मोनीरो रबानीपोर

यह प्यार की दुख भरी दास्तान है और यह तब तक दोहरायी जाती रहेगी जब तक समय का गोला दुनिया में बरकरार रहेगा। एक दिन समय का गोला किसी सितारे से टकराएगा- पर वह सितारा इस युग का नहीं, दूसरे युग का होगा।
एक दिन समय का यह गोला अपने आप विस्फोट के बाद खण्ड-खण्ड होकर बिखर जाएगा क्योंकि सदी दर सदी ऐसी दुखद कहानियाँ दोहरायी जाती रहेंगी। जब यह समय प्यार से सराबोर हो जाएगा, भावनाओं से पूरी तरह भीग जाएगा, आँसुओं से लथपथ हो जाएगा और अकेलेपन के नाखूनों से लहूलुहान हो जाएगा तब इसकी बाहरी दीवार टूटकर बिखर जाएंगी। लेकिन हर प्रेम कहानी समय के इस गोले के टुकड़े-टुकड़े में जज़्ब होगी… यह सब एक साथ मिलकर एक नए समय का निर्माण करेंगे। हो सकता है एक ऐसा दिन भी आए जब अमरता और जो कुछ भी निर्मित चीजें हैं और वह सारी चीजें भी जिनका निर्माण नहीं किया गया है-सब मिल जाएँ और एक नयी सृष्टि का जन्म हो, जिसके अन्तः में प्यार के बीज-प्यार की दुखद कहानी के बीज- छुपे होंगे। इस नयी सृष्टि में समय एक औरत होगी और समय के बुलबुलों के बीच सोया हुआ इंसान मर्द होगा… और दोनों की कहानियों का अंत एक-सा नहीं होगा, अलग-अलग होगा।
अब तक उस औरत को बहुत सारे लोग जानते होंगे, जिसकी यह कहानी है। इसलिए उसका नाम बताऊँ न बताऊँ कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। यह एक ऐसी औरत की कहानी है जो अपने जीवन के बारे में तमाम तरह की कहानियाँ लिखा करती थीं… और इस कहानी का जो मर्द किरदार है उसका वजूद हो या न हो इससे भी बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसके बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम। इसी तरीके से यह भी बहुत अहम मुद्दा नहीं है कि वे दोनों एक-दूसरे को कैसे जानते-पहचानते थे- जब एक कहानी बनने लगती है तो उसकी जड़ें ख़ुद ब खुद फैलने लगती हैं- हो सकता है नौकरी तलाशने के दौरान उनकी पहचान हुई हो, कहानी पढ़ने के दौरान हुई हो या किताब छपवाने के दौरान हुई हो। चाहे जैसे भी जान-पहचान हुई हो. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता।
जहाँ तक औरत का सवाल है, वह बेहद सीधी-सादी और सरल स्वभाव की थी। उसके मन, उसकी जुबान और उसके दिमाग के बीच कोई फ़ासला नहीं था… जैसी उसकी भावनाएँ होतीं और जो विचार उसके मन में होते, वह बोलती बिल्कुल वही थी। हाँ, प्यार के मामले में उसके लिए समय का कोई महत्त्व नहीं था- वह हरदम प्यार में रहती थी और उन लोगों से बिल्कुल अलग थी जो एक पल में प्यार में पड़े और अगले पल सब कुछ बिसार दिया और अजनबी हो गए।
