प्रेम की शेड्स और बदलते समाज की कहानियाँ

सुधांशु गुप्त

Sudhanshu Gupt

दुष्यंत का कहानी संग्रह ‘किस्से काफ़ियाना’ ने एक बार फिर ज़ेहन में कहानी को लेकर कुछ प्रश्न खड़े कर दिए। कहानी का रोचक होना, सबके लिए होना, कहानी से रसों की भरपूर प्राप्ति होना क्या और क्यों ज़रूरी है! आज कहानी की जितनी शाखाएँ हैं, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं रहीं। आज कहानी विचार है, यथार्थ और जादुई यथार्थ है, स्वप्न और फंतासी है, चेतन है, अवचेतन है, घटनाएँ हैं, सूचनाएं हैं, इतिहास है। अलग-अलग शिल्प में कहानियाँ लिखी जा रही हैं, पढ़ी और पसंद की जा रही हैं। यानी आप कैसी भी कहानी लिखकर लेखक-अच्छे लेखक हो सकते हैं। और यही बात कहानी को लेकर मेरी दुविधा बढ़ा देती है। प्रसंगवश मुझे इटली के मूर्तिकार की एक कृति याद आती है। 16वीं सदी के माइकल एंजेलो ने पुरुष सौंदर्य की प्रतीक एक कृति बनाई जिसे ‘डेविड’ कहा गया। ठीक उसी तरह जैसे स्त्री सौंदर्य का प्रतीक ‘वीनस’ को माना जाता है। माइकल एंजेलो से किसी ने पूछा, इतनी सुन्दर, परिपक्व और प्रौढ़ कृति कैसे बनी? एंजेलो ने बड़ी सादगी से जवाब दिया, मैंने एक चट्टान का टुकड़ा लिया और उसमें से वो हिस्से निकालता गया जो ‘डेविड’ नहीं थे। एक चट्टान को तराशते चले जाना ही डेविड को जन्म देता है।

अब मान लीजिए ‘डेविड’ एक कहानी है, तो आपको इसमें से वो हिस्से निकालने होंगे, जो कहानी नहीं है। तो क्या है जो कहानी नहीं है या जिसे कहानी नहीं माना जाना चाहिए? घटनाएँ, समाचार, निजी दुःख सुख, तत्काल हुआ कोई भी अपमान, अनावश्यक डिटेलिंग, डायवर्जन, ये सब कहानी नहीं है। कहानी लिखते समय कहानीकार को इन सबसे बचना चाहिए, इन्हीं ‘डिलीट’ करते हुए कहानी लिखनी चाहिए। तभी कहानी का सौंदर्य बचा रह सकेगा। कहानी के विषय में और भी बहुत सारी धारणाएँ-अवधारणाएँ हैं। मसलन कहा जाता है कि जिस पुल का नक्शा बन चुका है, उस पर कहानी नहीं लिखी जा सकती। कई बार कहानी लेखों की तरह हो जाती है। कहानी में ‘कहानी’ तो होनी ही चाहिए। इस्राइल के कथाकार एमोस ओज़ का कहना था, जिन विषयों पर लेख लिखने चाहिए, उनपर कहानी लिखने से बचना चाहिए। आमतौर पर देखा गया है कि हिन्दी का कथाकार यथार्थ के पीछे दौड़ता रहता है, और अपनी हर रचना में यह दावा करता है कि उसने यथार्थ को पकड़ लिया है। वह शायद यह नहीं जानता कि यथार्थ कोई ठोस चीज़ नहीं, जिसे छुआ या पकड़ा जा सके। वह निरंतर गतिशील है। एक काल्पनिक स्थिति है, जिसके पीछे सिर्फ भागा जा सकता है। वरिष्ठ कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यथार्थ कुछ नहीं होता, जो कुछ है वह कल्पना ही है। यह भी ज़रूरी है कि कहानी के विषय में संदेह, संशय और अनिश्चितता कहानी को बड़ा कैनवस देती है। आप किसी लड़की से मिलते हैं, या नहीं मिलते, उससे प्रेम करते हैं या नहीं करते, वह आपसे प्रेम करती है या नहीं करती, वह लड़की ‘एग्जिस्ट’ भी करती है या नहीं, यही ‘इफ़्स’ और ‘बट्स’ कहानी को गहराई और बड़ा कैनवस देते हैं। कहानी को खुला छोड़ देना कहानी को बड़े फ़लक की ओर ले जाना है।

