अंग्रेज़ी से अनुवाद : श्रीविलास सिंह
1. मैं चाहती हूँ एक प्याला पाप का
उसने कहा मैं चाहता हूँ वह जो नहीं पाया जा सकता।
– मौलवी
मैं चाहती हूँ एक प्याला पाप का, एक प्याला पतन का,
और थोड़ी मिट्टी मिली हुई अंधेरे के संग,
उससे मैं बनाऊँगी एक मूर्ति पुरुष के आकार की,
लकड़ी सी बांहों और तिनकों से बालों वाली।
उसका मुँह है बड़ा।
गिर चुके हैं उसके सारे दाँत।
उसका चेहरा दर्शाता है उसके अंतर्मन की कुरूपता।
लालसा ने बना दिया है उसे सारे निषेध भंग करने वाला
और उगा लेने वाला अपनी भौंहों पर “लज्जा का एक अंग”
उसकी आँखें हैं जैसे दो रक्तवर्णी किरणपुंज,
एक केंद्रित सोने की बोरी पर,
दूसरी शयनकक्ष के सुखों पर,
वह बदलता है मुखौटे गिरगिट की भाँति
ईल मछली की भाँति है उसका हृदय दोहरी धड़कन वाला।
वह बढ़ता है किसी विशाल शाखा की भाँति,
और उसकी देह ने पा ली है वानस्पतिक विशिष्टताएं।
फिर वह आएगा मेरे पास,
मुझे सताने का इरादा लिए।
मैं प्रतिरोध करूँगी और चीख़ूँगी उसके भय से।
और वह आदमखोर जिसे पुरुष कहते हैं
मुझे पालतू बना लेगा अपनी गालियों से।
जब मैं देखती हूँ उसकी आँखों में
मासूमियत और शर्म से भरी हुई,
मैं चीखती हूँ स्वयं पर : तुम देखो,
किस तरह तुमने बिता दिया एक पूरा जीवन प्रतीक्षा करते “आदम” की।
यह है वह जिसकी तुमने तमन्ना की थी।
2. और देखो
“क्या वे ऊँट के संबंध में विचार नहीं करते, कि वह कैसे सृजित हुआ?”
-कुरआन, सूरा ८८:१७
और ऊँट को देखो, वह कैसे सृजित हुआ:
मिट्टी और पानी से नहीं,
बल्कि, मानो जैसे, मरीचिका और धैर्य से।
और तुम जानते हो मरीचिका कैसे छलती है आँखों को।
और मरीचिका नहीं जानती रहस्य तुम्हारे धैर्य का:
कैसे तुम बर्दाश्त करते हो प्यास, रेत और नमक के दलदल की
और उस विशाल उपस्थिति को अपनी थकी हुई आँखों से देखना।
और देखो किस तरह यह दृष्टि चिन्हित है नमक की लीक से
तुम्हारे गालों पर आँसुओं की धारा से बनी सूखी पंक्तियों की भाँति।
और देखो आँसुओं को जिन्होंने सोख लिए हैं
तुम्हारे भीतर से चेतना के सब उपादान।
किस शून्य से तुम्हें भरना चाहिए यह रिक्त स्थान?
