शर्मिला जालान
पहले दुर्गा पूजा लौटी और अब काली पूजा लौटने के दिन हैं | राग-रंग के जाते हुए दिन | जैसे-जैसे ये दिन जाने वाले होते उदासी छा जाती | पूजा की गंध दूर होती जाती, पंडाल खुल जाते, बाँसउठ जाते और सड़क का सन्नाटा भाएँ-भाएँ करने लगता |
सुबह के छह बज रहे हैं| सड़क के दोनों ओर के लैंप पोस्ट बुझ चुके | मैं पिछली रात सोया नहीं | सियालदह स्टेशन जा रहा हूँ | शहर का मुख्य भाग छूटता जा रहा है | उत्सव की रौनक और रोशनी , आडम्बर और पवित्रता आँखों से ओझल होती जा रहीहैं | रोजमर्रा का जीवन दिखाई पड़ने लगा है |चाय की किसी गुमटी पर शायद उन्नीस सौ साठ-इकसठ का उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का बांग्ला गाना चल रहा | ‘सप्तपदी’ फिल्म का | हेमंत मुखर्जी और संध्या मुखर्जी का गाया हुआ जिसके बोल हैं-
यह राह अगर अनंत हो जाए.., तो तुम बोलो कैसा हो..(एई पॉथ जदीइ ना शेष हॉय तोबे केमोन हॉतो तूमि बोलो तो …)
दोनों की हिट जोड़ी | लगभग तीन दशकों तक दोनों छाये रहे | उन दिनों मेरे लिए फिल्में होती थी हँसी और दीपशिखा | कैसे निश्छल दिन थे | फिल्में जैसे उड़ा ले जाती थी मन को |
ओह! कितना जीवन जी लिया | हर साल कितना- कितना जीवन जीते हैं | ऐसा लगता है यह दुनिया पुरानी है| कितनी चीजें देख चुका| कलकत्ता शहर का स्थापत्य,रास्ते,वनस्पतियाँ, सूर्योदय , पृथ्वी और आकाश | सब कुछ उतना ही पुराना मालूम पड़ रहा जितना पुराना ‘सप्तपदी’ फिल्म का यह गाना और जितना पुराना उस फिल्म का प्रेम |
पूरा साल बीत गया और दिसम्बर आनेवाला है | नया साल पुकार रहा है | सियालदह स्टेशन से बहरमपुर जाने के लिए मुर्शिदाबाद उतरूँगा | सियालदह स्टेशन पर पहली बार नहीं आया हूँ | लोकल पसेंजेर आ गयी है | दो दिनों के कपड़े, रास्ते के लिए बिस्कुट और पानी साथ ले लिया है| ट्रेन में मेरे बगल में एक वृद्ध मुसलमान महिला हल्के भूरे रंग का बुर्का और हल्के भूरे रंग की सलवार कमीज पहने बार-बार कभी मुझे देख रहीं, कभी ट्रेन से बाहर छूटते कलकत्ते को | वे प्रतीक्षा कर रही हैं मेरे बोलने की| जब मैं कुछ देर नहीं बोला धीरे-धीरे उन्होंने ही बात शुरू कर दी |समय पूछा फिर बोलने लगी-
“ हाँ जा रहे?”
“बहरमपुर|”
“हम मुर्शिदाबाद |”
“मैं भी वहीँ उतरूँगा”- ऐसा कहते हुए मेरी आवाज धीमी हो जाती है और मैं थोड़ी थकान और थोड़े आसपास के माहौल से उदासीन होते हुए सोने की कोशिश करने लगता हूँ | मेरे पीछे टिके माथे को देखते हुए वे कहती हैं-
“क्या आप की सेहत ठीक नहीं?”
