लम्बे बालों वाली लड़की

मधुसूदन आनन्द

लड़की दुबली पतली थी। लम्बे घने बाल सचमुच उसके नितम्ब छूते थे। बाल काले थे मगर रेशमी बिल्कुल नहीं। पीठ पर वे एक श्यामल प्रपात की तरह गिरते थे। वह गर्दन के कुछ नीचे से चोटी गूँथती थी। मोटी-सी चोटी बेहद आकर्षक और कलात्मक लगती थी। नीचे अन्तिम छोर पर बालों का एक खुला गुच्छा भला लगता था। उसने कभी अपने सिर या चोटी में फूल नहीं लगाए। रोज रात को सोने से पहले वह बालों में देर तक कंघी करती थी। अपने शरीर में वह सबसे ज़्यादा बालों की संभाल करती थी। बाल ही उसे आकर्षक बनाते और एक मृदु सौंदर्य प्रदान करते थे। बालों के बाद उसका चेहरा ध्यान खींचता था। मोटे लैंसों के पीछे गहरी निष्काम आँखें गरिमा प्रदान करती थीं। चेहरे पर मासूमियत विराजती थी, जिसे पतली गर्दन प्रदर्शित और प्रतिष्ठित करती थी।

उन दिनों जब कभी वह साड़ी पहनती, उसकी शोभा और अधिक बढ़ जाती। वह बिल्कुल अपनी-सी लगने लगती। आत्मीय। मन करता उसे देखता रहूँ। उससे बात करूँ। उसका नाम पूछूँ। लेकिन कभी साहस नहीं जुटा पाया। वह एक कौंध की तरह आती और आत्मा में उतर जाती। एक उदास आलोक छा जाता। वह कई-कई दिन तक दिखाई नहीं देती। लेकिन अन्दर हल्का-सा उजाला रहता। वह उजाला तमाम दिनचर्या में टिमटिमाता रहता।

वह सोचने वाली लड़की नहीं थी। मगर मुझे गलतफहमी थी कि वह सोचने वाली लड़की होगी। अपने बारे में भी मुझे ऐसी ही गलतफहमी थी। मेरे दोस्त मेरी तथाकथित बौद्धिक बातों पर हँसते थे। मैं सोचता ये लोग मेरी बौद्धिकता से जलते हैं।

मैंने जगमोहन से कहाµ‘‘यार एक लड़की है। वह एक कौंध की तरह आती है और मेरी आत्मा में उतर जाती है।’’

‘‘तो तेरी आत्मा तो झुलस जाती होगी…’’µजगमोहन बोला। 

‘‘वाह! सीधे शरीर के बजाय तेरी आत्मा में करंट दौड़ता है। आत्मा न हुई सुपर कंडक्टर हो गया।’’धीरेन्द्र ने कहा। 

‘‘तुम दोनों पूरे चुगद हो। कभी किसी लड़की को अपने भीतर महसूस किया है?’’µ मैंने गुस्से में कहा। 

‘‘यार, तेरी ये चूतियापन्ती की बातें हमारी समझ में नहीं आतीं। सीधे-सीधे बता क्या तुझे किसी लड़की से प्यार हो गया है?’’µधीरेन्द्र उतावला हो रहा था। 

‘‘नहीं जानता। कुछ हुआ है। मेरे भीतर बारिश होती रहती है…’’µमैंने कहा।

‘‘बड़ी रोमेंटिक बातें कर रहा है गोपाल! अच्छा ये बता कि तेरे पास छाता भी है या नहीं?’’µजगमोहन का मनोरंजन होने लगा था। 

‘‘छाता?’’मैंने कहा। 

‘‘हाँ, वह जो तेरे अन्दर खड़ी भीग रही है, उसे नहीं बचाएगा। अभी आई भी नहीं कि तेरे अन्दर भीगने लगी। ससुर, जुकाम हो गया तो फिर लिए-लिए भागेगा। झटपट उठ और छाता तान दे।’’µजगमोहन अब खिल-खिलाकर हँस रहा था। 

‘‘अबे चूतिए, उसे अपनी बरसाती में खींच ले और भीग…’’µधीरेन्द्र ने बनावटी गम्भीरता से कहा।

