चाकू समय

सोनू यशराज

sonu yashraj

शाम पाँच बजते ही भूख उसके आसपास मंडराई और गली-कूचों, चौराहों पर खाने-पीने के ठेलों की धमक भी। भूख जगी थी पर सिर्फ खाने की ही नहीं, किसी चटपटी ख़बर की भी।

 स्थानीय अख़बार और टीवी चैनल से जुड़े युवा पत्रकार अनुज के पास जब ख़बरें चल कर नहीं आतीं तब वह चल देता है उन्हें लेने। उसके रिर्पोटर दिमाग ने कहा, मॉल में कोई धमाकेदार न्यूज़ मिल जाए तो एक फीचर लिखने का समय भी मिल जायेगा। और आज  छुट्टी के दिन बिजली की आँख-मिचौली से घर पर गर्मी और उमस का घेरा था। ऐसे में शहर में खुला नया ए.सी. मॉल उसके लिए शानदार चाबी थी।
अनुज अपने पुराने स्कूटर पर तंग गलियों से चौड़े रास्तों की ओर तेजी से मुड़ा। चित्तौड़ की फ़ोर्ट रोड मार्किट से आगे मुड़ते ही दिखता है हरा-भरा जनता पार्क और चुप्पा-सा सामुदायिक केंद्र। उसके ठीक सामने है हाल ही में बना गोल्डन लाइफ मॉल, जिसके बाहर कतार में खड़े, भूख जगाते खट्टे-मीठे-चरपरे गोलगप्पे,चाट,फल,जूस के ठेलों पर शाम की भीड़ आ जुटी है।

मॉल की पार्किंग से निकलकर बेवजह मोबाइल टटोलते बाहर खड़े अजनबियों के बीच परिचितों को ढूंढ़ता है अनुज ,क्या पता कोई दोस्त मिल जाए।

मॉल के बाहर चित्तौड़ की पुरानी संस्कृति बर्फ की सिल्ली की तरह जमी हुई है। दिखती है और न जाने कब वक़्त की तपिश से गायब हो जाती है। टुकड़ा कांच से सजे काले झोलझाल पहनावे, खंजर जुबान, तीखे नयन-नक्श और तेज औजारों के साथ गाडिया लुहार खड़े हैं। इन लुहारुओं के पास में एक फल का ठेला ‘काट के नहीं, छांट के लीजिये ‘ का बोर्ड लगाए हुए है। लुहार का छोरा भी एक बोर्ड लगा रहा है-‘छांट के नहीं काट के लीजिये।’
         तौबा!!आज भी अपनी मनमर्जी के मालिक हैं ये गाडिया लुहार, जो जँच जाये, भई वह तो करके रहेंगे। मेवाड़ के बड़े- बूढ़ों की जुबान पर कटार से लिखे हैं इनकी गौरव गाथा के जुझारू किस्से। जन्मभूमि की स्वतंत्रता के लिए कैसे-कैसे कठिन प्रण किये-दुर्ग पर नहीं चढ़ेंगे, घर नहीं बनाएंगे, मिट्टी के बर्तन में खाएंगे, भूमि पर सोयेंगे। बड़ी मान-मनोव्वल के बाद अपना प्रण छोड़ते इस दुर्ग के प्रवेशद्वार पाटनपोल आये थे ये स्वाभिमानी गाडिया लुहार।

“सच हर पीढ़ी के हिस्से में आते हैँ अपने-अपने संघर्ष।”

अनुज के भीतर रह रहकर अपनी और नाना की आवाजें गूँजती हैँ और अपने शहर के किले के अद्भुत दृश्य बनते-बिगड़ते जाते हैँ। उसकी धड़कन में धम्म से आ धमकता है कैशोर्य की ओर लम्बे डग भरता बचपन। उस उम्र में नाना का अनमोल साथ कभी नहीं भूलता और न ही भूलता है चित्तौड़ किले का विराट दरवाजा-पाटनपोल।

