1. घिसी हुईं कमीज़ों
तुम्हारी घिसी हुई कमीज़ें
दिलकश हैं,
मुलाक़ातें नहीं कर पाते
तो तुम्हारे पहनावों को
याद करने लगते हैं,
रंग तुम्हारे घिस जाते हैं
तो मेहनत रोशन होती है,
सीने से लग जाओ तो
धजा देखने वाली होती है,
खूंटी पर टंगी हुई तुम
जानी पहचानी लगती हो,
मुश्किल से जैसे तुमने
फ़ुर्सत पाई है,
अब यह गंध युक्त है,
मूल्य युक्त है,
बटन छोड़कर
थके हुए ये काज
मधुर मुस्काते हैं,
लोहा लकड़ी कागज़
इस पर छपे हुए हैं.
2. साइकिल
साइकिल आसानी से बेअसर कर देगी
ताक़त की मदहोशी को,
किसी तानाशाह को बिठा कर देख लो
वह बर्फ़ की तरह पिघलने लगेगा,
भद्दे उच्चारण टूट कर ढह जाएंगे,
और उसकी पोशाकें, जिन पर सबको शर्म आती है, खाक हो जाएंगीं,
फूहड़ बयान फूटकर
हवा में उड़ जाएंगे,
मासूम होने का अभिनय करे
तो वह क़ातिल की तरह दिखेगा
वह पैडल मारता रहेगा
लेकिन कहीं पहुँचना
संभव नही होगा,
उसके फ़ासीवादी सिपाही दलदल में
फंसे रह जाएंगे,
वह किसी के दुस्वप्न में आएगा
तो हंस नहीं पाएगा,
हू हू खड़ खड़ जैसा सुना जाएगा,
उसके अपशब्द कूड़े के पहाड़ में
जमा हो जाएंगे ,
दिल्ली लौटते हुए हमारी
साइकिल के स्पोक्स चमकेंगे,
कुछ नये गाने बजाये
जायेंगे.
3.कठिन काम
कठिन काम बहुत कठिन हैं
इनसे दूर रहने का अपना अनुभव ज्यादा
पुराना हो चुका है
कठिन काम वाले जन ठोस
और अस्पर्शनीय हैं
इन्हें दूर से देख कर बचना होता है
वरना घबराहट होती है,
इसलिए इनका तबादला दूसरी दुनिया में
नज़र बचा कर देते हैं,
इनके मां पिता, भाई बहन और बच्चे सब कठिन हैं,
इनके बूढ़े कभी गिरते नहीं
जिनकी त्वचा काई लगी चट्टानों की तरह होती है
इनके घरों को खोजना असुविधाजनक है,
बेवज़ह एक प्रतिबद्धता कायम हो जाती है
और हमारी हड्डियां और मांसपेशियां थकने लगतीं हैं,
इनको हटा कर ज्यों ही अपने विचार प्रकट करो
कठिन कामों की अविनाशी शक्लें कौंधने लगतीं हैं,
कहीं से पानी के बुलबुले फूटतें हैं
जो गायब होने से इन्कार करते हैं,
हिंसक धूप और विनाशकारी पानी इन्हें
तोड़ नहीं पाता,
हर आपदा के बाद पत्थरों पर चमक आती है
और प्रेम का ताप उजाला ले कर आता है
4. मैं कहां रच पाता हूं
मुझमें दृष्टि नहीं
पौधों जैसी,
मिट्टी की बनावट को
कहां ठीक से जानता हूं
मेरे पास मामूली योजनाएं हैं
भविष्य के लिए
मैं अपने गतिशील रक्त की भावनाओं को
नहीं समझता
अपरिचित हूं पदार्थ के गुणों से
मैं कहां रच पाता हूं
रंग बिरंगे डिजाइन वाले फूल,
मैं खींच नहीं पाता
पानी
अपनी ओर.