“नहीं…ऐसी कोई बात नहीं | दो दिनों से सो नहीं पाया हूँ|”
“मेरे शौहर डॉक्टर हैं | शरीरमें क्या पीड़ा है वह तो खोज ही लेते पर उनका मानना है कि मन सब चीजों का कारण है| वहाँके दर्द को पहचान जाते….क्या आप भी ऐसा सोचते हैं? ”
“मालूम नहीं…लेकिन आप उनका कार्ड दीजियेगा |”
वह मुझे अनुभवी आँखों से देखती हैं फिर इधर-उधर के कुछ सवाल कर सहजता से अपने बारे में कहने लगती हैं |
“उन्होंने अपने पेशे में खूब मेहनत की थी और आज सब कुछ मन के हिसाब से है| हमारी रोज की कमाई इतनी है, महीने और पूरे साल की इतनी| हज तो कर चुके| एक मस्जिद भी बनवा रहे हैं | बेटा नर्सिंग होम खोल रहा | आप जानते हैं-बेटी की शादी तारकेश्वर में हुई है | हम हुगली से लौट रहे हैं| हम सभी वहाँ कुछ दिन रहे और आसपास की दुर्गा-पूजा देखी |”
इस तरह धीरे-धीरे सहज भाव से बात करते हुए वेकई बात बताती जा रहीं हैं| सामने सिट पर जो युवा महिला बैठी हैं वह उनसे इशारे से कुछ मांगती हैं | वे धीरे से अपना बैग खोलती हैं | उसमें से एक डब्बा निकाल कहती हैं—
“मैं इसमें औषधि रखती हूँ| कभी किसी को जरूरत पड़ जाए”
दवा निकालकर महिला को दे देती है| तभी उनके हाथ में उनका मोबाइल आ जाता है| फ़ोन बाहर निकाल उसकी गैलरी में अपनी बेटी की फोटो खोजकर मुझे दिखाती हैं –
“यह देखो यह मेरी बेटी है|”
एक तस्वीर पर मेरी नजर ठहर जाती है| मैं उनसे मोबाइल माँगताहूँ | वह मुझे पकड़ाते हुए कहती जा रहीं,जमाईं स्कूल में पढ़ाता है| उनकी बेटी के गले में सोने का हार है| वह बताती हैं – “उसकी विवाह की वार्षिकी थी तब हम लोगों ने उसे यह दिया था|”
उनके घर परिवार की इन बातों का न आदि है न अंत| अटूट बातें | सांसारिक बातें करने के बाद धीरे से मेरी तरफ देखती पूछती हैं-
“आपके कितने बच्चे हैं ?”
“नहीं हैं |”
मैं बात बदलते हुए कहता हूँ-
“पर यह देखिये, आपकी लड़की की यह कमाल की तस्वीर है|”
“आप जरूर फोटोग्राफर हैं|”
“हाँ | महेनदर सिंह|”
“कहाँ से हो?”
“ जालंधर| कपड़ों के व्यापारी हैं मेरे भाई | बंगाली फिल्मों में काम खोजने कलकत्ता आया था |”
“फिर”
“बात बनी नहीं| पर यहीं बस गया |”
ऐसा कहते हुए मैं हँसता हूँ पर मेरे चेहरे पर टूटते बिखरते भाव हैं , वहाँजो पीड़ा है उसे वे देख लेती हैं | उनके चेहरे पर हैरानी है| संवाद एक बार रूक जाता है|वह मुझे कभी ‘तुम’ और कभी ‘आप’ कहती हैं|
