मधुसूदन आनंद की कविताएँ

  1. प्रेम

दवात क्यों उँडेल दी
इतनी नीली स्याही का मैं क्या
करूँगा
मुझे लिखना है सिर्फ एक शब्द —
प्रेम
उसी में निहित है न्याय
शांति उसी में उतरती है।
अब एक बड़ा नीला धब्बा
रह जाएगा शेष
दीवारें, फर्श देख-देखकर मैं
कहूँगा यकीन
कितना सचमुच का है जीवन
धब्बे तक में थिरकता है धीर-धीरे।

  1. हवा

इस कमरे में
चालीस साल से भरी हैं आवाज़ें
वे न कम होती हैं
न ज्यादा
ताज़ी हवा से नहीं मिलतीं वे
वे अपने भीतर बंद हैं ।

भीतर कहीं नहीं खिला है कमल
सिर्फ खून है गाढ़ा लाल
हवा की तरह बहता है हवा में ।
हवा निकल जाएगी एक दिन
खुलेगा कमरा चीज़ों से धूल हटायी जाएगी ।
जैसी की तैसी रखी मिलेंगी किताबें
तस्वीरें और हजारों शब्द ।
शब्दों में जो भरी है हवा
जो उन्हें जोड़ती है
करती है मुक्त उसे पहचान लेना ।

3. हिटलर

हिटलर बैठा है पार्क में अकेला
हिटलर नर आया है समय
हिटलर जुगाली कर रहा है
समय सवा सात बजे है शाम के

बच्चे खेल रहे हैं पार्क में
युवक फुटबाल बॉलावाल या चिड़ी छिक्का
हिटलर की जेबों में बच्चों के लिए टाफियां हैं
युवकों के लिए ईर्ष्या
हिटलर के लिए प्यार है
पार्क में बैठे थके बूढ़े हिटलर के मन में

हिटलर से कोई बात नहीं करता
हिटलर से बोलता है सिर्फ हिटलर
हिटलर असहाय है, उपेक्षित
अकेले हिटलर को देखकर करुणा पैदा होती है
बूढ़े हिटलर को देखकर दहशत पैदा नहीं होती
हिटलर मानवीय हो गया है इस मोड़ पर
यह बड़े मर्म की बात है
मार्मिक है इस हिटलर का चित्रण भी
जो मैं कर नहीं पाया हूँ
आप सुविधा के लिए इतना ही समझ लें
यह हिटलर इस्तेमाल किए गए
निरोध की तरह
फेंक दिया गया है।
समय सवा सात बजे है शाम के
और इस समय यह हिटलर
कितना मानवीय लग रहा है
खासकर पार्क में गुमसुम बैठा हिटलर
हिटलर
क्या बूढ़ा हिटलर आत्महत्या की सोच रहा है
मुग़ालता हो सकता है आपको
थके बूढ़े हिटलर को कोई मुगालता नहीं है
उसकी जेबों में कल की आशा में टॉफियाँ हैं।

  1. घड़ी से डर

घड़ी में चाबी नहीं दे सकता जी
घड़ी से मुझे डर लगता है।
जी आप मेरे बहुत काम करती हो ।
जी मैं आपका इतना-सा काम
नहीं कर सकता।
जी मैं आपको चाहता हूँ बहुत ।
जी मैं कोई धोखा नहीं कर सकता ।
घड़ी से मुझे लगता है डर।
जी अभी तक बीत गया सब सुंदर।
जी सुई कभी टिकी नहीं उस पर।
जी मन मेरा बार-बार डरता है।

