सुधांशु गुप्त

मधुसूदन आनन्द से मेरा पहला परिचय कहानीकार के रूप में ही हुआ था। एक दिन वह घर आए तो पिता जी ने कहा, ये मधुसूदन आनन्द हैं, इनकी एक कहानी ‘करौंदे का पेड़’ सारिका में छपी है। तुम्हें पढ़नी चाहिए। फिर मेरा परिचय कराते हुए पिताजी ने कहा, ये बड़ा बेटा है, सुधांशु। हम दोनों के बीच एक औपचारिक अभिवादन हुआ और मैं कमरे से बाहर निकल गया। यह 82,83 या 84 की बात होगी। वर्ष मुझे ठीक से याद नहीं रहा। इस मुलाक़ात के विषय में दो बातें ध्यान रहीं। पहली, कहानी का नाम और दूसरी यह कि मधुसूदन आनन्द नाम का यह शख़्स बहुत आकर्षक, शालीन और विनम्र है। तो आनन्द जी की जो तस्वीर मेरे ज़ेहन में बनी वह एक कहानीकार और शालीन व्यक्ति की थी। याद नहीं इसके बाद आनन्द जी कभी घर आए या नहीं। लेकिन मुझे घर में ही उनका कहानी संग्रह ‘करौंदे का पेड़’ मिल गया। मैंने तत्काल कहानी पढ़ी। कहानी में कुछ ऐसा था जिसका असर मुझ पर देर तक बना रहा। वह असर क्या था यह बताना आज भी मेरे लिए संभव नहीं है। ऐसा लगता है कि कहानी पेड़ की है-करौंदे के पेड़ की। लेकिन क्या ऐसा ही है! देखते हैं-बड़ी अम्मा के घर एक करौंदे का पेड़ था, जब पेड़ में करौंदे आते तो बड़ी अम्मा उनका अचार डालती। यह अचार प्रसाद की तरह मुहल्ले-घर में बँटता। करौंदे के पेड़ को अम्मा बच्चे की तरह पालती। बड़ी अम्मा विधवा थी-बाल विधवा। मगर हमारा घर बड़ी अम्मा के घर से दूर था। पिताजी शहर से बाहर नौकरी करते थे। मैं बड़ी अम्मा से कोई खाने की चीज़ या पैसे मिलने के लालच में एक-दो चक्कर रोज़ उनके घर के लगा आया करता था। बड़ी अम्मा का पेट खराब होने की वजह से (नायक) नैरेटर की दादी उन्हें अपने घर ले आती है। यहाँ भी पेड़ की चिन्ता बड़ी अम्मा को बराबर खाए जाती है। दो-चार रोज़ बाद जब बड़ी अम्मा अपने घर लौटी तो उन्होंने देखा करौंदे के पेड़ की जगह धातु पिघलाने की भट्टी लगी हुई है। बड़ी अम्मा ने दहकती भट्टी को देखकर भी फूफा जी से कोई बात नहीं की। भट्टी फूफा जी ने ही वहां लगाई थी। लेकिन तीसरे ही रोज़ उनकी कोठरी के सामने एक छोटा-सा पौधा खड़ा था और बड़ी अम्मा उसकी जड़ में गोबर और पानी देती हुई वात्सल्य और विस्मय में मुस्करा रही थी। कहानी बस इतनी ही है। इस कहानी में छोटे-छोटे वाक्यों से जिस तरह अपना समय दर्ज़ किया गया है, वह चकित करता है। संयुक्त परिवार, सामूहिकता, पेड़ों को बच्चे की तरह प्रेम करना, उन्हें पालना-पोसना, गई सदी के सातवें, आठवें और नवें दशक तक घर-परिवार के जो मूल्य थे, वे कहानी में दिखाई देते हैं। उन्हें बचाए रखने के प्रयास भी। यह कहानी पढ़कर मुझे समझ आ गया था कि आनन्द जी की कहानियाँ निरन्तर पढ़नी हैं-पढ़नी चाहिए। मैं जब जहाँ उपलब्ध होता आनन्द जी की कहानियाँ पढ़ता रहा।