सुबह–सुबह ट्रेन में चाय की आवाज लगाता हुआ एक छोटा लड़का आता है| साथ में अखबार भी है| मैं अख़बार नहीं खरीदता | मैं अपने साथ अकेला रहना चाहता हूँ | कोई लम्बी-चौड़ी बात सोचने का मन नहीं| खिड़की के बाहर आँख लगाये बैठा हूँ| न किसी का इंतजार कर रहा हूँ और ना ही कोई मेरा | चाय की चुस्की लेते हुए मैं सोच रहा हूँ कि कोलकाता महानगर के शोर-शराबे चमक से दूर बहरमपुर कस्बे में फोटोग्राफी के साथ थोड़ा एकांत भी मालूम पड़ता है मिलेगा| खेतान जी के लड़के की सगाई है| मैं उनकी फिल्म बनाने और तस्वीरें उतारने आया हूँ|
उनके घर में सुबह के समय पूजा-पाठ का काम हो रहा और माइक पर कोई मंगल पाठ| पूजा के बाद घर की कुछ तस्वीरें लेनी है| थोडा समय है| मैं छत पर चला जाता हूँ| जहाँ कबूतर उड़ रहे हैं | एक झूला डाला हुआ है जिस पर मैं बैठ गया हूँ| सामने छोटे-छोटे मकान दिखाई दे रहे और दिखाई दे रहींहैंकई बिल्लियाँ | पूर्वजों के पुराने घर| इन घरों की अस्थियों में जरूर पुरखों की साँस बसती होगी| यहाँ मैं सब तरह के डर और मोह से दूर हूँ| कोई आतंक नहीं मेरे मन पर | कोई रहस्य कोई रोमांच और कोई संभावना नहीं है अब मेरे जीवन में |
ऊपर खुला आकाश है जो छाया हुआ है मेरे भीतर| मेरे बाहर एक आकाश है| और मेरे भीतर एक आकाश | मैं आकाश हूँ | मैं आकाश देख रहा हूँ | कस्बे का आकाश ,कस्बे के कबूतर, कस्बे का शोर यह सब कुछ बाहर की बातें लग रही| अंदर निर्जनता है | पेशे से मै फोटोग्राफर हूँ | पर मन कवि सा | तभी तो मौसमी मिली | बांग्ला भाषी | शान्तिनिकेतन से पढ़ी हुई| पेंटर| बड़ी-बड़ी आँखें| चौड़ा माथा | क्या पच्चीस साल हो गए उस बात को!
लगातार बारिश हो रही थी उस दिन और मौसमी की कॉलेज में पेंटिंग की प्रदर्शनी थी| मैं उस कॉलेज का फोटोग्राफर था| पेंटिंग के साथ-साथ मैने उसकी भी एक तस्वीर खिंची| जिसमें उसके जूड़े में लगा सप्तपर्णी फूल दिखाई दे रहा था | शरद पूर्णिमा का दिन था | वह कहीं देख रही थी | मन की प्रफुल्लता तस्वीर में उतार दी| उसे वह तस्वीर बहुत अच्छी लगी| कॉलेज की लड़कियां मुझसे अलग से तस्वीरें खिंचवाती| लड़कियों की भीड़ लगी रहती थी मेरे आसपास | पर वह सबमें अलग थी| उसने न ही कोई तस्वीर उतरवायी और न जूड़े में सप्तपर्णी वाली तस्वीर मांगी| पूरे शरद ऋतु मेंवह दो तीन बार स्टूडियो आई| उसके आने से मैं सप्तपर्णी की सुगंध से भर जाता | मैं उससे कुछ नहीं पूछता| वह कुछ नहीं कहती| बस यूँ ही आ जाती और यूँही चली जाती | कभी–कभी ‘सप्तपदी’ (बांग्ला) फिल्म का गाना सुनाती| जब वह गाती उसकी आँखों के रंग बदलते जाते| उसकी आँखों में उजाला था, उम्मीद और उड़ान | कभी लगता कोई हिरन है जो भटक रहा | उसकी आँखें मुझ पर ठहर जाती| जिन्दगी बस इसी तरह , यूँ ही बरसी | रोज के झंझट चुपके