मिन्नी

मधुसूदन आनन्द

सिर्फ मज़ाक में ही तो उससे कहा था मैंने, ‘चल बेटी तू भी मेरे साथ शादी में चल।’ सोचा नहीं था कि वह साथ चलने के लिए रोने लगेगी और पूरा घर सिर पर उठा लेगी। वह जोर-जोर से पैर पटक रही थी। घर हैरान-परेशान-सा उसे देख रहा था। खिड़की की झिर्री से आती हवा सहमी खड़ी थी और अचरच से भरी थी।

तभी दोस्त आ गया। उसने देखा, मिन्नी फर्श पर लेटी रो रही है। उसकी जेब में मिन्नी के लिए चॉकलेट थी। चॉकलेट दिखाई भी। लेकिन मिन्नी लगातार रोए चली जा रही थी। पत्नी दोस्त की उपस्थिति में ही कई बार झल्ला चुकी थी। उसे ऐतराज यह था कि मिन्नी के जिद्दीपन को जानते-बूझते हुए भी, मज़ाक में ही सही, उसे शादी में चलने के लिए क्यों पूछा।

दोस्त को पानी का गिलास देते हुए वह कह रही थी, ‘देखिए भाई साहब, ये पहले कह देते हैं और फिर मुसीबत मेरी हो जाती है। अब आप ही देखिए, जगाधरी दिल्ली से कितनी दूर है। करीब पाँच घंटे तो सफर में लग जाएंगे। इन्होंने मिन्नी से कह दिया, विपिन की शादी में चलेंगे। जब अपने कपड़े निकालने लगे तो मिन्नी भी अपनी फिराक वगैरह निकाल लाई। रोए जा रही है जाने के लिए।’

मिन्नी के मासूम चेहरे पर आंसू ढलक आए थे। गाल लाल हो गए थे। नाक बह रही थी। दोस्त ने उसे उठाना चाहा, लेकिन वह पैर पटकने लगी। मैं अंदर से हिल गया। उसी गति से घर में भी लगातार कंपन हो रहा थे। दो नन्हें आंसू मेरी उंगलियों की पोरों पर थिरकने लगे। पांच मिनट के भीतर जो घट चुका था, वह उन बूंदों में ग्लोब की तरह घूम रहा था और आसमान दौड़ा चला जा रहा था।

‘हां बेटा, हां! तू मेरे साथ जगाधरी चलेगी। मैं तुझे किसी भी तरह ले जाऊंगा। तू मेरे बैग में अपने कपड़े रख ले।’ मैंने फैसला दे दिया।

‘तुम पागल हो गए हो। परेशान कर देगी। दो घंटे तो तुम रख नहीं सकते। इतनी देर कैसे रखोगे!’ पत्नी की चुनौतियां स्थिर-सी हो गई थीं।

‘अरे नहीं यार, बीच में ही वापस आना होगा। ढाई-तीन साल की बच्ची को संभालना मुश्किल होगा।’ दोस्त परेशान लग रहा था।

मिन्नी अलमारी से कपड़े निकाल-निकालकर फेंक रही थी। अपना हर फ्राक वह साथ ले जाना चाहती थी। दौड़-दौड़कर वह नर्सरी राइम और ए.बी.सी.डी की किताबें मेरी किताब के साथ बैग में रख रही थी। मेरे ब्रुश के साथ उसने भी अपना नन्हा ब्रुश रखा। अपना तौलिया रखा। मोजे लाई। जूतों पर पालिश कराई। झट सज-धजकर चलने को तैयार हो गई। दोस्त को कविताएं सुनाने लगी। मम्मी से और ज्यादा लाड़ में तुतलाकर बोलने लगी। कमरे में इधर-उधर भागने लगी।

दोस्त ने कहा, ‘चलो, तुम्हें बस-अड्डे तक बस पकड़वा दूं। लौटकर फोन करना मिन्नी के साथ सफर कैसा रहा।’

पत्नी मिन्नी के जाने की बात से उदास और विस्मय से भरी थी। मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं कुछ असंभव-सा करने जा रहा हूं और बीच में ही रुआंसा होकर लौट आऊंगा और विनय करते हुए अपनी परेशानियां उसे बता रहा हूंगा और वह गर्व से कहेगी-मैं कहती थी न, ऐसा न किया करो।

‘ठीक है मीरा, अब चलते हैं। कल दोपहर तक निश्चय लौट आऊंगा।’ मैंने कहा।

‘थीक है, मीरा…’ मिन्नी चहक रही थी।

रेलिंग के पीछे खड़ी मीरा का हाथ धीरे-धीरे हिल रहा था। दोस्त के स्कूटर के पीछे मेरी गोद में बैठी मिन्नी जोर-जोर से टा-टा कर रही थी। समुद्र के बीच एक व्हेल खुशी से उछल रही थी।

बस-स्टॉप पर खड़े बीस मिनट हो चुके थे। एक हाथ से गोदी में मिन्नी को संभाला हुआ था। दूसरे में कभी बैग तो कभी पहले हाथ को सहारा। मिन्नी ने अपनी नन्ही बांहें मेरे गले में डाल दीं। मेरे बालों से खेलते हुए उसने फरमाइश की, ‘पापा आइसक्रीम।’