इस बीच मुझे यह भी पता चला कि मधुसूदन आनन्द उत्तर प्रदेश के कस्बे नजीबाबाद के रहने वाले थे और मेरठ विश्वविद्यालय से उन्होंने एम.ए.हिन्दी किया। 1970 में वह दिल्ली आ गए। 1976 में ज्योत्सना से उनका विवाह हो गया। इस बीच उन्होंने नवभारत टाइम्स में ट्रेनी पत्रकार के रूप में नौकरी भी शुरू कर दी।1979-82 तक वह जर्मनी में (कोलोन) ‘डोयचे वैले’ (द वॉयस ऑफ जर्मनी) की हिन्दी सेवा में चार साल सम्पादक रहे और बाद में वॉयस ऑफ अमेरिका के दिल्ली स्थित संवाददाता रहे। मैं स्वयं भी विभिन्न संस्थानों में नौकरियाँ तलाशता रहा, करता रहा। आनन्द जी से मुलाक़ात बहुत कम हुई, लेकिन उनकी कहानियाँ मैं निरन्तर पढ़ता रहा। बचपन, थोड़ा सा उजाला, सामान्य जीवन (सभी सामयिक प्रकाशन से) तीनों संग्रह की कहानियाँ मैंने पढ़ीं। आज सोचता हूँ तो अजीब लगता है…पता नहीं क्यों मैंने उनसे कभी नौकरी के लिए नहीं कहा! समय इसी तरह बीतता रहा और लगभग बीत ही गया। 2008 में मैं एक मीडिया संस्थान में नौकरी कर रहा था और नौकरी बदलना चाहता था। इसी सिलसिले में उनसे मिलना हुआ। उस समय वह नवभारत टाइम्स के सम्पादक थे। अच्छी बातचीत हुई। उन्हें उतना ही विनम्र पाया जितना पहली मुलाक़ात में लगा था। आनन्द जी के प्रयासों से सब कुछ तय हो गया। उन्होंने मालिकान से भी मिलवा दिया। सब तय होने के बावज़ूद मेरी नियुक्ति नहीं हो पाई। इसके पीछे तकनीकी कारण यह रहा कि जिस संस्थान में मैं उस वक्त नौकरी कर रहा था, ‘वहाँ’ के कर्मचारियों को ‘यहाँ’ नहीं रखा जा रहा था। बहरहाल आनन्द जी के साथ काम करने और उन्हें निकट से जानने का एक अवसर और ख़त्म हो गया। मैं फिर अपनी दुनिया में मसरूफ़ हो गया और आनन्द जी अपनी दुनिया में मग्न रहे।
समय अपनी गति से दौड़ता रहा। लगभग एक दशक बीत गया।

अक्तूबर 2018 में पता चला कि आनन्द जी भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय के सम्पादक बन गए हैं। मैंने मैसेंजर पर संकोच से उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा, किसी दिन ऑफिस आओ। मैं ‘किसी दिन’ उनके ऑफिस, लोदी रोड़, शिर्डी के साईं बाबा मन्दिर के पास गया। नया ज्ञानोदय में मैं पहली बार गया था। मधुसूदन आनन्द बड़े पत्रकार और कहानीकार थे। मन में थोड़ा-सा डर भी था। लेकिन उन्होंने चाय मंगवाई और एकदम सहजता से बात करने लगे। पूछा, साहित्य की दुनिया में क्या नया हो रहा है, कौन-कौन युवा कहानीकार अच्छी कहानियाँ लिख रहे हैं, कौन-सी अच्छी किताबें प्रकाशित हो रही हैं? मुझे ‘महत्व’ और स्पेस देते हुए उन्होंने कहा, कोई अच्छी कहानी पढ़ो तो ज्ञानोदय में भिजवाओ…और किसी किताब पर लिखना चाहो तो लिख सकते हो। अपनी कोई नई कहानी लिखो तो भेजना। मेरे भीतर का डर एकदम गायब हो गया। बातचीत की आनन्द जी की यह ख़ास शैली थी। वह