तरुण भटनागर

कहते हैं यह एक सच वाकया है जो यूरोप के किसी शहर में हुआ था।
बताया यूँ गया कि एक बुजुर्ग औरत थी।वह शहर के पुराने इलाके में अपने फ्लैट में रहती थी।शायद बुडापेस्ट में, शायद एम्सटर्डम में या शायद कहीं और ठीक-ठीक मालूम नहीं।पर इससे कोई अंतर नहीं जान पड़ता।सारे शहर तो एक से हैं।सिर्फ इमारतों के बदल जाने से,लोगों की जबान बदल जाने से शहर तो नहीं बदलता न।
वह बुजुर्ग औरत ऐसे ही किसी शहर के पुराने इलाके में रहती थी,शायद।अकेली और दुनियादारी से बहुत दूर।यूँ उसकी चार औलादें थीं, तीन बेटे और एक बेटी, पर इससे क्या होता है? सबकी अपनी-अपनी दुनिया है, सबकी अपनी अपनी आजादियाँ, सबकी अपनी-अपनी जवाबदारियाँ…।ठीक उसी तरह जैसे खुद उस बुजुर्ग औरत की अपनी दुनिया है,अपना समय, उसकी अपनी खफ्त…।सो साथ रहने का कहीं कोई खयाल नहीं।साथ रहना दिक्कत देता है।इससे जिंदगी में खलल पड़ता है।एक उम्र के बाद आपका एक कंफर्ट जोन है।एक कंफर्ट जोन बच्चों का है,उनकी जवानी में।कोई भी अपना कंफर्ट जोन नहीं छोड़ना चाहता।पर उम्र को क्या कीजिये।वह बढ़ती रहती है और एक समय के बाद शरीर साथ नहीं देता।वह इतना कमजोर हो जाता है मानो बीमार हो।एक दो बार तो उस बुजुर्ग औरत की तबियत इस कदर खराब हुई कि वह अपने फ्लैट में अकेली ही पड़ी रही।उसमें उठ बैठने तक की ताकत न रही।उसने डॅाक्टर को फोन पर ही बताया।डॉक्टर ने फोन पर ही उसे दवायें बता दीं।उसने फोन से ही दवायें मंगा लीं।देर रात उसकी तबियत इतनी खराब हो गई कि उसे ऐसा लगा मानो वह मर जायेगी।पर उसने किसी को फोन नहीं किया।बस पड़ी रही।थोड़ी-थोड़ी देर बाद सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट का एक रिकॉर्डेड फोन उसके फोन पर सुनाई देता-आप ठीक तो हैं न-और वह हाँ या हूँ में आवाज कर देती।तन्हाई में सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट का फोन राहत देता है।सरकार ने इतनी सहूलियत दे रखी है कि किसी की मदद की जरुरत ही नहीं पडती।उसे पल भर को खयाल आया कि वह फोन पर कह दे कि वह मर गई।थोड़ी सी झुंझलाहट, थोडा सा रंज, थोडा दर्द और थोड़ी सी बेबात आ जमी यह तन्हाई जाने क्या था कि वह ऐसा कहना चाहती थी, पर जानती थी कि ऐसा कहना ठीक न होगा।
कभी-कभी उसका दूसरे नंबर का बेटा और इकलौती बेटी उसे देखने आते हैं।कभी-कभी क्या बल्कि उनके आने के दिन तय हैं।माह के दूसरे गुरुवार को बेटा आता है और तीसरे शनिवार को बेटी।पर अब वह अक्सर भूल जाती कि आज कौन सा दिन है।पहले याद रहता था कि आज बेटा आयेगा, तो आज बेटी।अब भी अगर याद रहता है तो वह उनका इंतज़ार करती है।अगर याद न रहता तो इंतज़ार न करती।एक बार तो यह भी हुआ कि वह अपनी बेटी को पहचान भी न पाई।वह उसके सामने भौंचक सी खड़ी रही।बेटी यह सोचकर आई थी कि आज तो माँ उसका इंतज़ार कर रही होगी।पर यह क्या, वह तो उसे पहचान ही नहीं रही थी।उसने उसे कुछ पुरानी तस्वीरें दिखाईं जिसमें वह और वे समंदर के किनारे खड़े हैं, पर वे तब भी बेटी को पहचान न पाईं। बेटी ने उनके बिस्तर के पास एक फोन लगवा दिया।फोन में एमरजेंसी बटन थे।लाल बटन दबाने से ऐंबुलेंस, पीला दबाने से फायर ब्रिगेड और हरा दबाने से सीधे-सीधे बेटी को फोन।बेटी ने सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट को भी माँ के हालात के बारे में बताया।उन्ही की सलाह पर यह फोन उसने लगवाया था।
पर उस दिन।उस दिन वह फोन भी काम न आया।वे बुरी तरह से गश खा गईं।तेज ठण्ड थी और उन्हें जोर का चक्कर आया था।जमीन पर पडे-पडे उन्होंने फोन उठाया।उन्हें यह तो याद था कि यह फोन है, पर बाकी कुछ भी नहीं।उन्हें यह भी याद न रहा कि वे कहाँ हैं।कब से हैं।बस इतना ही खयाल आया कि यह फोन है।इसके बटन दबाओ तो दूसरी तरफ किसी और से बात होती है।उनके सिर से खून निकल रहा था।उन्हें लाल, पीला और हरा बटन समझ न आया।उन्होंने फोन के नंबरों वाले बटन दबाये।बेतरतीब।एक बार, दो बार, तीन बार….।