“नानू……और कित्ती दूर है किला”
“वह तो रहा सामने….देख सूरज… पाटनपोल की चौखट पर तेरी राह देखता”
वे सातों दरवाज़े पार कर किले से लौट रहे थे तब नानू की सारी थकन दूर हो गई, वे अनुज का हाथ थामें वीरों की गाथायें सुनाते रहे। माटी के लाल हमारे राणाजी जीवन भर मेवाड़ की रक्षा के लिए गोगुंदा की पहाड़ियों में भटके, चेतक पर जागे सोये, घास की रोटी खाई। मुगलों के हथियाए हुए किले पर किले जीतते रहे। गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया। लला, ये इतिहास की किताब के वे सुनहरे पन्ने हैं जो आज भी दमकते हैं।

उसी रात अनुज दादी से मिला और उन्हें किले की दीवार जितनी लम्बी किले की सैर की बात सुनाई। छोटी कद-काठी की रुआबदार दादी मुस्कराती रही। फिर उसकी पीठ थपथपाते हुए सिर में तेल डालते हुए बोली-
“ये न बताया तोकू नाना ने, उस माटी में कपट के छींटे भी हैं। जिनके शिकार हुए सुख-शान्ति से जीवन बिताते हमारे पुरखे। वे असमय, असहाय होकर काल के पेट में चले गये। अरे,पैर रखते ही जमीन पूछती होगी उन कपटियों के ज़मीर का ठौर ठिकाना। किले के दोनों ओर बहती गंभीरी और बेड़च नदी में झाँकों, दिखेगा उनके राक्षस मन का प्रतिबिम्ब।”

“सब पर आँख मूँद बिस्वास न करना मेरे लल्ला..जहाँ भरोसे की दीवार, वहीं कपट की खिड़की।”

शायद यही लम्हें थे जो अनुज की पगथलियों से चिपक के रह गये। हर कदम के संग चलती है संशय की छाया।
“माँ सही कहती है, सिर की चम्पी करते हुए गर्दन और पीठ ने जो सुना, वह सीधे दिल और दिमाग दोनों में छप जाता है।”
संदेह का बीज कब उसके भीतर वृक्ष बन गया पता ही नहीं चला। नियति ने भी अनुज को पत्रकार बना दिया। उसकी चर्चा और आलेख के विषय होते हैँ मार-काट, चोरी-चकारी, खून-खराबा वाली ख़बरें। जिन्हें वह ढूँढ़ता, लिखता, छापता है। ख़बर की बानगी भी एक से एक बढ़कर। मसलन पिछले साल चौदह अप्रैल की सुबह सिडनी के एक मॉल में एक शख्स ने अचानक नौ लोगों पर चाकू से हमला कर दिया। भागता हुआ सिरफिरा हत्यारा एक सिक्योरिटी गार्ड की गोली से मारा गया। परसों ही आपसी रंजिश में यहाँ तीन स्थानीय लोगों ने तलवार के वार से एक दूसरे की जान ली।

“ज़रा सोचिये समय ने कैसे साधा होगा, एक ही समय में तीन या दो लोगों के सर धड़ से अलग हुए होंगे, तीन हुए तो क्या एक ने बिना सर वार किया? पल भर के समयान्तर से पूरा दृश्य बदल जाता, एक बच भी सकता था। और इससे पहले की ख़बर जो प्रथम दृष्टया आत्महत्या प्रतीत हो रही थी, वह सोची-समझी हत्या की साजिश थी। मरने से पहले के वीडियो में उसकी मानसिक स्थिति ठीक न दर्शाना उस छल का सोचा-समझा हिस्सा।”

इन दिनों अनुज दोस्तोवस्की के ‘क्राईम एंड पनिशमेंट’ को दुबारा पढ़ते हुए अपराध मनोविज्ञान को समझ रहा है। नायक अपराध घटित होने के बाद रोज़ मानसिक यन्त्रणा से गुजर रहा है। उस एक क्षण की गलती को जीवन भर अपने कंधों पर ढोने का साहस नहीं उसके पास।
अनुज को अब हर जगह अपराध नज़र आता है। ओह्ह्ह उसका दिमाग़ ऐसी ख़बरों का रसिक बन चुका है।