5.पहाड़ पर गांव
मै खिंचा चला जाता हूं
पहाड़ पर,
वहां पर बेशुमार चीज़ें हैं,
एक भी नहीं जिसे अलग किया जा सके
और लगातार आवाज़ें
जो अज्ञात मायनों की खोज के लिए
उकसाती हैं
और प्यासा छोड़ देती हैं
किसी जगह पर ठहरो तो
कई फलकों वाला एक नया दृश्य
प्रकट हो जाता है
और सभी खोहें तिरछी नज़र से
देखतीं हैं
ज्यों ही मै हटता हूं
पानी की बूंदें पत्थरों से,
चिड़ियाएं पेड़ की टहनियों से,
और कीट पतंगें जमीन से उठती
घास से
फुसफुसा कर बातें करते हैं
किसी दिन शायद पेड़ बताएंगे
( वे ज्यादा मुखर हैं )
इतने हज़ार सालों से
ये चीजें किन बातों में मुब्तिला रहतीं हैं
और किन लोगों का उन्हें
इन्तज़ार रहता है
और पिछले सालों में गांव छोड़कर लोग क्यों चले गए हैं।
6. अभियोग पत्र
एक नागरिक की सूझबूझ को विरूपित
करने की सजा कम से कम आजीवन कारावास है ,
इसे सौ करोड़ से गुणा करें
और भविष्य की ऊंचाई से,
महोदय फ़िर इसे ख़राब की गई चीजों की
लंबाई और चौड़ाई से गुणा करें,
यह भी हिसाब लगाएं कि
कुल जमा तकलीफ़ें
वायुमंडल में
कितने बरसों तक परेशान करेंगीं.
सदियों से हम इनके हिस्से का सामान गायब करते हैं और
इस बात को दबाते हैं।
7. तुम्हारी नींद
तुम्हारी सुबहें कैसी हैं, और
मिचमिचा कर आंखें खोलना,
बताओ कैसी है दुनिया,
उजाले के पर्दे पर,
कैसा है तुम्हारा ओढ़ना,
और उसके भीतर की ऊष्मा,
दोपहरों के सूनेपन में
आसमान कैसा है,
और खुशी से चमक कर
फेफड़ों का धौंकना,
तार पर सूखते हुए
कपड़ों का फरफराना ,
ऐन नींद के वक्त
वो अचानक आने वाले खयाल ,
वो पलकों का आहिस्ता से
मुंद जाना कैसा है ,
और वो फ़िक्रों का डूब जाना
गहरे समुन्दर में.
8. हिंसोल
(पहाड़ की जंगली बेरी)
मैं रास्ता भटक गया हूं
ओ हिंसोल के नन्हे और रसीले फलों
मेरी सुधबुध को जगा डालो,
मै दुनिया के प्यार में खो जाना
चाहता हूं,
सच्ची बातें सुनने पर
मैं खिल जाना चाहता हूं,
मैं बुरी आवाज़ों को खत्म
करना चाहता हूं
और अपनी दोस्तियों को
एक धुन में बांधना चाहता हूं
कोई किसी को क्यों
डराता हैं
क्यों लूट के ले जाता है
हमारी मेहनत को
ओ शर्मीले, पीतल वर्णी फल ,
मुस्कराओ ,
अपने मासूम स्वभाव
से ललचाओ और
विनम्र ताकत से
चट्टानों को
चमका दो ,
ओ रसीले !
9. तन्दूर साज
मदन तन्दूर लगा
एवज़ में मेहनताना पा
कुछ बेहतर
बेशक चेहरा मत
दिखा
चमकतीं हैं बाजू की मछलियां
पसीने की आभा में,
ये एक अलग जगह है
जिसका ताल्लुक रचनात्मक सन्तोष से है
और उस ईमानदार फ़िक्र से
कि आटे में न सन जाए
टपकती बूंदें
पैंतालीस डिग्री सेन्टीग्रेड ताप में
भट्टी के साथ लगे रहना कोई खेल नहीं,
और उसका नाम कहीं जाएगा नहीं
देर रात हो चुकी
अब घर जा ,
अलगनी से
कमीज़ उठा .
