सुमन शेखर

फ़िल्म – The Banishment (2007)
निर्देशक – एंड्री ज़्व्यागिन्त्सेव
फ़िल्म में मुख्यतः तीन पात्र हैं — अलेक्स, वेरा और घर।
अलेक्स अपनी पत्नी वेरा और दो बच्चों के साथ अपने पैतृक घर में रहने चला जाता है। शहर की बारिश से भीगी सड़कों को पीछे छोड़कर वे अब एक हरे-भरे ग्रामीण इलाके में आ गए हैं। लेकिन जल्द ही वे गहरे दुख में डूब जाते हैं।
एंड्री ज़्व्यागिन्त्सेव का सिनेमा संवादों में कम बोलता है, चुप्पी और ठहराव में ज़्यादा प्रकट होता है। ऐसा सिनेमा अधिक देर तक असर करता है – ऐसा मेरा मानना है। एंड्री सिनेमा के शानदार जादूगरों में से एक लगते हैं। उनकी फ़िल्मों में दृश्य और उसका सुर आपकी नसों तक में अपनी जगह बना लेते हैं। आपको घट रहा दृश्य महसूस होने लगता है, पात्र के साथ-साथ चलते हुए आप उसके दुख और उसकी पीड़ा महसूस करने लगते हैं।
इस फ़िल्म में एक दृश्य है, जब वेरा रसोई में है और अलेक्स घर को दुरुस्त कर रहा है। कितना सुंदर दृश्य है। उस समय दोनों कितना कुश हैं। बच्चों का पेडों के बीच, घर के बाहर चहचहाना कितना अद्भुत है। सबकी आँखों में ‘चाहना’ अलग-अलग है।
एक दृश्य अखरोट खाते हुए पेड़ों के बीच का है – वहाँ का संवाद (जो गद्य में भी उपलब्ध है) आपको फ़िल्म में आगे बढ़ने से ठहराता है। यह एक परिवार की कहानी है, जिसमें कहानी से ज़्यादा पात्र याद रह जाते हैं। उनके हाव-भाव याद रहते हैं; पुल और घर याद रहते हैं, आए हुए मेहमान याद रह जाते हैं, चर्च और उसके पीछे का वह हिस्सा याद रहता है, जहाँ वेरा को अंततः जगह मिली।
एंड्री ज़्व्यागिन्त्सेव का सिनेमा मुझे बहुत प्रभावित करता है। उनकी The Return मैंने पहले देखी थी। यहाँ The Banishment (2007) फिल्म पर कुछ ख़्यालः
(The Banishment)
भावनाएँ जब डगमगाने लगती हैं, व्यक्ति भी डगमगाने लगता है। जड़ता किसी भी तरह से सही नहीं है। जड़ता व्यक्ति के भीतर घुन की तरह घुसती है। धीरे-धीरे व्यक्ति गायब होने लगता है — न जड़ता दिखती है, न ही व्यक्ति…
हमेशा से जानता आया हूँ कि ‘कठोर’ शब्द में कहना क्रूरता है, विचारों का जड़वत हो जाना क्रूरता है, अविकास की गति पर पहुँच जाना क्रूरता है। जानना और मानना दो अलग-अलग बातें हैं।
काश कि हम उंगली रखते और कह देते कि देखो, यह है क्रूरता। यही है वह, जिसे कभी इस रूप में देख नहीं पाया। तुम इतने अभागे रहे कि क्रूर होने की ठसक में ही रह गए। ठीक से न क्रूर होना आया, न ही कोमलता शेष रही। न ही हमारा साथ…
तुम्हारे आसपास अकेलापन इतना सघन रहा कि साथ रहने वाले के सारे खिलखिलाते शब्द सूख गए। अंततः न शब्द शेष रहे, न भाव, न ही कोई अर्थ, और न ही रिश्ते में साथ रह पाने का कोई मकसद। शब्दों से फैलता संक्रमण रिश्तों के साथ-साथ आसपास के पूरे संसार में घने अँधेरे-सा फैलता गया। उजाला इतना बारीक था कि अँधेरा चट करता गया — धूप का आख़िरी कतरा, उम्मीद का आख़िरी कतरा भी।
प्रेम में बहुत ज़्यादा चाहना भी बहुत ज़्यादा मारना हो जाता है। प्यार, सम्मान और अपनत्व की जगह गिरती हुई रेत की गति में अनजानेपन की घुन चढ़ने लगी। तुम जीवन को लेकर इतने उदासीन रहे कि आसपास की सारी जीवंतता पत्थर बना गए। दो अलग-अलग दुनियाएँ एक ही ज़मीन पर साथ उगीं, फिर दोनों ने एक-दूसरे को ही नष्ट कर दिया।
उदासीन पत्थर के साथ रहते-रहते हरा-भरा पेड़ भी सूखकर पत्थर बन गया। अब न उस पर कोई कोंपल आती है, न कोई नई टहनी निकलती है, न ही फूल खिलते हैं, न ही जड़ों का विस्तार होता है। बहुत ज़्यादा सीमित हो जाना, पत्थर हो जाना है। है न?