स्टीव का जब सैल फोन बजा तब वह एक कैफेटेरिया में बैठा था।रात के आठ बज रहे थे।
‘ हैलो…।’
‘मेरा नाम क्रिस्टीना है। मैं बहुत बुजुर्ग हूँ। मैं गिर पडी हूँ।’
‘ ओह। क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूँ।’
‘ मुझे यहाँ से निकाल लो। मेरे सिर से खून बह रहा है।’
‘ आप घबराये नहीं आप कहाँ पर हैं, यह बतायें।’
‘ मुझे याद नहीं मैं कहाँ पर हूँ।’
क्रिस्टीना की आवाज़ लडखडा रही थी।
‘ मुझसे बात करते नहीं बन रहा। आप मेरी मदद करो।’
क्रिस्टीना जोर-जोर से हाँफ रही थी।
‘ अच्छा यह बताओ आपको आपके आसपास क्या दीख रहा है।’
‘ दीवार पर एक खिड़की है।आयताकार खिड़की।काँच वाली।’
‘ और कुछ…।’
क्रिस्टीना ने फिर कुछ नहीं कहा।बस फोन पर उसकी साँसों की आवाज सुनाई देती रही।स्टीव कुछ देर तक फोन पर हैलो-हैलो बोलता रहा।पर जब साँसों की आवाज के अलावा और कुछ भी सुनाई नहीं दिया तो वह थोड़ा बेचैन हो गया।
स्टीव बेरोजगार है।वह छब्बीस साल का है।उसने कुछ दिनों तक काम की तलाश की।रात दिन वह काम तलाशता रहा।पर इधर हफ्ते भर से वह काम तलाश कर थक गया है। अब वह फुर्सत में है।काम तलाश करने की थकान जब मिट जायेगी तब वह फिर से काम तलाशना शुरु करेगा।
कैफेटेरिया के काँच के पार एक स्ट्रीट है।दूधिया मरकरी की रौशनी में।पत्थरों वाली।काँच के ठीक बाहरएक पाथ-वे है।काँच के इतना पास कि लगता है उसी पाथ-वे पर बैठे हैं।पाथ-वे पर अभी-अभी तीन बच्चे भागते हुएनिकले थे।काँच के कारण उनकी आवाज सुनाई नहीं दीथी पर वे इतने पास से गुजरे थे कि स्टीव ने पल भर को उनकी तरफ देखा था।बर्फ गिर रही थी।कमजोर फाहों में।उड़ती-उड़ती सी।लैंपपोस्ट के नीचे एक अश्वेत लड़का खड़ा था, लबादे से कपड़े पहने, कानों में इयरफोन लगाये, कुछ सुनता और सुने की धुन पर पैर हिलाता।
‘ मुझे एक कॉल करनी है।’
स्टीव ने कैफेटेरिया के काउण्टर पर बैठे शख्स से कहा।काउण्टर वाले शख्स ने स्टीव के हाथ में सैल फोन देखा।स्टीव ने देखा कि वह उसका सैल फोन देख रहा है।जब पास सैल फोन हो तो कोई क्यों काउण्टर के लैण्डलाइन से फोन करेगा भला।स्टीव उसे नहीं बताना चाहता था कि उसके सैल फोन पर एक बुजुर्ग औरत है।बल्कि यूँ कहें कि उसके सैल फोन पर एक बुजुर्ग औरत की साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही है।वह उस कॉल को नहीं काटना चाहता।
‘ मैं कॉल के पैसे दूँगा।’
स्टीव ने कहा।उसके पॉकेट में छह यूरो हैं।दो यूरो की उसने कॉफी पी है।कुछ पैसे वह कॉल पर खर्च कर सकता है।
‘ हैलो।’
‘ हैलो।’
‘ मेरा नाम स्टीव है मुझे आपकी मदद चाहिए।’
फोन के दूसरी तरफ शहर की फायर ब्रिगेड सर्विस का हैड था।काउण्टर वाला शख़्स अपने काम में मगन हो गया।किसी का फोन सुनना बेअदबी है।किसी फोन करते के पास खड़ा रहना भी ठीक नहीं।किसी के काम से खुद को दूर रखना चाहिए।यहाँ तक कि किसी को देखना भी ठीक नहीं।लगातार देखना एकदम गलत।नज़र बाजी याने अनैतिक काम।किसी को न देखना इतना है कि अभी कल ही इस कैफेटेरिया से लगी स्ट्रीट से तीन औरतें गुजरी थीं।तीनों टॉपलैस थीं।किसी ने भी उनको आँख उठाकर नहीं देखा।
‘ इस तरह तो किसी को ढूँढ पाना मुश्किल है।’
फायर ब्रिगेड स्टेशन का हैड फोन पर स्टीव से कह रहा था।
‘ हम उस बुजुर्ग औरत को बचा सकते हैं।’
‘ मैं तुम्हारे इरादों की तारीफ करता हूँ।यह बडे ही सवाब का काम है।पर यह संभव नहीं लग रहा।’
‘ उसने बताया था कि वह जिस कमरे में है, उसमें बड़ी आयताकार खिड़की है। काँच वाली।’
‘ हाँ पर इससे क्या होता है?’
