जिलानी बानो

“सलाम अलेकुम मौलवी साहब…..”
सब बच्चे मौलवी साहब को देखकर ख़ुश हो गये।
” मौलवी साहब आज मैंने अल्लाह मियाँ को ख़त लिखा है कि वो हमारे अब्बा को बहुत से रुपये भेज दें” मुन्नी ने ख़ुश होकर मौलवी साहब से कहा।”
“अल्लाह मियाँ को ख़त नहीं लिखते हैं बेटी।” मौलवी साहब ने मुन्नी को समझाया।
“क्यूँ? क्या अल्लाह मियाँ को भी उर्दू पढ़ना नहीं आती है?” मुन्नी ने ताज्जुब (आश्चर्य) से पूछा।
सड़कों पर भीख माँगने वाले, मज़दूरी करने वाले, झोंपड़ियों में रहने वाले बेसहारा बच्चों को मौलवी साहब मस्जिद के आँगन में बैठाकर मज़हबी तालीम देते हैं।
” अल्लाह मियाँ से दुआ माँगो, अल्लाह मियाँ तुम्हारी सुन लेंगे।”
” बाबा….अंधा…… हूँ। एक रुपया दे दो। अल्लाह आपको हज़ार रुपए देगा।” मस्जिद के दरवाज़े पर खड़ा इक बूढ़ा फ़क़ीर चिल्ला रहा था।
” मौलवी साहब …..क्या अल्लाह मियाँ उस भिखारी की दुआ सुन लेते हैं?” एक बच्चे ने मौलवी साहब से पूछा।
” तो वो भिखारी अपने लिए अल्लाह मियाँ से हज़ार रुपए क्यूँ नहीं मांगता?”
बच्चों के इन सवालों से मौलवी साहब घबरा गए। उन्होंने सबको डांटना शुरू किया।
” बकवास बंद करो…..कल मैने तुमसे क्या कहा था…?
नमाज़ पढ़ा करो …..झूठ मत बोलो…..चोरी मत करो।”
” वो मौलवी साहब …..मुन्नी झूठ बोलती है…” एक लड़के ने मुन्नी को सामने धकेल दिया।
” और उसने कल दुकान पर मिठाई चुरा कर खाई थी।”
” तो क्या अल्लाह मियाँ मुझे उस वक़्त देख रहे थे….?” मुन्नी ने घबराकर कहा।
” हां। अल्लाह मियाँ हर एक को देखते हैं। हर काम अल्लाह की मर्ज़ी से होता है।” मौलवी साहब ने मुन्नी को समझाया।
” अच्छा……? मुन्नी के पास बैठे हुए शाकिर ने ताज्जुब से मौलवी साहब को देखा।
“अल्लाह मियाँ इतने बहुत से काम कैसे करते हैं….?
” स्कूल से आने के बाद तो मुझसे होमवर्क भी नहीं होता। टीचर से कह देता हूं कि मुझे बुख़ार आ गया था।” शाकिर पास बैठे दोस्तों से कहने लगा।
सब बच्चे हंसने लगे। मगर मौलवी साहब ने सबको डांट दिया।
” ख़ामोश ….बदतमीज़….”
” अगर तुम झूठ बोलोगे। चोरी करोगे तो अल्लाह मियाँ तुम्हें दोज़ख़ (नरक) में डाल देंगे।” मौलवी साहब ने डरावनी सूरत बना कर बच्चों की तरफ़ देखा।
सब बच्चे भी डर गए। मुन्नी और शाकिर भी घबराकर इधर उधर देखने लगे।
” दोज़ख़ में क्या होता है….?” एक और बच्ची ने मुंह खोलकर पूछा।
” दोज़ख़ बहुत बुरी जगह है।” मौलवी साहब ने डरावनी सूरत बनाकर….…इस तरह कहना शुरू किया कि बच्चे डर जायें।
” जो लोग बुरे काम करते हैं। चोरी करते हैं, झूठ बोलते हैं। अल्लाह मियाँ उन्हें दोज़ख़ में डाल देते हैं ”
” दोज़ख़ कहां है मौलवी साहब?” एक बच्चे ने घबराकर पूछा।
” दोज़ख़ ऊपर आसमान पर है। वहाँ अंधेरा होगा। भूख लगेगी मगर खाना नहीं मिलेगा। पीने को पानी नहीं होगा। साँप बिच्छू काटने को आयेंगे। बिछाने को बिस्तर मिलेगा न ओढ़ने को चादर मिलेगी।”
मौलवी साहब डरावनी शक्ल बनाकर बच्चों को दोज़ख़ का हाल सुनाकर डरा रहे थे। सब बच्चे डर के मारे एक दूसरे के क़रीब आकर मौलवी साहब की बातें सुन रहे थे। फिर बच्चे ऊपर आसमान की तरफ़ देखने लगे।
” मैं तो दोज़ख़ में कभी नहीं जाऊँगी।” एक छोटी-सी लड़की मुन्नी के पीछे छिप गई। मगर मुन्नी ने उसका हाथ थाम कर समझाया। ” अरे! रज़िया…? तू क्यूँ डर रही है?” मौलवी साहब को नहीं मालूम है। दोज़ख़ आसमान पर नहीं है। मुन्नी ने रज़िया को थाम लिया।
” अच्छा ….? मैं झूठ बोल रहा हूं….?” मौलवी साहब को ग़ुस्सा आ गया। उन्होंने बाक़ायदा छड़ी उठा ली।
” इतनी-सी छोकरी…मेरा मज़ाक उड़ा रही है? तू मुझे दोज़ख़ में ले जाएगी…..?