ज़िंदगी की ख़्वाहिश में ज़िंदगी ही छूटती गई। बहुत वक़्त बाद जब खुद को देखना आया तो मौत की माला गले में झूलती दिखी। वक़्त जैसे एकाएक खुले रास्ते पर दौड़ पड़ा हो और कुछ पकड़ में न आने पर औंधे मुँह गिर पड़ा हो…
“तुमने जो भी दिया, मैंने सहर्ष स्वीकार किया। जिस दिन मैंने तुम्हें स्वीकारा, तुम्हारे सारे गुण-अवगुणों को भी साथ स्वीकारा। न एक इंच ज़्यादा, न कम — सब वैसे का वैसा ही। फिर न कोई शिकायत रही, न ही कोई मलाल।” “मलाल! हाँ, यह रहा शायद। मलाल कि मैंने सब स्वीकार किया, लेकिन शायद तुम उतने सामर्थ्यवान नहीं थे कि मुझे भी उसी तरह स्वीकार कर पाते — पूरा का पूरा। मैंने स्वीकारा पूर्णता की तरह, तुमने स्वीकारा संशय की तरह।”
अच्छे समय बिताने की धुन पर आए घर में, ठीक बीचों-बीच रस्सी से झूलती देह बार-बार यही वाक्य दुहरा रही है… सवाल मौन थे जब वह जीवित थी, मरने के बाद भी मौन ही रह गए…
मेरे स्वीकारने में ‘महानता’ की चादर रही, तुम्हारे स्वीकारने में ‘प्यार’ था! महानता जीत गई!
नहीं, यह बहुत बड़ी हार है…अपने देश से बाहर खुद को धकेल देना कैसा होता है!
अपनी ही देह को धक्का खाते देखना कैसा होता है!
मैं वह शरीर थी जिसकी इच्छा को ‘प्रेम’ ने लील लिया। जिसकी खुशी तुम्हारे होने और तुम्हारे क्रूर बने रहने के डर ने सोख ली। कहना जो था, उसे कह पाने के लिए मैंने एक बड़े झूठ का सहारा लिया। क्यों? क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारी पसंद-नापसंद का ख़याल रखती आई। तुम्हारे चेहरे पर कभी तो हँसी की पतली-सी लकीर बन पाए, कभी तो मेरा दिन पूरा हो कि तुम आज मेरे लिए ‘मुस्कुराए’ हो।
शहर से दूर जाकर एक घर की ख़्वाहिश थी।
उस घर के बाहर टँगा होता — ‘अपना सुखी परिवार’।
हम–तुम तपती दुपहरी में पेड़ से तोड़ लाते अखरोट
और टुकड़ा–टुकड़ा चखकर बाँटते प्यार।
जहाँ “घर” बनाने की चाह थी,
वहाँ आत्मा नहीं बसी,
देह धँस गई।
खुद से खुद का निष्कासन बहुत कठोर होता है। चयन और निष्कासन का फ़र्क तुम समझते हो?
