यादवेन्द्र

प्रेमेंद्र मित्र की बांग्ला में मूल कहानी “तेलेनापोता आविष्कार” 1946 में छपी थी और मृणाल सेन ने उसे आधार बना कर “खंडहर” 1983 में बनाई। मैंने कहीं पढ़ा कि किसी अन्य बांग्ला निर्देशक ने भी इस कहानी पर बहुत पहले हाथ आजमाया था पर उसकी ज़्यादा चर्चा हुई नहीं। मृणाल सेन ने समकालीनता को ध्यान में रख कर मूल कहानी में बेहद प्रासंगिक बदलाव किए पर कहानी की आत्मा को ज्यों का त्यों बरकरार रखा… यही कारण है कि कहानी के ज्यादातर संवाद फ़िल्म में शब्दशः रख लिए।
एक इंटरव्यू में मृणाल दा कहते हैं कि कहानी के प्रकाशन और फिल्म बनाने के समय के बीच लगभग 40 साल का अंतराल था, इसलिए मुझे वर्तमान में समसामयिक दिखने के लिए कुछ बदलाव करना ज़रूरी लगा जिससे यह अप्रासंगिक और काल्पनिक न लगे। इसी बात को ध्यान में रखकर मैंने केंद्रीय चरित्र और वाचक को फैशन फोटोग्राफर के रूप में गढ़ा जिसकी नज़र हमेशा उत्कृष्ट फोटोग्राफी के लिए सबसे उपयुक्त दृश्यों और किरदारों पर रहती है। मूल कहानी का अंत बहुत मानवीय और सुंदर है लेकिन मैंने फिल्म का अंत उससे थोड़ा हटकर किया है और दर्शकों के ऊपर यह फैसला छोड़ दिया है कि वह अपने निष्कर्ष अपनी समझ और संवेदना के अनुकूल निकालें।
अलग-अलग काम करने वाले तीन दोस्त सुभाष ( नसीरुद्दीन शाह), दीपू(पंकज कपूर) और अनिल( अन्नू कपूर) अपनी रूटीन ज़िन्दगी से थोड़े समय के लिए छुटकारा पाने के लिए कोलकाता से 50 -60 किलोमीटर दूर एक पुराने खंडहर नुमा हवेली(बांग्ला की प्रचलित शब्दावली में राजबाड़ी ) में जाते हैं जहां दीपू के रिश्ते की ताई(गीता सेन) और उनकी युवा बेटी जामिनी(शबाना आज़मी) गरीबी में जीवन काट रहे हैं। वे तीनों नौजवान हैं, मौज मस्ती के लिए वहां गए हैं इसीलिए वहां पहुंचकर मज़ाक में कोई उसे बकिंघम पैलेस कहता है, दूसरा रात के अँधेरे में खिड़की पर खड़ी जामिनी को श्मशान चंपा कहता है तो कोई फोटोग्राफर्स पैराडाइज, जबकि है वह देखभाल और रहने वालों के अभाव में धीरे- धीरे ध्वस्त होता हुआ खंडहर – बातचीत में खानदानी तौर पर उनसे जुड़ा हुआ दीपू बताता है कि 100 साल से ज़्यादा हो गए उस इलाके में मच्छरों के कारण मलेरिया का जबरदस्त प्रकोप था और बदलते हुए सामाजिक आर्थिक परिवेश के साथ उन्होंने उस हवेली को श्मशान में तब्दील कर दिया। अब वहां सिर्फ गिद्ध, सियार, कुत्ते और एक आध ऐसे इंसान बचे हैं जिनकी टेंट खाली थी, इसलिए वे कहीं जा नहीं सकते थे, सो चाहे-अनचाहे यहीं रहना उनकी नियति बन गई। उसकी रिश्ते की बहन और उसकी मां उन्हीं खाली टेंटों वाली इंसान थीं। ऐसे ही तीन-चार साल पहले उनका एक रिश्तेदार निरंजन अपने कुछ दोस्तों के साथ छुट्टियां मनाने वहां आया था और ताई जी को जाते-जाते आश्वासन देकर गया कि मैं विदेश जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जामिनी से शादी करूंगा – उसे न विदेश जाना था न शादी करनी थी, लेकिन यहां मां बेटी उसके वापस लौट कर आने के उम्मीद भरे इंतजार में मुश्किल दिन गुजारते रहे। इस बीच निरंजन ने शादी कर ली, उसके एक बच्चा भी हो गया – यह ख़बर जामिनी तक तो पहुंची थी लेकिन बेटी के हाथ पीले कर के मुक्त हो जाने के इंतजार में मौत को एक-एक दिन टालती हुई लकवा ग्रस्त और अंधी बीमार मां आस लगाए बैठी थी। जब दीपू अपने साथ फोटोग्राफर दोस्त सुभाष को लेकर अंदर गया तो दीपू और जामिनी के भरपूर बचाव के बाद भी व्यग्र माँ यह मान बैठी कि दीपू के साथ जो तीसरा व्यक्ति आया है वह कोई और नहीं निरंजन ही है और वह अपना वचन पूरा करने आया है, अब जामिनी को अपने साथ ब्याह कर ले जाएगा।

दीपू और जामिनी के बीच बातचीत:
मां अपने आप तो करवट भी नहीं ले सकतीं।
इलाज वगैरह?
