाकिफ़ होंगे और निश्चित रूप से कला की दुनिया भी समृद्ध होगी। हमिंग वर्ड का यही उद्देश्य है।

साहित्य और विभिन्न कलाओं से जुड़े कलाकारों के चयन में केवल रचना को ही अहमियत देगा हमिंग वर्ड।

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