दुष्यन्त का संग्रह ‘किस्से काफ़ियाना’ पढ़ते हुए यह बात साफ़ दिखाई दी कि उनके पास कहानी लिखने का शऊर है। अनावश्यक डिटेलिंग से वह कहानी के सौंदर्य को नष्ट नहीं करते बल्कि उनका फोकस कहानी पर ही रहता है। इन कहानियों में डायवर्जन भी नहीं है। कभी-कभी यह भी लगता है कि वह कहानी की तलाश में कहानियां लिखते हैं, जो बेहद सुखद स्थिति है। यह संग्रह दो खंडों में है। पहले खंड की कहानियों की धुरी प्रेम, विवाह, सेक्स, ब्रेक अप, फिर प्रेम, फिर विवाह, प्रेग्नेंसी, अबार्शन, अकेलापन, प्रेम के अधूरापन के इर्द गिर्द घूमती है। लेकिन दुष्यंत की कहानियों केवल यही भर नहीं है। बेरोजगारी, जीवन, नौकरी पर आने वाले संकट, आर्थिक मंदी, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, ग्लोबल कारपोरेट पूंजी, जातीयता, साम्प्रदायिकता और यौनिक संघर्ष भी इन कहानियों में दिखाई पड़ता है। इन कहानियों की सबसे अच्छी बात यह है कि एक तरफ़ दुष्यन्त कहानी के परंपरागत शिल्प को तोड़ते दिखाई देते हैं(लगता है वह शिल्प के मोहताज़ नहीं हैं), वहीं वह साहस के साथ उन क्षेत्रों में भी सहजता के साथ प्रवेश करते हैं, जहाँ जाने के बारे में बात करना भी गुनाह-सा लगता है। दुष्यन्त के पास अनुभव की पूंजी है और बेपनाह किस्से हैं। यही वजह है कि वह अपने जीवन, अनुभव, अध्ययन, दर्शन से कहानियाँ उठाते हैं या ‘वीव’  करते हैं, लेकिन इसके बावज़ूद कहानी उनकी पहली प्राथमिकता है। कहानी का सिरा उनके हाथ से नहीं छूटता। वह उसी बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं, जो आज का युवा बोल रहा है-चाहे अंग्रेज़ी हो, हिन्दी या हिंग्लिश। इससे पठनीयता में कोई ‘स्पीड ब्रेकर’ नहीं आता। और दिलचस्प बात है कि वे भाषा में भी कहीं कलात्मकता या कृत्रिमता का प्रयोग नहीं करते। दर्शन भी उनकी कहानियों में आरोपित नहीं है। कहीं-कहीं तो लगता है दुष्यन्त की ये कहानियाँ प्रेम की छवियाँ हैं। आज के आधुनिक समय में प्रेम करते युवाओं की तस्वीर बहुत-सी कहानियों में देखी जा सकता है। किसी रोड साइड रेस्त्रां में बैठे नंदिता और राहुल एक दूसरे के होंठों को चूम सकते हैं (ताला चाबी), लड़की ब्वायफ्रेंड को बुलाती है और कहती है कि वह प्रेग्नेंट है, लेकिन बच्चा नहीं चाहती और अबार्शन के लिए डॉक्टर से समय ले लेती है(उलटी वाकी धार), ब्रेक अप के बाद का अकेलापन (डायरीः जुलाई की एक रात), प्रेम में बेरोजगार होना और उसके बाद प्रेमिका का सकारात्मक व्यवहार (प्रेम की उप कथा), ब्रेक अप के बाद पैच अप की कोशिश (यार, तुम भी बस!) ऐसी ही कहानियाँ हैं। दरअसल दुष्यन्त इन कहानियों में प्रेम की खोज करते दिखाई देते हैं। रिश्ते बनाना और उनका टूट जाना आज के समय में एक सहज बात है। युवा इस बात को समझता है। अबार्शन आज लड़कियों के लिए भी ऐसा निर्णय नहीं है, जिसे लेने के लिए उसे बहुत सोचना पड़े। करियर युवाओं के लिए पहली प्राथमिकता है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि किसी रिश्ते के ख़त्म हो जाने पर युवा अकेलापन या उदासी अनुभव नहीं करता, करता है। ‘शाम, नॉस्टेल्जिया और मोनालिसा की हंसी’ ऐसी ही कहानी है। इन कहानियों की नायिका बेहद मजबूत, आत्मनिर्भर और अपने फ़ैसलों में किसी का भी हस्तक्षेप ना चाहने वाली स्त्री है। जो बड़ी सहजता से प्रेमी से कह सकता है, हां, मैं शादी नहीं करना चाहती, लड़का कहता है, दैन वाय डिड यू स्लीप विद मी? अंत में लड़की फिर कहती है, आज आओगे, वी विल मेक लव फॉर वन लास्ट टाइम (बीच सड़क पर)। यानी कहीं भी कोई संकोच या वर्जना नहीं है। प्रेम का देहगीत, मादा गंध, लाइफ इज़ ग्रेः कुछ अधूरी प्रेम कहानियाँ, भी इसी मिजाज़ की कहानियाँ हैं।