से नरम घास बन गए| हम अलग रह नहीं पा रहे थे| एक दिन वह सब कुछ छोड़ मेरे घर आकर रहने लगी| धीरे- धीरे रोजमर्रा की जानी पहचानी जिन्दगी में हम दोनों ने चलना शुरू कर दिया | कुछ दिनों बाद विवाह किया| मैं फोटोग्राफी करता रहा और वह पेंटिंग| वह कालीघाट में रहती और मैं भवानीपुर में | उसे शोर पसंद नहीं था | हमने टालीगंज में शान्त जगह खोज कर अपने अनुसार एक घर बनाया | कैसे उत्सव और उल्लास के दिन थे|
स्वप्न और आकांक्षा का खुला आकाश | धीरे- धीरे प्रेम गृहस्थी की जिम्मेवारियों में बदल चुका था | साधारण और सामान्य से दिन चल रहे थे| और मुझे दिल्ली जाना पड़ा | नहीं… उन बातों की तरफ नहीं लौटना चाहता ..| वहाँ उजाड़ है….|
मैं अपना मन कहीं और लगाने की कोशिश करता हूँ| कितना जीवन गुजर गया | इन वर्षों की बात सोची जाये तो तीस घंटे भी कम पड़ेंगे | और ठीक से सोच जाये तो तीस सेकंड में पूरी कहानी कही जा सकती | हाँ तीस सेकंड की ही कहानी है मेरे जीवन की | साठ का हो गया हूँ | और मौसमी मुझसे दस साल छोटी |
नीचे खेतान जी के घर में जो माइक लगा हुआ है | उस की आवाज तेज हो गयी है | संपन्न मध्यमवर्गीय मारवाड़ी परिवार| उनके लड़के की हनुमान मंदिर में सगाई है| सभी वहाँ जाने वाले हैं| वधू पक्ष वहीँ पहुँच जायेंगे| मुझे सुबह के नाश्ते में सांभर बड़ा, इडली डोसा दिया गया है| उसके पहले चाय के साथ मठरी और सुहाली भी दी गई थी| बाहर से आये कुछ लोग आपस में बात कर रहे हैं| वधू पक्ष रघुनाथ गंज के हैं | कह रहे हैं –‘आजकल छोटी जगह की लड़कियाँ पढ़ी -लिखी मिलती हैं| पढाई के आलावा और कई तरह की चीजों में प्रशिक्षण लिया होता है | कंप्यूटर, गृह प्रबंधन में तो माहिर होती ही हैं| कलकत्ते में पी.जी. में रहकर पढाई करती हैं|’ये लोग ठीक ही कह रहे | आजकल पी.जी. पहले से ज्यादा खुल गए हैं |
खेतान जी के घर आये लोग आपस में बातें कर रहे हैं पर मैं उनकी बातें सुन नहीं रहा | मुझे मौसमी दिखाई दे रही है | जो अपने खाली और सन्नाटों भरे कमरे में अकेली बैठी है और एक ही बात को बार-बार बोल रही है| मैं जो भी बोलता हूँ वह सुनती नहीं है |वह कुछ और बोलती है| उसकी बिल्ली उसके पास आकार बैठ जातीहै | वह उसे अपने से अलग कर दूध दे देती है| उसका नवमी, दशहरा और काली पूजा सब उस कमरे में ही बीतता है| दीपावली और होली अब बस वह कमरा ही है| वह कमरे में से निकलती है कमरे में जाने के लिए| वह कुछ का कुछ बोलती है | और कुछ का कुछ सुनती है | उससे एक बात यदि तीन बार बोली जाये तो वह तीन बार तीन तरह का जवाब देती है| पर वह ऐसी कैसे हो गयी? लम्बा वैवाहिक जीवन | दस साल तो इंतजार में ही बीत गए| एक लड़की चाहती थी| अपनी जैसी| डॉक्टर, चेक अप | कुछ नहीं हुआ | संतान नहीं है हाथ की रेखाओं में|