बस-स्टॉप पर कहीं भी आइसक्रीम वाला नहीं था। एक तरफ तीन-चार भिखारी खड़े थे-आपस में ईर्ष्या करते हुए। एक तरफ एक लड़का थाल में नारियल लिए खड़ा था और थोड़ी-थोड़ी देर बाद ‘दूधिया गोलेSSS…की आवाज लगाकर पास खड़े ठंडे पानी के ठेलेवाले लड़के की बातों में खो जाता था।’

महीना मार्च का था। सूरज बहुत भला और आत्मीय लगता था। हवा के साथ खेलता था-और हवा में एक विस्मय-भरा उत्साह और आत्मविश्वास दौड़ाता था। इक्के-दुक्के लोग ही पानी पी रहे थे जिसमें पानीवाले और गोलेवाले के बीच संवाद प्रायः टूट नहीं पाता था।

मैंने देखा, रोड डिवाइडर के दूसरी तरफ बस स्टैंड से दूर एक आइसक्रीम वाला खड़ा है। पर मैंने उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया।

‘कहां है आइसक्रीमवाला’ मैंने उसे चूमते हुए पूछा।

‘वो उधल।’

‘कहां।’

‘वो, वो नई दिकता?’ उसने हाथ से इशारा करके बताया।

‘हां, हां दिखा।’ मैंने कहा।

‘तो तलो, ले लो’ उसने कहा।

मैंने उसे बताया शादी में शाम को ‘खूब आमकीम’ मिलेगी।

‘ओल कोला बी?’ उसने पूछा।

‘हां कोला बी।’ मैंने कहा।

‘नई दी, अबी लो।’ वह चलने लगी।

मेरी समझ में नहीं आया कि बस का इंतजार करना ठीक होगा या नहीं। मैंने ऑटोरिक्शा लिया और बस अड्डे के लिए चल पड़ा। रास्ते में मैं उसे बता रहा था-यह सफदरजंग हवाई अड्डा है, यह चिल्ड्रन-पार्क है, यह इंडिया गेट  है, यह मामाजी का दफ्तर है, यह मेरा दफ्तर है, यह दिल्ली-गेट है, यह लालकिला है, यह…

लेकिन वह मेरी बातो में बिलकुल भी नहीं उलझ रही थी। उसकी जिज्ञासाएं बिलकुल अलग थीं। चिल्ड्रन-पार्क आने पर मैंने उसे  बताया कि एक  बार तेरी दीदी यहां आई थी। वह झूली और फिसली थी और खेलते-खेलते उसके पांव में चोट लग गई थी। उसे इसमें कोई रस नहीं आया। उसने पूछा, ‘पाल्क में क्या हाथी बी होता है?’ उसे दिमाग में चिड़ियाघर था, जहां मैंने उसे अपने कंधे पर चढ़ाकर तरह-तरह के जानवर दिखाए थे और शेर का इंतजार करते हुए एक पेड़ से उसे लटका दिया था। पेड़ की नन्ही शाखों को पकड़कर वह हिलती और खुश होती थी। उसके दूधिया दांत देखकर मैं खो जाता था। सिक्किम की यात्रा में देखे पहाड़ और झरने जैसे इतने पास आ गए हों।

‘नहीं बेटी, पार्क में हाथी नहीं, घोड़ा है।’ मैंने उसे बताया।

‘पापा, हम तो जिलाफ पर बैठेंगा।’ उसने कहा।

स्कूटर रिक्शा आगे बढ़ा चला जा रहा था और उसके शीशे में वात्सल्य से भरा एक बूढ़ा मुसकरा रहा था। रेड-लाइट तपर जब ऑटो रुकता वह गरदन घुमाकर मिन्नी से बतियाने लगता।

दफ्तर आने पर मैंने उससे कहा, ‘यह मेरा दफ्तर है।’

वहां बहुत-सी कारें खड़ी थीं। उसने मुझसे पूछा ये सब क्या आपकी कारें है और आपकी मिस कहां है? मैंने उसे बताया मिस तो दीदी के स्कूल में होती है। मेरे दफ्तर में तो बॉस है। इसपर उसने पूछा कि क्या आपका बॉस भी आपको मारता है?

शीश में एक हंसता हुआ बूढ़ा झांकने लगा। मुझे लगा यह चेहरा शीशे से निकलने को बेताब है और मेरी नन्ही बेटी पर सब कुछ लुटा देना चाहता है।

दिल्ली-गेट की रेड लाइट पर ऑटो रिक्शा रुका तो कई दूधिया गोले वाले आ गए। मिन्नी नारियल की जिद करने लगी। मुझे पसंद नहीं था कि वह ऐसा नारियल का टुकड़ा खाए। मैंने सख्ती से मना कर दिया। वह रुआंसी हो गई। शीशे से झांकता चेहरा बाहर निकल आया। बूढ़े ड्राइवर ने एक रुपया देकर नारियल का टुकड़ा खरीद दिया और मिन्नी ने झट हाथ बढ़ाकर ले लिया। न जाने क्यों मुझे बूढ़े का व्यवहार अच्छा लगा और अपनी ओढ़ी हुई गरिमा को उतारते हुए मैंने मिन्नी से कहा, ‘बेटा बाबाजी को थेंक्स कहो।’ बूढ़े ड्राइवर के चेहरे की वह खुशी एक मोहक दर्प में बदलने लगी। इधर मिन्नी के चेहरे पर एक निर्मलता थी तो उधर बूढ़े के चेहरे पर दर्प-भरा वात्सल्य। बस अड्डे तक मेरे हृदय में कभी यह निर्मलता तो कभी वात्सल्य रह-रहकर गुदगुदी- सी कर देते थे।