संग्रह की पहली ही कहानी है ‘सन्दूक’। इसमें दादी रामकौरी एक चाबी को अपने छींट के घाघरे के नाड़े से बांधकर रखती है। चाबी को लेकर घर में रहस्य बना रहता है। यह रहस्य दादी की मृत्यु के बाद खुलता है, जब दादा को संदूक में से एक ख़त मिलता है। ख़त में लिखा थाः

मेरी हमनफ़स रामकौरी, 

पूरा परिवार पाकिस्तान जा रहा है। मुझे भी जाना ही पड़ेगा। इंशाल्लाह! ज़िंदगी रही और कभी लौटना हुआ तो ज़रूर आकर मिलूंगा। तुम शादी कर लेना।

तुम्हारा रसूल

पता नहीं विभाजन ने कितनी प्रेम कहानियों को अधूरा कर दिया। लेखक बराबर इन कहानियों को अपने लेखन में जीवित कर रहे हैं। यहां तक कि गुजराती लेखकों ने भी इस तरह की प्रेम कहानियाँ लिखी हैं।

पहले ही खंड में एक प्यारी-सी कहानी है ‘मुस्कुराती हुई लड़की।’ कहानी एक पार्क से शुरू होती है, जहाँ एक प्रौढ़ को रोज़ सुबह मार्निंग वॉक पर मुस्कराती हुई लड़की मिलती है। वह नियमित रूप से ‘नमस्ते अंकल’ कहती है। दोनों के बीच एक भावनात्मक-सा रिश्ता बन जाता है। लेकिन एक दिन वह लड़की वॉक पर नहीं आती। कई दिन बीत जाते हैं लेकिन लड़की नहीं आती। लड़की के विषय में बहुत-सी कहानियाँ पार्क के लोगों से पता चलती हैं। बस इतनी ही कहानी है। कहानी का अंतिम वाक्या हैः मुझे भी उस मुस्कुराहट की ज़रूरत है…मेरी सुबह को ख़ूबसूरत और सुहानी बनाने वाली मुस्कराहट की…गॉड ब्लेस हर! यह कहानी लगातार कम होते जा रहे संवाद को बनाए रखने का इशारा करती है, उस व्यक्ति से भी जिसे आप जानते नहीं या जो आपसे उम्र में बहुत छोटा है।

दुष्यन्त अपनी कहानियों के शीर्षक को लेकर प्रयोग करने से भी गुरेज़ नहीं करते। पहले खंड की एक कहानी का शीर्षक है ‘सामने वाली टेबल पर उर्फ़ एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’। नायक को कॉफी हाउस में एक टेबल पर हमेशा एक लड़की दिखाई देती है, जिसे वह अपनी प्रेमिका समझने लगता है-पूर्व जन्म की प्रेमिका। एक दिन सचमुच उस टेबल पर लड़की आ जाती है। पता चलता है कि आने वाली लड़की अब लन्दन में रहती है। पन्द्रह साल पहले अपने पति के साथ यहां आया करती थी। वे दोनों यहां काफी समय साथ गुजारा करते थे। अब पति रहे नहीं। वह अब भी हर साल यहां आती है। उसके साथ प्रेम को पुनर्जीवित करने या जीने। यह एक शानदार कहानी है, जो कहानी को बड़े फलक पर ले जाती है, जो कहती है कि प्रेम वहां तक नहीं होता जहां तक नायक-नायिका आपको दिखाई दे रहे हैं। वह उससे भी आगे जाता है।