(कोई जवाब नहीं, पैर से जमीन के कंकड़ हटाती रहती है)
छत की हालत ठीक नहीं है एक-एक करके सब गिर रही है…
सब कुछ तो चला गया पर कुटुंब का अहंकार बाकी है। लड़की के यहां नहीं रहेंगी।
तो क्या तुम भी निरंजन का….?
(कोई जवाब नहीं, खाली आंखों से इधर-उधर देखती है)
क्या यह मामूली सी बात ताई जी को नहीं समझाई जा सकती कि निरंजन अब कभी नहीं आएगा?
(कोई जवाब नहीं, बस गर्भित निगाहें)
ताई का भरोसा इतना पक्का था और उनकी सेहत इतनी नाज़ुक कि सच्चाई पता चलते ही सदमे से उनके प्राण पखेरू उड़ सकते थे…. वे निरंजन… निरंजन पुकारते हुए इतनी कातर हो गई कि सुभाष को कुछ समझ ही नहीं आया और बिलकुल गैर इरादतन उसने स्थिति को संभालने की नीयत से आगे बढकर अपनी कलाई उनके हाथ में दे दी हालांकि उसके परिणाम क्या होंगे इसके बारे में उसे कोई आभास नहीं था…. उसके मन में तात्कालिक तौर पर मनुष्यता का तकाजा यही था कि ताई को गहरे सदमे से बचाने के लिए अविलंब कोई उपाय किया जाए, चाहे झूठ का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। वैसे तत्काल यह झूठ काम कर गया लेकिन उसने जामिनी, सुभाष और दीपू के जीवन में अलग तरह की नैतिक चुनौतियां पैदा कर दीं।
जामिनी और सुभाष के बीच बातचीत:
सुनिए…
आपने हमारे लिए जो किया उससे मैं…
लेकिन… वो तो…
जानती हूं… जानती हूं कि मां की हालत देखकर ही आपने वो बात कही….
तो फिर क्या करता? आप लोग सब ऐसे चुप हो गए कि…
अगर आप मां को जानते तो….

अनायास घटी इस घटना पर तीनों दोस्तों की राय अलग है। सुभाष और दीपू अप्रत्याशित घटना से किनारा करने की और जो कुछ हुआ उसको झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं पर अनिल पूरी तरह से असंपृक्त और व्यावहारिक है। बेहद असंवेदनशील ढ़ंग से कहता है:
जामिनी को शादी की जरूरत है, निरंजन की नहीं….(अब सुभाष के झूठ के बाद)चार साल के लिए तो वे निश्चिंत हो गए…. उसके बाद फिर कोई और निरंजन आ जाएगा।
सुभाष और दीपू के बीच बातचीत:
वो लड़की बहुत समझदार है, वेरी सेंसेटिव एंड सिविलाइज्ड… उसने जिस सहज तरीके से यह सब लिया है और…
रास्ता ही क्या है यार?
मैं सोचता हूं ऐसे कितने दिन चलेगा… आखिर मां को बहकावे में कब तक रखा जा सकता है?
जब तक चलेगा, चलेगा… उसके बाद एक दिन मां मर जाएगी।
फिर?
जामिनी अपनी दीदी के घर चली जाएगी, मुजफ्फरपुर।
फिर?
हो सकता है दीदी किसी न किसी तरह उसकी शादी का इंतजाम कर दे…. या शादी हो ही न। या वह शादी करे ही न… या दीदी जीजाजी के घर की देखभाल करने लगे और बाकी ज़िन्दगी वैसे ही गुजार दे। और इस तरह आहिस्ता-आहिस्ता सब भूल जाए, मन से सब मिट जाए। यह घर बार, मंदिर, तालाब, आकाश, अंधेरा सब कुछ…
वापस जाने से पहले सुभाष और जामिनी के बीच बातचीत:
आप लोग आज जा रहे हैं न?
