ललन चतुर्वेदी  की कविताएँ

  1. एक और तस्वीर

    एक और तस्वीर है
    जो कभी किसी कैमरे से कैद नहीं की जा सकी
    उसके रंग अलग-अलग थे
    कभी – कभी तो यह इन्द्रधनुषी होकर उतरती थी

    आखिर, क्या हो सकती है इसकी वज़ह
    ध्यान आंखों की ओर गया
    जिसके कैमरे से वह तस्वीर ली गई है
    और उसकी जेपीजी इमेज फीड कर दी गई
    मस्तिष्क के हार्ड डिस्क में
    वह इस तरह सेव हो गई कि उसे  डिलीट करने का कोई ऑप्शन नहीं था
    अब इसे मिटाने के लिए क्यों किया  जाए किसी से विफल अनुरोध

    सबके अपने कैमरे हैं
    जिसे वे हरदम गरदन में लटकाए घूमते रहते हैं
    और पलक झपकते ली गई एक क्लिक को
    बना देते हैं प्रोफाइल पिक्चर
    जबकि दूसरे कोने से ली जा सकती थी एक मुक्कमल स्पष्ट तस्वीर

    विडंबना यह रही है कि  एक  को दिखती थी जो ब्लैक
    वही दूसरे को दिखती थी ह्वाइट ।


2. टर्मिनस


शालीनता का तकाजा यह है कि
हम अंधे को अंधा नहीं कहते
दुश्मन के सामने उसे दुश्मन नहीं बोलते

दुःख को इतना पोशीदा रखते हैं
कि दूर से किसी को आते देख
पोंछ लेते हैं रूमाल से आंसू
लाख गम  पीछे  धकेल कर
होंठों पर ओढ़ लेते हैं मुस्कान

अपने वश में तो इतना ही है कि
नेत्रों में धवल ज्योति के बावजूद
स्वयं को अंधा कहे जाने पर भी
नहीं दर्ज करते कोई आपत्ति
कुछ अनर्गल प्रश्नों का जवाब होता है मौन
और उससे भी अधिक कड़वे सवालों को
हल किया जा सकता है मुस्कान से

सह‌-अस्तित्व को स्नेहोपहार समझ लिया जाए
कुछ कम है क्या साथ – साथ चलना भी
सफर भले ही  रेल- पटरियों का हो

समझ  के अभाव में  लंबा लगता है सफर
जबकि दूरियां ही दूरियों को कम करती हैं
जरूरी नहीं कि हर यात्रा की हो कोई मंजिल
हर अगले क़दम के लिए उत्साह भरता है
एक सुनिश्चित टर्मिनस
पथिक के लिए यही है बड़ा संबल
और इस तरह असुविधाजनक स्टेशनों से गुजरते हुए वह मुस्कुरा उठता है।

3. नींद

वह मेरी नटखट सहेली
धीरे-धीरे प्रेयसी बन गई
बड़ी बातूनी है
खोद – खोद कर पूछती है सवाल पर सवाल
उसे डांट देता हूं तो छाती से चिपक कर रोने लगती है
उसे गुदगुदा देता हूं तो हंसने लगती है

बिस्तर पर आते ही कहती है –
घूमने नहीं जाओगे शिमला मनाली
अरे,इस उम्र में तूने कैसी सूरत बना ली ?

जब चुप हो जाता हूं तो ले जाती है
अतीत के गलियारे में
और मुखर होकर पूछती है –
कल का मौसम कैसा रहेगा ?

बातों ही बातों में उलझाए रखती है
मुझे प्यास लगती है
और बाहर निकल कर देखता हूं
दूर क्षितिज पर अकेला दिखता है शुक्र तारा

धीमे पैरों से पीछे – पीछे आती है और कान में हौले – हौले कहती है –
उठो,सबेरा हो गया
टहलने नहीं जाओगे?

नींद मेरी सबसे नटखट सहेली है
मैं उसका  बेसब्री से इंतजार करता हूं।

4. मृत्यु

तुम्हें मालूम नहीं कि कितना व्यस्त हो गए हैं लोग
कि दुआ – सलाम तक के लिए नहीं है समय
गनीमत है कि कभी- कभी राह- चलते हाथ हिलाकर 

इशारे से पूछ लेते हैं एक-दूसरे का हालचाल
सुबह से शाम तक सर पर पांव उठकर भाग रहे हैं लोग
जैसे कि किसी खुफिया एजेंसी से कर रहे हों अपना बचाव

अरसे बाद जिगरी दोस्त मिलते ही

कुशल – क्षेम पूछे बग़ैर देने लगता है स्पष्टीकरण –
“सांस लेने की भी फुरसत नहीं है यार!
तुमसे घर पर नहीं मिलने का है मुझे भी अफसोस
आने के पहले कर लिया  होता एक  फोन  ।”

मैं देखता रहा देर तक उसे चुपचाप
अचानक उभरने  लगे आंखों में जीवन और मृत्यु के समानांतर दृश्य
सोचने लगा-
“इस व्यस्त समय में सबको सूचित होने का है अधिकार
मृत्यु को भी बतलाना चाहिए आगमन का समय
उसे  भी निभाना चाहिए न्यूनतम शिष्टाचार ।” 

 

5. कवि की कब्र पर

उसने तुम्हें  दिया है पुनर्जन्म
उसकी आंखों से देख रहे हो इतनी सुन्दर दुनिया
उसकी विवेकी नजरों से परख सकते थे भला- बुरा

उसी के लगाए पौधे हो
उसी ने सुबह-शाम सींचकर दिया है  वृक्षाकार
और अब तुमने धारण कर लिया है
आंखों पर पावर वाला सुनहरा चश्मा

जिन किताबों के बल पर  मिली हैं तुम्हें अकादमिक डिग्रियां
जिन किताबों के बल पर बैठे हो ऊंची कुर्सी पर
बतला रहे हो वे तुम्हारे  लिए कौड़ी काम की नहीं हैं
वे किताबें जो देती हैं प्रेम का संदेश
उन्हें तुम नफरती बतलाते हो
कविताओं को पढ़ते हुए
भूल ग‌ए पढ़ना कृतज्ञता का पाठ

जानते  हो कवि अब दिवंगत हो चुका है
वह कभी नहीं आयेगा करने कोई प्रतिवाद
कभी देखा है उसकी आंखों में किसी के लिए विरोध ?
नाराज़ कवि के रास्ते अलग हो सकते हैं
लेकिन हृदय के कोने में धड़कता रहता है मनुष्य मात्र के लिए सनेह
यह तो जानते ही हो प्यारे दोस्त!
कवि की कब्र खोदी नहीं जाती
उन पर फूल चढ़ाए जाते हैं ।

***

ललन चतुर्वेदी

प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी , यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित।

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