डॉ. नीलिमा पांडेय

Just Being: A Memoir, प्रोफेसर रोमिला थापर की आत्मकथा है। यह एक विस्तृत और विचारशील कृति है, जिसमें लगभग 710 पृष्ठ हैं। 94 वर्ष की उम्र में प्रकाशित यह रचना उनकी अकादमिक किताबों से बिल्कुल अलग है। इसमें उन्होंने अपनी व्यक्तिगत जीवन-यात्रा को आधुनिक भारत के बौद्धिक और सामाजिक इतिहास के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है।
आत्मकथ्य की शुरुआत में प्रो.थापर ब्रिटिश भारत में अपने बचपन और युवावस्था के किस्से सुनाती हैं। इसमें शामिल है पुणे, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रांत जैसी जगहों पर बीता समय, स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन की छाया, लंदन के SOAS में उच्च शिक्षा, जहां उन्होंने ए. एल. बाशम के मार्गदर्शन में अशोक पर शोध किया। इसके बाद भारत लौटकर कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी और ख़ासतौर पर JNU के Centre for Historical Studies की स्थापना में उनकी भूमिका विस्तार से आती है। वे एशिया के विभिन्न पुरातात्विक स्थलों की यात्राओं, मित्रों, परिवार, बौद्धिक विकास और पब्लिक इंटेलेक्चुअल के रूप में मिली चुनौतियों का ज़िक्र करती हैं। उन्होंने बार-बार “autonomous woman” बनने की अपनी इच्छा पर जोर दिया है।
Just Being में बचपन का हिस्सा बहुत जीवंत और विस्तृत है। किताब का पहला अध्याय “The Child” इसी पर केंद्रित है। रोमिला थापर का जन्म 1931 में हुआ। उनके पिता लेफ्टिनेंट जनरल दयाराम थापर ब्रिटिश भारतीय सेना के मेडिकल सर्विसेज में डॉक्टर थे, इसलिए परिवार अक्सर एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर होता रहता था। बचपन के शुरुआती साल लाहौर, पेशावर, थल फोर्ट (नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रांत, अब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में) और बाद में पुणे जैसे स्थानों पर बीते। थल फोर्ट और पेशावर के दिनों को वे
ख़ासतौर पर याद करती हैं। थल फोर्ट एक ब्रिटिश फोर्ट था जहां असली झड़पें और सैन्य गतिविधियां होती थीं। एक बच्ची के रूप में वे अपनी मां की अंगुली थामे पूछती थीं, “हम कहां जा रहे हैं?” पठान महिलाओं से उनकी मुलाकात यादगार रही। उन महिलाओं के भारी चांदी के गहनों ने उनमें अंगूठियों के प्रति आजीवन लगाव पैदा कर दिया।
1937 में उनका परिवार पेशावर के कैंटनमेंट में शिफ्ट हुआ। वहां का घर सिंगल-स्टोरी था। साथ में खुला मैदान, आंशिक बागीचा और बाकी अंकेम्पट एरिया। घर का लेआउट क्लासिक कैंटनमेंट स्टाइल का था, सेंट्रल कॉरिडोर, वरांडा, किचन अलग एनैक्स में। थापर उस समय की रसोई की कीमतों को याद करते हुए बताती हैं कि एक सेर आटा-दाल आदि एक रुपए से कम में मिलता था। सेवकों का वेतन भी महज 30 रुपए मासिक होता था। उन्हें खुली जगहों, बागीचों और पड़ोस की दोस्तियों की याद सबसे ज्यादा है।
पेशावर में उनके पड़ोसी थे सैयद इस्कंदर अली मिर्ज़ा, जो बाद में पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति बने। दोनों परिवार जल्दी ही घनिष्ठ मित्र बन गए। रोमिला जी का इस्कंदर मिर्ज़ा के बच्चों के साथ खेल-कूद का साथ था। उनकी मां को मिर्ज़ा की पत्नी, जो एक शानदार फारसी महिला थीं, ख़ूब पसंद थीं। रोमिला के पिता और इस्कंदर मिर्जा में भी गाढ़ी छनती थी। दोनों में हास्य का एक समान स्वभाव था। वे लगातार मज़ाक करते रहते थे और एक-दूसरे को चिढ़ाते थे। यह संबंध छेड़छाड़ और चुटकुलों से भरा था। बाद के वर्षों में उनके रिश्ते में बदलाव आया।