‘‘मुझे माफ़ करो मेरे प्यारे पिताओं! मेरी तौबा! मेरे बाप की तौबा! तुमसे कुछ शेयर करना बेकार है। तुम्हारे भीतर तो चमगादड़ लटके हुए हैं अन्धेरे में उल्टे।’’µमैंने कान पकड़ते हुए कहा। 

‘‘वाह प्यारे, क्या कहने! तेरे भीतर बारिश। बारिश में लड़की और हमारे भीतर चमगादड़। अन्धेरे में उल्टे। कुर्बान जाऊँ तेरी कल्पनाशीलता पर।’’µधीरेन्द्र अब झिड़क-सा रहा था।

मैं कुढ़ कर रह गया। अन्दर का आलोक जाता रहा। उसके साथ वह छवि भी। पतली-दुबली लम्बे बालों वाली सांवली लड़की, जिसका चेहरा कभी आधा, कभी पूरा जल-बुझ रहा था! मैंने सोचा मेरे भीतर जो घटा है, उसे किसी से शेयर नहीं किया जा सकता। उस अनुभव को बताया नहीं जा सकता, हालाँकि उसमें न तो कोई बड़ी दिव्यता है और न कोई बड़ी रहस्यात्मकता। ज़रूर ऐसा होता होगा कि कोई देखते ही आपको भा जाए। अच्छा लगने लगे। वह अपने आप आपके भीतर उग आए। खिलने लगे और महकने लगे। आप उस जादुई गंध के सम्मोहन में विवश हो जाएँ। आपको समझ में न आए कि यह मुझे क्या हुआ है।

मैं सच कह रहा हूँ कि यह एक सच्चा अनुभव है। मेरा आकर्षण सच्चा है। वह सादा सौंदर्य सच्चा है। वह शोभा सच्ची है। निष्कलुष। निष्काम। पर यह जो मेरे तन को, मेरे सीने को, फाड़कर अंकुरित हो रहा है, हो सकता है वह किसी आदिम आवेग का वंशज हो। मैं जानता हूँ कि इस तरह जो अचानक उग रहा है, वह निष्काम नहीं है। मेरे भीतर कहीं किसी कोने में वह नैसर्गिक कलुष भी है, जिसे एक सच्चा प्रेम सचमुच धो डालता है। मैं आपको कैसे बताऊँ कि उस लड़की को देखकर मुझे क्या हो गया है। मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता। वह बखान लगने लगेगा। कौन मानेगा कि 21 वीं शताब्दी में भी ऐसा होता है। कौन मानेगा यह जो हुआ, वह क्षणिक नहीं है। वह शाश्वत है और समय के पार जाने की ऊर्जा में कसमसाता रहेगा।

होता है! होता है! प्यारे गोपाल लाल 21 वीं शताब्दी में भी ऐसा होता है। अतीत में भी ऐसा होता आया है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।

उसका नाम दीप्ति था। दीप्ति विश्वास। हौज ख़ास में एक दो कमरों के मकान में वह रहती थी। उसने गार्गी कॉलेज से बी. ए. ऑनर्स किया था और अब वह भारतीय विद्या भवन से एक साल का कोई डिप्लोमा कोर्स कर रही थी। वह हौज ख़ास से बस से कस्तूरबा गाँधी मार्ग जाती और बस से ही लौटती।