बाद के दिनों में खूब पेंटिग करने लगी| अमूर्त पेंटिंग | दो तीन प्रदर्शनियाँ सफल रही | पर न जाने उसे क्या होने लगा| बाद में काम तो करती पर दिखाना नहीं चाहती| धीरे-धीरे चुप रहने लगी | पेंटिंग की दुनिया में लोग उसे जानते हैं | कोई इंटरव्यू लेने आता तो उसे कुछ नहीं कहती | खिड़की के बाहर देखती रहती| उसके कमरे में रंग, कैनवास, कूची, तस्वीरें अस्त-व्यस्त पड़े रहते| हर चीज दूसरी चीज के काम में लायी जा रही होती| दो-तीन दिनों तक पुराने कपड़े पहने रहती| मैं कहता –“बाल संवार लो|”- तो हाथों से ही बालों पर हाथ फेर लेती और कहती-
“ मैं ऐसी ही हूँ”
जब कोई इंटरव्यू लेने आता तो कुछ नहीं कहती ,जब वह जाने लगता कहती-
“फिर मत आना |”
उसके ऊपर लेख छपते रहते | वह उन्हें पढना नहीं चाहती | कहती-
“मैं जानती हूँ कि मेरी पेंटिंग में क्या-क्या कमियां हैं| मुझमें धीरज की कितनी कमी है| मुझे मेरे काम को और समय देना होगा | मेरा काम कमजोर काम है|”
उसे अकेले रहना ही अच्छा लगने लगा | देर रात तक बीथोवेन और मोजार्ट के शास्त्रीय संगीत सुनती रहती| जब तब ‘शोक गीत’ सुनने लगती| जिस दिन शोक गीत ज्यादा सुनती मैं उस पर नजर रखता | मुझे खटका लगा रहता कि कहीं कुछ कर न लें| कुछ उसके अंदर के संसार में घटा था| बड़ा और गहरा | वह मेरे साथ थी पर लगता था कि वह मेरे साथ नहीं थी| मुझसे बात करती पर लगता किसी और को खोज रही है| मैं उसे जब कहता –
“खाना कब खाओगी?”
“तुम्हें हर समय यही लगता है कि मैं भूखी हूँ|”
मै यह सुन वह परेशान न हो इसलिएकभीपूरे दिन खाने की बात नहीं पूछता तो वह कहती-
“मैं भूखी हूँ, पर तुम्हें कोई परवाह ही नहीं|”
उसके शोक और संताप उसकी व्याकुलता मुझे समझ में तो आ रही थी पर मैं कुछ नहीं कर सकता | वह जब तब कहने लगती –
“मैं रहूँ न रहूँ तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता|”
वह हर दिन कुछ अजीब होती जा रही थी | यह मैं किससे कहताकि उसकी आँखों में कोई रहस्य था | उसका मन हरा-भरा नहीं रहता था | अपनी किसी दुनिया में वह फँसगयी थी | भँवर था | बाहर से तो मैं यह सब जानता हूँ लेकिन कभी भी मन के उस इलाके में नहीं जा पाया | ये बातें आज मैं इस छत पर सोच पा रहा हूँ | उसकी एक मूर्त पेंटिंग है , जिसमें सप्तपर्णी के पेड़ है और मूसलाधार बारिश हो रही है| उस में नीले और काले रंग का जिस तरह से प्रयोग किया है