सुंदर पहाड़ियों का नज़ारा – लाओ मा

Lao Ma

अनुवादः यादवेन्द्र

मेयर के नाम उसके दफ़्तर में एक चिट्ठी आई। यह चिट्ठी यांगयांग नाम के छात्र ने लिखी थी जो ग्रीन प्राइमरी स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ता था। उस चिट्ठी का मजमून यह है:

“प्रिय मेयर अंकल,

कैसे हैं आप?

मुझे आप से दो बातें बतानी हैं – उनमें से एक अच्छी है पर अफ़सोस दूसरी बुरी है।

पहले अच्छी ख़बर। मेरे मां पापा ने फ्यूचर कम्युनिटी के बिल्डिंग नंबर 23 में नया घर खरीदा है। हमारा यह घर 14वें तल्ले पर है – खूब सुंदर और प्यारा-सा घर है। इसमें कभी भी कितनी भी बरसात हो, छत से पानी नहीं टपकता। यहां आने के बाद जब हम सामने की खिड़की के पास पहली बार खड़े हुए तो पापा ने पश्चिम की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा हमें दिखाया… यह बताया भी कि उन्होंने यह घर यही सोचकर खरीदा कि खिड़की पर खड़े होकर हमारा पूरा परिवार हरी-भरी पहाड़ियों का नज़ारा देख सकेगा।

 जब यहां आकर मैंने पहली बार हरी-भरी पहाड़ियां देखीं तो मेरा मन खुशी से झूम उठा। मैंने मां पापा को बार-बार कहा कि क्या मेयर अंकल भी हमारी तरह इस खूबसूरत दृश्य को देख सकते हैं? उन्होंने मुझे बताया कि आप अपने काम में बहुत व्यस्त रहते हैं… पर एक दिन हम उन्हें अपने घर आने का न्योता देंगे और कहेंगे कि जब भी उन्हें काम से थोड़ी फुर्सत मिले हमारी बालकनी पर हमारे साथ थोड़ा समय बिताएं और पश्चिम की ओर दिखने वाली पहाड़ियों की खूबसूरती का आनंद लें।

 पर मुझे तो आपको दूसरी बात भी बतानी है—बुरी खबर। पिछले लगभग दो महीनों से सामने वाली पहाड़ियां नहीं दिखाई दे रही हैं। जब हम पहली बार इस घर में रहने आए थे तो मैं हर रोज यहां से उन पहाड़ियों को निहारती थी , लेकिन ऐसा नहीं था कि हर रोज़ वह मुझे दिख ही जाती थीं। जिस दिन आसमान साफ़ होता और धुंध न होती उस दिन मुझे इन पहाड़ियों के दर्शन होते। अंकल, आपको यह जानकर शायद ताज्जुब हो कि मैंने अपनी मैथ्स की कॉपी में तारीख़वार  पूरा हिसाब रखा हुआ है। हर सुबह जब मैं बालकनी में खड़ा होकर पश्चिम दिशा में देखता हूं और मुझे पहाड़ी दिखाई दे रही होती है तब उस तारीख़ पर मैं टिक का निशान लगा देता हूं…यदि नहीं देख पाता हूं तो क्रॉस का निशान लगाता हूँ। पिछले छः महीनों का हिसाब-किताब मेरे पास है। मुझे यह बताते हुए अफ़सोस हो रहा है कि इन छः महीनों में केवल बारह दिन ऐसे थे जिनपर टिक लगा था, बाकी सारी तारीख़ों पर क्रॉस लगा हुआ है। पिछले दो महीनों की बात करें तो मुझे एक भी ऐसा दिन नहीं याद जब मुझे बालकनी से पहाड़ियां दिखाई पड़ी हों… मेरी किताब में सिर्फ़ क्रॉस ही क्रॉस लगे हैं।

हर रोज़ अब ऐसा लगता है जैसे सलेटी रंग की धूल ठहरी हुई हो सामने – पापा ने बताया वायु प्रदूषण के चलते ऐसा हो रहा है। मेयर अंकल, क्या यह सही है कि प्रदूषित हवा ने सुंदर पहाड़ियों को हमारी नज़रों से छुपा लिया? मेरा मन उन हरी-भरी पहाड़ियों को हर रोज़ देखने को मचलता है पर निराशा हाथ लगती है। आपसे मेरी बिनती है कि कुछ ऐसा उपाय करें जिससे मैं पहाड़ियों को फिर से निहार पाऊं। आप करेंगे न अंकल? ये पहाड़ियां वाकई बेहद खूबसूरत हैं।

माफ़ी चाहता हूँ, मेयर अंकल, मैं  खा म खा आपको परेशान कर रहा हूँ।”

मेयर ने जब यह चिट्ठी पढ़ी तो बहुत भावुक और विचलित हो गए। उन्होंने फ़ौरन अपनी कलम उठाई और चिट्ठी के हाशिए पर अपना निर्देश दर्ज़ किया:

“बच्चे ने चिठ्ठी में जो लिखा है वह बहुत महत्वपूर्ण है। उसकी आंखों को तत्काल अच्छे से अच्छे इलाज़ की दरकार है। संबंधित विभाग को यह निर्देश दिया जाता है कि अविलंब इस चिट्ठी को उपयुक्त अस्पताल तक पहुंचाया जाए। इस बात की हर संभव कोशिश की जाए कि बच्चे की नज़र फिर से दुरुस्त हो जाए और वह सामान्य ढंग से देख सके।”

(लाई किशेंग और लाई पिंग के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित)

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 लाओ मा 

 (1963 में जन्मे लाओ मा (असल नाम मा जुंजी) एक प्रमुख चीनी लेखक हैं जिन्हें आधुनिक चीनी समाज की छोटी कहानियों के लिए जाना जाता है। व्यंग्य और सामाजिक विद्रूपताओं पर कटाक्ष उनकी कहानियों का प्रमुख तत्व है।

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