यही कारण है कि जब उसने पहली बार उस आदमी को देखा तो बोल पड़ी : “तुम बहुत खूबसूरत हो। हम दोस्ती कर लें? मैं बहुत अकेली हूँ।”
मर्द अपने डेस्क के पीछे बिखरे बाल और अनमना-सा चेहरा लिए बैठा था… उसने औरत की तरफ देखकर हल्का सा मुस्कुरा दिया। उस औरत की अदा ऐसी थी कि मर्द को उसके बारे में कोई राय बना पाने में मदद नहीं मिली सिवा इसके कि उसे लगा वह अभी एक मासूम-सी बच्ची है और यदि ढंग से उसकी परवरिश की जाए तो उसे अच्छा कहानीकार /उपन्यासकार बनाया जा सकता है।
आदमी ने उस औरत की लिखी कहानियाँ पढ़ी थीं और उसे पसन्द भी आयी थीं-उसने उन कहानियों के बारे में औरत से बातचीत शुरू की लेकिन उस पूरी बातचीत में जो एक चीज़ सिरे से गायब थी वह थी प्यार । औरत को लगा कि यदि वह और अच्छी कहानियाँ लिखे तो उसके सामने बैठा हुआ आदमी उसका हो सकता है।
इस तरह दिन बीतते रहे- वह अपने चेहरे पर एक खामोश मुस्कान चिपकाये रहा और बाकी सारी चीज़ों को हवा में यूँ ही लटकता हुआ छोड़ दिया कि जब समय आएगा तब देखेंगे।
औरत जैसे पहले रहती थी उसी तरह से बर्ताव करती रही- अपने कमरे को ठीक-ठाक रखना, अलमारी से काम की किताबों को न बिखेरकर कुछ ढूंढते रहना, उसके बाद फिर उन कागजों को संभालना, शेल्फ पर बेतरतीब ढंग से बिखरे हुए कागजों को बार-बार सँभाल देना… । धीरे-धीरे उस औरत में हर क़दम पर एक तरह की बेसब्री दिखाई देने लगी- उसके हर काम में, उसके एक-एक शब्द में। एक दिन जब उसका धीरज जवाब दे गया तो सारी चीजें उसने फिर से बिखरा दीं और उस आदमी के सामने बैठकर बोली:” मुझे अपना हाथ दो. मैं तुम्हारी रेखाएँ देखकर किस्मत बताती हूँ।”
“अभी तुम पहले ढंग की लेखक बन जाओ, उसके बाद रेखाएँ देखना,” आदमी ने बड़े ठंडे तरीके से जवाब दिया।
“पर मैं तुम्हारा हाथ थामना चाहती हूँ… मैं चाहती हूँ तुम मेरे बाल सहलाओ”, औरत ने प्यार से कहा।
“क्यों?”, आदमी मुस्कुराया और चौंकते हुए सवाल कर बैठा।
“मैं चाहती हूँ कि तुम मेरे बालों के अन्दर अपनी उँगलियाँ फिराओ”, औरत ने मुलायम स्वर में कहा।
“तुम बावली हो गई हो क्या?”, आदमी ने जवाब दिया और माँगने पर भी अपना हाथ सामने नहीं बढ़ाया।
मैं यह कहानी बड़ी जल्दी-जल्दी और हड़बड़ी में लिख रही हूँ क्योंकि मुझे अन्देशा है अभी कोई आ जाएगा और खिड़की के पास बैठकर मुझसे पूछने लगेगा : कितना काम पूरा हुआ अभी ?
