सुधांशु गुप्त
प्रिय युवा लेखक,
आपका मेल मिला। खुशी हुई कि आप कहानियाँ लिखना चाहते हैं। इस बात की भी बहुत खुशी है कि आप युवा हैं। युवावस्था ही वह उम्र है, जब आप बहुत कुछ करना चाहते हैं। स्वाभाविक है कि आप भी बहुत कुछ करना चाहते होंगे। मुझे यह भी अच्छा लगा कि आपने दुनियावी सोच से इतर लेखक बनना चुना। वह भी कहानी लिखना चुना। आपने मुझसे एक सवाल पूछा है। सिर्फ इतना कि ‘कहानी क्या होती है’। लेकिन इस सवाल का जवाब देने से पहले मैं दो निजी बातें आपको बताना चाहता हूँ। मुझे खुशी हुई कि आपने जानना चाहा कि ‘कहानी क्या होती है’। हालांकि मुझे इस बात पर संदेह भी हुआ कि पता नहीं मैं इस सवाल का जवाब ठीक से दे पाऊँगा या नहीं। यह शायद किसी भी लेखक का सबसे पहला और सबसे मुश्किल सवाल है। कहानी लिखना शुरू करने से पहले यही सवाल मन में आता है। यह ऐसा सवाल भी है, जिसका जवाब आप उम्र भर खोजते रहते हैं।
आपका यह सवाल मुझे भी अपनी स्मृतियों में ले गया है। पता नहीं आपकी उम्र कितनी होगी। लेकिन जब मैंने लिखना शुरू किया था, तो मेरे मन में भी यही सवाल आया था। मैंने भी ठीक आप ही की तरह यह सवाल एक अन्य लेखक से पूछा था। उन्होंने जिस अकादमिक शैली में इसका जवाब दिया था, उससे मैं आज तक सहमत नहीं हो पाया। मुझे अब भी यही लगता है कि व्यक्ति जीवन भर इसी सवाल से उलझा रहता है। वह लिखता रहता है…लिखता रहता है…लेकिन पता नहीं इस सवाल का जवाब उसे मिलता है या नहीं! आप युवा हैं, मैं आपको किसी उलझन में नहीं डालना चाहता। मैं चाहता हूँ कि आप स्वयं इस सवाल का जवाब तलाश करें, लिखते-लिखते ही। मुझे विश्वास है कि एक ना एक दिन आपको इस सवाल का जवाब अवश्य मिल जाएगा।…शायद यही प्रक्रिया है।
लेकिन आपने मुझसे सवाल पूछा है तो मुझे आपको जवाब तो देना ही होगा। यह जवाब इसलिए भी ज़रूरी है ताकि आप दूसरे लेखकों पर विश्वास बनाए रखें-कम से एक लम्बे समय तक। कोई भी विश्वास स्थायी नहीं होता! मैं आपके सवाल का जवाब देने की कोशिश करता हूँ। इस विश्वास के साथ कि आप मेरे जवाब को अन्तिम नहीं मानेंगे और अपने स्तर पर इस सवाल का जवाब स्वयं भी तलाशने की कोशिश करेंगे और करते रहेंगे। मुझे विश्वास है कि एक ना एक दिन आप इस सवाल का जवाब तलाश कर लेंगे। अब मैं आपके सवाल का जवाब देने की कोशिश करता हूँ।
आपने पूछा है, कहानी क्या होती है? इस सवाल का सीधा-सीधा कोई उत्तर नहीं हो सकता। हर दौर का लेखक कहानी को अपने हिसाब से परिभाषित करता। मैं चाहूँ तो मैं भी वही कर सकता हूं। एडगर एलन पो, हेमिंग्वे, आस्कर वाइल्ड, निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव और बहुत से लेखकों ने इसे परिभाषित किया है। युवा लेखक इन्हीं लेखकों द्वारा दी गई किसी परिभाषा दोहराते रहते हैं। कभी-कभी तो उम्रभर। मैं आपको उस चक्रव्यूह में फंसाना नहीं चाहता। पहली बात तो मैं आपको यह कहना चाहता हूँ कि कोई भी लेखक किसी दूसरे (चाहे वह कितना भी बड़ा लेखक क्यों ना हो) लेखक की बताई परिभाषा पर कहानी नहीं लिख सकता। ऐसा करना मुश्किल ही नहीं लगभग असंभव है।