सितम्बर का महीना था। दिल्ली की सड़ी हुई गर्मियाँ बीच में हुई छिटपुट बारिश के बावजूद अपना रंग दिखा रही थीं। शाम के पाँच बजे थे और मैं बस का इंतजार कर रहा था। मुझे कुछ ज़रूरी पत्रिकाएँ लेने कनॉट प्लेस जाना था। मेरे सामने से दो बसें गुजर गई! ठसाठस भरी हुई! मेरा मन नहीं हुआ कि भीड़ में अपना कचूमर निकलवाऊँ। मैं अगली बस का इंतजार करने लगा। बस स्टॉप पर चार-पाँच लोग और भी थे। तभी मैंने बस स्टॉप की तरफ़ उसे आते हुए देखा। उसने चूड़ीदार पाजामा और पीले रंग का एक सुन्दर-सा कुर्ता पहना हुआ था। आज भी याद है कि कैसे वह छाता ओढ़े चली आ रही थी। वह मेरे बिल्कुल पास में आकर खड़ी हो गई। तभी उसके बालों पर मेरी नज़र पड़ी। मैंने कनखियों से उसे देखा। वह बस की ओर देख रही थी। मैं उससे ज़रा दूर जाकर बस को देखने का उपक्रम करते हुए उसे देखने लगा। वह मुझे बेहद आकर्षक और भली लगी। मुझे लगा कि मैं ऐसे ही उसे देखता रहूँ। वह बस के लिए अधीर थी और मैं कामना कर रहा था कि बस कभी आए ही नहीं। पर ऐसा कहाँ होता है? मेरी सारी कामनाओं को मुँह चिढ़ाती बस सामने खड़ी थी। वह हड़बड़ी में बस पर चढ़ रही थी। तब मुझे झटका लगा…अरे बेवकूफ यहाँ क्यों खड़ा है। दौड़कर लटक जा। बस चलने लगी थी और मैं किसी तरह उसमें चढ़ गया था। उसने भारतीय विद्या भवन तक का टिकिट लिया। मैं उसे लगातार देख रहा था। पीछे से उसकी शोभा और भी अच्छी लग रही थी। उसके एक हाथ में फोल्डिंग छाता था और एक कन्धे पर जूट का बैग लटक रहा था। उसे बैठने की सीट नहीं मिली थी। उसने छाते वाले हाथ से ही एक सीट की रॉड को पकड़ा हुआ था, जबकि दूसरे हाथ से कभी वह अपनी चुन्नी ठीक करती तो कभी गोल्डन फ्रेम और मोटे-मोटे शीशों वाली अपनी ऐनक। दो-एक स्टॉप के बाद उसे बैठने की जगह मिल गई तो मैं उसे और भी गहरे आकर्षण से निहारने लगा। मुझे लगा की मेरे अन्दर कोई चीज़ गड़ गई है। मुझे मीठा-मीठा दर्द हो रहा है लेकिन मेरा मन कर रहा है कि यही स्थिति बनी रहे। यह हल्की मिठास बनी रहे।

अचानक मैंने देखा वह उतरने की तैयारी कर रही है। कोई और मौक़ा होता तो मैं लपककर बैठ जाता लेकिन मैं क्या देखता हूँ कि मेरी बजाय मेरा दिल बैठा जा रहा है। मैंने कहाµअरे ओ मेरे दिल! तू जो अभी तक उस ‘वस्तु’ पर मक्खी की तरह भिनक रहा था, जो एक भी शब्द बोले बिना; एक भी क्षण तुझे देखे बिना और इस भरी हुई बस में तेरे लिए अपने एक भी स्पर्श का मौक़ा दिए बिना निर्मल व्यक्तित्व में रूपान्तरित हो गई है, क्या ऐसे ही फट से बैठ जाएगा या तुझे भागकर उसे बस से उतरते और वहाँ से आगे बढ़ते देखना चाहिए। 

मैंने कहाµअरे ओ मेरे हमदर्द दिल! दुख का परित्याग कर और आँख फाड़कर देख कि यह लड़की जा कहाँ रही है। बस उसी क्षण अँधे विवेक की आँख खुल गई, जिसने मेरे मजनूंकरण को रोक दिया।

पर मेरे प्यारे पाठको! कहा है न मुद्दई लाख चाहे तो क्या होता है, होता वही है जो मंजूरे खुदा होता है। 

अगले रोज शाम पाँच से पहले ये मुए पैर हमें जबरदस्ती उसी बस स्टॉप तक खींचकर ले गए और हम क्या देखते हैं कि निर्मल कोमल व्यक्तित्व से 24 घण्टे के भीतर ही वह फिर ‘वस्तु’ में तब्दील होकर बढ़ी चली आ रही है। 

या अल्लाह मैं मर जाऊँगा! हे ईश्वर!! मुझे सन्मति दे। मेरी आँखें सौ साल तक इस अपूर्व ‘वस्तु’ को देखती रहें। मैं इसे तब तक देखता रहूँ जब तक यह मेरे भीतर घुल न जाए। हे ईश्वर! मेरी आँखों में यह छवि बस जाए। मेरे कानों में उसके शब्द सुनाई देने लगें। लेकिन मैंने तो अभी तक इसका एक भी शब्द नहीं सुना है।