10. गन्दे कीड़े
इन वर्षों में सुबह होती है,
गन्दे कीड़े घरों में
घुस जाते हैं,
वे शब्दों को ख़राब करते हैं
इस फ़िक्र में रातें ख़राब होतीं हैं
वाक्यों का मतलब बिगड़ जाता है
उच्चारण से दिमागों में कलह मचती है
पहले वे हमारी सहनशीलता को कुतरते हैं
जिससे हमारी चौखट पर बदबूदार बुरादा जमा होता है
बिफरी हुए वर्णमाला को दर्द होता है
जब हम नींद में होते हैं,
अपनी लार में सने कीड़े भविष्य को बर्बाद करते हैं
और दांत फाड़कर हंसते हैं।
भद्दे इशारों से खिजाते हैं।
फ़ोटो खिंचवाते हैं।
उछलते जाते हैं।
11. पिछवाड़े में बारिश
पिछले दरवाज़े और खिड़की पर
टूट पड़ रही बारिश
आड़ू के पेड़ से लिपट कर
थिरक रही लताएं
टूटी हुईं कुर्सियां, खाली डिब्बे, बोतलें,
जंक खाए कनस्तर
छोड़ी हुईं तमाम चीज़ें भीग रहीं हैं
पिंडालू के चौड़े पात पर
डग डग करतीं चमक रहीं हैं पानीदार आंखें,
थप थप, थप थप जैसी धुन
गाढ़ी होती जाती है।
छूटी हुई प्रतिज्ञाएं कहीं भी हों
उनकी आवाज़ें बची रहतीं हैं
बिसराई गई बातें बुलबुलों
की तरह फूटतीं हैं।
12. आवर्त सारिणी
मेण्डेलीफ़, मेण्डेलीफ़
आवर्त सारिणी मेण्डेलीफ़
सौ के लगभग तत्व विश्व में
तरतीबों का पता बताये
शनैः-शनैः घटते-बढ़ते रूप रंग गुण
दल आवृत्ति गुणधर्म बताये
परमाणु अंक क्रम सृजन युक्तिमय सृष्टिरूप अन्तस दिखलाये
दत्तचित्त मन आवेग सुकेन्द्रित
आवर्त सारिणी मेण्डेलीफ़
जो तुझमें है वो मुझमें है
दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे बद्ध तालिका
यही हमें जतलाती
यह अबूझ जीवन की लीला
ललचाती भरमाती
जागें, जाने मिल प्राणतत्व
भाव भौतिकी गुंफन खोलें
उमड़ घुमड़ ज्ञान पिपासा
सुधि की आस जगाती
माया भेद उजागर करती
आवर्त सारिणी मेण्डेलीफ़.
13. दो पत्तों सहित अमरूद
साइकिल पर सरपट भागते कभी पैडल मारने से
उछल जाएगी खुशी
वह तारे सी झलकेगी
दिल के शीशे कुछ पल उसे रोकेंगे
फेरी वाले का गला थक जाए
यदि आवाजों में वह कभी न चमके ,
थके जिस्म की कोशिकाओं के चटकने से भी वह फूट पड़ती है,
दुखों के बीच में उसे जगह मिले तो अचरज नहीं
हम धरती पर साँस लेते हैं
पानी पर लहरें आती हैं
मियाँ जी ने दो पत्तों सहित अमरूद रखा तराजू पर
उधर बाट आकाश में झूलने लगा।
14. खिलौने
बच्चों तुम कितनी ही रचनाएँ खिलौनों की तरह तोड़ चुके हो
तुम दौड़ते हुए आए और कभी पहली ही पंक्ति लेकर भाग गए
तुम्हारी हड़बड़ी में कभी काँच के बर्तन की तरह
कोई कविता टूट पड़ी और हँसने लगी
मुझे बहुत गुस्सा आता है
लेकिन मैं अपना सोच छोड़कर तुम्हारी बातें सुनने लग जाता हूँ
हद है, मेरी आधी-अधूरी कविता को
चादर की तरह ताने
घर बना कर छिप जाते हो,
एक के पीछे एक इस तरह चलते हुए आते हो
जैसे कि मैं चाहता हूँ शब्द रचते हुए चले आएँ
चलो यह भी सही कि तुम मुझे कवि न बनने दो
और सारी पंक्तियों को उठा कर खिलौने बना लो।
सोने की गेंद.
पाण्डव खेलें कौरव खेलें
सोने की गेंद से मिलजुल खेलें
नभ खेले झिलमिल परबत पर
उछल मचल जलधारें खेलें
चिड़िया के पंखों से खेलें हवाएँ
डाल-डाल पर डालें खेलें
चाँदी की हँसिया नदिया जैसी
बाला के संग भेड़ें खेलें
तीखे पाथर मृदुल भये अकुलाये
बादल किलक पुलक कर खेलें
हिन्दू खेलें मुस्लिम खेलें
धूप की किरणें मुख पर खेलें।
(गढ़वाली लोकगीत की एक पंक्ति से प्रेरित)
***
राजेश सकलानी
1955 में उत्तराखंड में जन्मे राजेश सकलानी हिन्दी के सुपरिचित कवि हैं। उनके तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। उनकी कविताओं में जीवन, प्रकृति और मनुष्य के सूक्ष्म संबंधों की मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है। साहित्यिक जगत के शोर-शराबे और आत्मप्रचार से दूर रहकर उन्होंने अपने एकांत और खामोशी को ही सृजन का आधार बनाया है। सामान्य जनजीवन, प्रकृति, पर्यावरण और मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता उनकी काव्य-दृष्टि को विशिष्ट बनाती है।