  1. विचार

सपने में किसी ने कहा
यह जो दो तारों के बीच आकाश तना है
क्या तुम समझते हो इसके बीच
कोई तारा नहीं है
ध्यान से देखो ज़रा भाई जान
यह एक काला तारा है।
टेलीस्कोप लगाकर देखा गया फिर
तारा नहीं था वहाँ कोई
एक काली पूँछ हिल रही थी।
दो बरस बाद नासा ने जाँच की कुछ रेडियो चित्रों की
एक पुच्छल तारा सूर्य से टकराया था बताया गया
जिससे काली धूप छितर गई थी आग के चारों ओर
इतनी बिजली निकली थी इस टकराहट से
कि बरसों दुनिया को बिजली की ज़रूरत नहीं होती।
उतिष्ठतः जागृत कहकर वह चला गया
शटल से हम लोग सूरज से सैकड़ों मील दूर उतरे
काले अँधेरे में हम अंधे थे
पूरन पहलवान भी साथ था हमारे
अपने नयनतारे सुरमे और बैसाखियों के साथ
हम देखने लगे सूरज के चारों ओर उमड़ती लपटें
जो सूरज में समायी हुई थीं
जैसे सागर समाया रहता है सागर में ।

पूरन पहलवान ने कहा भूख लगी है
मूरख हो पहलवान कहा मैंने
देखो यह कोई भूख का टाइम है
देखो देखो आग के समुद्र को ध्यान से देखो
ध्यान मगर मेरा भी रोटी पर ही था
सो मैंने पोटली खोलकर
दो रोटियाँ पूरन को दीं और दो खुद खा लीं
अंतरिक्ष में इस तरह रोटी तोड़कर हम पड़ रहे।
बोला पूरन सूरज की आग पृथ्वी पर ले जाएँगे
मैंने कहा सौर ऊर्जा तो वहाँ भी मिल जाएगी
मगर पूरन जिद करने लगा।
थोड़ा-सा सूर्य हमने शीशी में बंद कर लिया
और वापस रवाना हुए
रास्ते में सूरज आराम से रहा मगर पृथ्वी की कक्षा में आते ही वह वापस मुड़ने लगा
बहुत तदबीर की हमने सूरज को रोकने की
मगर एक धमाके के साथ वह हमारे यान से बाहर निकल भागा आखिर।
मैंने कहा भाई पूरन सूरज नहीं टिकेगा पृथ्वी पर
जैसे कि हम सूरज पर टिक नहीं पाए
हमें भूख लगी वहाँ और रोटियाँ तोड़ीं हमने
और वापस आ गए पृथ्वी पर।
पूरन बोला हम आदमी हैं और घर है हमारा गाँव में
कैसे सब कुछ छोड़-छाड़कर अंतरिक्ष में
पड़े रह सकते हैं हम सूरज के मोह में
बात पूरन की ठीक थी
मगर पूरन की समझ में नहीं आ रहा था यह
कि सूरज का टुकड़ा
आदमी न होने के बावजूद क्यों भागा वापस
उसका कौन-सा घर-बार था
बीवी बच्चे थे सूरज पर ।
मैंने कहा पहलवान
तुम सिर्फ पूरन नहीं हो
तुम हो एक पृथ्वी जो
पृथ्वी पर लौट रही है
ऐसे ही सूरज का टुकड़ा भी सूरज है
जिसे लौटना होता है लाजिमी तौर पर सूर्य में
ऐसे ही रहेगा सूर्य
और ऐसे ही पृथ्वी
इतना काफी नहीं है क्या कि
करोड़ों सालों के बाद
तुम सूरज को इतने नजदीक से देख आए
कह तो दिया मैंने पूरन से यह सब कुछ
उसको समझाने के लिए
मगर समझ में मेरी भी नहीं आया
सूरज और पृथ्वी का यह घपला
इसीलिए दूसरे दिन जब वह आदमी आया
फिर सपने में
तो मैंने जिज्ञासा की — कौन हो तुम ?
क्यों तुमने मुझे बताया काले तारे के बारे में
क्यों मुझे परेशान कर रहे हो
क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा
वह आदमी बन गया एक विचार
जिस पर मैं वर्षों से सोच रहा हूँ।

***

Scroll to Top