मीनार के परिदृश्य में – अलीफा रिफात

अपनी अधखुली आंखों से उसने अपने पति को देखा. दाहिने करवट लेटे हुए उसके पति की देह उसकी देह में उलझी थी और उसका सिर उसके दाहिने कंधे पर झुका था. हमेशा की तरह उसे यही अहसास हुआ कि वह उसकी दुनिया से दूर किसी और ही दुनिया में है, जिसमें उसके लिए कोई जगह ही नहीं है. उसकी हल्की-सी क्रियाओं को आधे मन से देखती उसने अपने सिर को एक ओर घुमाया और छत की ओर देखने लगी, जहां उसने मकड़ी के जाले को देखा. उसने अपने आप से कहा कि उसे उठकर लंबे झाडू से उसे साफ़ करना होगा. जब उसकी नई-नई शादी हुई थी तो उसने अपने अंदर जलती कामाग्नि की मांग के अनुरूप अपने पति को कुछ देर और करते रहने के संकेत दिए थे, परंपराओं से बंधी होने से वह अपनी इच्छा को खुलकर कहने में शर्माती थी. अपनी विवाहित सहेलियों से अनुभव की कगार पर रहने की फुसफुसाहटें सुन उसने अपनी इच्छा को स्पष्ट व्यक्त भी कर दिया था. ऐसे पलों में उसे लगता था कि बस केवल एक क्षण दूर है वह, अपनी देह और आत्मा की पूर्ण संतुष्टि से और इस एक अनुभव के उपरांत उन्हें अनुभव को दोहराने में आसानी हो जाएगी. लेकिन ऐसे अवसरों पर जब वह हांफती हुई उससे करते रहने को कहती, वह जैसे जान-बूझकर उसे केवल वंचित रखने के लिए अपनी क्रिया तेज़ी से कर समाप्त कर देता है. कई बार उसने ताल की गति को कुछ देर और बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन वह उसे हमेशा रोक देता था. पिछली बार जब वह कगार पर थी और उसने उसकी पीठ पर नाखूनों को गड़ा कर उसे भीतर ही रहने को बाध्य किया था, तब चिल्ला कर उसने उसे दूर किया था और बाहर निकल आया था. “तू पगला गई है क्या? क्या मुझे मार डालना चाहती है तू?”

इसके बाद जैसे उसके अंदर शर्म का गोदना गोद दिया गया था और जब भी उसे इस घटना की याद हो आती, उसका चेहरा लाल हो जाता. उसके बाद उसने निष्क्रिय मुद्रा धारण कर ली थी. कभी-कभार स्वयं से प्रश्न अवश्य कर लेती, “शायद, मैं ही ग़लत हूं, मेरी मांगें ही गलत हैं और दरअसल मुझे ही पता नहीं है कि मुझे उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए. 

कई बार उसने इशारे में बतलाया है कि उसके दूसरी स्त्रियों से रिश्ते रहे हैं और कभी-कभी उसे ऐसा भी संदेह हुआ कि उसके संबंध शायद अभी भी हैं, लेकिन आश्चर्य है, इस विचार से वह न तो परेशान ही हुई और न ईर्ष्या ही जन्मी. पति की गति में तीव्रता आने से वह अपने विचारों से बाहर आ गई. वह मुड़ी और उसने उसे अपनी बनाई दुनिया से ही लड़ते देखा. उसकी आंखें कस कर बंद थीं, उसके होंठ गंदे ढंग से लटके थे और उसकी गर्दन की नसें पूरी तरह तनी थीं. उसने उसके हाथ को अपने पैर पर पाया, वह घुटने से ऊपर पकड़े था और तिरछे हो जोर-जोर से मेहनत किए जा रहा था, उसकी क्रियाएं पगलाइ-सी थीं. उसने अपने पैर को देखा, जो मकड़ी के जाले की ओर इशारा कर रहा था और अपने पैरों की उंगलियों के बढ़े नाखूनों को देखा, जो कटने का रास्ता देख रहे थे. ऐसे क्षणों में जैसा प्राय: होता है, उसने दोपहर बाद की अजान की आवाज़ सुनी, जो बंद खिड़कियों के शटर्स से छनकर आ रही थी. उसने उसे पूरी तरह वर्तमान में ला दिया. लंबी कराह के साथ उसके पति ने उसकी जांघ को छोड़ दिया और तुरंत बाहर निकल आया. उसने तकिए के नीचे से एक छोटी तौलिया निकाली, उसे अपनी कमर के चारों ओर लपेटा और उसकी ओर पीठ कर सो गया. 

वह उठी और बाथरूम में चली गई, जहां स्टूल पर बैठ उसने अपने को अच्छी तरह से धोया. उसके अंदर ऐसी कोई इच्छा नहीं थी कि वह स्वत: ही क्रिया को आगे बढ़ाए और पूरा करे, जैसा वह शादी के शुरुआती वर्षों में किया करती थी. शॉवर के नीचे खड़े हो उसने पहले दाहिने भाग को गर्म पानी से भिगोया और फिर बाएं को– इस प्रकार अपने फार्मूले को वह दोहराती रही. जैसे-जैसे पानी उसकी देह पर बहता गया, वह शांत होती चली गई. उसने अपने गीले बालों को तौलिए में लपेट लिया और दूसरे बड़े तौलिए को अपनी बगलों को घेर कर लपेट लिया. बेडरूम में लौट उसने हाउस गाउन पहना और नमाज़ की ‘आसनी’ वार्डरोब के ऊपर से उठा, दरवाज़ा बंद कर बाहर निकल गई.