बस अड्डे पर बहुत भीड़ थी। बीसियों  बसें चिंघाड़ती हुई गुजर जाती थीं। उन्हें देखकर सामन्यतः दहशत हो सकती थी, लेकिन आज मिन्नी के साथ न जाने क्यों मुझे नन्हे हाथियों की आवाजें सुनाई दे रही थीं, जो मैंने प्रत्यक्ष नही, टेलीविजन पर जीव-जंतुओं की फिल्मों में सुनी हैं और मुझे भली लगी हैं।

जगाधरी की बस डेढ़ घंटे बाद थी, यमुनानगर के लिए आधे घंटे बाद बस थी। यमुनानगर और जगाधरी जुड़वा शहर हैं। टिकट लेकर हम बस में बैठ गए। बैठते ही मिन्नी को प्यास लग आई। बैग से बोतल निकालकर उसे पानी दिया और खुद भी पिया। उन मीठी बूंदों ने गहरी राहत दी। प्यार में मैंने मिन्नी को गोद में बैठाना चाहा लेकिन वह सीट पर बैठने के लिए मुक्त होने लगी। पूरी सीट पर टांग फैलाकर वह बैठी और बोली, ‘हम छादी में जाएंगे औल आमकीम खाएंगा।’

दो मिनट भी वह थिर नहीं रही, चंचल। कभी सीट पर खड़ी हो जाती। कभी खिड़की के शीशे छूती। कभी उतरकर अगली सीट पर बैठी बुढ़िया को देखती। कभी बैग खोलती। कभी अपनी किताब निकालती, कभी मेरी किताब निकालती। कभी मेरी गोदी में आ जाती । कभी मेरे कंधे से लग जाती। कभी मेरे पैरों पर खड़ी हो जाती। बस चली तो उसका थिरकना कुछ कम हुआ। अभी बस दिल्ली से बाहर भी नहीं निकली थी कि उसे भूख लग आई। मैं उसे आलू का परांठा खिलाने लगा। खाते-खाते वह मुझे दीदी से सुनी पहेलियां सुनाने लगी। बोली, ‘पापा एक नदी है। उछमें एक पेल है। पेल की डाली पर एक कबूतल बैठा है। उसने अंडा दिया। वो कां गिलेगा? दाली पल या नदी में?’

मैंने कहा, ‘नदी में।’

वह जोर से किलकने लगी, ‘कलत-कलत।’ मैं बुद्धु आदम-सा दिखने की भरसक कोशिश करने लगा। अपना चेहरा मैंने लटका लिया और रोनी को अंदरसे भरसक खींच लाया। उसे दया आ गई।

बोली, ‘आप भी बुद्धु लाम हैं। कबूतल कोई अंडे थोली देता है।’ वह भी मेरे साथ हंसने लगी। उसके मुंह से दूधिया झरना फिर फूटा। नहाकर मुझे अपूर्व खुशी मिली। मैंने कहा, ‘जरा मुंह खोल। गिनूं तेरे कितने दांत हैं।’

उसने झट बड़ा- सा ‘आ’ कर दिया। बीस मोती वहां दमक रहे थे। मैं बहुत देर तक उसे सीने से लगाए रहा। एक शांति मुझे मिली जो कभी इतनी पूरी नहीं थी। उसने एक-दो बार सिर उठाने की कोशिश की। मैं उसके सिर को सहलाता रहा। उसके सैंडल मैंने खोल दिए। मोजे उतार दिए। उसके नन्हे पैरों को हथेलियों में मैंने भर लिया। उसे आराम मिला और सोनी पत आने से पहले ही वह सो गई। मैं जो जरा-सा बोझ उठाकर थक जाता हूं, सांस और खांसी चलने लगती है, उसे कंधे से चिपकाए प्रसन्न था।

यात्राएं करना मुझे कोई खास प्रिय नहीं है। फिर भी सैकड़ों छोटी-बड़ी यात्राएं मैंने की हैं। बचपन में पिता के साथ की गई एक-दो यात्राएं अकसर ‘फ्लैश बैक’ की तरह आती हैं। पिता ने हमेशा एक अनुशासन चाहा है, मैं के लिए जो गौण रहता है। पिता प्रायः स्टेशनों के बारे में बतातें चले जाते हैं। खेतों में खड़ी फसलों के बारे में बताते हैं। बिजली और टेलीफोन के तारों और खंभों के जरिए विकास और विज्ञान समझाते थे और फिर प्रश्न पूछते थे। स्टेशनों पर खाने-पीने की कोई चीज उन्होंने कभी नहीं दिलवाई और मेरी स्मृति से यह सूचना कभी हटी नहीं-‘यात्रियों से अनुरोध है कि वे अपनी ही भलाई के लिए किसी अनजान व्यक्ति से खाने-पीने का सामान न लें। ऐसा न हो कि उसमें विष मिला हो।’