लगता है बारिश का कोई संगीत पीछे बज रहा | ध्यान से देखने पर वृक्ष और झाड-झंखाड़ के पीछे कोई खड़ा नजर आता है | वह उस पेंटिंग पर नीला कपड़ा बांध कर रखती है | उसे बार-बार देखती है| कोई खरीददार आता तो किसी को भी वह नहीं देती| कुछ है जो छाया हुआ है उसके ऊपर| उसके चेहरे पर जब धूप पड़ती उसके अंदर के सभी रंग चमकने लगते पर एक कोना उदास और अँधेरे में डूबा हुआ है जिसे मैं देख पा रहा हूँ |
कोई पेंटर था जो शान्तिनिकेतन से आया था| वह कई बंगाली फिल्मों के निर्देशकों के साथ उठता बैठता था | पर , वह मेरे काम को देखना भी नहीं चाहता था | मौसमी से एक बार उसने कहा था –“कहाँ तुम्हारा काम और कहाँ महेंदर की फोटोग्राफी| एकदम औसत काम|” उसे विदेशी रंग खरीद कर ला देता | वह उन दिनों की बात है जब मैं दो साल दिल्ली गया | मेरा काम मंदा था | मेरे पास महंगे रंग खरीदने के पैसे नहीं होते| वह विदेशी रंग का उपयोग करना चाहती| मैं जब दिल्ली से वापस आया वह वैसी नहीं मिली जैसी छोड़ कर गया था | उसके अंदर कुछ बदल गया था | अब वह बतियाती नहीं थी| वह पहले से ज्यादा अच्छी पेंटिंग करने लगी | उस को पेंटिंग में रंगों का चुनाव समझ में आने लगा था| एक रंग के पड़ोस में दूसरा कौन सा रंग आएगा यह वह बहुत बेहतर समझने लगी थी| उसकी अमूर्त पेंटिग गहरी होने लगी थी| मैं पूछता –
“ कुछ तो कहो,इस कैनवास के बारे मे बताओ” तो वह धीरे से कहती- “पेंटिंग बताई नहीं जाती| उसे देखो | देखने से खुलेगी”
बाद के दिनों में वह अपना काम कही नहीं दिखाना चाहती|
मैने उसे कहा – “मुर्शिदाबाद जा रहा हूँ| तुम भी साथ चलो | मन बहल जायेगा | पेंटिंग के लिए बंगाल के लैंडस्केप देख सकती हो|”
मौसमी ने कहा –“ नहीं..नहीं | ट्रेन में भीड़ होती | मेरा मन घबराता है| तुम्हें भीड़ में , शोर रहना पड़ता है पर जो लोग रचनात्मक होते वे भीड़ में नहीं रह सकते| उनको अकेले ही रहना चाहिए|”
“पर मैं अकेला कैसे जाऊं | तुमसे प्रेम करता हूँ”
वह हाथ छुडाते हुए बोली-
“ काम करने वाले,सोचने समझने वाले इतना प्रेम में नहीं रह सकते | उन्हें अपने काम के लिए एकांत चाहिए| तुम्हारा जीवन सरल है| लोगों से मिलते-जुलते रहना,जोर-जोर से बात करना , रौशनी में रहना | दूसरा जो जीवन है वह आत्मा का जीवन है| मेरा जीवन वही है| बाहर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता |”
जब वह ऐसी बात करती है तब मैं उस पर कड़ी नजर रखता | डर लगता कि कहीं वह कुछ कर न बैठे| आत्महत्या | उसे बाहर की कोई भी चीज अच्छी नहीं लगती|
मुझे नहीं पता यहसब कुछ कैसे हुआ !