तो प्यारे पाठको! आपको मन की बात बताऊँ। आप भैया जी हँसना नहीं। आप हँसे तो इस मन को ठेस लगेगी और यह पथराकर ठस हो जाएगा। बात यह है कि दूसरे रोज यह मन फूला-फूला फिरने लगा। वह जो मेरे भीतर एक छ्दम बौद्धिक है, आज गम्भीरता छोड़कर मुस्कराने लगा। बोलाµ‘‘मन फूला-फूला फिरे जगत में कैसा नाता रे। ये जो दूसरे रोज ही तुझे अपनी-सी लगने लगी है, तेरी है कौन? तेरा इस कन्या से क्या नाता है? दिल्ली जैसे शहर में कौन जाने यह कन्या विवाहिता है या अविवाहिता। किसी की प्रियतमा है या इसकी सलेट बिल्कुल साफ़ है। कहीं तेरी तरह इसका कोई एकतरफ़ा प्रेमी, चाहने वाला तो नहीं है? इसके माता-पिता बन्धु-सखा कौन हैं? यह दुबली-पतली लेकिन कमनीय बाला किस कुल, गोत्रा, वर्ग और समाज से आती है?

पर फूल कर कुप्पा हुआ यह मजबूर और तब तक मजलूम मन बोलाµअबे ओ छद्म बौद्धिक! चुप रह। अपनी टांग और अन्य अंगों को मत अड़ा। इस पृष्ठभूमि में अन्दर से फूला और बाहर से लूला मैं अपने दो बदमाश दोस्तों की शरण में फिर से जाने को बाध्य हुआ।

जगमोहन बोलाµ‘‘हे गोपाल! तू किसी कन्या के लिए शोक या चिन्ता मत कर। यह जो तुझ में कुछ फुदक रहा है प्रेम नहीं, काम है। तू एक काम कर। किसी भी छेद में मूतकर निवृत्त हो जा। प्रेम जैसी कोई चीज़़ नहीं होती। प्रेम काम का ही संस्करण है। काम से ही ये सारी सृष्टि है। छब्बीस बरस की आयु में भी तुझे स्त्रा के भूगोल की जानकारी नहीं है। बस देखकर यूँ ही फूला-फूला घूम रहा है।’’ 

मुझे लगा मेरे कानों में किसी ने गर्म-गर्म शीशा उंडेल दिया हो और वह कह रहा होµ‘‘गोपाल ये अनर्गल और वर्जित बातें तेरे लिए नहीं हैं। तू अपने मन की सुन।’’

मन ने दृढ़ता से कहा तुझे इस कन्या के करीब जाना है। तेरे अन्दर जो वाष्प उठ रही है, यही बादल बनकर बरसेगी।

तो पाठको! मन की बात मानकर मैं भरपूर उत्साह और पूरे होशोहवास में कन्या के करीब जाने की कोशिश करने लगा। लेकिन इस कोशिश में कन्या दूर भागने लगी। एक दिन बानक कुछ ऐसा बना कि कनॉट प्लेस से लौटते हुए मुझे बस में उसके पास की सीट मिल गई। मैं शीशे के बाहर देखने का नाटक करते हुए उसे कनखियों से देखने लगा। उसने मुझे पकड़ लिया पर वह भी पत्रिका पढ़ने का ढोंग करते हुए रह-रहकर मुझे कनखियों से देखने लगी। दोनों को पता चल गया कि खेल दोनों तरफ़ से खेला जा रहा है। जैसे बीच में टेबिल टेनिस की एक मेज धरी हो, उस पर नैट लगा हो। एक बार उधर-से सर्विस बहुत संभली हुई और इधर बॉल का पता नहीं। आँखें क्षणांश में शीशे के बाहर रोज-रोज देखे हुए पेड़ों की तरफ़ ठहर जातीं! यह दृश्य मुझे हमेशा सुन्दर लगा है लेकिन सर्विस न उठा पाने के उस क्षण ऐसे लगता जैसे आँख में कोई तिनका गिरा हो। मैं सचमुच आँख मलने लगता और फिर सामान्य-सा दिखते हुए कनखियों का खेल खेलने लगता। कई बार कृत्रिम बौद्धिकता बीच में आ टपकती। स्त्रा के सौन्दर्य और बाहर पेड़ के सौन्दर्य में कौन बड़ा और आकर्षक है? दिल कहता स्त्रा। बुद्धि कहती पेड़। एक सूखा पेड़ भी पतझड़ में सुन्दर दिखता है जबकि उम्र बढ़ने के साथ स्त्रा की सुन्दरता झरने लगती है।