मैं इस सूचना को स्मृति से मिटा डालना चाहता हूं। मैं उन सब लोगों पर भरोसा करना चाहता हूं जो टोकरियां और बाल्टियां उठाए गाड़ियों में, बसों में खटते हैं।  हालांकि रोज ही तो पढ़ने को मिलता है कि फलां गाड़ी में प्रसाद खिलाकर एक ठग ने मुसाफिरों को ठग लिया, लेकिन फिर भी मैं अनजान लोगों से चीजें खरीदना चाहता हूं। मैं मानता हूं कि बचपन में स्टेशनों पर पढ़ी इस इबारत ने मुझे बेवजह शंकालु बना दिया है। बचपन में सफर करते हुए मुझे हर मुसाफिर षड्यंत्रकारी लगता था। यही वजह है कि आगे भी सफर करते हुए मेरे सिर पर एक अदृश्य शंका तनी रहती है। मैं सफर में सहज नहीं रहता। मैं भरसक अनजान लोगों से बोलना-बतियाना चाहता हूं और अपना पाथेय उनके साथ बांटना चाहता हूं। यदि कोई ग्रामीण मुझे आत्मीयता से गुड़ की डली दे तो मैं ना नहीं करना चाहता। मैं यह विश्वास नहीं करना चाहता कि कोई मुझे विष दे देगा। बहरहाल, मुझे स्वीकार करना चाहिए कि बचपन में पिता के साथ की गई यात्राओँका यह पहलू अकसर मेरे और मुसाफिरों के बीच दीवार बना रहता है। रेल और बसों में मैं प्रायः गूंगी फिल्मों का पात्र रहा हूं।

मीरा को मुझसे  हमेशा शिकायत रही है कि मैं सफर में गुम हो जाता हूं।  मैं खिड़की के बाहर पेड़ों को देखते, पुलों के नीचे नदियों के विस्तार को अपनी आँखों में भरते, छोटे-छोटे गांवों को अंदर से देख पाने की इच्छा के साथ अपनी मंजिल पर पहुंच जाता हूं। रास्ते के खेत, बाग, नदी-नाले, पहाड़, गांव, कस्बे, पशु-पक्षी र सबसे बढ़कर लोग मुझे समृद्ध करते हैं। मैं भूल जाता हूं कि मेरे ऊपर एक आसमान तना है जिसमें सूरज की तेज रोशनी के पीछे असंख्य तारे टिमटिमा रहे हैं। कि रात होते ही तारों की टिमटिम रोशनी धूप से बदला ले लेगी।

वह कुनमुनाई। मैंने उसे कंधे से गोदी में ले लिया। अब वह मोहक प्रतिमा हो गई। सांवले रंग का कोई पत्थर नहीं होता, पर वह सांवली प्रतिमा हो गई। अरी मेरी बेटी उठ, मैंने मन में कहा। उसकी नाक के पास मैं उंगली ले गया, लेकिन सांस का कोई स्पर्श नहीं। मैंने उसके हाथ पर हथेली रख दी-कोई धड़कन नहीं। हे मेरे ईश्वर! मैं अचानक जैसे किसी गहरे संकरे कुएं में जा गिरा हूं। बहुत गहरे से एक आवाज आ रही है, पुकारते हुए-उठ, बेटी उठ! तभी सूरज वरदान की तरह आया हालांकि खिड़की के शीशे को वह ताबड़तोड़ लांघकर आया था-अफलातून। उसने पहले तो पलकें कसकर भींचीं और फिर आँखें खोल दीं। उसके मोहक वात्सल्य में भरा मैं भूल गया था कि खिड़की से तेज हवा आ रही है और ऐसे में उंगली पर सांस को महसूस करने में मैं गलती कर सकता हूं और उसी आपाधापी में उसके हृद्य की धड़कनों को अपनी हथेली को संवेदनहीन बना सकता हूं। अभी तक कुएं में डूब जाने का बोध था। असहजता और जड़ता के धागों ने मुझे इतना ढक लिया था कि धागे के गुस्से के नीचे के कंकड़ का कोई अस्तित्व नहीं रह गया था।

‘पापा जगाधरी कब आएगा?’

‘हूं।’ मैंने कहा।

‘वां बाबाजी भी होंगे ?’

‘हूं।’ मैंने कहा।

‘दादीजी?’

‘हूं।’

‘ओल?’

‘होरी चाचा।’ मैंने कहा।

‘हम चाचाजी के साथ आमकीम खाएंगा’ उसने कहा।

मैं कुएं से बाहर आ गया था और उसे देखे जा रहा था। अपनी दोनों हथेलियों पर मैंने उसे बैठा लिया और वह मेरी कमीज की जेब से रुपए निकालने लगी। काफी देर तक वह रुपयों से खेलती रही। फिर उसने वापस रख दिए। फिर अचानक उसे क्या सूझा, बोली, ‘जला आ कलो, देखूं कितने दांत हैं।’

