क्या पढ़ना कहानी लिखना सिखा सकता है?

सुधांशु गुप्त

प्रिय युवा लेखक महोदय

आपका मेल मिला। दूसरा मेल। पढ़कर अच्छा लगा कि आपके भीतर पढ़ने का एक  जुनून है। आप ख़ूब पढ़ते हैं। मुझे यह बात इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि अब पढ़ना भी एक निरर्थक-सा काम होता जा रहा है। बहुत से लेखकों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे इसलिए किसी और का लिखा नहीं पढ़ते क्योंकि इससे उनके लेखन पर असर पड़ता है। शायद वे यह कहना चाहते हैं कि अधिक लेखकों को पढ़ने का असर उनके लेखक पर भी आ जाता है, उनकी मौलिकता नष्ट हो जाती है। हो सकता है उनका कहना सही हो(लेकिन पहले यह भी तो देखा जाना चाहिए कि वे  कितने मौलिक हैं)। लेकिन इस बात को यहीं छोड़ते हैं। मुख्य बात पर आते हैं। आपने लिखा है कि आप ख़ूब पढ़ते हैं। आपके  प्रिय लेखकों में लू शुन, मोपासां, चेखव, ओ हेनरी, काफ़्का, तोल्स्तॉय, दोस्तोव्हस्की, गोगोल के साथ-साथ जैक लण्डन भी हैं। मैं यह मानकर चलता हूं कि जब आप इतने विदेशी लेखकों को पढ़ते हैं तो हिन्दी लेखकों को भी पढ़ते ही  होंगे। हिन्दी के कौन से लेखकों को आप पढ़ते हैं, यह मैं आपसे नहीं पूछूंगा। इस मामले में लेखक को-ख़ासकर युवा लेखक को स्वतंत्र रहना चाहिए। उसे अपनी इच्छा से ही यह तय करना चाहिए कि उसे किसको पढ़ना है-किसको नहीं।

अपनी मेल में जिन लेखकों का आपने ज़िक्र किया है-वे सभी 19वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों के लेखक हैं। ये सभी क्लासिक लेखक भी हैं। रूस, फ्रांस, चीन, जर्मनी, अमेरिका और आयरैंड के हैं। मुझे यकीन है कि आप केवल इन्हीं लेखकों को नहीं पढ़ते होंगे। मेरा मानना है कि आपको और लेखकों को भी पढ़ना चाहिए, जो क्लासिक नहीं माने जाते, लेकिन महत्वपूर्ण हैं। मेरा तो यह निश्चित रूप  से मानना है, किस लेखक की कौन-सी  किताब पढ़नी है इसका चुनाव स्वयं पाठक को ही करना चाहिए। आपकी अध्ययनशीलता निस्संदेह प्रभावित करती है। लेकिन पता नहीं क्यों जब आप दुनियाभर के विदेशी लेखकों के नाम गिनवा रहे थे, यह कहते हुए कि आप इन लेखकों को पढ़ रहे हैं या भविष्य में पढ़ना चाहते हैं तो आपकी सारी बात में एक और बात अंतर्निहित लग रही थी। आप शायद बात के भीतर की बात को पकड़ नहीं पाए। वह बात क्या थी, मैं बताता हूँ। आपको लग रहा था कि अधिक से अधिक, बड़े से बड़े क्लासिक लेखक को पढ़ने के आपके पास दो कारण थे। पहला कारण, आपको लग रहा था कि इन्हें पढ़कर आप कहानी लिखना सीख जाएंगे। दूसरा कारण यह था कि आप इनके जैसा हो जाना चाहते थे। यानी आप चेखव, मोपासां या वे दूसरे लेखक जिन्हें आप पढ़ रहे हैं या भविष्य में पढ़ना चाहते हैं उनके जैसा लिख पाएंगे। वास्तव में  ये दोनों ही बातें ग़लत हैं। आप बेशक दुनियाभर का साहित्य पढ़ लें, आप कहानी लिखना नही सीख सकते। ये लेखक आपको कहानी लिखना नहीं सिखा सकते। और आप किसी भी क्लासिक लेखक की तरह तो बिल्कुल  ही नहीं लिख सकते। इसकी  वजह है। इन क्लासिक लेखकों ने जो कुछ भी लिखा वह अपने अनुभव, अनुभूति, अध्ययन, दर्शन, मनुष्यता की समझ के साथ लिखा। आपके पास अभी तक इनमें से शायद कुछ भी ना हो। मैं  आपको निराश नहीं  कर रहा। एक कटु सत्य बता रहा हूं। मैं कितने ही ऐसे लोगों को जानता हूँ जिन्होंने बेपनाह साहित्य पढ़ा है। वह कहानी पर बोल सकते हैं, कहानी पर लेख लिख सकते हैं, लेकिन कहानी नहीं लिख सकते। और चेखव, मोपासां, ओ हेनरी (या अन्य लेखक जिनके नाम आपने मेल में गिनवाए हैं) बनना लगभग असंभव हैं। या तो आप उनसे  बेहतर बन सकते हैं या ख़राब। 