मैंने जगमोहन से कहाµ‘‘यार यह बता कि स्त्रा के सौन्दर्य और पेड़ के सौन्दर्य में कौन अधिक श्रेष्ठ है?’’

वह हस्बेमामूल हँसने लगा। उसने तत्काल ही पास में खड़े धीरेन्द्र से कहाµ‘‘लड़की ज़्यादा सुन्दर या पेड़!’’

‘‘अबे, क्या बकवास कर रहा है। साफ़-साफ़ बता माज़रा क्या है?’’µधीरेन्द्र झुंझलाया। 

‘‘अपने गोपाल को फिर बौद्धिक दौरा पड़ा है।’’µजगमोहन ने बताया। दोनों हँसने लगे। लड़की। पेड़। पेड़। लड़की। पेड़-पेड़। लड़की-लड़की। पेड़ की लकड़ी। लकड़ी-सी लड़की। हा हो हा।

‘‘हँसो मत यारो, यह प्रश्न मुझे परेशान कर रहा है। मैं सचमुच कुछ सोच नहीं पा रहा हूँ,’’µमैंने कहा मुझ पर तरस खाओ। 

‘‘तू पूरी कहानी सुना। सच्ची-सच्ची। कुछ भी मत छिपाना…’’µधीरेन्द्र ने कहा। 

‘‘ताकि तुम्हें हँसने का मसाला मिल जाए और तुम दिन-रात मुझ पर हँसते रहो…’’µमैंने खीझकर कहा।

‘‘यार तू इतना क्यों सोचता है। खा पी मौजकर। इन बेकार की बातों में क्या रखा है।’’µजगमोहन ने कहा। 

‘‘तू किसी अच्छी-सी लड़की से शादी कर ले, जगमोहन की तरह…’’µधीरेन्द्र बोला।

‘‘हाँ यार तुझे जो हलवाई की लड़की वाला रिश्ता आया था, उसे तेरे पापा ने तो अभी तक अन्तिम तौर पर ना नहीं की है। उससे ही शादी कर ले। दिल्ली की बस वाली लड़की से तो नाम तक पूछने की तेरी हिम्मत नहीं हुई और ना ही कभी होगी। मिठाई का तू शौक़ीन है। मिठाई ससुराल से ख़ूब आती रहेगी। मुरादाबाद दिल्ली से है ही कितनी दूर। इस बार लड़की देख आ। झट देख और फट शादी कर ले। फिर नून तेल लकड़ी के चक्कर में बेकार का सोचना बंद हो जाएगा।’’µजगमोहन ने कहा। 

‘‘तुम अजीब लोग हो। मैं कुछ पूछ रहा हूँ, तुम कुछ और कह रहे हो और हँस रहे हो मुझ पर। मेरा मज़ाक़ बना रहे हो। दोस्त हो या दुश्मन…’’µमैंने कहा और गुस्सा होकर घर चला आया। वे आवाज़ देते रहे। बुलाते और हँसते रहे। मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