पहले-पहल तो खून का रंग देखकर अनुज की आँख मुंद जाती थी। जब तक साहित्य और संस्कृति कॉलम देखता था तब संवेदनायें जीवित थीं। पर छः सात महीने पहले उसे क्राइम न्यूज़ संभालनी पड़ी। तब से हमेशा गूंजती है उसके कानों में दादी की महीन खरखराती आवाज़ –

“सब पर आँख मूँद बिस्वास न करना मेरे लल्ला..जहाँ भरोसे की दीवार, वहीं कपट की खिड़की।”

मॉल के बाहर ठेलों पर शोर बढ़ गया है।अनुज की नज़र अब गाडिया लुहारों के धारदार चाकू, कैंची जैसे औजारों पर और उन्हें लेने वालों पर आ टिकी है। उसके सामने पीठ किये खड़े शख्स ने अभी-अभी गाडिया लुहारन से बड़े- बड़े दो चाकू लिये। सामान्य से ऊँचे कद और गठीली देह वाली इस लुहारन को देखकर लगता है कि ये चाकू बनाना ही नहीं,चलाना भी जानती है।
“धारदार देना, रसोई के लिए.. खच्च..से काट दे”
“और दूसरा बाबू …”

दो चाकू और लुहारन की खरखराती आवाज़ सुनकर अनुज के कान खड़े हो गये। उस अजनबी को देखने के लिए वह सामने आ गया। उस मामूली से दिखने वाले जनाब के पास पहले से ही एक हथियार था -मुस्कराहट का, जिसने लुहारन की कंजी आँखों में बिन बोले ही कह दिया –
“….जाने दीजिए”
अब लुहारन ने चाकू जाँचने के लिए एक मोटी लकड़ी उठाई है, जिसे उस व्यक्ति ने हाथ के इशारे से मना कर दिया।
“कौन है ये? ”
एकदम आम आदमी जैसा औसत कद और दबी रंगत, चाल ढाल। उस पर तुर्रा ये कि गाल लब के साथ मुस्काते और आँखें नाराज़गी से भरी, सामने वाले को कच्चा चबा जाने वाली तुर्शी लिये हुए।
सामने अतरंगी किरदार हो तो दिमाग में कलम चलने लगती है। अकेला आदमी चाक़ू के साथ मॉल की ओर मदमाती चाल से बढ़ रहा है। मॉल के अंदर जाते हुए वह ठिठका। पीछे से आ रही महिला उससे टकराते-टकराते बची। बाहर की ताबड़तोड़ गर्मी से मॉल का दरवाजा खुलने पर मिलने वाले ठंडक के सुख से तृप्त, उसने महिला को देखा ही नहीं।
सामने मेटल डिटेक्टर लिए गार्ड खड़ा है। उसने गार्ड के सामने अख़बार में अच्छी तरह से लपेटे चाकू बैग से निकाले और उन्हें दरवाजे के दूसरी ओर पड़ी मेज पर रख दिया। गार्ड ने बैग और पीठ पर मेटल डिटेक्टर घुमाया और अब वह अंदर था ।
जाते-जाते वह चाकुओं को उठाना नहीं भूला।
ओह गार्ड की उदासीनता ! यंत्रवत मेटल डिटेक्टर घुमाते गार्ड का उन चाकुओं की ओर ध्यान नहीं गया,या गया भी हो तो उसे कोई परहेज़ नहीं।

“आजकल कोई कुछ भी पूरा जानने को उत्सुक भी नहीं, जानना नए सवालों का हुजूम खड़ा करता है। पर सवालों से बचना इस युग की फितरत है। हुजूम सिर्फ हामी भरे ,क़सीदे काढ़े, तभी सबका प्रिय।” 

