मिंटू दास की कविताएँ- असम

अनुवाद : दिनकर कुमार

 

1. कलम का संघर्ष

बोधिद्रुम की सूखी लकड़ी के एक टुकड़े में ही
जन्म हुआ था उसका
पत्थर की तरह भारी काई जमी धरती के शब्दों का भार सहने के लिए
खुरदरी उंगलियों के बीच निस्तेज कलम की घुटती सांसें
धूप के रंग वाले सपनों के जाग न पाने की बीमारी से अस्थिर
शव को खींचकर जीने का नाम क्या जीवन है
जहाँ छीन नहीं सकते खुद के लिए
मुरझाए सीने की हल्की दुख भरी आह
कलम के कलेजे में अभावग्रस्त की रुलाई नहीं
फटी चप्पल में तार लपेटकर
गुजर जाता है ठोकरों भरे जीवन का एक युग, एक पहर
झुकी हुई कलम की गर्दन पर डोलियाँ झूलती हैं
कीट के डंक के दाग से आँगन चिल्लाता रहता है
मिट्टी-मनुष्य की ममता में हवा साँस नहीं लेती
पकी भौंहों की रक्त-रंजित आँखों में कूदता रहता है जीवन
फिर भी
कलम की आमरण व्याकुलता उंगलियों को घेरे रहती है
चौदह मनुओं की चेतना में खिल उठते हैं शाश्वत शब्द-पुष्प
यादों के फूल चुनकर कलम अपनी टोकरी भरती है
आदर-सत्कार के साथ
नामघर की संध्या घंटों की ध्वनि में स्पंदित होता है
प्रार्थना का प्रगल्भ ईश्वर

2. प्रिय धूप में

मेरी प्रिय धूप के लाल-हरे रंग में
जल उठते हैं
जी उठने के सारे स्वप्न-दुःस्वप्न के रेत के घर
हवाहीन भावों की एक अदृश्य बारिश में
भीगता रहता है धूल का धुआँ
प्लास्टिक की पानी की एक बोतल में
यदि डूब पाता
आँखों की परत खोलकर  भुने हुए आलू की गंध समेटकर
पसीने की नमकीन नदी में अरमानों की नाव उतरती है
भीगे माथे की घनी भौंहों पर
बैठा रहता है एक अन्य मृत सूर्य
फटी बनियान के छेदों से दिखता रहता
बादलहीन एक आसमान का सरल बहाना
छायाहीन एक चुटकी भर स्थान पर चलता रहता है
अथक
मटमैले पैरों का गहरा निशान
प्रिय धूप में पीठ फैलाकर बैठा रहता है
सूखे पेट की
कुलबुलाती भूख का एक हिस्सा
हल्की साँसों के जटिल अभ्यास में
बदल जाता है कहानियों का सात लड़ी वाला हार

3. खुली खिड़की के सच्चे काँच में

जो पार होकर देखा
और जो प्रतिबिंब में झलका
सब सच है
उस पार हरियाली के बीच
थोड़ी और हरियाली
और
इस तरफ धुएँ जैसे धूल के
तूफान में रक्त-रंजित आँखों की अक्षत दृष्टि की दीप्ति
सहेज कर रखी हर बात का
सरल अनुवाद उनके हाथों में
सौंप कर
मैं बढ़ रहा हूँऊपर असीम की ओर
सिर के ऊपर के एक आसमान के बहाने
देर से
बैठे-बैठे गुज़ार रहा हूँ
खुली खिड़की के सच्चे काँच में
जीवित होने के लिए छोड़ दी है छुईमुई की बेल की रेखा
इस अंधेरे के चाँद में भीगी रहती है
हल्की साँस
लहलहा कर बढ़ती आती है सीने की विष-माला
उछल कर पार हो जाने वाले चंचल बसंत के लिए
इतने दिनों तक
किसी आयोजन का अभ्यास नहीं हुआ

***

Mintu Das :

A state award–winning, young eminent Assamese Poet, short story Writer, Essayist, and Literary Critic from Assam. Having been engaged in literary pursuits since his school days, Mintu Das has so far published seven books. Among his notable works are Ronga Shimulur Rodot (2024), Tez Pora Matit (2016), Tez Aru Ghamor Slogan (2016), Ei Juddhor Xexot (2018), and Kone Jane Jibonor Xothik Khobor (2014). The major awards received by poet Mintu Das include the Yuva Lekhaok Sanman conferred by Assam Government in 2025, Kabyapran Chujauddin Ahmed Award in 2024, Tikendrajit Gogoi Memorial Award in 2017, Bandhuchaki Award in 2020, Rohini Medhi Poetry Award in 2017, and the Chitradhar Thakur Literary Award in 2017 conferred by the Assam Sahitya Sabha.
das.mintu34@gmail.com

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