‘ ऐसी खिड़कियाँ शहर के पुराने इलाके में हैं।वहाँ के घरों और फ्लैट्स में।’
‘ एकदम सही।’
‘ आपके पास कितनी फायर ब्रिगेड हैं।’
‘ कुल पंद्रह।’
‘ क्या आप सबको काम पर लगा सकते हैंॽ’
‘ हाँ।अभी सभी स्टेशन पर खड़ी हैं।बहुत दिनों से खाली खड़ी हैं।इस बहाने वे भी काम पर लग जायेंगी।’
‘ आप अगर उन सबको पुराने शहर रवाना कर दें।पुराने शहर के मुख्तलिफ इलाकों में और उनको बता दें कि वे सब अपना फायर अलार्म बजाते रहें।’
‘ उससे क्या होगा ?’
‘ मेरे सैल फोन पर उस बुजुर्ग औरत का फोन होल्ड पर है।सैल फोन में इतना पैसा है कि अभी वह दो-चार घण्टे होल्ड पर रह सकता है।’
‘ उससे क्या होगा ?’
‘ हो सकता है कि उन फायर अलार्म में से कोई अलार्म मेरे सैल फोन पर सुनाई दे जाये और उससे उस बुजुर्ग औरत के फ्लैट का कुछ पता चले।’
‘ आइडिया अच्छा है।ऐसा ही करते हैं।’
स्टीव ने काउण्टर वाला फोन रख दिया।फिर पल भर को अपने सैल फोन पर क्रिस्टीना की साँसों की आवाज सुनी।फिर दो बार हैलो-हैलो कियापर दूसरी तरफ से कोई जवाब न आया।कैफेटेरिया में दूसरी तरफ बैठे एक शख्स ने पल भर को उसे देखा।उसने उसे बेचैनी से सैल फोन पर हैलो-हैलो कहते सुना।अगर दूसरी तरफ से हैलो-हैलो का जवाब न आये तो कौन भला इतनी दफा बार-बार हैलो-हैलो करता है।लोग एक दो बार हैलो-हैलो करते हैं और फिर फोन बंद कर बैठ जाते हैं।कितना अजीब शख्स है।कितना अजीब कि थोडी-थोडी देर में हैलो- हैलो कहता है पर सैल फोन को नहीं काटता।उसने सोचाफिर दूसरी तरफ देखने लगा।पता नहीं क्या है, पता नहीं क्यों ?
स्टीव बेचैन हो चला था।वह कैफेटेरिया के बाहर जाना चाहता है पर लगता है जैसे अभी फायर ब्रिगेड का फोन आयेगा और काउण्टर पर रखा फोन घनघना उठेगा।उसने पल भर को बाहर देखा।लैंप पोस्ट के नीचे खड़ा अश्वेत लडका जा चुका था।उसके पीछे दीवार पर बना म्यूरल अब बिना किसी रोक के साफ-साफ दीख रहा था।म्यूरल में एक लड़की है जो दीवार पर रंग बिखेर रही है।लड़की की फ्राक अपनी पूरी गोलाई में खुली है।उसने ऊँची हील के बाद भी खुद को पैरों से उचका रखा है।रंग दूर तक बिखरा हुआ है, जैसे बकेट से फिंकाता है,रंगीन पानी, अपनी बुंदकियों, धार, रिसते रंग और छपाकों के साथ,दीवार पर ही रुक गया हो जैसे।लड़की की फ्राक पर बर्फ के फाहे हैं,फ्राक की फोल्ड्स में,लकीरों में जमे।म्यूरल के ठीक सामने एक हाइड्रेण्ट हैं।उस पर एक बिल्ली बैठी है अपने आगे के पैरों को अपनी जबान से चाटती।स्टीव का अगर सैल फोन एंगेज न होता तो वह काँच के बाहर चला आता,सिंपली रैड का एक पुराना गीत सुनते हुए बर्फ में चलता चला जाता- इफ यू डोण्ट नो मी बाई नाउ यू विल नेवर नेवर नो मी।तभी उसे खयाल आया कि उसके जैकेट में इयर फोन है।उसने इयर फोन का पिन मोबाइल में लगाया और एक स्पीकर को बाँये कान में लगा लिया।दाहिना कान उसने काउण्टर के फोन की घनघनाहट सुनने के लिए खुला छोड दिया।
उसे क्रिस्टीना की साँसों की आवाज़ एकदम साफ सुनाई दे रही थी।उसने इसके पहले कभी साँसों की आवाज़ों को इतना गौर से नहीं सुना था।अगर जरुरत न हो तो लोग सुनते नहीं।लग सकता है कि साँसों की आवाज कोई ऐसी चीज नहीं जो सुनी जाये।जब वह खाली होता है वह मुश्ताक हो जाता है।इतना मुश्ताक कि साँसों की आवाज जैसी एक सी आवाज भी उसे बडी जानदार लगती है।खुद क्रिस्टीना को ही नहीं पता कि उसकी साँसों की आवाज में एक रिदम है।