पर अनुज ऐसे संदिग्ध व्यक्ति को जाने बिना कैसे जाने दे? चाकू का सवाल अनुज को काट रहा है। वह यथावत दूरी रखता हुआ स्वतः उसका पीछा कर रहा है। मॉल की ठंडक से दिमाग ठंडा होकर दिल से कहता है किसी को गलत क्यों समझें , दुनिया में कितने लोग एक चींटी भी नहीं मार सकते ।
इधर मॉल का दरवाज़ा बन्द हुआ उधर वही खंजर दिमाग वाली खिड़की खुली। मॉल की ठंडक वाला अहसास उड़न छू हो गया है।
वैसे भी कुछ मिल जाए तो थोड़ी ही देर बाद अपनी उपयोगिता खो देता है ।
मॉल में सजे शो रूम, परफ्यूम की महक, चहल-पहल अब दृश्य नहीं सिर्फ आवाज़ें भर हैं। इस क्षण विचारों में बस वह व्यक्ति और चाक़ू घूम रहा है। निगाह कहीं और नहीं। इक आधी–अधूरी घट सकने वाली हिंसक कल्पना दिमाग़ ने बुनी कि खलबली शुरू।
चित्त के घोड़े दूसरों की हरकत और हकीकत जानने की धुन में दौड़ -भाग करने में कभी ना थकते -रुकते। चाहे प्रत्यक्ष रूप से हम किसी से ना जुड़ें ,भीतर द्वंद पैदा कर खूब टकराते हैं।
“चाकू समय है ये दोस्तों !! ” ये जुमला साहित्यिक चर्चाओं में खूब सुना था। हामी भरने वाले चाहें सियार हों, मंजूर हैं। सीधापन शंकालू नज़रों से देखा जायेगा। अपनी छवि निर्माण में दूसरे की टोपी उछालने से बाज नहीं आने वाला समय है ये।
“पर इतिहास गवाह है, क्या हर पीढ़ी नहीं झेलती कपटी लोग और चाकू समय!! ”
अनुज का दिमाग ख़बर बना रहा है। किसी से कह दूँ या पुलिस को सूचित करूँ तो ख़बर कैसे बनेगी। मॉल में दो बड़े चाकुओं के साथ घूम रहा है एक आदमी। उसकी घातक प्रवृति की धार उन ताजे बने चाकुओं जैसी हो भी सकती है और नहीं भी।
“ओह , अगर मॉल के दरवाजे पर मन का एक्सरे लेने वाला मेंटल डिटेक्टर हो तो अनुज का दिमाग चाकू से भी ज्यादा धारदार हिंसा से भरा होगा। किसी व्यक्ति को लहूलुहान होते देखना, ख़बर का यूएसपी है।”
“चाकू उस व्यक्ति के पास है और खून….अनुज की कलम कर रही है।”
उसकी जिज्ञासा उन चाकुओं के प्रयोग को जानने की दिशा में द्रुत गति से बढ़ती जा रही है और अर्जुन की एकाग्र दृष्टि की भांति चाक़ू पर छिद्रान्वेषण करती सुई अटक गयी है ।
उसके संपादक ने क्राइम रिपोर्टिंग सौंपते हुए कहा था-“अनुज, हम सबमें कुंडली मार कर बैठी है किलर इंस्टिंक्ट। द्वेष, निंदा, जजमेंट मानवीय स्वभाव का हिस्सा बन गया है। किलर इंस्टिंक्ट  को हुनर में बदलते देखने की नज़र खोते जा रहे हम। सीमा पर डटे मुस्तैद जवान, खेल मैदान में जुझारू टीम, चित्र बनाने में तन्मय कलाकार, संगीत, सृजन में खोए शख्स में वही आग है। पर शास्त्रीय संगीत के किसी कार्यक्रम की तुलना में सावधान इण्डिया और क्राइम पेट्रोल हाई रेटिंग पर हैं।”
इधर अनुज का साहित्यप्रेमी , संवेदनशील दिल कह रहा है, ये खंजर नहीं है, बहुत से काम हो सकते हैं चाकू से।

“ये दुनिया काम की चीजों और लोगों के लिए नित नयी दुनिया निर्मित करना जानती है और बेकार, भोंथरी चीजों और लोगों से उदासीनता पूर्वक पिंड छुड़ाना भी।”