मैं पहले तो हंसी रोके रहा फिर मुंह खोल दिया।

बस तेजी से भागी जा रही थी-आगे और आगे। मैं उसी रफ्तार से पीछे जा रहा था। मेरी आंखें दुख आई थीं, औरमेरे पिता मुझे गोदी में लिए रेल में सफर कर रहे थे। पिता अनुशासनप्रिय हैं, लेकिन उससे बढ़कर भावुक। मुझे अपने सीने से चिपकाए वे बैठे रहे। एक  बार मैं उनके साथ ऐसे ही एक विवाह में गया था। जाने से पहले जब सामान बांध लिया तो पता चला कि मेरे सैंडल हैं ही नहीं। मुझे याद आया कि मैंने स्कूल में सैंडल उतारे थे और पहनकर आना भूल गया था। नगरपालिका के प्राइमरी स्कूल में तीसरी जमात में मैं पढ़ता था। वहां टाट की पट्टियों पर हम बैठते थे और हमारी नजरें मास्टर साहब से होती हुई श्यामपट्ट तक जाती थी। उसके पास ही एक तरफ हमें जूते उतारने होते थे। ज्यादातर लड़कों के पास जूते नहीं थे। वे इंटरवल में हमारे जूते पहन लेते और इतराते। जो बच्चे उम् में हमसे बड़े थे, वे हमारे जूतों पर प्रायः इंटरवल में जरूर कब्जा कर लेते, और बीसियों आले वाले उस कमरे में, जो तीसरी कक्षा थी, जूते यहां-वहां छुपा देते। स्कूल का इकलौता चपरासी फिर जूते ढूंढ़-ढूंढ़कर देता और बुदबुदाता। पिता बहुत नाराज हो रहे थे। लेकिन जब भी मझ ऊंट को गोदी में लिए नदी पार गए थे, जहां श्यामसिंह चपरासी का घर था। चपरासी हंसता हुआ आया था इतवार के उस रोज स्कूल का ताला खोलकर जूते निकाल लाया था। पिता के साथ फिर रेल से मैं विवाह में गया था। रास्ते भर पिता मुझसे अंताक्षरी करते रहे थे। जब मैं कठिन समझे जाने वाले अक्षरों पर भी दोहे पढ़ता तो एक अनुशासित खुशी उनकी आंखों में झलकती। आज पहचानता हूं कि वह कितना प्यारा वात्सल्य था। मेरे विवाह के बाद एक सड़क-दुर्घटना में मरी टांग टूटी तो पिता की वे अनुशासित आंखें कितनी नम हो गई थीं। पिता को चूंकि घर चलाने के लिए डिक्टेटर होना पड़ता है, इसलिए उसका वात्सल्य उतना प्रत्यक्ष नहीं होता। लेकिन सच कहता हूं, कोई भी पिता दरअसल एक पारदर्शी पत्थर है, जिसके बीच एक लौ निष्कंप जलती है-वात्सल्य, प्रेम, कर्तव्य और जिम्मेदारी की-भूरि-भूरि रोशनी बिखेरती हुई।

मिन्नी ने पता नहीं कब मेरी पैंट की जेब से चाय मसाले का पैकेट निकाल लिया था जिसे मैं भरसक उससे छिपाकर रखता हूं। बड़े जोर से किलकती हुई वह बोली, ‘अच्छा, पान मसाला!’

हड़बड़ी में मैंने उससे पैकेट छीन लिया। वह रोने लगी।

‘एक दाना दोगे।’ उसने कहा।

‘हां एक दाना दूंगा।’ मैंने कहा।

‘मैं तो दो लूंगी।’ उसने कहा।

मैंने अच्छी खासी फंकी बनाकर मुंह में रख ली और उसे ऐसे ही उंगली चटा दी। जल-भुनकर वह चिल्लाने लगी। दो छोटे-छोटे दाने मैंने उसे दिए। लेकिन उसका मन नहीं लग रहा था।

बाहर खेतों में सोने की बालियां लहरा रही थीं। कई जगह पीली सरसों फूली थी। कहीं गन्न खड़े थे। मैंने उसे बताया कि ये खेत हैं, यहां गेहूं, चावल, दालें पैदा होती हैं।

‘नई जी, यां आलू, गाजल, गोबी पैदा होती है।’ उसने कहा।

‘तुझे किसने बताया?’ मैंने उससे पूछा।

‘मम्मी ने।’ उसने बताया।

‘गेहूं भी यहीं पैदा होता है, जिसके आटे से रोटी बनती है।’ मैंने कहा।

मैंने उसे पेड़ दिखाए। सेब और अमरूद की मनगढ़ंत कहानियां सुनाईं। चिड़ियों के बारे में बताया। लेकिन वह फैलती जा रही थी। धीरे-धीरे वह रोती बल्कि रोने का नाटक करती। अपना निचला होंठ वह फैला लेती और जोर-जोर से गरदन हिलाती। तब वह मासूम चेहरा मुझे भिगो डालता। मेरे कमीज के  बटनों को वह गुस्से से खोलती। मैंने आखिर बैग से वह चीज निकाल ली जो ‘अंतिम अस्त्र’ के रूप में उसके रोने को विफल बनाने के लिए मीरा ने मुझे दी थी।