बाहर गिरती बर्फ तेज हो गई है।हाइड्रेण्ट पर बैठी बिल्ली जा चुकी है।उसने बिल्ली को कूदते देखा था।फिर काले रंग पर बर्फ के सफेद फाहों को लिये वह धीरे से एक तरफ को सरक गई थी।तभी उसे सैल फोन पर क्रिस्टीना की साँसों की आवाज के साथ-साथ एक बिल्ली की आवाज सुनाई दी थी।उसे पल भर को लगा कि आवाज बाहर से आई थी शायद उसी काली बिल्ली की पर वह तो जा चुकी थी।आवाज सैल फोन से ही आ रही थी।सैल फोन में बिल्ली की आवाज धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी।वह कभी हाइड्रेण्ट की वह खाली जगह देखता है जहाँ बिल्ली बैठी थी, फिर सैल फोन पर सुनाई देती बिल्ली की आवाज सुनता।उसके जेहन में विण्डोसिल से सरककर खिडकी के भीतर बेआवाज कूदती बिल्ली का खयाल आता और फिर सैल फोन के एकदम पास सुनाई देती उसकी म्याऊँ-म्याऊँ सुनाई देती।उसे लगता कि क्रिस्टीना फर्श पर पड़ी है, उसके सिर से निकले खून का चकत्ता जमीन पर फैला है, आहिस्ते से मुँह खोल म्याऊँ करती बिल्ली खून के चकत्ते को सूँघती है, उसकी छोटी लाल जबान धीरे से गढ़ा चुके खून को छूती है…।वहसैल फोन पर जोर-जोर से कहता है – हैलो, हैलो क्रिस्टीना…हैलो…हैलो…क्या तुम मुझे सुन रही हो क्रिस्टीना…हैलो, हैलो…जवाब दो क्रिस्टीना…।बिल्ली की आवाज एकदम से बंद हो जाती है।उसे नहीं पता कि जब-जब वह हैलो कहता है उसकी आवाज क्रिस्टीना के कमरे में गूँजती है।क्रिस्टीना के फोन का स्पीकर आन है।वह थोड़ा जोर-जोर से कहता है -चले जाओ…चले जाओ वहाँ से…ओ बिल्ली तू चली जा वहाँ से , जा दूर चली जा, भाग वहाँ से…भाग…भाग…।कैफेटेरिया में उसकी आवाज गूंजती है।सब लोग उसे अचरज से देखते हैं।काउण्टर पर खड़ा शख्स उसे गुस्से से घूरता है।
न जाने कौन सी बेखयाली में वह अपना सैल फोन लेकर बाहर आ जाता है।बाहर रोड पर जमी बर्फ पर गाड़ियों के टायरों के निशान हैं।सफेद बर्फ पररंगीन लाइटें चमक रही हैं।कैफेटेरिया का काँच अपारदर्शी प्रकाश से भरा-भरा है।चारों ओर चुप्पी है।पाथ-वे और घरों की ढलुँवा छतों पर बेआवाज बर्फ गिर रही है।पास ही बर्फ में समा चुकी एक कार खामोशी से खडी है।चुप्पियों को चीरती उसकी आवाज थोडा देर तक सुनाई देती है – हैलो…हैलो क्रिस्टीना, क्या तुम सुन रही हो…।सैल फोन में बिल्ली की आवाज दूर जाती जाती है।फिर खत्म हो जाती है।बस साँसों की आवाज रह जाती है।वह बर्फ से ढंकी स्ट्रीट चेयर बैठ कर कान में इयर फोन लगाकर उस आवाज को सुनता मुस्कुराता है।
‘मेरे लिए कोई कॉल थीॽ’
लौटकर उसने काउण्टर वाले शख्स से पूछा।काउण्टर वाले शख्स ने थोड़ा हिकारत से उसे देखा।फिर उसने ‘न’ में अपनी गर्दन डुलाई।तभी उसे अपने सैल फोन पर साँसों की आवाज के साथ-साथ फायर ब्रिगेड का फायर अलार्म सुनाई दिया।लगातार बढ़ता सा अलार्म।उसने काउण्टर पर रखे फोन से एक फोन मिलाना चाहा।काउण्टर वाले शख्स ने उसे इशारे से मना किया। उसने कहा वह पैसे देगा।काउण्टर वाले शख्स ने इशारा किया याने अच्छा कर लो…।
‘ आप एक-एक कर सभी फायर ब्रिगेड को अपना अलार्म बंद करने को कहो।’
‘ उससे क्या होगा।’
‘ जब मेरे सैल फोन पर सुनाई देने वाला फायर अलार्म बंद होगा मैं आपको बता दूँगा।’
‘ इस तरह पता चल जायेगा कि उस बुजुर्ग औरत का फ्लैट किस फायर ब्रिगेड के पास है।’
‘ एकदम।उस बुजुर्ग औरत का नाम क्रिस्टीना है।’
‘ ओह।शुक्रिया।’
‘ शुक्रिया किस बात का।’
‘ तुमकिसी की परवाह कर रहे हो।यह वीकेण्ड है और यह किसी की परवाह करने का समय नहीं है पर तुम परवाह कर रहे हो।यही हमारा काम भी है।फायर ब्रिगेड का।परवाह करना।’
जब फोन पर अलार्म बंद हुआ तो स्टीव ने फिर से काउण्टर से फोन लगाया।काउण्टर वाला शख्स चिढ़ चुका था।पर इस मुल्क में कोई किसी को लैण्डलाइन का प्रयोग करने से मना नहीं कर सकता।यह बेअदबी है।पैसे देने की बात स्टीव कह ही चुका था।सो वह चुप रहा।
‘ कौन से नंबर की फायर ब्रिगेड का अलार्म बंद हुआॽ’
‘ तेरह।’
‘ बस उसका फ्लैट वहीं कहीं होगा आसपास।’