मैं धीरे-धीरे आत्मकेन्द्रित होता गया। अख़बारों और किताबों में मुझे रस आने लगा। कोई प्रश्न खड़ा होता, तो उसका कोई सन्तोषजनक उत्तर भी मिल जाता। बेकार के बौद्धिक प्रदर्शन से मैं यथासम्भव बचने लगा। जीवन घिसटने के स्थान पर चलने लगा। कोई चार-छह महीने बाद मेरी मुम्बई बदली हो गई। वहाँ शुरू में समन्दर को देखने में अद्भुत आनन्द आने लगा। आकाश की तरह समुद्र भी हर पल नया लगता है। कभी शान्त। कभी वाचाल। नाव में बैठकर समुद्र में अन्दर आओ तो अलग-अलग रंग। अलग-अलग छटाएँ। तट से टकराती लहरें। अनन्त सागर। अनन्त लहरें। अनन्त हलचल। ज्वार-भाटे। उत्सुकता। जिज्ञासा। सौन्दर्य और आनन्द। बेचारे मुम्बई की लोकल ट्रेन वालों के पास समुद्र देखने का नियमित समय नहीं। उदास, थके हुए, हारे हुए, अकेले और असहाय चेहरे! जैसे जीवन को बस किसी तरह ढो रहे हों। घर और नौकरी के बीच कुरू-कुरू स्वाहा होते। हम भी ऐसे ही लोगों में थे। तब छड़े थे तो समुद्र देखने का समय मिल जाता था। रात को वी टी (छत्रापति शिवाजी रेलवे स्टेशन) या चर्चगेट से अंधेरी की लोकल ट्रेन या बस लेते। फिर एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर एसिक नगर के अपने कमरे में पहुँचते। थोड़ा बहुत पढ़ते। ज़्यादा सोते। सुबह गिरते-पड़ते वी. टी. स्टेशन के पास अपने दफ़्तर पहुँचते। हालाँकि दिल्ली वाली लड़की से मिलने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं थी, फिर भी कभी-कभी उसकी याद आती थी। वही लम्बी चोटी वाली पीली साड़ी पहने एक कंधे पर जूट का बैग लटकाए दिखाई देती थी।

दिल्ली में उसके एकतरफ़ा प्रेम में मैंने रात-रात भर जागकर उसके प्रेम के लिए प्राथनाएँ की थी। दब्बू इतना था कि नाम तक नहीं पूछ सका। मुम्बई रवाना होने से पूर्व मैंने सोचा अब जा ही रहा हूँ तो एक बार को पुराने दोनों दोस्तों से भी मिलता चलूँ। वे मिले तो उन्होंने उस लड़की के बारे में फिर से चर्चा छेड़ी। मैंने गम्भीरता पूर्वक सब कुछ सच-सच बता दिया। उस दिन उन्होंने काफ़ी डिटेल्स में बात की। मैंने उन्हें बताया कि वह कनॉट प्लेस से चढ़कर भारतीय विद्या भवन वाले स्टॉप पर उतरती थी और जब पहली बार दिखी थी हौज ख़ास वाले स्टॉप पर तब भी सम्भवतः भारतीय विद्या भवन वाले स्टॉप पर उतरी थी। लम्बे बालों वाली चोटी। नितम्बों पर गिरते हुए बाल। मोटे लैंसों वाला सुनहरी फ्रेम का चश्मा। जूट का बैग कंधे पर लटकता हुआ। …उसका उस बस स्टॉप यानि भारतीय विद्या भवन से निश्चय ही कोई सम्बन्ध होना चाहिए। ख़ैर बात आई गई हो गई और मैं मुम्बई आ गया।

तब तो मैंने ब्राजील के चर्चित लेखक पाओलो कोएलो का नाम तक नहीं सुना था, लेकिन आज लगता है कि उनका यह उद्धरण सौ-टंच सही है। उन्होंने कहा हैµ ‘‘जब आप कुछ सच्चे हृदय से चाहते हैं तो पूरा यूनिवर्स उसे पूरा करने में मदद देने के लिए तैयार हो जाता है।’’ संक्षेप में बताऊँ तो धीरेन्द्र ने जो खुद किसी हिन्दी अख़बार में ट्रेनी था, उसने उसे ढूँढ लिया। वह भारतीय विद्या भवन से अंग्रेजी पत्राकारिता का कोर्स करके उसी अख़बार में उप-सम्पादक के रूप में नियुक्त हुई थी, जहाँ धीरेन्द्र ट्रेनी था। वह धाकड़ तो था ही। कुछ दिन हाय-हैलो करने के बाद उसने मेरे बारे में उसे सब कुछ बता दिया। उसने कह दिया बस यह कहानी ध्यान से सुन लो और अगर तुम्हे ठीक लगे तो गोपाल को इस पते पर दो-चार लाइन लिख दो। तुम्हारी हाँ हो तो ठीक और ना हो तो वह भी ठीक। उसने मुझे भी सब कुछ लिख भेजा। मेरे आँसू निकल आए। लब्बेलुबाब यह कि कोई पन्द्रह रोज बाद अंग्रेजी में लिखा एक पत्रा आ गया।

