स्वाति शर्मा का जर्मन से अनुवाद
इन्हें काफ्का ने 9 नवंबर,1903 (बीस साल की उम्र में) अपने स्कूल के दोस्त ऑस्कर पोलाक को लिखे एक पत्र में शामिल किया था, अपने “खली समय में” पढ़ने के लिए।
- सोलह जनवरी
सोलह जनवरी। ये पिछले सप्ताह ही था
जैसे हुआ एक पूर्ण पतन। असंभावना
सोने की, असंभावना जागने की,
असंभावना जीवन को जीवन के
सिलसिलेवार रूप की सटीकता से ढोने की।
घड़ियाँ एक दूसरे से मेल नहीं खातीं।
मेरा आन्तर एक नारकीय, या
राक्षसी, नहीं तो अमानवीय
प्रकार से शिकार करता है।
मेरा बाह्य मंथर गति से अपने
नियमित रास्ते पर चलता है। और क्या ही
हो सकता है जब ये दोनों
अलग अलग लोक टूटते हैं,
एक दूसरे से भयावह प्रकार से
दूर होते हैं। ये अकेलापन
जिसका ज़्यादा भाग मुझ पर थोपा गया,
उसका कुछ भाग मेरे उसे ढूंढने का नतीजा है
(हाँ, ये ज़बरदस्ती के सिवाय और हो ही क्या सकता है)
अब बिलकुल गैर-दोहरा और स्पष्ट हो गया है
और उठ गया है
बाहर की अति कहाँ ले जाती है?
ये, ऐसा प्रतीत होता है, की अनिवार्यतः
पागलपन की ओर ही ले जाती है।
इस बारे में और कुछ नहीं कहा जा सकता।
शिकार मेरे अंदर से गुज़रता है और मुझे चीर देता है।
या मैं कर सकता हूँ – भले ही केवल एक बार के लिए-
इसे मुझे सीधा पकड़े रहने दूँ और
शिकार में घसीटने दूँ।
फिर मैं कहाँ से आऊंगा? शिकार करना तो बस एक
छवि है- ऐसा भी कहा जा सकता है :
आक्रमण, अंतिम सांसारिक सीमा के विरुद्ध।
2. ठंडा और कठोर
ठंडा और कठोर है आज का दिन।
बादल जम रहे हैं।
हवाएँ तनी हुई रस्सियां हैं।
लोग जम रहे हैं।
पदचाप धातु जैसी सुनाई देती हैं
अयस्क के पत्थरों पर,
और आँखें देखती हैं
विशाल सफ़ेद झीलें।
पुराने शहर में खड़े हैं
छोटे चमकीले क्रिसमस घर,
उनकी रंगीन खिड़कियाँ बाहर तकती हैं
बर्फ़ से ढकी जगहों को
चांदनी बिखरी हुई जगहों पर
चुप चाप चलता है
एक आदमी बर्फ़ में आगे की ओर
उसकी बड़ी छाया को
उड़ाती है हवा घरों के किनारे।
लोग जो अँधेरे पुलों को पार करते हैं
सामने से संतों के
मंद रौशनी में।
बादल जो स्लेटी आकाश में
तैरते हैं ऊपर से धुंधले मीनारों वाले
गिरजाघरों के।
वो जो झुका हुआ है चौकोर रेलिंग पर
और शाम के पानी को देख रहा है
प्राचीन पत्थरों पर हाथ लगाए।
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