चॉकलेट देखकर वह खुश हो गई। बस करनाल आ चुकी थी। उस दिन सुबह वह पॉटी पर नहीं बैठी थी। मैंने उसे एक नाली पर बैठा दिया और बस पर भी नजर रखी। थोड़ी देर वह बैठी रही फिर उठ खड़ी हुई। मैंने कहा बेटी कर ले। लेकिन वह नहीं मानी और मैं यह सोच सोचकर डरने लगा कि यह जरूर बस रुकवाएगी और मुझे सारे मुसाफिरों का गुस्सा सहना पड़ेगा। उसे गोदी में उठाए मैं बस की तरफ लपका। बीच में एक किताबों की दुकान उसने देख ली। किताब की वह जिद करने लगी। जानवरों की फोटो वाली एक किताब मैंने उसे दिला दी। बस में वह किताब खोल-खोलकर खुश होती। काफी देर तक वह मुझे पढ़ाती रही। हाथी को घोड़ा और घोड़े को हाथी कहकर वह हंसती और किताब में बने सेब को उंगलियों से खींचकर मुंह में रख लेती। कहती, ‘बड़ा अच्छा सेब है। पापा, आप खाएंगे।’

मिन्नी के अलावा किसी और चीज का मेरे लिए अस्तित्व नहीं था। मैं पूरी तरह उसी में खोया था।उसकी खातिर में प्रकृति में भी खो गया, लेकिन वह फिर अपने में लौटा लाई। वे क्षण कितने शाश्वत थे। मैंने सोचा कि टिक-टिक करते हुए वे बढ़ेंगे और फैलते जाएंगे। मिन्नी के शरीर से सैकड़ों धागे निकल जाएंगे। वे बजेंगे और उस टिक-टिक विस्तार में उनके सिर एक-एक करके मिलते चले जाएंगे। कोई मिन्नी की बहन होगी, कोई सहेली, कोई मिस, कोई सहपाठी, कोई दोस्त, कोई प्रेमी, कोई पति। यह फूल मेरा कहां है? फिर यह सोचकर मैं गुम हो गया कि यह सोच कितनी खतरनाक है। मिन्नी को जोर-जोर से मैं चूमने लगा। मुझे लगा कि नीले आसमान के नीचे भागी जा रही बस अचानक अलौकिक और असाधारण हो गई थी, फिर से पूरी तरह सांसारिक हो गई है।

तभी मेरी सीट के एक सिरे पर बैठी गांव की एक औरत ने उलटी कर दी। मिन्नी मेरी गोद में थी। मेरे बराबर में एक अधेड़ पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय सरदारनीजी बैठी थी। सरदारजी आगे की सीट पर बैठे थे। उलटी सरदारनीजी की अटैची पर गिरी। इसके साथ ही किसी का ब्रीफकेस भी खराब हो गया था। ग्रामीण औरत की गोद में बच्चा था। बस किसी छोटे कस्बे के बस अड्डे पर पहुंच गई थी। ग्रामीण औरत बच्चे के साथ झट बाहर निकल गई। बस में उसे कोसा जाने लगा-सरदारनी और ब्रीफकेस वाली एक अन्य स्त्री ने ग्रामीण औरत को जंगली, कुतिया और न जाने क्या-क्या कहा। बस में शोर मचने लगा।

इतने में उलटी करने वाली औरत बगल में बच्चा लिए फिर आ गई। शायद मुंह हाथ धोने बाहर गई थी। उसके चेहरे पर दया और याचना का भाव था। बच्चा टुकुर-टुकुर उसे देख रहा था। मिन्नी उस बच्चे को देखकर खुश थी। वह उसकी खुशी और सरोकार का केन्द्र था।

देखते ही देखते उलटी से प्रभावित दोनों स्त्रियां खड़ी हुईं और एक ने झट ग्रामीण औरत का शॉल, जो एक मामूली-सा मोटा कपड़ा था, उतार लिया। इस प्रक्रिया में गोदी के बच्चे को असुविधा हुई और वह जोर-जोर से रोने लगा। स्त्री ने झट अटैची और ब्रीफकेस उस शॉल से पोंछ डाले। ग्रामीण औरत ठगी-सी खड़ी देखती रह गई। उसका चेहरा रुआंसा हो गया। बच्चा जोर-जोर से चीखता रहा। उसी रफ्तार से मिन्नी बच्चे को पुकारती रही। कई लोग एक साथ उठ खड़े हुए। मिन्नी मेरी जांघों पैर रखकर खड़ी हो गई।

’ पापा, बच्चा लो लहा है।’ उसने कहा।

‘ हूं।’ मैंने कहा। दरअसल मैं इस वक्त मिन्नी के बजाय लोगों बातचीत में था। पूरी बस में सिर्फ एक आदमी ग्रामीण औरत का हिमायती था। लेकिन उसे भी पूरी बात का पता नहीं था। वह समझा रहा था कि उलटी शायद बच्चे ने की है।

वह दहाड़ा, ‘क्या हो गया अगर बच्चे ने उलटी कर दी। इसका मतलब यह तो नहीं कि उसकी मां का ओढ़ना ही उतार दो।’

‘अगर उलटी आप पर गिरती तो पता चलता।’ एक स्मार्ट से दिखने वाले युवक ने कहा।

‘ओए तू अपना काम कर।’ आदमी ने कहा।

‘शट अप! यह अटैची मेरी है जिस पर उलटी गिरी है।’ युवक ने कहा।

‘यू शट अप।’ आदमी ने कहा।

युवक मोना था। वह इकहरे बदन का साढ़े पांच फुटा जवान था। उसके दाढ़ी थी। जींस पहने था। उसने धूप का चश्मा पहन रखा था और किसी अंग्रेजी पत्रिका के पन्ने पलट रहा था। जब उसने आदमी को ‘शट अप’ कहा तब अपना चश्मा उतार लिया। लगता था जैसे दो काली गोलियां दागी ही जाने वाली हैं।