वह एक प्रगतिशील मध्यवर्गीय बांग्ला परिवार से थी और तीन बहन भाइयों में सबसे छोटी थी। हमारी पत्रा-मित्राता धीरे-धीरे इन्द्रधनुषी होने लगी। सब कुछ आपस में शेयर करते। उसका हस्तलेख बहुत खराब था तो मेरी अंग्रेजी बहुत खराब थी। उसने एक दिन लिख भेजाµ‘‘तुम अंग्रेजी में उतने कम्फर्टेबिल नहीं हो, पत्रा हिन्दी में ही लिखा करो।’’ 

हिन्दी का मेरा हस्तलेख तब सचमुच सुन्दर था। एक दिन उसका पत्रा आया कि उसके घरवाले उसकी शादी के लिए रिश्ता ढूँढ रहे है। में परेशान हो गया। मैंने उसे अपनी पूरी पारिवारिक बैकग्राउंड लिख दी और कहा की यदि तुम चाहो तो मैं शादी कर लूँगा। झटपट अपने परिवार में बात कर पत्रा लिखो, मैं जल्दी से जल्दी दिल्ली पहुँचकर तुमसे तुम्हारे ऑफिस में सम्पर्क कर लूँगा। दिल्ली पहुँचने पर उसने अपने घर खाने पर बुला लिया। मैं तब उसके लिए मुंबई से एक फोल्डिंग छाता ले गया था; जो उसे बहुत अच्छा लगा और शुक्रिया कहते हुए उसने उसकी तारीफ़ की। उसी शाम उसने अपनी माँ से मेरे शादी के प्रस्ताव के बारे में बात कर ली। प्रारम्भिक संकोच और जातिगत पूर्वाग्रहों के बाद परिवार आख़िर मान गया। उसे अपने परिवार को मनाने में जितनी कठिनाई हुई, उससे कहीं ज़्यादा कठिनाई मुझे अपने परिवार को मनाने में हुई। परिवार मानता ही नहीं था। मैं भी अड़ गया। बोला कि एक बार उससे मिल तो लो। उसे देख तो लो। फोटो देखकर सबसे पहले माँ पिघली। फिर बहनें। पिता को डर था कि यह शादी अगर हो गई तो बहनों के हाथ पीले करने में लोहे के चने चबाने पड़ेंगे। बिरादरी में उनकी नाक कट जाएगी। पर मैंने कोई भी आश्वासन नहीं दिया। आख़िरकार पिता भी मान गए।

वह जितनी मुझे बाहर से सुन्दर लगती थी, उसका अन्तस उससे भी ज़्यादा ख़ूबसूरत था। मेरे घरवाले उसके दीवाने हो गए। माँ तो उसे बहू नहीं, बेटी समझती थीं। उसके साथ जीवन के करीब पैंतालीस साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। अपने पुराने कस्बाई संस्कारों के चलते मैं कई बार उस पर चीख पड़ता। वह ऑफिस के साथ घर और बच्चों की जिम्मेदारी भी उठाती रही। मैं कृत्रिम बौद्धिकता में सब कुछ उस पर ही छोड़ता रहा। वह दिन ब दिन परेशान रहने लगी। बच्चों से भी ज़्यादा वह मेरी चिंता में घुलती रही। मैं पुरानी छवि से उसकी आज की छवि की तुलना करता। वह सब समझती लेकिन उसने अन्तस के सौन्दर्य को न केवल बचाकर रखा बल्कि उसे और भी समृद्ध किया। मेरा अन्तस का सौन्दर्य तो था ही नहीं, बाहर का सौन्दर्य भी कोई ख़ास आकर्षक नहीं रह गया था। वह कहतीµ‘‘तुम्हारे बाल इतने घने और काले थे, तुमने उनकी संभाल नहीं की। आलस्य में शरीर का ध्यान नहीं रखा और कई बीमारियाँ पाल लीं। अब भुगत रहे हो और मुझे दुख दे रहे हो।’’ इस वाक्य का उतरार्द्ध बिल्कुल सही है। मेरे कष्टों-तकलीफों ने उसे मुझसे भी ज़्यादा दुख दिए है। 