हां…
कब?
( बड़ा शून्य, कोई जवाब नहीं)
सब के चले जाने के बाद मां बेटी की बातचीत:
वे लोग कब तक रहेंगे? कब जाएंगे? कुछ बताया?
(बड़ी सारगर्भित चुप्पी)
जामिनी, जामिनी…. मैं चल फिर नहीं सकती इसीलिए बार-बार तुम्हें भेजती हूं। और तू कुछ जवाब नहीं देती… इतनी जिद क्यों? जामिनी जामिनी….
(जामिनी वहीं बैठी है, एक शब्द नहीं बोलती)
मां, तुम्हें मेरी हालत पर तरस नहीं आता क्या?
अरे, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?
(चुप्पी… चुप्पी…. सिर्फ चुप्पी)
मां, चुप हो जाओ… भगवान ने तुम्हारा सब कुछ तो ले लिया – हाथ, पांव, आंख सब कुछ। अगर तुम्हें गूंगा भी बना दिया होता, तो?
(यह सुन कर मां एकदम निढाल हो जाती है)
मां… मां, मेरा मतलब यह नहीं था। तुम जानती हो मेरा मतलब यह नहीं था। मुझे माफ कर दो मां…. मुझे समझने की कोशिश करो मां…. मैं तुम्हें सच नहीं बताना चाहती थी, मैं अबतक तुमसे झूठ बोलती आई हूं मां…..
कोलकाता से करीब पौने दो सौ किलोमीटर दूर शांतिनिकेतन (बोलपुर) के निकट के
कालिकापुर राजबाड़ी में फ़िल्म का अधिकांश भाग शूट किया गया है। यह लोकेल फ़िल्म को अप्रतिम ऊंचाई तक ले जाता है और फ़िल्म का कथानक और दृश्यबंध एकमेव हो जाते हैं –
फिल्म देखने के बहुत देर बाद तक वीरान खंडहर और उसके बीच पसरे अनकहेपन का गर्भित कोलाहल सुनाई देता रहता है। भरोसे की हल्की-सी डोर से बंधी हुई जिंदगियां कहना कितना कुछ चाहती हैं लेकिन उनके बीच अनकहे का दलदल इतना विशाल हो जाता है कि उम्मीद का उजाला बस छत रहित खंडहर की सूराखों से अंदर आकर जीवन का आभास पैदा करता रहता है। बोलकर क्या हम सब कुछ कह देते हैं? जो बोला नहीं गया क्या वह ज़्यादा मारक और भावपूर्ण नहीं होता?
मूल कहानी में शहर से तीन दोस्तों का छुट्टी बिताने के लिए गांव तक पहुंचने का विवरण बहुत विस्तृत (कहानी का लगभग आधा हिस्सा) है और इस पूरी यात्रा में सबसे बड़ा किरदार यात्रा के दौरान चारों ओर फैला हुआ अंधेरा और कोहरा है। गांव पहुंच कर भी इन दोस्तों को खंडहरनुमा कोठी में गहन अंधकार का ही सामना करना पड़ता है। इस कोठी में रहने वाली दो स्त्रियों का जीवन भी इसी कभी न छंटने वाले अंधेरे संसार का बदकिस्मत और अविच्छिन्न हिस्सा है। क्या इसे महज़ संयोग माना जाये कि गहन अंधकार में जीवन की टिमटिमाती लौ थामे अनिश्चित भविष्य की देखी अनदेखी करती युवा नायिका का नाम जामिनी है … जामिनी माने रात?