कैफेटेरिया में चार लडकियाँ आई थीं।उनमें से एक ने कैफेटेरिया में घुसने से पहलेकंधों पर पड़े बर्फ के कतरे झाड़े थे।उनमें से एक लड़की जिसने लाल रंग के दस्ताने और लाल रंग के ही गम बूट्स पहन रखे थे स्टीव को देखकर मुस्कुराई थी।वे चारों थोड़ा दूर एक टेबिल पर बैठ गई थीं।वह लड़की जो स्टीव को देखकर मुस्कुराई थी, अब भी बीच-बीच में उसको देख लेती थी।स्टीव खुद में मगन था।लड़की को लगता न जाने सैल फोन पर क्या तो सुनता होगा यह लडका।कोई जैज, कोई पॉप, कोई नेटिव…पता नहीं, कुछ तो सुनता है।कितना मगन है। पर स्टीव को खयाल भी नहीं आया कि कोई कुछ सोचता होगा कि वह क्या सुन रहा है।जब करने को कोई काम न हो, आप बेरोजगार हों, खाली-खाली वक्त हो, तो इयरफोन पर किसी बुजुर्ग औरत की साँसों की आवाज सुनने का तो खयाल ही इतना बौड़म हैकि किसी को कभी इसका इल्म भी न हो।सो वह निश्चिंत था।दुनिया कुछ भी सोच सकती थी अपनी बला से।
इयरफोन पर क्रिस्टीना की साँसों की आवाज थोडा कमजोर हो गई थीमानो किसी कंदरा से आ रही हो।गौर से सुनने पर उसकी साँसों के बीच का अंतराल बढ़ गया लगता था।पल भर को लगता मानो क्रिस्टीना सो रही हो।पर दूसरे ही पल कोई डरावना सा खयाल स्टीव को आया।उसे लगा मानो कुछ छूटा जा रहा है।कुछ जो ठीक नहीं हो रहा।कुछ जो बेचैन करता है।वह जोर-जोर से कहता है-हैलो, क्रिस्टीना हैलो….जागो, उठो…सुनो, सुनो…एक बार बात करो, बोलो, बोलो…-बाहर निकलते उसने दीवार पर मुक्का मारा-कुछ बोलती क्यों नहीं तुम,क्रिस्टीना… क्रिस्टीना-क्रिस्टीना के बंद कमरे में स्टीव की आवाज़ गूँजती है।आयताकार खिड़की का काँच कांपता है-…बोलो,बोलो…क्रिस्टीना…-उसकी आवाज पर फोन का ब्लिंकर चमकता है-बात करो, बात करो क्रिस्टीना…हैलो,हैलो-हरा ब्लिंकर झिझकता सा चमकता है,बुझता है, चमकता है।
स्टीव उदास हो जाता है।उसके भीतर कुछ दरकता है।पता नहीं कौन है यह क्रिस्टीना,पर वह बेचैन है।न जाने क्यों उसके ही फोन पर आया उसका फोन,पता नहीं ऐसा क्यों होना थाॽकिसी ऐसे को पुकारता है वह जिसके बारे में उसे कुछ भी नहीं पता-क्रिस्टीना…क्रिस्टीना…- उसकी कमजोर पड़ती साँस को सुनकर उसकी आँखें भीग जाती हैं।
दूर कहीं तेरह नंबर की फायर ब्रिगेड का ड्रायवर खडा है।चारों ओर ऊँची-ऊँची इमारते हैं।इमारतों में हजारों आयताकार खिड़कियाँ हैं।काँच वाली आयताकार खिड़कियाँ।आज फ्राइडे नाइट है।लोग अपने-अपने घर छोड़कर जा रहे हैं।हर आयताकार खिड़की रौशनी से चमक रही है।हर इमारत में,हर ओर,आसमान तक फैली,गिरती बर्फ में दमकती आयताकार काँच वाली खिड़कियाँ।इन्हीं हजारों में से किसी एक में क्रिस्टीना है।तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर माइक उठाकर जोर-जोर से एनाउंस करता है- ‘ कृपया अपने-अपने घरों की लाइटें बंद कर दें।हम एक बुजुर्ग औरत की तलाश में हैं जिसका नाम क्रिस्टीना है।’
गिरती बर्फ के बीच उसकी आवाज गूँज रही थी।गर्म कमरों में बैठे लोगों तक उसकी आवाज पहुँच रही थी-उसका नाम क्रिस्टीना है….क्रिस्टीना…।ठण्ड से उसकी आवाज कांप रही थी।वह लगातार एनाउंस कर रहा था-‘ कृपया लाइट बंद कर दें।इस तरह हम उसे ढूँढ पायेंगे। आप लाइट बंद कर देंगे तो हम उस खिड़की को देख पायेंगे जिसकी लाइट बंद नहीं हुई।यकीनन वह क्रिस्टीना के फ्लैट की खिड़की होगी फिर।’
चारों ओर से लोग उमड़े पड़ रहे थे।हर तरफ से लोग चले आ रहे थे।फ्राइडे नाइट थी।आगे वीकेण्ड था।पाथ-वे पर, स्ट्रीट्स में, पब में, रेस्तरां में…हर जगह, लोग ही लोग।लोगों से टकराता चलता स्टीव लगातार बोल रहा था…हैलो क्रिस्टीना, हैलो…।हजारों जगमगाती आयताकार खिड़कियों वाली बिल्डिंगों को देखता तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर बार-बार चिल्ला रहा था -उसका नाम क्रिस्टीना है…क्रिस्टीना…।कुछ लोगों ने आपस में एक दूसरे से पूछा था – क्या तुम किसी क्रिस्टीना को जानते हो? एक आदमी ने एक दूसरे फ्लैट के आदमी से फोन लगाकर पूछा था कि वह जोऔरत रहती है उसके सामने वाले फ्लैट में कहीं उसका नाम तो क्रिस्टीनानहीं? दूसरी तरफ से जवाब आया था – नहीं।