स्वयं कम बोलते थे। सामने वाले को अधिक अवसर देते थे। ऐसा भी नहीं था कि वह ग़लत बात का विरोध नहीं करते थे। करते थे, लेकिन शालीनता और विनम्रता के साथ या चुप रहकर। वह यह गुंजाइश हमेशा छोड़ते थे कि हो सकता है, वह स्वयं ही ग़लत हों। हालांकि अधिकांश समय वही ठीक ही होते थे। यह उनका बड़प्पन था कि वह सामने वाले को सही होने का अहसास कराते थे। मैं आनन्द जी के पास एक घंटे से भी अधिक बैठा। उनसे पहली बार इतनी लम्बी बात हुई थी। उन्होंने दो किताबें दीं और उनपर लिखने के लिए कहा। उन्होंने यह नहीं कहा कि इनपर पॉजिटिव लिखना है या नगेटिव। इसकी उन्होंने पूरी छूट दी कि किताबें जैसी लगें, वैसा ही लिखूँ। इस तरह ज्ञानोदय में लिखने का और आनन्द जी से संवाद का एक सिलसिला शुरू हुआ। घर आकर सोचता रहा कि अब आनन्द जी की सारी कहानियाँ पढ़नी हैं। कभी भी उनपर बात हो सकती है। वास्तव में मैं यह देखना चाहता था क्या उनकी कहानियाँ भी विनम्रता और शालीनता से अपनी बात कहती हैं या कहानी तक आते-आते उसका स्वाभाव और चरित्र बदल जाते हैं। क्या कहानियों से भी किसी लेखक को जाना जा सकता है? यह भी देखना ज़रूरी था कि वे अपनी कहानियों के विषय कहाँ से उठाते हैं और उनकी कहानियों में कविता कितनी होती है? सभी कहानियों पर यहाँ बात नहीं हो सकती लेकिन ‘करौंदे का पेड़’ और ‘साधारण जीवन’ संग्रहों की कहानियों को मिलाकर बने संग्रह ‘बचपन’ की कुछ कहानियों का ज़िक्र यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। ‘करौंदे का पेड़’ का ज़िक्र ऊपर हो चुका है। इस संग्रह की अन्य कहानियों में बचपन झिलमिलाता दिखाई देगा। आनन्द जी ने भूमिका में स्वयं यह स्वीकार किया है कि ‘इन कहानियों के बीच एक अदृश्य धागा है जो उस जीवन को बांध लेना चाहता है जो तमाम हाहाकार के बावज़ूद अस्त नहीं होता। इस साधारण जीवन में एक असाधारण कौंध है, जो आश्वस्त करती है कि साधारण लोगों की कहानियाँ लिखी जाती रहेंगी। ये साधारण लोग किसी बड़े सत्य का संधान नहीं करते, ना ही वे किसी बड़े संघर्ष या आन्दोलन के योद्धा हैं। ये वे लोग हैं जो महत्वाकांक्षाविहीन जीवन जीते हुए अपना अस्तित्व बचाने के संघर्ष में नित्य पराजित होते हुए भी कुछ ऐसा आलोक दिखा जाते हैं जो अंततः जीवन के ही काम आता है।’ मिन्नी, छाता, रत्तो, तरबूज, बचपन, दादी जैसी कई कहानियों में यही आलोक पाठक को दिखाई देता है। 