कहानी में तीनों युवकों की वहां रहने वाली जामिनी और उसकी मां के साथ मुलाकात और बातचीत का विवरण बहुत संक्षिप्त है – शुरू होता है और हथौड़े की किसी चोट सा टंकार उत्पन्न करता है….और पल भर में अनंत खामोशी में विलीन हो जाता है। लगता है जैसे कुछ हुआ ही न हो।
जब मृणाल दा ने इस कहानी पर फिल्म बनाने का निश्चय किया तो उन्होंने छायाकार के महाजन को मूल कहानी में वर्णित अंधेरे के साम्राज्य का इस्तेमाल न कर के दिन के उजाले और धूप की विभिन्न स्थितियों की छटा को पकड़ने का निर्देश दिया… कहानी में सुभाष के काम-धंधे के बारे में कोई खुलासा नहीं किया गया है पर फ़िल्म में फोटोग्राफर बने सुभाष (नसीर) के हाथ में जो औजार (कैमरा) है उसका और कभी अपनी खूबसूरती और शान ओ शौकत पर इठलाती विशाल कोठी का सर्वाधिक ऐश्वर्य सूरज की रोशनी में निखरता है शायद इसीलिए महाजन ने दिन के उजाले को किसी भावपूर्ण कविता के भावों सा संजोया है। पर मूल कहानी पढ़ने पर मुझे लगता है कि (उजाला नहीं) अंधेरा, खंडहर और जामिनी के किरदार अविभाज्य हैं, एक दूसरे को ज़्यादा गहराई के साथ व्यक्त करते हैं।
मूल कहानी में शहर से गांव के बीच के रास्ते और कोठी से सटे हुए पोखर का बेहद सजीव चित्रण है जिसमें काव्यात्मक दृश्यात्मकता है पर फ़िल्म में उसकी भी उपस्थिति नगण्य है – फ़िल्म में निर्देशक का पूरा फ़ोकस मानवीय संबंधों के बीच व्यक्त-अव्यक्त खदबदाते तनाव पर है शायद इसलिए वे विवरण हाशिए पर चले गए।
फ़िल्म देखते हुए मुझे लगता है कि राजबाड़ी में बड़ी संख्या में फोटो खींचते हुए सुभाष अपने कैमरे जैसा यांत्रिक हो जाता है और जामिनी और उसकी मां की मानवीय उपस्थिति उसको प्रभावित या द्रवित नहीं करती – ऐसा तो होता ही रहता है… और इससे मुझे क्या लेना-देना है… हम तो शहर की भीड़-भाड़ से दो-तीन दिन निकाल कर रिलैक्स करने आए हैं… मेरा अपना प्रोफेशनल काम मेरा और उनका मरना जीना उनका… मुझे अपने स्टूडियो की शोहरत बढ़ाने के लिए जो करना होगा बगैर आगा-पीछा सोचे करता रहूंगा। यही कारण है कि उसका ज़्यादा ध्यान जामिनी पर नहीं बल्कि उस परिवेश पर है जहां वह रहती है – उसकी उतारी तस्वीरों में जामिनी की उपस्थिति जामिनी नामक व्यक्ति की उपस्थिति कम और ध्वस्त होती हुई कोठी के खिड़की दरवाज़े जैसे एक अविभाज्य और अभिशप्त अंग के तौर पर ज्यादा है।
हाल में प्रकाशित अपनी किताब ‘बोंधु’ में कुणाल सेन ने अपने पिता मृणाल सेन की फिल्म ‘खंडहर’ का ज़िक्र करते हुए लिखा है कि यह फिल्म उनके पिता की सबसे ज्यादा अंतर्मुखी और आत्मनिरीक्षण करती हुई फ़िल्म है और उनके मन में शुरू से यह तय था कि फ़िल्म के लिए उन्हें इस धरती पर उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चाहिए थे। क्योंकि मूल कथा बांग्ला की थी इसलिए उनका सहज निर्णय यह होता कि फिल्म भी बांग्ला में बनाई जाए। कुणाल बड़ी बेबाकी से लिखते हैं कि उन्हें जिस स्तर के अभिनेता चाहिए थे उस स्तर के अभिनेता बांग्ला में नहीं मिल पाए इसलिए उन्होंने शबाना आज़मी और नसीर जैसे लाजवाब हिंदी अभिनेताओं को लेकर फिल्म हिंदी में बनाने का फ़ैसला किया। उनकी तमाम फिल्मों के बीच इस फिल्म में अभिनय का स्तर अद्वितीय है और यदि अभिनय का यह स्तर उन्हें न मिल पाता तो फिल्म अपनी कलात्मक ऊंचाई को न छू पाती।
मृणाल दा को याद करते हुए शबाना आज़मी ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘खंडहर’ मेरे करियर की वैसी फिल्म है जिसमें मैंने सबसे कम गलतियां की हैं… जामिनी का किरदार निभाते हुए मैंने उसे बेइंतहा प्यार किया। उस किरदार को मृणाल दा ने बहुत प्यार से गढ़ा था। जामिनी की घनघोर असुरक्षा के बीच भी आत्म सम्मान को बचा कर रखने और पीड़ित और दया का पात्र बनने से इनकार करने की शख्सियत – क्या कहने।
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