वह थक कर एक जगह ठहरता है । मॉल में भीड़ बढ़ रही है। अक्सर बड़े शॉपिंग मॉल में मध्यर्गीय लोग तफरीह के लिए ही जाते हैं। युवा लड़के -लड़कियां अपने लिबास और शोर से ध्यान खींच रहे हैं। मोबाइल पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे हैं। मॉल के रेस्टोरेंट बोर्ड पर थ्री डी कोल्ड कॉफी का विज्ञापन देख अनुज ये अहसास अपने भीतर उड़ेलना चाहता है। पर नीचे लिखे रेट पढ़ने पर सोचता है, मॉल के बाहर मिल रहा गन्ने का जूस उसकी जेब की जद में है।संगिनी सुमन का व्हाट्सअप देखकर सोच रहा है,  इतने बड़े मॉल में एक साधारण स्टेशनरी की दुकान क्यों नहीं है? 

“चलो,लौटते हुए जूना बाजार से ले लूंगा। फिलहाल तो दिमाग़ में जंग छिड़ी हुई है।

अगर वह सामान्य से दिखते इस शख्स का साधारण-सा इंटरव्यू लेता तो ये धारदार चाकू लेने का सही कारण बता सकता था।
क्या वह कहता –
“तेज चाक़ू से गुलाब के पौधे को तिरछा काट गुलाब की क्यारियाँ बनाने की सोच रहा हूँ”
या कहता –
“पेड़ से विलग न होने के बहाने तलाशती कच्ची केरी तोड़नी है”
“मेरी गर्भवती पत्नी तपते तन-मन को और अपने भीतर बैठे जीवन को इन अम्बियों के चटखारों की लिपि पढ़ाना चाहती है।”
ओफ, इधर अनुज ख्यालों में डूबा, उधर वह व्यक्ति ओझल हो गया।
मॉल में गहमागहमी बढ गयी है और ग्राहकों के साथ आए बच्चों का शोर भी। शुक्र है लोग एक दूसरे से टकरा नहीं रहे। शॉपिंग, विंडो शॉपिंग करने में मध्यवर्गीय तबके की लड़कियाँ ज्यादा हैं। उनकी धीमी-धीमी बातों का शोर इकठ्ठा हो रहा है। ये शोर उसके मन में मची मारकाट से थोड़ा कम है। आशंकायें दिल की धड़कन बढ़ा रही हैं।
“किसी के चेहरे पर उसका मन थोड़ी न लिखा हुआ रहता है? ”
अपहरणकर्ता हुआ तो ? ”
किसी से पुरानी रंजिश निकाली तो ? ”
“किसी लड़की को, बच्चे को पकड़ कर उसके गले पर चाक़ू रख दिया तो ? ”

हाथ में इतना बड़ा धारदार हथियार पकड़े आदमी से अपनेपन की कल्पना कैसे की जा सकती है। अगर ऐसा कुछ घटित हुआ तो भीड़ क्या करेंगी, तमाशबीन बनकर खड़ी रहेगी।

“किसी को कटता-मरता देखना सामान्य घटना क्यों बनती जा रही है? ”

वह एक जागरूक नागरिक, सच्चा पत्रकार है पर क्या वह भी इस भीड़ का हिस्सा नहीं बन रहा। 

क्या करेगा वह? उस समय उस दृश्य को कलमबद्ध करेगा या सब छोड़कर किसी को बचाने की पुरजोर कोशिश!