अब मेरा आनन्द जी के घर गौतम नगर भी आना-जाना शुरू हो गया। उनके साथ बातचीत के दौरान मैंने पाया कि उनका व्यवहार, उनकी शालीनता, उनका व्यक्तित्व उनकी कहानियों के किरदारों की तरह ही है। उनमें किसी किस्म का कोई पाखण्ड नहीं है। शायद यही वजह रही कि उनके भीतर दिखाई देने वाला आलोक मेरे लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा था। उनके घर पर बैठकर मैंने यह बात भी महसूस की कि उनमें कोई लेखकीय दम्भ नहीं है, वह सामने वाले को कभी यह अहसास नहीं होने देते कि वह एक दैनिक अख़बार के सम्पादक या डॉयचे वेले (जर्मन) के सम्पादक रहे हैं। यही बात उन्हें पत्रकारों और साहित्यकारों की भीड़ से अलग करती है। उनकी शालीनता और मानवीय व्यवहार तो उन्हें सबसे अलग करता ही है। मैं जब भी उनके घर गया, कभी ऐसा नहीं हुआ कि उन्होंने चाय (साथ में समौसा, ढोकला और नमकीन) के बिना आने दिया हो। बल्कि एक बार तो उनके घर बैठे हुए दो बज गये तो उन्होंने बाक़ायदा खाने के लिए कहा। मैं बिना खाना खाए नहीं आ पाया। ये बेशक सामान्य बातें ही हैं लेकिन इनमें मानवीयता तो देखी ही जा सकती है। मेरे और आनन्द जी के बीच जो दशकों में पैदा हुआ गैप था (मेरे संकोच के कारण) वह अब दूर हो गया था। अब मैं उनसे सहज रूप से किसी भी विषय पर बात करने लगा। हर दूसरे-तीसरे दिन मैं उन्हें फोन कर लेता।
बचपन संग्रह की कहानियों पर भी उनसे बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि ‘ये कहानियाँ1979-1982 के बीच लिखी कहानियाँ हैं। जर्मन में रहते हुए मुझे उत्तर प्रदेश का अपना कस्बा नजीबाबाद और वहाँ के लोग बहुत हॉन्ट करते थे। जर्मनी के वैभव,चकाचौंध और अजनबीपन के बीच अपना बचपन बार-बार बीच में आ जाता था और कस्बे के अपने लोग एक आत्मिक सवाल बन जाते थे। इस संग्रह की कहानियाँ वही कहानियाँ हैं। ’
उनसे बातचीत का मुझपर एक प्रभाव यह पड़ा कि मैं अधिक से अधिक किताबें पढ़ने लगा ताकि उनसे बात की जा सके। दूसरा मैं उनसे यह सीखने की कोशिश करता कि साहित्य से किसी तरह की अपेक्षा नहीं पालो, बस अपना काम करते रहो-निरपेक्ष भाव से। वही करने की मैं कोशिश करता रहा। जीवन में पहली बार मुझे लग रहा था कि समय अच्छा चल रहा है। इस बीच कोरोना की दस्तक हुई और पूरी दुनिया रुक गई। आनन्द जी से मुलाकात बन्द हो गई लेकिन फोन पर तब भी बातें होती रहीं। वह चिंतित रहते कि कहीं मुझे कोरोना ना हो जाए और मैं चिंतित रहता कि कहीं उन्हें कोरोना ना हो जाएं। दोनों को कोरोना हुआ और दोनों ठीक भी हो गए। लॉकडाउन के पीरियड में ही मैंने उनका एक और कहानी संग्रह ‘थोड़ा सा उजाला’ की सभी कहानियाँ पढ़ लीं। इस संग्रह को पढ़ने के बाद आनन्द जी के व्यक्तित्व के कुछ और पहलु उजागर हुए। इसमें कुछ कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें प्रियजन की मृत्यु से उपजा दुख दिखाई देता है (आँख, वह पेड़, सुबकियां, चाकुओं से गुदा आदमी)। लेकिन आनन्द जी निजी दुख को सार्वजनिक दुख में तब्दील कर देते हैं। वह हमारा दुख बन जाता है। गंगा जमुनी तहज़ीब को बचाना, प्रकृति प्रेम, पारिस्थितिकी सन्तुलन के लिए भी आनन्द जी की कहानियाँ खड़ी दिखाई देती हैं (जर्राह, मिस्त्री सईद अहमद शेरकोटवाले, दरवाज़ा अन्दर खुलता है, तलवार और तकली)। आनन्द जी लम्बे समय तक कारपोरेट कल्चर का भी हिस्सा रहे और बाज़ार के विस्तार और उसकी विसंगतियों को भी उन्होंने करीब से देखा, जो उनकी कहानियों (कारपोरेट स्मेल, फूंकनी, प्रेजेंटेबल, अवमूल्यन) में दिखाई देता है। सेब और घोड़ा उनकी प्रयोगवादी कहानियाँ हैं।