मौलवी साहब के हाथ में डंडा देखकर मुन्नी डर के मारे अपनी सहेली के पीछे छिप गई और फिर दोनों हाथ कान पर रख कर रोते हुए बोली।
” मैं झूठ नहीं बोल रही हूं मौलवी साहब। जंगम बस्ती में हमारी झोंपड़ी दोज़ख़ में है। रात को जब हमारा बाबा पी कर आता है। अम्मा को मारता है तो अम्मा रोते-रोते बोलती है। ये घर तो दोज़ख़ है।”
” अच्छा…..तो तेरी माँ बोलती है कि तेरा घर दोज़ख़ में है…..?
” हाँ मौलवी साहब। हमारा घर भी दोज़ख़ में है…..आप बोले न दोज़ख़ में अंधेरा होगा। खाना पीना नहीं मिलेगा। हमारे घर में भी लाइट नहीं है। दिये में तेल नहीं होता तो अंधेरा हो जाता है।”
” और हमारे घर में पानी भी दूर से लाना पड़ता है। रात को पानी ख़त्म हो जाता है।”
” रात को भी हमारे अब्बा चावल नहीं लाते थे तो अम्मा ख़ाली हांडी में पत्थर डाल कर झूठ बोलती है कि खाना पक रहा है।” एक बच्चा रोने लगा।
बच्चों की बातें मौलवी साहब ग़ौर से सुनने लगे।
” इसलिए हमारी दादी गाँव से नहीं आती। बोलती तुम्हारे घर में ओढ़ने को आसमान बिछाने को ज़मीन है।” सब बच्चे हंसने लगे।
” और बारिश होती है तो हमारी झोपड़ी में पानी आ जाता है।”
” रात साँप भी निकला था।”
बच्चों की बातें सुनकर मौलवी साहब का सिर झुक गया। उन्होंने दिल ही दिल में सोचा
“अब कौन-सा अज़ाब बचा है जिससे इन बच्चों को डराऊँ मैं।”
अचानक मस्जिद के बाहर शोर होने लगा…..लोगों के रोने चिल्लाने की आवाज़ें …. फ़ायरिंग का शोर…..चारों तरफ़ लोग भाग रहे थे। रास्ते बंद कर दिए गए थे।
किसी शानदार होटल में बम फटा था।
उस के पीछे मज़दूरों की बस्ती में आग लगी थी। हर तरफ़ आग के शोले नज़र आ रहे थे। मौलवी साहब से पढ़ने वाले बच्चे इसी बस्ती से आये थे। शायद इन बच्चों के घर भी जल रहे थे।
बच्चे डर के मारे रोने लगे। मौलवी साहब भी उन बच्चों से पीछा छुड़ाकर कहीं भाग जाना चाहते थे। मगर पुलिस ने सारे रास्ते बंद कर दिए थे।
सब बच्चे डर के मारे मौलवी साहब से लिपट गए थे। ” मौलवी साहब हमें डर लग रहा है।”
” अब हम घर कैसे जायेंगे?”
” मौलवी साहब…..क्या आज दोज़ख़ सड़कों पर आ गई है……”
” मौलवी साहब…..आप हमें फिर दोज़ख़ की तरफ़ क्यूँ ले जा रहे हैं….जन्नत (स्वर्ग) की तरफ़ चलिये न.…..”
बच्चों के सवालों से घबरा के मौलवी साहब इन बच्चों को अपने हाथों से छिपाते एक कोने में खड़े थर – थर काँप रहे थे।
” या अल्लाह तूने इन बच्चों के लिए दोज़ख़ तो ज़मीन पर ही उतार दी है।”
” जन्नत में जाने का वादा हश्र (क़यामत या प्रलय) के दिन पर क्यूँ टाल दिया है……?”
” ऐ ख़ुदा! मुझे वो रास्ता बता दे कि मैं इन बच्चों को जन्नत में ले जाऊँ।”
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जिलानी बानो
आधुनिक उर्दू साहित्य की एक अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रगतिशील लेखिका, उपन्यासकार और कहानीकार थीं। महिलाओं की स्थिति, सामाजिक चेतना, और हैदराबादी तहज़ीब को अपनी कहानियों में जीवंतता से उकेरने के लिए जानी जाती हैं।
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अनुवादः नरगिस फ़ातिमा
fatima.huma1320@gmail.com