जब तुम मुझे उसी घर पर दुबारा ले गए, जहाँ होने-बसने का सपना मैंने बारह बरस पहले देखा था, मैं खिल गई थी। मुझे उम्मीद थी कि शायद तुम यहाँ थोड़ी देर को मुस्कुरा सको। तुम्हारे चेहरे पर दिखता भारीपन, उदासी — यहाँ की हवा बदल देगी। शायद हम बरसों से भूले ‘हम’ को फिर हासिल कर लें, और शायद मैं तुम्हें हमारे ‘नए मेहमान’ की खुशी महसूस करा पाऊँ। शायद… इतने सारे शायद रहे, हासिल रहा शून्य।
वर्षों पहले बंद हुई खिड़की का वर्षों बाद खुलना। रौशनी का भर-भरकर भीतर भर आना।
हवा और रौशनी का बेधड़क भीतर प्रवेश करना, जैसे वे वर्षों से इंतज़ार में हों — जैसे मैं…
रौशनी का फिर से अंधेरे में छुपी, हर छूटी हुई चीज़ को छू लेना, मेरी देह पर आकर सुस्ता लेना, कमरे के सारे कोनों में जीवन का संगीत पैदा कर देना। वर्षों पहले बंद हुए नल से टपक-टपककर बूंद-बूंद पानी निकलना। मेरा रसोई में चोर निगाहों से तुम्हें घर के अंदर-बाहर तकते-तकते खाना बनाना। तुम्हारा घर के चारों तरफ़ इतनी तल्लीनता से खराब हुई चीज़ों को दुरुस्त करना…
उम्मीद थी कि इस घर में वह बात है, इस सुबह में इतना उजाला है, यहाँ की हवा में इतनी शांति है कि तुम्हारे भीतर की सारी बंद दीवारों और किवाड़ों को धीरे-धीरे ढहा सकती है। तुम्हारे भीतर की घनी चुप्पी को धूप पी सकती है। अखरोट के पेड़ की छाँव में बैठकर हम अपने बीते दिनों की जो थोड़ी-बहुत खुशियाँ बची हैं, उन्हें चुग सकते हैं, बाँट सकते हैं।
बच्चों ने जितनी आसानी से आग्रह कर दिया — “मुझे पेड़ से अखरोट चाहिए” — काश, मैं भी कह सकती कि “मुझे तुम चाहिए अलेक्स।”
शहर और गाँव को जोड़ने वाली छोटी-सी पुलिया की गुंजाइश हमेशा मेरे भीतर रही। एक पुल, जो तुम्हें और मुझे जोड़कर ‘हम’ बनाता।
मैंने चाहा था केवल इतना
कि कह सकूँ तुमसे वह सब
जिसका बीज बचपन से
सपनों में नमी की तलाश करता रहा।
जब तुम मिले,
सुकून से मेरी जड़ों ने धीरे–धीरे फैलना–पसरना शुरू किया।
इंतज़ार… इंतज़ार… इंतज़ार… एक लंबा इंतज़ार…
और वह बीज, जड़ जाने कब का सूख चुका है।
मेरे भीतर
जाने कितनी अनकही बातों का अवशेष है।
मेरा मन स्मारक है उन तमाम यातनाओं और इच्छाओं का
जो मैं तुमसे कभी कह न सकी… प्रिय अलेक्स,
स्मारक संजोते हुए खुद ही दब जाऊँगी किसी कब्र में
सुन मत लेना तब भी
मेरी अनकही बातों का मौन।
तुम्हारी उदासीनता के लिए ईश्वर ने रचा है कोई शब्द?
तुम्हारी चुप्पी के लिए
है किसी सज़ा का प्रावधान?