युवक की तुलना में आदमी हृष्ट-पुष्ट था। जब युवक ने उसे ‘शट अप’ कहा तो वह ‘यू शट अप’ कहने के साथ-साथ सीट से भी उठ खड़ा हुआ-युयुत्सु।

अब सरदारनी भी खड़ी हुई। उसने जोर-जोर से घोषणा की कि वह मोना युवक उसका बेटा है, इसलिए उसे बोलने का पूरा हक है। उसने  यह भी कहा कि ग्रामीण औरत के सिर से ओढ़ना खींचने वाली स्त्री से उसका कोई संबंध नहीं  है।

ओढ़ना खींचने वाली स्त्री अकेली और डरी हुई थी। लगता था जैसे उसे सांप सूंघ गया है। कुछ लोगों ने बीच-बचाव किया और आदमी फिर पर बैठ गया। बस का ड्राइवर और कंडक्टर इस घटना से बिलकुल अप्रभावित थे। ड्राइवर अकसर शीशे से पीछे देख लेता और थोड़ा-सा ‘मनोरंजन-रस’ लेकर बस तेजी से बढ़ाने लगता। सरदारजी इस पूरी घटना में शालीन बने रहे और तटस्थ भी। थोड़ी देर में बस में सब कुछ झाग की तरह बैठ गया।

लेकिन मिन्नी की पुकार जारी थी। वह बीच में बैठी सरदारनी की गरदन के पीछे झांकती हुई उस बच्चे को देखे जा रही थी जो अपनी मां के साथ हुए इस अपमान से बिलकुल अनजान मिन्नी को देख-देखकर हंस रहा था।

उलटी करने के कार वह बीमार ग्रामीण औरत मेरे लिए भी घृणा की वस्तु बन गई थी, और उसके निरपराध भोले बच्चे के साथ मिन्नी के खेल मुझे बहुत बुरे लग रहे थे। लेकिन मिन्नी भी तो उतनी ही अनजान और निर्मल थी। बीच-बीच में याद आने पर वह उलटी को लेकर मेरी तरफ अपना मुंह और नाक घृणा में बिचकाती और फिर बच्चे के साथ क्रिडात्मक संवाद करने लगती।

मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था। उसका थिरकना मुझे बुरा लग रहा था।

मैंने कहा, ‘चुप बैठ। घंटा हो गया। मुझे खूंद रही है।’

उसने अनसुना कर दिया और उसी तरह मुझ पर थिरकती, बच्चे से खेलती रही। उसे पकड़कर मैंने बैठा दिया और डांट लगाई। वह जोर-जोर से रोने लगी। जोर-जोर से उसने पैर चलाए। अपना निचला होंठ फैलाकर नीचे को ढुलका लिया जिसके पीछे उसके नन्हें दांत दमकते रहे। फिर उसके चेहरे पर फिर रक्ताभ आ गई। गालों की दो रक्ताभाओं के बीच फैलती-सिमटती वह श्वेत दंत-आभा कितनी नैसर्गिक और मौलिक थी। बीच-बीच में वह पूरे आवेग के साथ नन्हा मुंह खोलती और चीख जब पूरी तरह बाहर निकलने को होती तो उसकी पूंछ पकड़कर फिर अंदर ले जाती।

अरी मेरी बच्ची, क्या पूरी ताकत से तू प्रतिरोध कर रही है? तेरा शरीर कितनी तड़पती बिजलियों से भरा है? तेरे तालू के भूरे, गोल विस्तार में मुझे शाताब्दियों पुराने धनुषों की टंकार सुनाई दे रही है। नीचे पृथ्वी पर सैकड़ों शंख समवेत बज रहे हैं। मेरे कानों में लावा बह रहा है। स्थिति, उत्पत्ति और  विनाश की अरी साक्षात ऊर्जा, मैं त्राहिमाम कहता हूं! मुझे क्षमा कर। आगे अपराध मैं नहीं करूंगा। तेरी क्रीड़ाओं मेंम हस्तक्षे करने वाला मैं कौन? पृथ्वी के आंतरिक पथ पर क्या मैं कोई स्पीड-ब्रेकर लगवा सकता हूं? तू उस बच्चे के साथ खेल, जो तेरी तरह निर्मल है। जिसकी गरीबी का तेरे लिए कोई मतलब नहीं है। उसके और तेरे बीच कोई वर्ग नहीं है। कोई पूर्वाग्रह नहीं है। कोई तनाव नहीं है। कोई प्रलोभन नहीं है। उसके और तेरे बीच एक शाश्वत ऊर्जा बह रही है। जिसकी पीली-पनीली मां घृणा नहीं सहानुभूति की हकदार है।