और देखो इस रिक्त स्थान में एक प्यासे ऊँट की व्याकुलता,
पागल हो चुका अपने धैर्य की सारी सीमाओं से परे,
चुपचाप अपना भारी बोझ ढोने को अनिच्छुक।
और देखो इसके दो कृतंक बुरी तरह चमकते दाँतों की पंक्ति में।
धैर्य जन्म देता है घृणा को और घृणा मारक घाव को:
देखो किस प्रतिशोध से ऊँट ने
नोच ली हैं शिराएँ अपने चालक की।
मरीचिका ने खो दिया अपना धैर्य।
और देखो ऊँट को।
3. मत डालो मेरे देश को ख़तरे में
यदि क्रोध की लपटें उठती हैं कुछ और ऊँची इस भूमि पर, तुम्हारी कब्र के पत्थर पर तुम्हारा नाम ढँक जाएगा धूल से।
तुम हो चुके हो एक बड़बड़ाते लफ़्फ़ाज़। तुम्हारी ढीठ शेखी बन चुकी है मज़ाक़ की चीज।
झूठ जो तुमने पाए, तुमने बुन लिए हैं एक साथ। रस्सी जो तुमने बनायी है, तुम पाओगे उसे लिपटी अपनी ही गर्दन में।
घमंड से फूल गया है तुम्हारा सिर, तुम्हारा विश्वास हो चुका है अंधा। जो हाथी गिर जाता है फिर नहीं उठता।
बंद करो यह उच्छृंखलता, लापरवाही से मेरे देश को धकेलना ख़तरे में। विकट चेहरे वाला बादल गिड़गिड़ायेगा दलदल के पैरों में।
बंद करो यह चीखना, तबाही और रक्तपात। बंद करो वह सब जिस कारण ईश्वर की संतति शोक करे आँसू बहाती हुई।
मेरे शाप नहीं असर डालेंगे तुम पर पूरे हो कर। क्योंकि मेरे दुश्मनों के कष्ट भी मुझे देते हैं पीड़ा।
तुम भले चाहो मुझे जला देना, अथवा निर्णय लो मुझे संगसार करने का। लेकिन तुम्हारे हाथों की माचिस या पत्थर खो देंगे अपनी शक्ति मुझे हानि पंहुचाने की।
4. आदमी जिसका एक पाँव नहीं है
आदमी जिसका एक पाँव नहीं है
मोड़े हुए है अपनी पतलून का एक पायंचा
ग़ुस्सा सुलग रहा उसकी आँखों में।
यह क्या तमाशा है, वे चीखते हैं।
यद्यपि मैं अपना मुँह फेर लेती हूँ दूसरी ओर,
उसकी छवि देर तक रहती है मेरी आँखों में:
उसकी युवावस्था, बीस से भी कम, शायद,
मैं प्रार्थना करती हूँ वह नहीं होगा मेरे जैसा: चालीस वर्ष और कष्ट झेलने हेतु।
यद्यपि कष्ट जो आता है अस्तित्व के साथ
होता है अभेद्य ऐसी विनतियों के लिए।
मेरे पाँव फुर्तीले थे,
फिर भी राह कितनी कठिन थी मेरे लिए।
वह कैसे चल पाएगा बस एक ही पाँव से?
ठक, ठक, वह आवाज़ करता है फुटपाथ पर अपनी छड़ी से
यद्यपि उसे आवश्यकता नहीं किसी हस्ताक्षर की
दर्ज करने को अपनी उपस्थिति।
मेरी कोमल मुस्कान उसकी आँखों में बदल गयी काँटों और कटारों में।
कठोर व्यवहार के आदी
उसे नहीं कोई भूख कोमलता की।
ऐसा है मानों अपनी देह की कमी के साथ ही
उसकी आत्मा ने भी खो दिया है अपना लचीलापन।
उसकी मदद को रुकने हेतु, सोचा मैंने, उसको दूँगी मैं थोड़ी करुणा और मातृसुलभ सलाह।
किंतु मुझे भान हुआ कि यह सब उसकी सहनशक्ति से अधिक था।
मैं मुड़ी उसकी ओर बातचीत शुरू करने को।
जगह जहाँ वह खड़ा था, ख़ाली थी।
वह जा चुका था, वह जिसका एक पाँव नहीं था।
5. हमारे आँसू हैं मधुर
हमारे आँसू हैं मधुर, हमारी हँसी विषमय।
हम खुश होते हैं जब हों दुःखी, और दुःखी जब हों खुश।
हम धोते हैं एक हाथ रक्त से और दूसरे से हम धोते हैं रक्त।
हम विलाप करते हैं जब हम हँसते हैं इन दोनों कामों की व्यर्थता पर।
आठ वर्ष बीत गए, हम नहीं ढूँढ़ पाए उनका अर्थ।
हम रहे हैं बच्चों की भाँति बिना किसी हिसाब या ज़िम्मेदारी के।
हम ने तोड़ डाली हर डाली, बगीचे की किसी आँधी की भाँति।
हम ने नोच डाली दीपवृक्ष की हर लता।
और यदि हम ने पाया एक भी वृक्ष, अब भी खड़ा हुआ, अवज्ञा से,
हमने काट डाली उसकी शाखाएँ, उखाड़ दिया हम ने उसे जड़ से।
हमने कामना की युद्ध की, वह लाया मुसीबत हमारे लिए।
अब अफ़सोस करते, हम कामना करते हैं शांति की।