वह लिखती हैं कि पहले के वर्षों (1930 के दशक) में पाकिस्तान की कोई चर्चा नहीं थी। लेकिन 1940 के दशक में जब विभाजन की मांग तेज हुई, तो दोनों दोस्तों के बीच गहरी बहसें शुरू हो गईं। रोमिला के पिता विभाजन के खिलाफ थे और इस्कंदर मिर्ज़ा को समझाने की कोशिश करते थे कि वह ग़लती कर रहे हैं।
इस्कंदर मिर्ज़ा पाकिस्तान के समर्थक बन चुके थे। एक बहस में उन्होंने कहा था कि, “जो मुसलमान नहीं हैं, वे ब्रिटिश चले जाने के बाद अल्पसंख्यकों पर पड़ने वाले खतरे को नहीं समझ सकते।” दिल्ली में बाद की मुलाकातों में दोनों की बहसें और तेज हो गईं, लेकिन व्यक्तिगत दोस्ती बनी रही। रोमिला थापर बाद में लंदन में भी इस्कंदर मिर्ज़ा से मिलीं (जब वे बूढ़े हो चुके थे) और पुरानी यादों को ताजा किया। उन्होंने महसूस किया कि शायद मिर्ज़ा के मन में उन फैसलों पर कुछ पछतावा भी था। आत्मकथ्य का यह हिस्सा दिखाता है कि व्यक्तिगत संबंध कैसे बड़े ऐतिहासिक बदलावों (विभाजन) से प्रभावित होते हैं। यह उनके बचपन का एक जीवंत अंश है, जो पेशावर के कैंटनमेंट जीवन, दोस्ती और आगामी राजनीतिक विभाजन को सुंदर ढंग से जोड़ता है।
स्वतंत्रता के समय वे पुणे में स्कूल (St. Mary’s School) की छात्रा थीं। 1947 में वे प्रिफेक्ट चुनी गईं। उन्हें 15 अगस्त को भारतीय झंडा फहराने तथा भाषण देने का मौका मिला। उन्होंने लिखा है कि 1947 में स्वतंत्रता को लेकर बहुत बड़ी उम्मीद और उत्साह था।
बचपन के इन सालों में परिवार की बार-बार होने वाली शिफ्टिंग ने उनमें जगहों, लोगों और संस्कृतियों को देखने-समझने की आदत डाली। पिता की पोस्टिंग के कारण वे विभिन्न शहरों के स्कूलों में पढ़ीं। बाद में पिता के दक्षिण भारतीय ब्रॉन्ज मूर्तियों के शौक ने उनके घर में इतिहास और कला की किताबों का माहौल बना दिया, जो उनकी बौद्धिक यात्रा की नींव बना। कुल मिलाकर, थापर का बचपन ब्रिटिश भारत के अंतिम दौर, विभाजन की छाया और स्वतंत्रता के जश्न के बीच बीता जहां व्यक्तिगत यादें बड़े-बड़े ऐतिहासिक बदलावों से गुथी हुई हैं। थापर इसे “इतिहास की धारा में व्यक्तिगत जीवन” के उदाहरण के रूप में पेश करती हैं।
यह मेमोयर सिर्फ एक व्यक्तिगत कहानी नहीं है, बल्कि इतिहास की नब्ज को थामे स्वतंत्र भारत का इतिहास भी बयान करता है। व्यक्तिगत आत्मकथ्य के साथ वे सबूत-आधारित (evidence-based) इतिहास लेखन, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, आलोचनात्मक सोच और भारत की सभ्यता की बहुलता (plurality) पर गहराई से चर्चा करती हैं। आर्यन विवाद, हिंदुत्व, मुगल काल जैसे मुद्दों पर उनके विचार भी इसमें जगह पाते हैं, साथ ही वर्तमान में इतिहास को राजनीतिक रूप से कैसे इस्तेमाल किया जा रहा है, इस पर उनकी चिंता साफ झलकती है। वे कहती हैं कि इतिहास को “क्यों और कैसे” के सवालों से समझना चाहिए, न कि रटन्तु विद्या (rote learning) और लोकप्रिय आख्यानों (populist narratives) के माध्यम से।
Just Being न केवल रोमिला थापर के प्रशंसकों और इतिहास के छात्रों के लिए बल्कि आधुनिक भारत के बौद्धिक इतिहास को समझने वाले हर व्यक्ति के लिए बेहद ज़रूरी और समृद्ध पढ़ने की सामग्री है। यह एक आत्मकथा से कहीं आगे जाकर 20 वीं सदी के भारत के सामाजिक-बौद्धिक परिवर्तनों का जीवंत दर्पण है। प्रोफेसर थापर की कहानी-कथन की क्षमता यहां अकादमिक विद्वता के साथ भावुकता और सरलता का सुंदर मिश्रण पैदा करती है।
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डॉ. नीलिमा पांडेय
प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष
प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग
लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