सच्चाई यह है कि मैं कहानी लोगों की बेधती निगाहों से दूर जाकर लिखना चाहती हूँ क्योंकि कहानी पूरी होने से पहले ही कोई उसको पढ़ ले यह मुझे पसन्द नहीं है। यही वजह है कि मैं अपनी कहानी में जगह, शहर या मकान का खुलासा नहीं करती क्योंकि इससे एक तो समय भी बहुत लगता है और मैं जानती हूँ मेरे पास समय बहुत है नहीं। और उससे भी बड़ी बात यह है कि किसी को बताओ न बताओ कोई फर्क पड़ता नहीं। यही पर्याप्त है कि हमें यह मालूम हो कि जो कुछ भी कहानी में घट रहा है
वह समय के पारदर्शी गोले के अंदर ही घट रहा है। एक मर्द के प्यार में बुरी तरह से पागल इस औरत के लिए समय बस समय था, इससे ज्यादा कुछ नहीं- उसके लिए किसी खास पल और साल में भी कोई फर्क नहीं था। जिस भी तरफ से वह शुरू करे उसके दिमाग में बस एक ही खयाल आता था कि वह उस आदमी तक पहुँच पाये और उसके बगल में उसकी औरत बनकर खड़ी हो। इसके अलावा संसार में उसके लिए किसी और बात के मायने नहीं थे।
उन्हीं बातों के चलते वह कहानी की ओर मुखातिब हुई, हर शब्द को वह जीवन से भर देना चाहती थी जैसे ये शब्द उसकी देह से, उसकी रूह से सीधे निकलकर बाहर आते हों। एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी… दिन पर दिन वह प्यार से पगी रोमांटिक कहानियाँ लिखती चली गई। जिसे वह प्यार करती थी वह आदमी उससे मिलता, उसकी कहानियाँ पढ़ता और अपना सिर हिलाकर बता देता कि वह उसके काम से सन्तुष्ट है।
कई बार ऐसा होता कि औरत अपनी कहानी पूरी करके मर्द के सामने बैठकर उसे पढ़कर सुनाती, सुनाने के बाद बोलती :”मैं बहुत थक गयी हूँ… चलो, थोड़ी देर घूमकर आते हैं।”
मर्द हौले से मुस्कराता, अपना सिर हिलाता और औरत पल भर में समझ जाती कि आदमी के लिए उसके साथ बाहर सड़क पर निकलने का समय अभी नहीं आया है, उसे और मेहनत और इन्तजार करना पड़ेगा। वह सिर झुका कर अपने और आदमी के बीच की दूरी को कबूल कर लेती,-उसे लगता अभी उसके काम में कुछ कमी बची रह गई है… वह अपने काम में फिर से जुट जाती, खूब पढ़ती और खूब लिखती।
समय बीतता गया, औरत की एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी किताबें प्रकाशित होती गईं। अब उस मर्द का सारा समय औरत की रचनाओं को पढ़ने में बीतता … उसके लिखे एक-एक शब्द को पढ़ते हुए वह निरन्तर उसके बारे में या उसकी कहानियों की नायिकाओं के बारे में सोचता रहता। वह अक्सर उस औरत के ऑफ़िस में चला जाता और उनके बीच नये-नये विषयों को लेकर खूब बातें होती पर औरत किसी बात पर टिकती नहीं, आधी-अधूरी बात कर उछल कर किसी और विषय पर चली जाती… उसकी बातों में कोई सिलसिला न होता। उसकी बातों की यह बेतरतीबी दिनोदिन बढ़ती गई। मर्द को यह समझ नहीं आता कि वह सचमुच खुद बोल रही है या उसकी कहानियों की कोई किरदार बोल रही है। औरत की बातचीत का स्थायी भाव यह हो गया कि “बोलो, तुम मुझसे प्यार करते हो न ?” उसकी बात सुनकर आदमी जोर से हँसता और पलट कर हर बार एक ही बात बोलता:
“तुम्हारा काम कहाँ तक पहुँचा ?”
यह सवाल सुनकर औरत चौंक जाती, अपने आप को सँभालती और अपने हाथ उसके सामने फैला देती – उसकी उँगलियों पर कलम और पेंसिल के गहरे निशान पड़ गये थे और उसकी हथेलियाँ लगातार काम करते-करते सूखकर काठ जैसी बहुत सख़्त हो गयी थीं। उन्हें देखकर मर्द सधा-सधाया जवाब देता कि काम करने से ऐसा होता ही है। यह जवाब सुनकर औरत फिर से अपने काम पर बैठ जाती।
उस औरत की देह और उसकी रूह में देखते-देखते ये बदलाव कैसे हो गये ?
