शंकरानंद की कविताएँ

  1. पता पूछना

जब भी मैं जाता हूं अनजान जगहों पर
भूल जाना चाहता हूं वे तमाम कहानियां
जो भय पैदा करती हैं
वे कहानियां जो पता नहीं कब सुनी थीं
वे हर वक्त घूमती रहती हैं दिमाग में और
मन सिहर जाता है
किसी अखबार की कोई खबर कौंध जाती है
कोई किरदार याद आ जाता है-
मुश्किल में फंसा हुआ
मैं उन्हें याद करने से इनकार करता हूं
मैं उन्हें भूल जाना चाहता हूं
अगर कहीं रास्ता भटक जाता हूं तो
बिना कोई संकोच किए पूछ लेता हूं पता
जानता हूं कि
सही रास्ता बताने वालों की कहानियां कोई नहीं सुनाएगा।

2. मौत का कुआं

जमा हैं लोग और देख रहे हैं मौत का कुआं
मेले में सबसे अधिक भीड़ है यहीं पर
कितना अजीब है कि
एक आदमी दूसरे आदमी को
मौत के मुंह में जाते देखता है
और मुस्कुराता है उसकी कलाबाजी पर
चारों तरफ से कुएं को घेरे लोग चकित हैं
वे और नजदीक से देखना चाहते हैं उस आदमी को
जो मौत के कुएं में दिखा रहा है जिंदगी का खेल
बच्चे बूढ़े जवान और स्त्रियां सब हैं यहां पर
सबका ध्यान टिका है उसी आदमी पर
जो हर बार बचा लेता है अपनी जिंदगी
हर बार निकल आता है
मौत के मुंह से बाहर।

 

3. मैं मजदूर

अपने जीवन में
एक घर नहीं बना सका छत का
जो भी बहाया पसीना
उसके बदले जमीन खरीदी और
फूस लिया पेट काट कर
जैसे तैसे गुजर रहा है जीवन
इसी से दाल के दाने चुनता हूं और
ईंट के चूल्हे पर पकाता हूं रोटियां
अपने घर से हजारों कोस दूर
दूर देश में जहां पांच हाथ जमीन है मेरे नाम
उस पर भी सबकी नजर लगी हुई है
वर्षों बेघर रहने के बाद अब सोचता हूं कि
फूस का ही घर बना लूं
लेकिन डर लगता है कि
कहीं कोई उसमें भी रातों रात तीली न लगा दे।

4. मां के हाथ

एक दिन काट रही थी हरी सब्जियां
उसी समय कट गए मां के हाथ और
नाकाम हो गई उंगली
खूब खून बहा पट्टी बांधने तक
कपड़े लाल हो गए वे जो मां पहनी थी
मां रोयी नहीं
दर्द से चीखी नहीं
वह तो सबकी भूख के बारे में सोच रही थी
कई दिनों के बाद
मां फिर से करने लगी है काम
चूल्हा चौका
जब छूती है नमक तो वह स्वाद के बारे में सोचती है
मैं सिहर जाता हूं सोचकर कि
कटे पर नमक पड़ने से
कितनी तकलीफ होती होगी उसे
मां इस सबसे बेफिक्र
अपने काम में लगी रहती है
वह फिर काट रही है हरी सब्जियां
वैसे ही रसोई में
और चाकू में भी वही धार है।

5. दु: होता है

मैं आवाज दूं
और तुम्हारी इच्छा हो कि
तुम मुझसे नहीं मिलो तो
पांव तेजी से बढ़ाते हुए
आगे निकल जाना
लेकिन पीछे मुड़कर
अंजान की तरह मत देखना।

6. तुम और मैं

नदी और
उसमें बहता हुआ
पानी
कागज पर
पसरती
रोशनाई
खिले फूल के साथ
हवा के झोंको में
बहकती खुशबू
ओस की बूंदों से
लिपटी
हरी भरी दूब
घने जंगलों के बीच
ऊंघता सन्नाटा
फुनगी पर
अपनी जगह सुरक्षित करने की
कोशिश करती धूप।

***
शंकरानंद 
हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित।अब तक पाँच कविता संग्रह। कविता के लिए विद्यापति पुरस्कार, सृजनात्मक पुरस्कार और मलखान सिंह सिसौदिया कविता पुरस्कार। संप्रति – लेखन के साथ अध्यापन।

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