“क्या मैंने तुमसे बहुत ज़्यादा चाह लिया था, अलेक्स?” “नहीं, वेरा। तुम्हें कुछ भी दे पाना हमेशा मेरे सामर्थ्य से बाहर रहा है।” “तुम इतने भी बड़े दिल के नहीं थे।”
“बचपन में मेरे पिताजी ने मुझसे एक बात कही थी — ‘अपने पंख हमेशा खुले रखना।’ मैंने वही किया वेरा, लेकिन उसके आगे की बात उन्होंने बताई ही नहीं कि खुले पंख लेकर किस तरफ़ जाना है और कितना जाना है! जब भी निर्णय की बारी आती, बड़े भाई कहते — ‘तुम जो भी करोगे, सही ही होगा।’ अधूरा वाक्य भी कई बार दुहराने पर पूरा लगने लगता है। क्रूरता की भी तो कोई सीमा होती होगी। जितना बड़ा नुकसान, उतनी बड़ी क्रूरता। वेरा, काश मैं तुमसे हर बात की माफ़ी माँग सकता। मांग सकता!” “ज़िंदगी में मौके एक बार ही आते हैं। ज़्यादा सोचोगे तो बचा हुआ मौका और साथ — दोनों हाथ से निकल जाएँगे, अलेक्स… तुम शायद कभी तैयार ही नहीं थे मेरे ‘साथ’ रहने के लिए। साथ-साथ रहते हुए भी अलग-अलग की तरह रहे। अब जो भी कह रहे हो, सारी बातें हवा में ही घुल रही हैं। हर बात की एक उम्र होती है। उसमें ज़रा-सी भी देरी हुई तो शब्द धुंध बन जाते हैं। फिर उनका कोई रह पाता है!”
एहसास होते ही बोलने का बहुत मन करता है… काश कि मैं उससे उस वक़्त कह पाता।
अब जो भी संवाद हैं, वे मेरे हैं — एकतरफ़ा संवाद। बेचैन, छटपटाहट, उकताहट से भरा हुआ संवाद।
इससे पहले कि तुम मुझे माफ़ करने की सोचो,
मैं जीवन भर की ग्लानि में तुम्हें छोड़ जाऊँगी।
तुमसे ही तो सीखा है सब —
भूल जाने के झूठ तले
अनवरत ग्लानि का रस देना।
फ़र्क केवल इतना रहेगा अलेक्स—
तुम मुझे देख लेते थे
उसमें गलते हुए, जीते हुए, धीरे-धीरे खपते हुए।
मैं तुम्हें वह हक़ भी नहीं दूँगी।
नहीं देखूँगी कभी।
तुम हमेशा देखोगे —
पत्थर के नीचे दबी मेरी देह
तब भी कुछ कह पाओगे अलेक्स !
कहना और न कह पाना — दोनों के बीच बहुत गहरी खाई है। जिस घर में तुम्हारे रहते घर जैसा लगता था, अब वहाँ खंडहर है, जर्जर हो चुकी खिड़की है, लचर पुल है, ठूँठ अखरोट के पेड़ हैं, और बच्चों के सामने माँ के हत्यारे पिता का चेहरा है — जिसके हाथ में न बंदूक थी, न चाकू; केवल उसका मौन और क्रूर मौन, शहर में गुम गलियाँ थीं।
जहां प्यार, घर और साथ चाहा था, उसी हवा में, धरती के नीचे दबी है मेरी देह। मेरे हिस्से आई कब्र…
तुम तक पहुँचने के दो रास्ते थे, ठीक उसी तरह मुझतक यहाँ पहुँचने के भी दो रास्ते हैं अलेक्स।
तुम्हारे हिस्से! ग्लानि… केवल ग्लानि।
प्रेम में मृत्यु है। प्रेम में विद्रोह है।
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सुमन शेखर
मास कम्यूनिकेशन के बाद फ़िल्मों के लिए पटकथा लेखन, निर्देशन के साथ ही अभिनय में व्यस्त। देश-विदेश के बड़े फ़िल्म फेस्टिवल्स में फ़िल्में प्रदर्शित, अभिनीत फ़िल्म “ख़्वाबिदा” को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का अवार्ड। कई नाटकों का लेखन, अभिनय और निर्देशन। एक दशक से रंगमंच में सक्रिय।
अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
ईमेल- shekhers914@gmail.com