आप भी नहीं लिख पाएँगे। तो मैं आपको थोड़ा-सा अलग ढंग से बताना चाहता हूँ। मैं यह नहीं बताऊँगा कि कहानी क्या होती है, बल्कि यह बताने की कोशिश करता हूँ कि क्या है, जो कहानी नहीं है। अगर आपने कभी मैथ्स पढ़ा है तो आप जानते होंगे कि हम किसी की वैल्यू निकालने के लिए सारी असम्भावनाओं को डिलीट करते जाते हैं और जो बचता है वही ‘रिक्वायर्ड’ की वैल्यू होती है। तो कहानी पर बात करने के लिए हम उसे जानते हैं, जो कहानी नहीं है। धीरे-धीरे हम उन सारे घटकों को डिलीट करते जाते हैं, जो कहानी नहीं है। हम अंत में पाएँगे कि हमारे पास कहानी बची है-सिर्फ़ कहानी। हो सकता है मेरी यह बात आपको कुछ अजीब लगे। फिर भी मैं अपनी बात आपको इसी तरह समझाना चाहूंगा। मुझे यकीन है कि अंत में आपको मेरी बात समझ में आ जाएगी। आज आपके सामने कहानियों की भीड़ दिखाई देती होगी। यह सवाल भी आपके मन में आता होगा कि किसे कहानी ना माना जाए और किसे कहानी माना जाए। मैं अपनी बात पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के, इटली के एक महान मूर्तकार से करता हूँ। इस चित्रकार का नाम है-माइकल एंजेलो। सोलहवीं शताब्दी के एकदम शुरू में उसने एक मूर्ति बनाई। यह मूर्ति इतनी ख़ूबसूरत थी कि इसे पुरुष सौंदर्य का प्रतीक मान लिया गया। नाम दिया गया ‘डेविड’। ठीक उसी तरह जिस तरह स्त्री सौंदर्य की प्रतीक वीनस को माना जाता है। यह मूर्ति पूरे विश्व में आज भी जानी जाती है। एक दिन किसी ने एंजेलो से पूछा, आपने इतनी सुन्दर और परिपक्व मूर्ति कैसे बनाई? एंजेलो ने बड़ी सहजता से मुस्कराते हुए कहा, मैंने संगमरमर की चट्टान का एक टुकड़ा लिया। उसमें से वो हिस्से निकालता रहा जो ‘डेविड’ नहीं था। स्वाभाविक है कि उसकी कल्पना में ‘डेविड’ की एक तस्वीर रही होगी। तो उस मूर्ति में से एंजेलो वे हिस्से निकालता रहा जो ‘डेविड’ जैसे नहीं दिखते थे। अंत में जो मूर्ति बनी बची वह ‘डेविड’ की थी। वास्तव में किसी चट्टान को लगातार तराशते जाना ही ‘डेविड’ को जन्म देना है।
मित्र, अब मान लेते हैं, ‘डेविड’ एक कहानी है। तो आपको इसमें से वे हिस्से निकालने होंगे जो कहानी नहीं है। यानी कहानी की जो तस्वीर आपके ज़ेहन में बनी है, जो भी उससे ‘मैच’ नहीं करता उसे आपको बाहर निकालना होगा। तभी कहानी बचेगी।
तो क्या है जो कहानी नहीं है। बाहर की दुनिया में घट रही घटनाएँ, न्यूज़, तत्काल हुआ कोई भी अपमान, अनावश्यक डिटेलिंग, ऐसी राजनितिक बातें जो कहानी लिखने के कुछ समय बाद ही बदल सकती हैं। मिसाल के तौर पर आप किसी नेता के तानाशाहीपूर्ण रवैये पर कहानी लिखते हैं, लेकिन कहानी लिखने के कुछ ही दिन बाद वह नेता अपने पद पर नहीं रहता तो आपकी कहानी निरर्थक हो जाती है, उसकी उम्र घट जाती है।