हजारों आयताकार खिड़कियों से आती रौशनियाँ बुझ रही थीं, एक के बाद एक, धीरे-धीरे, क्या तुम जानते हो किसी क्रिस्टीना को ?…न, नहीं, मैंने नहीं सुना, क्या कहा यहीं कहीं रहती है, पता नहीं, कैसी दिखती है वह,क्या किसी को कहीं दिखी थी वह,आज सुबह या शाम को,कभी अपने फ्लैट में जाती हुई, कभी सुना नहीं यह नाम, नहीं, नहीं कभी भी नहीं सुना,इधर ही हो शायद इसी इमारत में…हजारों आयताकार खिड़कियों की रौशनी बुझ रही थी, एक के बाद एक, मैं किसी क्रिस्टीना को नहीं जानता ऐसा कहकर एक आदमी ने बुझाई थी लाईट, पता नहीं कौन है ऐसा कहकर दूसरे ने,अगर लोगों के नामों का रजिस्टर होता,उनके सही-सही मालुमात तो इतनी कवायत की जरूरत ही नहीं रह जाती,एक तीसरे शख्स ने झुँझलाते हुए लाईट बुझाई थी…एक चुपचाप गाना सुन रहा था, उसने पल भर को उसका नाम सुना था-क्रिस्टीना और अपने बेटे को लाइट बुझाने को कहा था, एक ने बिना कुछ सुने ही बुझा दी थी लाईट, एक बालकनी से झांक रहा था तसल्ली से लाइट बुझाने के बाद, ‘बुजुर्ग औरत हुँह’-ऐसा कह कर एक लंपट लड़के ने बुझाई थी लाइट…तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर चिल्ला रहा था-सभी अपने-अपने फ्लैट्स की लाइटें बुझा दें-लाइटें बुझ रही थीं,एक के बाद एक,बिल्डिंग की दीवार पर से मिटती जा रही थीं आयताकार काँच की खिड़कियाँ। तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर को लग रहा था कि जिस आयताकार खिड़की की लाइट न बुझेगी वह क्रिस्टीना के फ्लैट की लाइट होगी।जरुर वही होगी।
…फ्लैटों की बत्तियाँ बंद होती जा रही थीं,उनमें से कोई भी क्रिस्टीना को नहीं जानता था,हजारों खिड़कियों की रौशनियाँ सिमट रही थीं,उन्ही हजारों में कहीं क्रिस्टीना के फ्लैट की खिड़की भी थी,हजारों में से किसी ने भी,कभी भी,उसका नाम तक नहीं सुना था,आसमान तक उठी इमारतोंमें उसका होना अज्ञात था,उमड़ती भीड़ में वह एक अजनबी के फोन पर थी अपनी कमजोर पड़ती साँसों के साथ…
कैफेटेरिया में लोगों का सैलाब उमड़ आया था।एक गायिका जोर-जोर से गाना गा रही थी।तमाम लोग शराब पी रहे थे।बाहर आती जाती गाड़ियों के हॉर्न शोर मचा रहे थे।रात गहरा रही थी,शहर जाग रहा था।अंधेरा बढ़ रहा था,लाइटें जगमगा रही थीं।
सिर्फ तीन आयताकार काँच की खिड़कियाँ बची थीं।बाकी सारी खिड़कियों की रौशनी बंद थी।लोगों को पता था कि अगर बत्ती जलती रही तो अभी कोई फायर ब्रिगेड वाला आकर उनके फ्लैट की बैल बजा देगा।अंधेरे में डूबी इमारतें रह गई थीं।बर्फ फेंकते आसमान की ओर उठी भुतही अंधेरी विशाल इमारतें,जिनमें से एक के बारहवें माले पर तो एक के सातवें और ग्यारहवें माले पर आयताकार खिड़कियाँ चमक रही थीं।अंधेरे में डूबी विशाल इमारतें किसी प्रेत की तरह दिखती थीं।उनके निचले हिस्से रोड की लाइटों में चमक रहे थे और धीरे-धीरे ऊपर की ओर अंधेरा बढ़ता जाता था।ऊपर के सारे हिस्से अंधेरे में समाये हुए थे।गिरती बर्फ में उनका विशाल भुतैल आकार दैत्य की तरह उठा हुआ था, आसमान से गिरती बर्फ के घनेपन में समाया हुआ।दो इमारतें तो ऐसी थीं कि वे नीचे से ऊपर तक पूरी तरह से अंधकार के समंदर में डूबी हुई थीं।
तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड के पास खड़ी ऐंबुलेंस की सायरन वाली लाइटें लुकझुक हो रही थीं।फायर ब्रिगेड के कुछ लोग उन तीन खिड़कियों वाले फ्लैटों के दरवाजे चैक कर रहे थे।दो के दरवाजे बाहर से बंद थे और एक अंदर से।जो अंदर से बंद था उसे खोलने में मशक्कत लगी।
थोडी देर बाद फायर ब्रिगेड के हैड का मैसेज आया स्टीव के सैल फोन पर।लगभग आधा घण्टे बाद।
‘ हमने कर दिखाया।’
‘ वे कैसी हैं? उसकी साँस बहुत कमजोर हो गई थी।’
‘ अब ठीक हैं।उन्हे अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया है।’
‘ आपने मुझे आधे घण्टे बाद बताया कि वह ठीक है।आपको तुरंत बताना चाहिए था।’
‘ सॉरी स्टीव।’
फायर ब्रिगेड सर्विस के हैड ने स्टीव को मैसेज किया।
तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर लौटने से पहले उन इमारतों की ओर देखता रहा था।गिरती बर्फ के दरमियाँ जगमगाती हजारों आयताकार खिड़कियाँ।दूर एक खिड़की खुली है।एक बच्चा उसमें से झाँक रहा है।वह उसे देखकर हाथ हिलाता है।इमारतों के बेसमेण्ट से गाडियाँ निकल रही हैं।लगातार।एक के बाद एक।कुछ लोग पैदल जा रहे हैं, फुटपाथ पर।रात दिन में बदल रही है।
तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर पिछले बारह दिनों से खाली था।उसे शहर का डाउनटाउन इलाके का एक हिस्सा मिला हुआ है।वहाँ बहुत कम वारदात होती हैं।पिछले तीन सालों में वहाँ आग लगने का कोई भी वाकया नहीं हुआ।सिर्फ एक रैस्क्यू उन्होंने चलाया था, एक स्कूल में जिसकी छटी मंजिल पर एक शिक्षक ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था और कमरे की खिड़की से लटक गया था।
उसने फायर ब्रिगेड को स्टार्ट किया।अबकी उसने उन इमारतों की ओर नहीं देखा।उसे पल भर को खून से सना क्रिस्टीना का चेहरा दीखा।धीरे-धीरे फायर ब्रिगेड सरकने लगी।लबादा पहने एक बच्ची ने सरकती फायर ब्रिगेड को देखकर हाथ हिलाया, वह मुस्कुरा दिया।बच्चों की स्कूल की किताब में फायर ब्रिगेड की फोटो होती है इसलिए वे हाथ हिलाते हैं – उसके साथी ने उसे एक बार कहा था।
स्टीव कैफेटेरिया से बाहर आ गया था।स्ट्रीट के किनारे-किनारे पाथ-वे पर वह सीटी बजाता टाँगें नचाता चल रहा था।पाथ-वे पर कोक की एक खाली केन पड़ी थी, उसने उसे पैरों से मारने अपनी दाहिनी टाँग पीछे की, फिर पल भर को रुका और दूसरी ओर चला गया।सामने एक डस्ट बिन था।खरगोश के आकार का।खरगोश के आकार को देखकर उसने इस तरह हाथ हिलाया जैसे कोई किसी का अभिवादन करता है।पास से गुजरते एक आदमी ने उसे पल भर को देखा, शराब पिये है – यह खयाल उसके जेहन में आया।स्टीव को पल भर के लिए शराब पीने की इच्छा हुई थी।पब के सामने खड़े-खड़े उसने अपनी पॉकेट से पैसे निकालकर गिने थे।उसे काउण्टर वाले शख्स पर गुस्सा आया जिसने उससे फोन करने के चार यूरो ले लिये थे।रम का एक पैग तीन यूरो का था और बियर के लिए उसे एक यूरो देनी पड़ती।उसने बचे-कुचे पैसे गिने।उन्हें वापस रख लिया और चला आया।
सामने मुख्य चैराहा था।बर्फ में दफन।रोड के किनारे पेडों की एक कतार थी जिनकी टहनियों पर, पत्तों पर बर्फ की कतरनें थीं,बीच-बीच में छूटकर टुकडों में पेड़ से यकायक गिरतीं।बर्फ से ढंकी उनकी शंक्वाकार चोटियाँ लाशों की तरह आसमान की ओर उठी थीं,चुपचाप,मरी हुई।पेडों के नीचे-नीचे गाड़ियों की लाइटों की चकाचौंध थी, जो अचानक बढ़ी थी और बढ़ती जा रही थी।सामने घण्टाघर पर लटकी घड़ी में बारह बजकर पैंतालिस मिनट हुये थे।वह पैदल चलता चला गया था।
‘ हैलो मेरा नाम स्टीव है।’
उसने अस्पताल के बिस्तर पर पडी क्रिस्टीना को देखते हुए कहा।क्रिस्टीना ने कुछ नहीं कहा।वह चुप थी।डॉक्टर ने बताया कि क्रिस्टीना कोकुछ याद नहीं।उसकी उम्र छियासी साल है, फिर सिर पर चोट।पता नहीं उसे कभी याद भी आये या नहीं कि उसके साथ क्या वाकया हुआ था?
