
- लाल बिल्ली
पिछले साल जब पहली बारिश हुई
आँगन में जब पहला लाल फूल खिला
मैदान में जब निकलीं पहली बार ज़मीन के भीतर से लाल लाल इन्द्रवधुएँ
तो तुम मुझे बहुत याद आये
बहुत माने बहुत
याद आये वे सारे गीत जो बारिश के नाम से जाने जाते थे
याद आये वे सारे पल, वे सारे स्वप्न और वे सारे एहसास
जिन्हें किसी बारिश में ही डूबकर मर जाना था
मगर वे फिर भी बने रहे मेरे भीतर कहीं ज़िंदा
धुले मैदान में अकेले चहलकदमी करते हुए उस दिन
लाल मखमली कीड़ों का रेंगना मुझे बहुत भा रहा था
याद आ रहा था इन्द्रवधुओं का बचपन में रखा गया रुचिपूर्ण नाम राम की बिल्ली।
वह बचपन जो लाल फ्रॉक पहनकर लाल बिल्लियों के पीछे दौड़ने का था
वह बचपन जो बीत चुका था
और ये जवानी बहुत थकाऊ हो चुकी थी
पिछले साल जी करता था फ्रेंज़ काफ़्का के नायक ग्रेगर सैमसा की तरह एक कीड़े में बदल जाऊँ
क्यों न बरसात में भटकते लाल मखमली कीड़ें में बदल जाऊँ
और हर साल केवल बारिश में ही आऊँ।
याद है जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी
तब मैं एक लाल बिल्ली ही तो थी
वह बिल्ली जिसकी आँखों पर मर गये थे तुम
और जिसकी मखमली हँसी तुम्हारे अंदर कहीं बस गई थी
पिछले साल मैं तुम्हारी वही लाल बिल्ली बन जाना चाहती थी
चाहती थी तुम मुझे रख लो अपनी शर्ट पर,
अपनी खिड़की में, अपनी छत पर,
कहीं किसी कोने में,
किसी पुराने-धुराने कबाड़े के आसपास
कहीं भी जहाँ थोड़ा खुला खुला हो
थोड़ी हवा हो, थोड़ा पानी हो और थोड़ी गर्म सांसें
मैं आम बिल्लियों की तरह दूध नहीं चुराती
मैं नन्हे बच्चों को भी नहीं डराती
मैं तो केवल पसंद करती तुम्हारा लाल दिल
तुम्हारा लाल लाल बहता लहू
मैं तुम्हारी लाल बिल्ली, जो कहती थी
मुझे जाने मत दो, मुझे सँभाल लो
मैं किसी के जूतों से दबकर मर भी सकती थी पिछले साल बारिश में…
- शत्रुता
पिता की छत से चंबल का बीहड़ नज़र आता था
और तुम्हारी छत से अरावली का पर्वत
तुम अपने शहर में जहाँ भी मुझे ले गए
अपनी लाल मोटर साइकिल पर बिठाकर
यह पर्वत हर उस जगह था
यह देखता था हमें केवल हम कहाँ देखते थे इसे
एक दिन उसी मोटर साइकिल पर बैठकर
हम उस पर्वत पर चढ़े थे
रास्ते में मिले थे कुछ राहगीर और एक पुराना मंदिर और दिन में दिया जलातीं चार औरतें
क्या अब भी वह सब है ?
मैं तुम्हें याद नहीं करती
मैं केवल याद करती हूँ पर्वत को
कि जब ये ख़बर मुझ तक पहुँच चुकी है कि
तुम्हारा पर्वत भी खरीद लिया है किसी बड़े व्यापारी ने
तो सोचती हूँ रह-रहकर
क्या तुम्हें भी हो रहा होगा वैसा ही दर्द जैसा मुझे हो रहा है आजकल
क्या तुम भी शामिल हुए होगे
अरावली पर्वत माला बचाओ मुहिम में
छत पर खड़े होकर तुमने एक बार तो सोचा होगा कि नहीं बिकना चाहिए हमारा पर्वत
या अब भी कह रहे होगे आंगन में बैठकर वही
कि सरकार जो करती है अच्छे के लिए ही करती है
और डेवलमेंट शहर के लिए ज़रूरी है
इससे ही तो बढ़ेगें हमारे प्लॉट के दाम
और मोहल्ले में हमारा नाम
सोचती हूँ रुक-रुक हर शाम
हम दोनों में क्या ख़राब था!