आनन्द जी की कहानियों के विषय में एक बात और। उनकी कहानियों में कविता दिखाई देती है। ‘मिस्त्री सईद अहमद शेरकोटवाले’ की शुरुआत देखिएः क्या आपने किसी बढ़ई को रंदा चलाते हुए देखा है? रंदा चलाते हुए किसी दिन उसे इत्मीनान से देखिए। उसमें एक लय है। एक सौंदर्य। उसके सारे शरीर से पसीना चूने लगता है। बनियान भीग जाती है। माथे से, सिर से, चेहरे से बूंदें टपकने लगती हैं। बांहों में मछलियाँ उभर आती हैं। एक अन्य कहानी-दरवाज़ा अन्दर खुलता है की शुरुआत इस तरह होती हैः इस जगह से थोड़ी ही दूर वह घर है। उस घर में सिर्फ एक दरवाज़ा है। घर में न कोई खिड़की है, न रोशनदान। चारों तरफ़ ऊँची-ऊँची दीवारें हैं और सिर्फ कच्चा आंगन। आंगन में एक कुआं। एक अमरूद का, एक करौंदे का और एक नीम का पेड़ है। नीम के चारों तरफ गोलाई लिए हुए एक चबूतरा है।….क्या दोनों कहानियों की ये पंक्तियाँ कविता-सी नहीं जान पड़तीं?
मुझे हमेशा लगता है कि कहानियों से लेखक को जानना थोड़ा आसान है। मधुसूदन आनन्द की कहानियाँ उनके व्यक्तित्व से अलग नहीं हैं। उनमें भी वही सादगी, धैर्य, सहनशीलता और सरलता है, वे कहीं से भी कृत्रिम नहीं लगतीं। उनकी भाषा में कहीं आपको भारी भरकम शब्द, बड़ी-बड़ी बातें नहीं मिलेंगी, लेकिन जीवन से निकली इन कहानियों की भाषा भी अनुभव से निकली है। 2023 में उनका एक और कहानी संग्रह-क़ब्रिस्तान में कोयल (सम्भावना प्रकाशन) से आया। इस संग्रह की सभी कहानियाँ नाटकीयता, चमत्कार और जादू से मुक्त हैं। लेकिन समाज और समय इनमें बराबर दिखाई देगा। मांसाहार-शाकाहार (पोर्क), माओवाद और नक्सलवाद से मोहभंग (पिस्तौल), साम्प्रदायिकता का विरोध (हसन कहाँ रहता है), बच्चों को अपनी गिरफ़्त में लेता बाज़ार (रैंप पर कैटवॉक), नौसर्गिक ही बचेगा (लम्बे बालों वाली लड़की), प्रकृति और पशु पक्षियों को बचाने की उनकी सद्इच्छा (मेंढक) जैसी कहानियाँ इस संग्रह में हैं। इन कहानियों ने मुझे आनन्द जी को जानने और समझने का और मौका दिया। मुझे यह भी समझ आया कि क्रांति जोर-जोर से चिल्लाने से नहीं होती। कहानी में हम केवल अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं।