एक औरत जो अपने दरवाज़ों को लेकर पहले इतनी चौकन्ना रहती थी… उसको हर आहट पर यह लगता कि वह जिसे इतना चाहती है वह मर्द दरवाज़े से अन्दर आ रहा है- वह आकर उसके पास बैठेगा, उसकी लिखी कहानियाँ पढ़ेगा। वही औरत अब हर पल इस आशंका में घुली जाती थी कि दरवाज़े से जाने कब कोई अन्दर आ जाए और उसके लिखे शब्दों वाले पन्नों को उलट-पुलटकर देखने लगे।
किसी औरत के जीवन में समय कोई मायने नहीं रखता-यदि प्यार का बीज रोप दिया जाए तो समय चाहे जो भी लगे उसके अँखुए फूट ही आएँगे, कोई उसको रोक नहीं सकता। उधर आदमी को यह लगने लगा कि जब भी वह उस औरत से मिलता है उसमें उस मुलाकात को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखता, उसकी नज़र में अब प्यार की चमक नहीं दिखती। बच्चों जैसी उत्तेजना धीरे-धीरे कर के पूरी तरह से गायब हो गई। वह उसकी तरफ़ से मुँह मोडकर दूसरी ओर कर लेती। उसके मन में यह विचार घर करने लगा कि औरत की देह भी देखते देखते गायब होती जा रही है जबकि दूसरी तरफ़ उसकी लिखी कहानियों की नायिकाओं की आँखें दिन ब दिन बहुत ज़्यादा चमकने लगी थीं। पहले की तुलना में अब वे ज़्यादा रोमांटिक निगाहों से अपने पुरुष प्रेमियों को देखने लगी थीं… और उनके सामने बिल्कुल बच्चों जैसी बेबाक हरकतें करने लगी थीं।
आदमी उस औरत की लिखी हर कहानी रोज़ पढ़ता था, एक बार छपने के पहले और फिर छपने के बाद। और उसे लगता था कि इन कहानियों की मार्फत हर रोज वह उस औरत से ज़्यादा से ज़्यादा परिचित होता जा रहा है। उसके ज़्यादा से ज़्यादा निकट आता जाता है-उसकी कहानियों में उस औरत की त्वचा का स्पर्श है, उस औरत का ही खून बहता है।
मर्द उसके सामने बैठकर उसे मनपसंद संगीत सुनाता जिससे वह ज़्यादा और ज़्यादा से ज्यादा लिख सके और उसकी कहानियों में कमरे के माहौल जैसा ही रोमांटिक संसार सिरजा जा सके। उसे लगता कि औरत की गर्दन और सिर अब मुश्किल से घूम पाते हैं सो वह उसके लिए फलों के रस निकालकर लाता, उसके खाने पर ज़्यादा ध्यान देता। लेकिन औरत उसकी दरियादिली पर बिल्कुल ध्यान नहीं देती, वह सिर्फ़ लिखने में मशगूल रहती।
एक दिन आदमी ने कहा:” तुम बहुत थकी-थकी लग रही हो, चलो थोड़ी देर घूम के आते हैं।” तो उसने बड़ी बुझी हुई आवाज़ में उदास नज़रों से उसकी तरफ़ देखते हुए जवाब दिया : “मैं नहीं जा सकती घूमने, मुझे अभी बहुत काम करना है… बहुत व्यस्त हूँ मैं।”
वह घूमने नहीं गयी। उसने अपनी कहानियों के बारे में समीक्षकों के लिखे पर ध्यान देना भी छोड़ दिया। पत्रिका में उसकी किताबों पर खूब चर्चा होती लेकिन उस औरत की उनमें कोई दिलचस्पी नहीं थी… उसे तो इतना भी नहीं पता था कि उसकी कितनी किताबें छप चुकी हैं। उसके सामने खड़ा होकर उसकी किताबों की तारीफों के पुल बाँधने वाले उस आदमी की बातों को भी वह कोई तवज्जो नहीं देती। दिन ब दिन उसकी देह और उसकी गतिविधियाँ सुस्त और सुस्त होती चली गयीं।
एक दिन आदमी सोकर उठा तो सुबह-सुबह खूब हँसने लगा, इस तरह की हँसी उसने जीवन में पहले कभी नहीं हँसी थी… अकेले बैठकर वह देर तक हँसता रहा। उसे बार-बार उस औरत की बच्चों जैसी मासूमियत भरी बात याद आ रही थी : “बोलो, तुम मुझसे प्यार करते हो न ?”