स्टीव ने थोड़ा झिझकते हुए उसके पास फूलों का गुलदस्ता रख दिया।कारनेशन के फूलों का एक सस्ता सा गुलदस्ता वह खरीद लाया था।
क्रिस्टीना ने उसे पल भर को देखा और फिर दूसरी तरफ देखने लगी।स्टीव ने सोचा था कि वह उसे बतायेगा कि उसको ढूँढने पूरे एक हजार तीन सौ छह घरों के लोगों ने अपने-अपने घरों की लाइटें बुझा दी थीं।है न कितनी अद्भुत बात।सच कितना अच्छा दीखता होगा, इस तरह हजारों आयताकार खिडकियों की रौशनियों का बुझते जाना, किसी छियासी साल के बुजुर्ग के लिए।वह सोचकर आया था, कि वह कहेगा कि उसने पूरे चार घण्टो तक उसकी साँसों की आवाज सुनी थी।
तभी क्रिस्टीना की बेटी आ गई।स्टीव से मिलकर वह खुश हुई।क्रिस्टीना उसे भी पहचान न पाई।
‘ इनके घर में बिल्ली आती है।शायद किसी खिडकी से।वह कोई पालतू बिल्ली नहीं है।यह खतरनाक हो सकता है।’
‘ ओह…यह नहीं पता था।’
‘ सरकार के सोशल वेलफेयर डिपार्टमेण्ट वाले कह रहे थे कि क्रिस्टीना का फोन व्यस्त था।उन्हें लगा वह कहीं बात कर रही है।सो उन्होने मान लिया कि वह ठीक है।’-उसने आगे कहा-‘ मैं काम में लगी रहती हूँ।मेरे पास एक पल भी खाली नहीं।इस वाकये की बात भी मुझे आज पता चली।पूरे दो दिन बाद।फायर ब्रिगेड वालों का मैसेज था।दो दिन पुराना मैसेज जो मैं आज देख पाई।’
‘ अरे।पर मैं व्यस्त नहीं रहता हूँ।मैं बेरोजगार हूँ।’
‘ ओह।’
‘ ऐसी कोई बात नहीं।यह होता रहता है।यह जिंदगी है।’
उस रोज जब स्टीव तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड के ड्रायवर से कह रहा था कि उसने आधे घण्टे बाद उसे क्रिस्टीना के मिलने की खबर दी थी,जबकि उसे तुरंत बताना चाहिए था तो वह देर तक सोचता रहा था।वह थोड़ी देर तक फोन से आती स्टीव की आवाज को सुनता रहा था।वह पल भर को ठिठक गया था।इस तरह लेट हो गया था।उसके मन में तमाम बातें थीं, कि क्या अंतर पडता है स्टीव जो तुम्हारी आवाज अकेले कमरे में गूँजती थी,हो सकता है क्रिस्टीना को ले जाने के बाद भी उस खाली कमरे में जहाँ उसका खून बिखरा था,जहाँ वह लाल, पीले और हरे बटन वाला फोन लावारिस पड़ा था,जहाँ काँच को थामे दीवार पर जमी थी आयताकार खिड़की, जहाँ फर्श पर थे क्रिस्टीना के गिरने और बेहोश होने के निशान, जहाँ ठण्ड में जम रहा था फर्श पर बिखरा उसका खून लाल से गहरा लाल और काला होता, जहाँ कोई बिल्ली थी दरवाजे के पीछे छिपी…वहाँ उस वीराने में,जब क्रिस्टीना भी नहीं सुन सकती थी,तब भी वहाँ पर तुम्हारी आवाज थी…तुम्हारी पुकार…तुम्हारी बेचैनी के शब्द…- तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड का ड्रायवर उससे कहना चाहता था।
तरुण भटनागर
कहानीकार एवं उपन्यासकार. तीन उपन्यास ‘लौटती नहीं जो हँसी’, ‘ राजा, जंगल और काला चाँद’ और’ बेदावा’ प्रकाशित. चार कहानी संग्रह’ गुल मेंहदी की झाड़ियाँ’, ‘ भूगोल के दरवाज़े पर’, ‘ जंगल में दर्पण’ और’ प्रलय में नाव’ प्रकाशित. वर्तमान में भोपाल में निवासरत.
वागेश्वरी सम्मान, स्पंदनकृति सम्मान, मध्य भारत हिंदी साहित्य सम्मान, वनमाली सम्मान