हम ने नोच लिए पंख और सिर, देह से,
अब, खोजते हुए इलाज, हम व्यस्त हैं प्रत्यारोपण में।
क्या यह हो जाएगी जीवित, क्या यह उड़ेगी,
सिर से जो हम जोड़ रहे, पंख से जो हम सिल रहे।
6. मेरे देश, मैं निर्मित करूँगी तुम्हें फिर से
मेरे देश, मैं निर्मित करूँगी तुम्हें फिर से,
यदि आवश्यकता हुई, तो अपने जीवन से बनी ईंटों से।
मैं निर्मित करूँगी स्तंभ, तुम्हारी छत धारण करने को
यदि आवश्यकता हुई, तो अपनी अस्थियों से।
मैं साँस लूँगी सुगंध में तुम्हारे फूलों की,
जो महकते है तुम्हारे यौवन से।
मैं धो डालूँगी रक्त तुम्हारी देह से
अपने आँसुओं की धार से।
एक बार फिर अंधेरा दूर जाएगा इस घर से।
मैं रंग दूँगी अपनी कविताएँ हमारे आकाश के नीले रंग से।
“अस्थियों को पुनः जीवित करने वाला” अपनी उदारता में देगा मुझे
एक पर्वत का वैभव अपने परीक्षा के मैदानों में।
वृद्ध, मैं भले हो सकती हूँ, पर मौक़ा मिलने पर, मैं सीख लूँगी।
मैं शुरू करूँगी दूसरा यौवन अपनी संतानों के साथ।
मैं सुनाऊँगी हदीस देश के प्रेम की
इस जोश के साथ कि हर शब्द हो उठेगा जीवंत।
अभी भी प्रज्ज्वलित है एक अग्नि मेरे वक्ष में
भाईचारे की ऊष्मा को कम न होने देने को।
मैं महसूस करती हूँ अपने लोगों के बारे में
एक बार फिर तुम दोगे मुझे शक्ति,
भले ही मेरी कविताएँ बस चुकी हैं मेरे रक्त में।
एक बार फिर मैं निर्मित करूँगी तुम्हें अपने जीवन से,
भले ही हो यह सब मेरे संसाधनों से परे।
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सिमिन बेहबहानी के लिए फ़ातिमा शम्स (शहरज़ाद एफ़ शम्स) की कविता:
मैंने स्वप्न में देखी एक स्त्री खड़ी हुई अपनी स्वयं की कब्र पर
खुली बांहों से सामना करती हवा का, देखती उसे चोट पहुँचाते और दहाड़ते।
लम्बी और एक अप्सरा की भाँति राजसी, सूर्य की पुत्री
बहती हुई आवारा हवा के संग, श्वेत परिधान में लिपटी।
मैंने महसूस किया कि जैसे वह क्षीण हो रही मैं भी हो जाऊँगी अस्तित्वहीन
तभी शून्य के कगारों से उठी ये पंक्तियाँ अकस्मात् –
यह एक रात्रि थी, नशे में और निद्राविहीन रात्रि, निद्रह्रास और मदिरा का
एक छलकता हुआ पात्र उसके हाथों में और एक भरा हुआ प्याला मेरे।
कीमियागर थी एक स्त्री, प्रकाश की सूत्रधार
सितारों की विश्वस्त, रात्रि से निर्भय।
उसकी कविता थी प्रेमालिंगन ग़रीब और दुःखी लोगों के लिए,
मज़दूरों, किसानों और वेश्याओं के लिए एक सुरक्षित स्वर्ग।
एक मीटर सत्तर सेंटीमीटर कुल ज़मीन जो उसकी मातृभूमि छोड़ सकती थी उसके लिए,
किंतु जब बात हो कविता की, सारी दुनिया थी उसका हिस्सा।
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सिमिन बेहबहानी (1927-2014)
आधुनिक फ़ारसी साहित्य की एक दिग्गज ईरानी कवयित्री, गीतकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता थीं。उन्हें उनके साहसिक लेखन और सामाजिक संघर्षों के कारण दुनिया भर में “ईरान की शेरनी” के रूप में जाना जाता था। उन्होंने ग़ज़ल (फारसी और पारंपरिक दोनों) में समकालीन विषयों, स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकारों को सफलतापूर्वक शामिल किया। उन्हें दो बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था और वे दुनिया भर के कई साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित थीं। उनका पहला काव्य संग्रह 1951 में ‘सेतार-ए शेकस्तेह’ (टूटा हुआ सितार) प्रकाशित हुआ था। उनकी कविताओं का एक अंग्रेज़ी अनुवाद “ए कप ऑफ़ सिन” के नाम से प्रकाशित हुआ। उनकी कविताओं के अनुवाद अनेक भाषाओं में हुए हैं।