बोतल में पानी गरम हो गया था। लेकिन पानी की गरम बूंदें भी सफर में नियामत होती हैं। अनमनी मिन्नी ने दो घूंट पीकर बुरा-सा मुंह बनाया। पानी पीकर मेरी प्यास और बढ़ गई। मैंने मिन्नी को एक टॉफी दी और कहा कि इसमें से आधी बच्चे को दे दे। उसने साफ मना कर दिया। मैंने कहा अच्छा, मैं दूसरी टॉफी बच्चे को दिए देता हूं। वह उसके लिए भी राजी नहीं हुई और टॉफियों के पूरे लिफाफे के लिए मचलने लगी। मैंने हारकर पूरा लिफाफा उसे पकड़ा दिया। अब वह उदार थी। सबसे पहले उसने बच्चे को टॉफी दी, फिर मुझे और फिर खुद खाने लगी।

बच्चे के साथ खेल में उसका टाइम आसानी से बीत रहा था। तभी लाडवा स्टेशन आया और ग्रामीण औरत उतर गई। मिन्नी भी उतरने की जिद करने लगी। फलवाले से मैंने उसके लिए केले, संतरे लिए। लेकिन वह नीचे जाना चाहती थी। मैं ड्राइवर से कहकर नीचे उतर गया। नीचे उतरकर मिन्नी भी चुप हो गई। वह एक सामान्य-सा बस-स्टेशन था-धूल-मिट्टी और पानी से गड्ढों वाला। लेकिन मिन्नी के लिए वह खेलने का मैदान था। वह वहां दौड़ने लगी। मैं जो बसोंके भीमकाय हत्यारे पहियों की आशंका से घिरा था, झट उसे गोदी  में उठाकर बस में आ गया और उसे सुलाने की कोशिश करने लगा।

जगाधरी पहुंचकर मुझे अपूर्व खुशी मिली और राहत भी कि मिन्नी को संभालने वाले कई लोग होंगे। स्कूटर घर के बाहर खड़ा हुआ तो होरी बाहर आ गया। मिन्नी को देखकर वह बहुत खुश था। वात्सल्य में उसकी जुबान तुतलाने लगी। उसने झट मिन्नी को लेना चाहा। लेकिन मिन्नी ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और मेरी गरदन में दोनों बांहें डालकर छाती से चिपक गई। पिछले एक महीने से एक अजीब आदत उसमें आ गई थी। जिन लोगों को वह जानती थी उनसे मिलने पर शरमाने लगती थी। लेकिन आध-पौन घंटे में ही सामान्य हो जाती थी मैंने उससे कहा, ‘बेटे, होरी चाचाजी हैं।’ लेकिन उसने अनसुना कर दिया।

अंदर घर में शादी की कोई चहल-पहल नहीं थी। यह मेरी ननिहाल थी। मां नानी के पास बैठी थी। मुझे देखकर झट उठ खड़ी हुई और मिन्नी को गोदी में लेना चाहा। लेकिन मिन्नी उसी तरह चिपकी रही।

एक बूढ़ी औरत बड़ी तन्मय होकर अनन्नास खा रही थी। मैं उसे पहचानने की कोशिश करने लगा। उसके पांव में जूते नहीं थे और उसने बहुत साधारण से कपड़े पहने हुए थे। मुझे याद आया वह नानी की भनेली है जो बचपन में मुझे जामुन और खजूरें दिया करती थी, और मेरे चेहरे में मां को ढ़ूढ़ता थी। बीस बरस बाद भी उसकी वह निरीह ममता कम नहीं हुई थी। झुर्रियों के पीछे अपनी बूढ़ी आंखों से वह मुझे पहले की तरह देख रही थी और फिर मिन्नी को देखकर खुश हो रही थी।

थोड़ी देर में पिता आ गए। उन्होंने साधिकार मिन्नी को मेरी गोद से खींच लिया। मिन्नी ने बड़े पैर पटके। आंखें बंद करके वह रोती रही। पिता ने कोई परवाह नहीं की। वे वात्सल्य में भीगे उसे घर से बाहर ले गए। लौटे तो मिन्नी की आंखें खुली थीं और वह चॉकलेट खा रही थी। अब वह सामान्य हो गई थी और मां और होरी को तरह-तरह की कविताएं सुना रही थी। मां, पिता और होरी उस अपूर्व हर्ष में उड़े चले जा रहे थे।

मिन्नी ने उन्हें नाच भी दिखाया। नानी, मौसी,  बूढ़ी औरत और दो-चार अन्य रिश्तेदार दूर से उसका नाच देख रहे थे। उसका नाच देखकर मेरी थकावट भी जाती रही। वह अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए, अपने नन्हें पैरों से गोलाकर बनाते हुए नाच रही थी। संगीत ने मुझे रुलाया है, नृत्य ने नहीं। उसने सिर्फ अंतस को थिरकाया है-एक लालित्य-भरा दीप्त स्फुरण! लेकिन आज मिन्नी का वह नृत्य, जो दरअसल एक मामूली बाल-क्रीड़ा थी, मुझे भाव-विह्वल किए दे रहा था। मैंने झट आगे बढ़कर उसे पकड़ लिया और चूमने लगा। वह मुसकराने लगी और फिर मुझे बढ़-चढ़कर वैसे ही चूमने लगी जैसे लाड़ में अपनी मां को चूमती है, और मैं मीरा से ईर्ष्या करने लगता हूं। क्या जीवन में इतना पुलकित मैं कभी हो पाऊंगा? चंद घंटों में उसके और मेरे बीच जो घटा, उसका हिसाब क्या मैं मीरा और दोस्त को दे पाऊंगा?

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