तुम भी सादा और मैं भी सादा
दाल-रोटी खाकर गुजारा कर सकते थे हम
बात सारी विचारों की थी
मैं विचार के इस तरफ़ और तुम उस तरफ़
मुझे तुमसे कोई घृणा नहीं
मुझे घृणा रही हमेशा तुम्हारे विचारों से
मैंने तुम्हें जो भी दिया वह प्रेम में नहीं
केवल दया और विवशता में दिया
केवल देने के लिए दे दिया
जैसे दिया जाता है घिघियाते भिखारी को दो का सिक्का
कि कैसे भी करके इससे जान छूटे
एक वैचारिक शत्रुता हमारे बीच हमेशा रही
और अब तो लगता है मेरी मृत्यु के साथ ही ख़त्म होगी।
- विधवा आश्रम
प्रेम के बिना वे जी रही हैं इस तरह
जैसे समुद्र की मछलियाँ जी रही हों पानी के बिना
मछलियाँ जिन्हें फेंक गई हैं लहरें रेत पर
मछलियाँ जो जीती हैं उन्हीं लहरों के सहारे
जो उन्हें फेंक गई हैं रेत पर
हज़ारों पैर गड़ रहे हैं इस रेत पर
पर कोई पैर ऐसा नहीं जो उन्हें वापस समुद्र में उछाल दे
समुद्र की मछलियों को जब नहीं मिलता
मटके जितना भी पानी
तब वह सड़ने लगती हैं
प्रेम के बिना वे सड़ रही हैं कुछ ऐसे ही…
वे भूल जाना चाहती हैं इस बात को कि वे कोई समुद्र की मछली हैं
मगर आँख बंद करते ही समुद्र आता है उनके सपनों में
मछलियाँ ही मछलियाँ आती हैं उनके सपनों में
पानी ही पानी आता है उनके सपनों में
उनके सपनों में नहीं आता रेत
जब वे खोलती हैं आँखें
अपने हाथों में पाती हैं रेत
सूखा-सा रेत
रेत जिसका पानी धीरे-धीरे मर रहा है
- जड़ें
अपने गाँव से कटना
गाँव से कटना नहीं है
गाँव में बसे लोगो से कटना है
ऐसे ही अपने रिश्तों से कटना
रिश्तों से कटना नहीं है
अपनी जड़ों से कटना है
जब तुम एक रिश्ता बनाते हो
तब तुम एक रिश्ता नहीं बनाते
अपनी एक जड़ बनाते हो
तुम अपने दिन, महीने, साल लगाते हो उस जड़ को और गहरे धँसाने में
जब तुम एक रिश्ता तोड़ते हो
चाहत, विवशता या अहंकार में
तो तुम एक रिश्ता नहीं तोड़ते
अपनी एक जड़ तोड़ते हो
सोचो अगर तुम सारी जड़ें तोड़ दोगे
तो तुम क्या रह पाओगे हरे ?
और अगर तुम हरे नहीं रह पाओगे
तो कैसे दोगे हवा ?
कैसे दोगे फूल ?
कैसे दोगे फल ?
कैसे दोगे जानवरों को अपनी पत्तियाँ ?
और मनुष्यों को अपनी छाँव?
बिना कुछ दिए इस धरती पर कैसे रहोगे ?
क्या बिना कुछ दिए इस धरती पर जमे रहना धरती की छाती पर मूँग दलना नहीं होगा ?
नेहा नरुका
चंबल क्षेत्र के एक गांव उदोतगढ़ (भिंड, मध्यप्रदेश) में जन्म। वर्ष 2012 से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और वेब माध्यमों पर कविताओं का प्रकाशन। वर्ष 2023 में ‘फटी हथेलियाँ’ शीर्षक से पहला कविता संग्रह प्रकाशित। वर्ष 2024 का मध्यप्रदेश का प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान प्राप्त।