  लिविंग रूम से निकलते हुए उसने अपने बेटे महमूद के कमरे से आती पॉप-संगीत की धुन सुनी. उसने कल्पना में उसे बिस्तर पर पैर फैलाए स्कूल-बुक हाथ में लिए देखा. इतने शोर के बीच ध्यान से पढ़ते रहने की उसकी क्षमता पर उसे आश्चर्य हुआ. उसने लिविंग-रूम का दरवाज़ा बंद किया और आसनी को फैलाकर नमाज़ शुरू कर दी. चार ‘रका’ पढ़ने के बाद आसनी के किनारे बैठ उसने खुदा का तीन बार उंगलियों के पोरों पर गिन आभार माना. पतझड़ के अंतिम दिन थे और शाम की अजान शुरू ही होने वाली थी और यह सोच वह खुश हुई कि वह फिर से नमाज़ पढ़ेगी. उसकी दैनिक पांच नमाज़ें उसकी ज़िंदगी के पांच विराम-चिन्ह थीं, जिन्होंने उसकी ज़िंदगी को कुछ अर्थ प्रदान कर रखा था. प्रत्येक नमाज़ का एक विशेष गुण था, जैसे हर भोजन का अपना स्वाद होता है. उसने आसनी को मोड़ा और छोटी बालकनी में बाहर निकल गई. 

वहां रखी बेंत की कुर्सी की धूल साफ कर कुछ देर वहीं खड़ी रही और फिर वहीं बैठ छठे माले से नीचे सड़क को देखने लगी. बसों के शोर, कारों के हॉर्न, सामने रहने वालों की चिल्लाहटों और पड़ोस के घरों से रेडियो की आवाज़ों की प्रतिद्वंद्विता से उपजे मिले-जुले शोर के हमलों से वह घिर गई. कारों से निकले धुएं ने अकेली बची मीनार पर पर्दा डाल रखा था, जिसे दो विशाल ऊंची बिल्डिंगों के बीच से देखा जा सकता था. सुल्तान हसन की मस्जिद की जुड़वां मीनारों में से यह अकेली बची है पुराने काहिरा में, जो कभी अनगिनत मस्जिदों और मीनारों का शहर था और जिसके पार्श्व में थीं, मोकत्ताम की पहाड़ियां और मोहमेद अली का राजमहल. 

शादी के पहले वह मादी अथवा ‘हिलवां’ के शांत उपनगरों में छोटे-से बगीचे के साथ एक प्यारे-से मकान का सपना देखा करती थी. अपने पति की ऑफिस की दूरी के बारे में सोचकर ही उसने इस फ्लैट का चयन किया था — वह भी इस परिदृश्य के कारण. बरस-दर-बरस गुज़रते गए और इस परिदृश्य को संकुचित करती, चारों ओर बिल्डिंगें उठती गईं. और कुछ समय बाद एकाकी बची यह मीनार भी किसी बिल्डिंग के पीछे गुम जाएगी.

 शाम की नमाज़ के बारे में सोच वह बालकनी से उठ किचन में अपने पति के लिए कॉफी बनाने चली गई. तांबे के कनका (बर्तन) में उसने पानी भरा और उसमें एक चम्मच कॉफी और शक्कर डाल दी. जैसे ही उसमें उबाल आने को हुआ, उसने उसे उठा ट्रे में कॉफी कप के साथ रख दिया, क्योंकि उसके पति को उसके सामने ही कॉफी को कप में डालना पसंद था. अपने पति को बिस्तर में बैठे सिगरेट पीते देखने की वह उम्मीद कर रही थी. अजीब तरह से ऐंठी उसकी देह ने उसे बता दिया कि कुछ-न-कुछ गड़बड़ है. बिस्तर के पास पहुंच उसकी आंखों को देखा, जो शून्य को ताक रही थीं और तभी उसे अचानक कमरे में मौत की गंध का अहसास हुआ. वहां से मुड़ अपने बेटे के कमरे में जाने से पहले उसने लिविंग-रूम में कॉफी ट्रे-रख दी. जैसे ही वह कमरे में गई, बेटे ने उसे देख रेडियो बंद कर दिया और खड़ा हो गया. “अम्मा, कुछ गड़बड़ है क्या?” “तुम्हारे अब्बा . .” “उन्हें फिर दौरा पड़ा है?” उसने सिर हिला दिया, “नीचे जाकर पड़ोस से डॉ. रमजी को फोन कर उन्हें जल्दी आने को कह दो.” वह लिविंग-रूम में वापस लौटी और अपने लिए कॉफी तैयार की. उसे अपने शांत रहे आने पर आश्चर्य हुआ.

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(अनुवादः इंद्रमणि उपाध्याय, उसका एकांत संग्रह, ‘संवाद प्रकाशनसे साभार)


अलीफा रिफात

अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा मिस्र के देहातों में व्यतीत किया है। अपनी कहानियों की कथा-वस्तु उन्होंने वहीं से प्राप्त की है, वे एक पुलिस अधिकारी की विधवा हैं और वर्तमान में अपने तीन बच्चों के साथ काहिरा में निवास कर रही हैं।

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