बीते हुए और आने वाले दुखों के बारे में मैं भरसक नहीं सोचता, लेकिन यदा कदा सबसे पहले देखी गई उसकी छवि कभी-कभी मेरी आँखों के सामने आ ही जाती है। 

मैं कहता हूँµ‘‘दीप्ति तुम्हारे बाल तेजी से गिर रहे हैं। कई बार तो रोटी और दाल में पड़े मिलते हैं। इस तरफ़ ध्यान दो।’’

वह कहती हैµ‘‘मैं आगे से सर पर कपड़ा लपेटकर खाना बनाया करूँगी।’’

मैं चुप हो जाता हूँ। सोचता हूँ अगर सचमुच होते होंगे तो इसके अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश निर्मल और स्वस्थ ही होंगे। यह बूढ़ी हो रही है, मगर कमोबेश स्वस्थ है। दूसरी तरफ़ मेरी बीमारियाँ बताती हैं कि मेरे सभी कोश दूषित और दुर्गुणों से भरपूर है। उसने अपना बौद्धिक ही नहीं, आत्मिक विकास किया है। गुण अर्जित किए हैं। मैंने सोचा उसके बालों के गिरने की तरफ़ इशारा करके मैंने उसका अनजाने ही अपमान किया है। मैं अपराधबोध से घिर गया तो एक आँसू आँखों से ढलक आया। वह मुस्कराने की कोशिश करने लगी और फिर बोलीµ

‘‘इस पृथ्वी पर जो कुछ भी नैसर्गिक है, वह सुन्दर है। सारे पेड़-पौधे; वन-उपवन; नदी, पहाड़, झरने, जीव-जन्तु सभी अपने आप में सुन्दर हैं। इसी पृथ्वी पर एक नहीं; हज़ारों-लाखों जीव प्रजातियों की दुनियाएँ हैं। ये सब भी पल-प्रतिपल बदलती रहती हैं। सभी कभी रूप बदलते हैं, तो कभी नया जन्म लेते हैं। यह तारों भरा आकाश, यह बादल, यह बिजली क्या; हमारा अपना सौर-मंडल भी बदलता रहता है। सूरज की भी एक निश्चित आयु है। यूनिवर्स में बहुत कुछ ऐसा है जो दिखाई नहीं देता। उसका हम सिर्फ़ अनुमान ही लगा सकते हैं। चाहे सब कुछ नश्वर न भी हो, मगर परिवर्तनशील तो है ही। तुम मेरे बालों में ही क्यों उलझे रहते हो? तुम अब पेड़ का सौन्दर्य देखने के लिए बाहर क्यों नहीं जाते। मेरा तथाकथित सौन्दर्य भी एक दिन क्षय हो जाएगा। हमारा दैहिक सौन्दर्य कुदरत के विराट सौन्दर्य के सामने कुछ भी नहीं। मैं तो कहती हूँ कि श्रम भी एक विकल सौन्दर्य रचता है। सारा चराचर जगत ही सुन्दर है। कैमरे की तरह सुन्दरता को उसी क्षण अपने मस्तिष्क में उतार लो। उसका आनन्द लो। अपने भाग्य को सराहो कि हम लोग जो व्यक्त होते हैं, एक दिन अव्यक्त हो जाएँगे और तब जो क्षण-क्षण नया सौन्दर्य व्यक्त हो रहा होगा, उसका अनुभव भी नहीं कर सकते हैं। आज व्यक्त हैं तो समूचे व्यक्त को देख सकते हैं और अपार और अथाह अव्यक्त में भी सुन्दरता की कल्पना कर सकते हैं। सुन्दर देखने के लिए आँख को नहीं, अन्तस को सुंदर बनाना पड़ता है, जो आसान नहीं है। तब सौन्दर्य बोध इन्द्रियों के पार ले जाता है, जिसका अनुमान न तुम्हें है न मुझे। हम दोनों घने लम्बे बालों को तो याद करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि सृष्टि की तरह हमें भी एक दिन झरना है, नष्ट होना है।’’

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