‘छुट्टन मियां फूल वाले’ एक ऐसे फूल बेचने वाले की कहानी है जिसकी बेटी के साथ दंगों के समय बलात्कार हो जाता है। छुट्टन मियां की दिमागी हालत खराब हो जाती है। कहानी के कुछ संवाद-फिर भी,उस वक्त तो वे हिंदू थे और आप मुसलमान। ‘एक दिन में पहचान तो नहीं बदल जाती, रिश्ते तो खत्म नहीं हो जाते’ दंगों के साइके को पोर्ट्रे करते दिखाई देते हैं।

मुझे उम्मीद थी कि खंड दो की कहानियाँ कुछ अलग होंगी। और ऐसा ही है भी। ‘कबूतर’ वर्तमान माहौल पर एक शानदार कहानी है। दुष्यन्त राजनीतिक माहौल पर एक तीखा कटाक्ष करते हैं। वह सन 2040 के समय में दर्शकों को ले जाते हैं। पार्लियामेंट ने एक बिल पास किया है कि अब इस मुल्क में ज़ुबानों को मजहबों और जमातों के साथ जोड़ दिया गया है (आप वर्तमान राजनीति समय को देख सकते हैं)। हिन्दी केवल हिंदू बोल सकते हैं, संस्कृत केवल हिंदू ब्राह्मण, उर्दू केवल मुसलमान, पंजाबी केवल सिख। इस मुद्दे पर बहस होती है और पाया जाता है कि यह वाहियात कानून है। इस  राष्ट्र की भाषाई संस्कृति कभी धर्मों के आधार पर विभाजन की नहीं रही है। सारी बहस मुहाबिसे के बाद जज फैसला सुनाता हैः मैं इस मुकदमे में देश की पार्लियामेंट पर एक रुपए का जुर्माना करता हूं। उन्हें सलाह देता हूं कि ऐसे वाहियात कानून बनाकर मुल्क की अदालतों का वक्त जाया न करें। अगले दिन अख़बार में चार कॉलम की ख़बर की सुर्खी थीः अदालत में पंखे से कटकर कबूतर की मौत। कबूतर एक रूपक है। यह इस संग्रह की सबसे सशक्त, ज़रूरी और सामयिक-राजनीतिक कहानी है। इस खंड की एक अन्य कहानी ‘दो चांद और तीन कहानियां’ में दुष्यन्त अलग-अलग धर्मों के प्रेमी-प्रेमिका दिखाते हैं। लेकिन यह प्रेम कहानी नहीं है। प्रेम पत्रों के ज़रिए और छोटी-छोटी मुलाकातों के ज़रिए कहानी अंत तक पहुँचती है और यह अहसास होता है कि दोनों ही धर्म के लोगों का जीवन और नियति एक-सी है। ‘तीसरे कमरे की छत और पाँचवां कमरा’ लोककथा पर आधारित दिलचस्प और बढ़िया कहानी है तो ‘गंडासा’ में दुष्यन्त स्त्री की बदल जाने की प्रवृत्तियों को चित्रित करते हैं। ‘ऊँचा नीचा महल पिया का अधूरे-सच्चे अफसाने’ में वह एक बार फिर प्रेम की ओर लौटते हैं, जहाँ नायक और नायिक दोनों ही अपने पुराने प्रेम का ज़िक्र कर रहे हैं। दुष्यन्त के इस संग्रह को पढ़कर लगता है कि उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है। प्रेम, आपसी रिश्ते उनकी कहानियों की धुरी है लेकिन वह राजनीतिक, सामाजिक और वैश्विक दृष्ट से संपन्न व्यक्ति हैं और इन विषयों पर भी बाकायदा उनकी नज़र रहती है। इस संग्रह को पढ़ना एक अलग दृष्टि से  दुनिया को देखना भी है।

किताबः किस्से काफ़ियाना, लेखकः दुष्यन्त, प्रकाशकः पेंगुइन स्वदेश, मूल्यः 299, पृष्ठः 206

 

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