और यह सोचते-सोचते वह हंसता ही रहा।
इसके बाद उसके मन में औरत के लिए बहुत प्यार उमड़ने लगा। वह बाज़ार गया, वहाँ एक सुन्दर-सा गुलदस्ता बनवाया । औरत के घर पहुंच कर देखा जैसा हर बार होता था- वह लिखने में मशगूल थी। उसको देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी कहानी के आख़िरी वाक्य पर पहुंच गयी है। उसके हाथ तो हिल रहे थे लेकिन उसकी देह किसी पत्थर की मूरत जैसी स्थिर हो गयी थी।
दरअसल, वह सभी चीज़ों से परे जा चुकी थी, समय से भी बहुत दूर। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे बहुत जल्दबाज़ी में वह कुछ शब्दों को लिखकर अपना काम पूरा करना चाहती है। आदमी ने गुलदस्ते को फूलदान में सजाकर उसके सामने रख दिया लेकिन औरत ने उधर बिल्कुल ही गौर नहीं किया… उसका ध्यान उन शब्दों पर ही टिका हुआ था जिन्हें वह लिख रही थी। उसने अपनी पलकें भी नहीं झपकायीं, ऐसा लग रहा था कि उसने अपनी कहानी का आख़िरी वाक्य पूरा कर लिया है। आदमी ने उसे छुआ तो उसका हाथ काग़ज़ के पन्ने पर धप से गिर गया। आदमी ने उस पन्ने को खींचकर बाहर निकाला तो उसपर कहानी का शीर्षक लिखा
दिखा :
प्यार की दुख भरी दास्तान ।
शीर्षक पढ़कर उसे एक बार फिर से हँसी आ गयी। उसने औरत का कंधा छुआ, उसके चेहरे की ओर देखा और घबराहट में लगभग जम सा गया-अब औरत, औरत नहीं थी। वह औरत शब्दों से बनी हुई मूरत में तब्दील हो गयी थी। और जैसे ही उस आदमी ने उसके कंधे को छूकर हिलाया, उसकी देह से निकलकर हजारों की तादाद में शब्द भरभरा कर जमीन पर गिर पड़े। उन हज़ारों-लाखों बिखरे शब्दों के बीच आदमी को यह लिखा दिखाई दिया : तुम बहुत खूबसूरत हो। हम दोस्ती कर लें? मैं बहुत अकेली हूँ।
***
मोनीरो रबानीपोर
1952 में जन्मी मोनीरो रबानीपोर ईरान की सम्मानित लेखिका हैं जिनकी लगभग एक दर्जन किताबें (उपन्यास और कथा संकलन) प्रकाशित हैं। उनकी रचनाओं में परम्परा और आधुनिकता दोनों का सम्मिश्रण मिलता है और वे आधुनिक फ़ारसी साहित्य में जादुई यथार्थवाद की पुरोधा मानी जाती हैं। शुरू में उन्हें थिएटर का बहुत शौक़ था और उनके कुछ नाटकों पर शाह की सरकार ने प्रतिबन्ध भी लगाये। 1979 की इस्लामी क्रान्ति के बाद राजनीति में सक्रिय होने के कारण उन्हें विश्वविद्यालयों में पढ़ाई नहीं करने दी गयी। उनका पूरा परिवार राजनीतिक गतिविधियों में संलग्न होने के कारण गम्भीर यातना का शिकार हुआ। कई बार उन्हें अपने विचारों के कारण जेल जाना पड़ा। लेखन को गम्भीरता से अपनाने का विचार उनके मन में लम्बे जेल जीवन में ही आया। बार-बार की प्रताड़ना से तंग आकर अन्ततः वे ईरान छोड़कर अमेरिका चली गयीं।
उनकी लगभग सभी कृतियों पर ईरान में प्रतिबन्ध है लेकिन उनके अनुवाद अरबी, चीनी, अँग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, कुर्द, पोलिश, स्वीडिश और तुर्क भाषाओं में हुए हैं।
***
फ़ारसी से अँग्रेज़ी तर्जुमा: कामरान तलात्तोफ
अनुवाद: यादवेन्द्र
(moniravanipor.com से साभार)