मुझे लगता है मेरा आशय आप समझ गए होंगे। एक और छोटे से उदाहरण से आप मेरी बात समझ सकते हैं। अभी कुछ समय पहले पूरी दुनिया पर कोरोना का आतंक छाया हुआ था। कोरोना पर बहुत-सी कहानियाँ और उपन्यास लिखे गए। मरते हुए लोगों पर, चिकित्सा प्रणाली की बिगड़ती दुनिया पर, साइकिलों पर अपने शहर से अपने घर-गाँव जाते लोगों पर, रेल की पटरी पर सोये लोगों की मृत्यु पर…। इन कहानियों को आप आज…या कुछ समय बाद पढ़ते हैं तो इन्हें नितांत अप्रासंगिक पाते हैं। यानी जब भी आप बाहर की दुनिया में घट रही घटनाओं पर-वह भी बिना अनुभूति के- कहानी लिखते हैं तो घटनाओं के घट जाने के तत्काल बाद वे कहानी भी मर जाती है।
ऐसा इसलिए कि जिसे कहानी कहा जा रहा है वो असल में क्षणिक आवेग में आकर लिपिबद्ध रिपोर्ताज मात्र है। अब ये सवाल उठ सकता है कि फिर कामू का प्लेग उपन्यास भी तो आज से एक सौ साल पहले की कहानी है। फिर उसे क्यों न रिपोर्ताज मान लिया जाए? ऐसे ही द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी अनेक कहानियाँ हैं, जिनके बारे में यही उद्गार कहे जा सकते हैं। ठीक भी है। लेकिन कहानी और रिपोर्ताज में अंतर यह है कि चाहे वो कामू का उपन्यास प्लेग हो या फिर द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से जुड़ी कहानियां हों, इनमें युद्ध की विभीषिका व्यक्तिगत त्रासदी के रूप में प्रस्तुत होती है। कहानी में या तो त्रासदी या व्यक्ति या शाश्वत मानवीय भावना मुख्य किरदार होती है और उसके चारों ओर कहानी विकसित होती है। ऐसा इसलिए कि घटना समय के साथ मानस पटल पर धूमिल या अप्रासांगिक हो जाएगी लेकिन शाश्वत भावनाएं और मानवीय वेदना या उल्लास से पाठक का जुड़ाव हर युग में बना रहेगा। प्लेग में व्यक्त डर, युद्ध के समय मृत्यु का भय…ऐसी ही अनेक चीज़ें हैं जो किसी काल विशेष से जुड़ी नहीं है। अगर काल विशेष से जुड़ी किसी घटना को लेकर भी लेखक कहानी लिख रहा है तो उसकी सघनता, उसका दर्शन, उसका जीवंत परिवेश, उसके साथ लेखक की संल्गनता, उसकी भाषा उसे समय की सरहदों से परे ले जाती है। और यही बात कहानी को अहम बना देती है। मुझे लगता है कि आप मेरी बात समझ गए होंगे।
तो प्रिय मित्र, यहाँ मैंने कहानी को लेकर कुछ बातें कहीं हैं। लेकिन मैं अपनी इन बातों के साथ यह भी कहना चाहता हूँ कि कोई भी बात, किसी की भी बात अन्तिम नहीं होती। मेरी बात भी अन्तिम नहीं है।
लेखक अपने अनुभव से, अपनी अनुभूति से अपने अध्ययन से सीखता है और कहानी को पुनः परिभाषित करता है। आपसे भी मैं यही उम्मीद करता हूँ।
लेकिन यहाँ मैंने जो कुछ भी कहा है वह मूल बातें हैं, आप इनमें कुछ भी जोड़ने-घटाने के लिए स्वतंत्र हैं।
प्रिय युवा लेखक, मुझे उम्मीद है कि हमारा संवाद बना रहेगा। हम कहानी के विषय में और भी बातें करेंगे।
तुम्हारा संभावित मित्र
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