इंसानियत भूल जायेगा??
फोटोग्राफर केविन कार्टर याद है न, जिसने अफ्रीका में मरते हुए बच्चे और उससे थोड़ी दूर बैठे गिद्ध की फोटो खींचकर इस पर पुल्तजिर पुरस्कार जीता था। उसके सम्मान आयोजन में एक दर्शक ने उसे दूसरा गिद्ध कहा था। केविन कार्टर इससे इतना द्रवित हुआ कि तीन महीने बाद आत्महत्या कर ली।
अनुज की खोजी निगाह वापिस मॉल में उस शख्स को ढूंढ़ने में जुट गई है जो हाथ में धारदार हथियार लेकर इस भीड़ भरे माल में बेखौफ घूम रहा है।
“कितने वर्षों से हमारे देश में नायकों से ज्यादा खलनायक लोकप्रिय हैं। जानते हैं क्यों? हमें बुराई देखने की आदत जो हो गई है।”
वह, वह रहा, मॉल में जिद करते, पैर पटकते, मचलते-चिल्लाते बच्चे और लोगों की निर्णायक(जजमेंटल)दृष्टि झेलती उसकी क्रोधित युवा माँ की ओर बढ़ता हुआ।
“आखिर उसका इरादा क्या है? ”

“मानना पड़ेगा, हम सबके मन में रक्तिम चाक़ू नाच उठा है… उस शख्स को किसी खतरनाक अंजाम का खलनायक बनता देखने को उत्सुक हमारी निगाहें चस्पां हैं हर पीठ पर ! ”
 “ये समय चाकू नहीं, हम चाकू में बदल रहे हैँ! ”
हमारे भीतर विचारों की कितनी मारकाट, युद्ध! हमारी निर्णायक मनोवृति बिना अल्पविराम!
परिणामों की ओर दौड़ती ज़िन्दगी के पास अब पूर्णविराम भी नहीं बचा… ”
और इधर ये क्या घटित होने जा रहा है… दिखता हुआ सच भीतर चल रहे दृश्यों को गड्डमड्ड कर रहा है।
मॉल के चमकते फर्श पर झुककर बैठते इस शख्स ने बच्चे की मासूम जिद को स्वीकार लिया है।अब वह अपने एक हाथ से बैग में रखा बड़ा सा चाकू निकाल रहा है।दूसरे हाथ में बच्चे से अन्नानास लेकर,उसे जमीन पर टिकाकर धारदार चाक़ू से एक झटके में छिलके समेत रिंग जैसा काटकर अपनी हथेली पर सजा रहा है। मॉल की जमीन पर रक्त नहीं रस बह रहा है।बच्चा डब -डब आंखों से मुस्कुरा उठा है,अंगार बरसाती माँ भी लाड़ लड़ा रही है।
अचानक उस शख्स ने अनुज की ओर एक मुस्कराहट फेंक दी है। और देखो तो पूछे बिना एक जवाबी मुस्कान अनुज के लबों पर तिर गयी है।
“क्या ये किलर इंस्टिंक्ट को तिरोहित करती हमारी आदिम सच्चाई है।”
कुछ तो ऐसा है जो बिन बोले साझा है हम सब प्राणियों के बीच!! ”
“ये कैसी एका है? ”
अनुज मुस्कुराता हुआ मॉल से बाहर निकल गया है,अब उसके पास खबर नहीं,कहानी है।कहानी इस समय की,जिसके पास केवल चाक़ू नहीं,स्नेह,विश्वास की आत्मीय डोर भी है।
जूना बाज़ार से सामान लेकर वह घर पहुँच गया है।

स्कूटर के लिये गेट खोलते हुए अनुज ने देखा, बाहर नीम के पेड़ के नीचे कूदती गिलहरी और डाल पर बैठी चिड़ियों पर हमेशा घात लगाती दिखती बिल्ली सुस्ता रही है। उसके आस-पास गिलहरी और चिड़ियाँ फुदक रही हैं। ऐडानियम के सुंदर फूल बोगेनविलिया के फूलों संग झूम रहे हैं। गलबहियाँ डाले जेड प्लांट और सर्पगंधा प्रेमिल सपनों में खोए हैं। घर की खिड़कियाँ ताजादम हवाओं के लिए खुली हुई हैँ।
दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है यार…

***

सोनू यशराज
         संचार विशेषज्ञ, कवि-कथाकार, मध्य भारत इंदौर में अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में ‘उस रात’ कहानी को प्रथम पुरस्कार (2024) , “पहली बूंद  नीली थी” (कविता संग्रह)को कृति सम्मान (2021), अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

ईमेल  :  sonuyashraj5@gmail.com

 

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