बसंत त्रिपाठी की कविताएँ

Vasant Tripathi

मुझे अब मरना होगा

मुझे उधर जाने से बचना होगा
जिधर नदियाँ हैं
क्योंकि नदियाँ बहा ले जाती हैं
दिखा जाती हैं किनारे बसी दुनिया

मुझे उधर जाने से बचना होगा
जिधर चौराहे हैं
क्योंकि संभावनाओं के रास्ते
चौराहों से ही फूटते हैं
मुझे उधर जाने से बचना होगा
जहाँ दोस्तों के ठिकाने हैं
जुलूस हैं मोर्चे हैं
बहसे हैं असहमतियाँ हैं
क्योंकि लौह बक्से में बंद आत्म का किवाड़
खटखटाते हैं सब मिलकर
मुझे अंतर की घुमड़न कह देती ज़ुबान को
नियंत्रण में रखना होगा
निर्भीकता नहीं प्रशासन को शिरोधार्य करना होगा
मैं वहाँ हूँ अब
जहाँ एकांत है शराब है
जाम से अठखेलियाँ करती
बेग़म अख़्तर की आवाज़ है
और सुनने वाले बस यही दो कान
और भीगती दो आँखें
और एक डगमगाता हुआ दिल
मुझे पचहत्तर पार बूढ़ी आज़ादी को
कंधा देना होगा
मुझे अब मरना होगा।

ईमानदारी की जेब

ईमानदारी की जेब
अंदर से फटी है
कुछ भी थहाता नहीं

सुना है कविगण
कभी तारे तक ठूँस लिया करते थे अपनी जेबों में
मैंने तो कल बस आत्मा रखी थी
वह भी फिसलकर जूते से कुचली गई
आश्चर्य कि चींटी जितनी चीख भी नहीं फूटी
बस इतने भर काम की रह गई है पतलून की जेब
कि दोनों हथेलियाँ घुसाए
खिंचवाई जा सके एक अदद रौबदार तस्वीर
विचार को सड़क पर बिछलने दें
आत्मा को जूतों से कुचलने दें
कोई वांदा नईं
पन तस्वीर खिंचवाएँ एकदम कड़क
भले न बैठे अपने समय से वैचारिक तालमेल ठीक-ठीक
प्रोफाइल पिक्चर अपडेट भोत ज़रूरी है बीड़ू !

***

22 वर्ष तक महाराष्ट्र के नागपुर के एक महिला महाविद्यालय में अध्यापन के उपरांत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन. कविता, कहानी और आलोचना में सतत लेखन. कविता की पाँच किताबें, कहानी और आलोचना की एक-एक किताब के अलावा कई संपादित किताबें प्रकाशित।

ई-मेल basantgtripathi@gmail.com

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top