खेतान जी के बेटे और बहू की आज जिस तरह तस्वीरें उतारूंगा हमारे विवाह की तस्वीर भी उतारी गयी थी| एक आज भी लगी हुई है घर की दीवार पर | जूड़े में सप्तपर्णी के फूल | पर सब कुछ क्या कैसे हुआ ! बीस साल बाद मैं कहाँ पहुँच गया हूँ| तीस सेकंड में मैं अपने जीवन को बस इसी तरह देख पाता हूँ| मेरे जीवन की कई और परतें होंगी पर मौसमी के जीवन को मैं नहीं समझ पाता| वह पेंटर है| उसकी पेंटिंग में उसके एक-एक दिन की यात्रा देखने वाले देख पाते होंगे| उसकी पेंटिंग का गहरा होता जाना , उसमें कई शेड कई परतें आना | मैं ज्यादा कुछ नहीं जानता| हाँ , जिन दिनों मैं दो साल दिल्ली गया थाउन दिनों दिल्ली में मैं क्या कर रहा था यह नहीं बता सकता | मौसमी यहाँ किस तरह रही यह भी नहीं जानता | मेरी कहानी बहुत सारी चीजों को नहीं जानने की कहानी है| मेरी कहानी जो मैने बताई वह तो वही है जो मैं जानता हूँ पर मेरी कहानी वह भी है जो मैंनहीं जानता | मैं नहीं जानता मौसमी मेरे साथ क्यों नहीं आई! और मौसमी उस पेंटिंग पर कपडा बांध कर क्यों रखती है! यह बोलना झूठ है कि मैं दो साल दिल्ली क्यों गयायहमैं नहीं जानता |यह बता नहींसकता कि मैं वहाँ दो साल क्यों रह गया?मैं नहीं जानता कि मौसमी को क्या हुआ ? साँस की बीमारी तो हो गयी थी उसे| मैं अक्सर उसके पास रहता था | पर ऐसी तो कोई बात नहीं थी कि वह गंभीर हो जाये| वह ठीक हो रही थी| उस दिन सुबह उसे क्या हुआ ? वह क्यों नहीं उठ पायी? नहीं, मैने नहीं मारा उसे| मेरा विश्वास कीजिए | मैं नहीं जानता | मैं यहाँ इस आकाश के नीचे किसी से भी झूठ नहीं कहूँगा | आधी रात को वह जो सोयी फिर उठी ही नहीं | मैने उसकी तस्वीर उतारी | उसकी अंतिम तस्वीर | उसमें कोई रहस्य था | वह उसके साथ ही चला गया | वह उस रात भी बीथोवेन के सिम्फनी सुनती रही थी| शोक गीत|
“महेंद्र जी आप कहाँ हैं? आप यहाँ छत पर किससे बात कर रहे? नीचे आपको फोटोग्राफी के लिए खोजा जा रहा है| हम सभी आपको खोज रहे हैं|”- खेतान जी के छोटे भाई –कमल बाबू उन्हें खोजते हुए ऊपर आ गए| महेंदर सिंह बोले- “माफ़ कीजियेगा आपकी छत इतनी सुन्दर है कि मन लग गया | पर यहाँ कोई पेड़ कटा हुआ है| काठ चंपा के बगल में कौन सा पेड़ था ?”
कमल बाबू सीढियों से उतरते हुए बोले- “अच्छा , आप छातिम की बात कर रहे| सप्तपर्णी को यहाँ छातिम कहा जाता है| | माँ ने कटवा दिया | उसे शुभ नहीं मानती | उसकी खुशबू इतनी तेज होती है कि भूतनी लग जाती है और इन्सान को मार भी देती | माँ उसे घर के अहाते में कभी पनपने नहीं देती| ”
“अरे!”- महेंदर सिंह यह सुन पीले हो गए|
उनके सामने मौसमी की पेंटिंग घूम गयी| पेंटिंग का वह सप्तपर्णी पेड़ उसकी सरसराहटें, उससे झड़ती पत्तियां ,उसके आसपास की ख़ामोशी , उससे उसका लगाव ,सब कुछ उन्हें क्षण भर के लिए निराशा और हताशा में ले गया | नवम्बर महीने के अंतिम दिन पुराने पीले और पराजित दिन लगे | सुचित्रा सेन और उत्तम कुमार का वह गाना अवसाद बन अंदर उतर गया | मन विषाद से भरा था था और ऊपर पूर्णिमा का चाँद|
जैसे ही महेंद्र सिंह नीचे गए उनकी नजर रामेश्वर बाबू पर गयी| दोनों एक दूसरे को देख चौंक गए| रामेश्वर बाबू ने धीरे से खेतान जी के कान में कहा –“ ये तो कमाल की तस्वीरें उतारते हैं| आदमी के मन के भाव भी उतार देते| पर इनका ध्यान रखिएगा| इनका इलाज चल रहा | इनकी पत्नी की कुछ साल पहले रहस्मय ढंग से मौत हो गयी थी|”