एक बार कहानियों पर ही आनन्द जी से बात हो रही थी। उन्होंने किसी लेखक का नाम लेकर पूछा कि क्या फलां की कहानियाँ पढ़ी हैं, कैसी लगती हैं? उस वक्त संयोग से मैं उसी लेखक की कहानियाँ पढ़ रहा था। मैंने कहा, आजकल मैं इन्हीं की कहानियाँ पढ़ रहा हूँ और मुझे अच्छी लग रही हैं। आनन्द जी ने हल्के से मुस्कराते हुए कहा, मुझे उन कहानियों में कुछ नज़र नहीं आया, केवल भाषाई लफ्फाजी लगी, लेकिन अब आप तारीफ़ कर रहे हो तो मुझे दोबारा पढ़नी पड़ेगी। यह आनन्द जी का दूसरों को स्पेस देने का अपना तरीका था। जब मैंने भी उस लेखक की कहानियों को दोबारा पढ़ा तो मुझे अहसास हुआ कि आनन्द जी सही कह रहे थे।

बहरहाल बातचीत की निरंतरता से मुझे आनन्द जी की आदत-सी पड़ती चली गई। एक दिन भी उनसे बात ना हो तो अजीब-सा लगने लगता। जनवरी 2026 से मैं उनसे घर आने के लिए कह रहा था, लेकिन वह हर बार कहते, अभी तबीयत ठीक नहीं है, थोड़ा ठीक हो जाऊं, फिर ख़ुद ही बुलाऊंगा। दिन बीतते गए। फिर ऐसा हुआ कि कई दिनों तक उनका फोन नहीं उठा। मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था। पाँच फरवरी को उनकी पत्नी (ज्योत्सना जी) ने फोन उठाया, बताया कि वह शेख सराय के अस्पताल में, आईसीयू हैं। छह फरवरी को मैं उनसे मिलने अस्पताल गया। उसी दिन वह आईसीयू से बाहर आए थे। बहुत कमज़ोर लग रहे थे। उन्होंने कहा, मेरे मन में बहुत कुछ उमड़-घुमड़ रहा है, ठीक होने पर उपन्यास लिखूँगा। चाय पिए बिना उस दिन भी उन्होंने नहीं आने दिया। सात फ़रवरी को उनका फ़ोन आया। उन्होंने कहा कि वह एक दो दिन में घर आ जाएँगे, फिर घर पर ही बैठकर आराम से बात करेंगे। कुछ दिन इसी तरह बीत गए। मैंने कई बार उन्हें फोन किया, लेकिन फ़ोन पिक नहीं हुआ। मेरे मन में लगातार यह डर बढ़ता गया कि कहीं उनकी तबीयत दोबारा ख़राब तो नहीं हो गई। और…18 फरवरी को रात दस बजे ख़बर मिली कि वह नहीं रहे। मैं शॉक्ड था!
पिछले आठ साल में मेरे लिए वह गाइड, अभिभावक, मित्र, सब कुछ बन गए थे। उनसे निरंतर संवाद के दौरान ही मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। ऐसे समय में, जब अधिकांश पत्रकारिता बाज़ार के सामने घुटने टेके बैठी है और कहानी नगरवधू बनने के लिए मचल रही है, मधुसूदन आनन्द कुछ ऐसे लोगों में थे जो दोनों की आत्मा को बचाए हुए थे।
सोच रहा हूँ आनन्द जी के ना रहने का क्या अर्थ है…क्या यह साहित्य-पत्रकारिता की दुनिया में विनम्रता, सादगी और स्वयं से परे देख पाने की प्रवृत्तियों के अन्त की शुरुआत है?
आनन्द जी होते तो वह समझाते, ऐसा नहीं है सुधांशु, हमें निरपेक्ष होकर अपना काम करते रहना चाहिए और दुनिया से बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं पालनी चाहिए। तोल्स्तॉय की आत्मकथा का ज़िक्र करते हुए वह अक्सर कहते थे, उन्होंने जितना काम किया है, हम उनके मुकाबले कुछ भी नहीं हैं। इसलिए अपना अधिकांश समय काम पर लगाओ…
आज उनकी अनुपस्थिति भी मुझे लगातार सुनाई दे रही है…सुनाई देती रहेगी…