शायद आपकी क्रिकेट में रुचि हो। मैं अपनी बात क्रिकेट के ज़रिए समझाने की कोशिश करता हूं। सुनील गावस्कर दुनिया के पहले ऐसे बल्लेबाज थे, जिसने टेस्ट क्रिकेट में दस हजार रन बनाए। वह क्रिकेट में भी थोड़ा धीमा समय था। उसके बाद एक से एक बल्लेबाज आए और चले गए। कपिल देव, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और भी बहुत से। सभी महान क्रिकेटर हैं। लेकिन इनमें से कोई भी गावस्कर नहीं बन पाया। अब तो आपने भी वैभव सूर्यवंशी का नाम सुन ही लिया होगा। उसके भीतर आक्रामकता कमाल की है। वह भी हो सकता है भविष्य में एक बड़ा क्रिकेटर साबित हो। लेकिन वह भी किसी पूर्ववर्ती महान क्रिकेटर की जगह  नहीं ले सकता। क्योंकि हर क्रिकेटर अपनी समय के अनुसार खेलता है। उस समय के गेंदगबाज, पिच, परिवेश उसके खेल को बनाते है जिस समय सुनील गावस्कर क्रिकेट खेल रहे थे, उस समय वेस्टइंडीज, आस्ट्रेलिया के पास तेज गेंदबाज थे। वह ऐसा समय था जब गेंदबाजों का दबदबा था। लेकिन आज क्रिकेट पूरी तरह बदल चुका है। आज क्रिकेट बल्लेबाजों का खेल बन गया है। पिचें बल्लेबाज के अनुकूल होती हैं। उसकी सुरक्षा के लिए तमाम चीजें उपलब्ध हैं।

क्या यही नियम साहित्यकार-कहानीकार पर  लागू नहीं होते? बिल्कुल लागू होते हैं। कहानीकार जब कहानी लिखता है तो उसके सामने अपना देश, अपने समय के युद्ध, अपने समय के संघर्ष, समाज में होने वाले अत्याचार, नैतिकताएँ-अनैतिकताएँ, अपने समय की वर्जनाएँ, अपना दर्शन, आस पड़ोस के मुल्कों में क्या हो रहा है, यह सब कहानी में दर्ज करता है। अगर आप ग़ौर से देखें तो पाएँगे कि कोई भी लेखक ऐसी कहानी नहीं लिखता जो किसी स्थान विशेष से जुड़ी हो। वह मनुष्यता के लिए, मनुष्यता के पक्ष में कहानियाँ लिखता है। यही वजह है कि रूस में लिखी गई कहानियाँ केवल रूस को ही चित्रित नहीं करतीं और फ्रांस या जर्मनी में लिखी गई कहानियाँ केवल उन्हीं देशों की दुनिया चित्रित नहीं करती जहाँ के लेखक उन्हें लिख रहे् हैं। वे अपनी कहानियों में ‘यूनिवर्सल ट्रुथ’ चित्रित करते हैं। इसलिए वे क्लासिक कहलाते हैं। इसलिए ऐसा कोई भी विचार अपने मन में ना आने दें कि आप विश्व प्रसिद्ध कहानीकारों को पढ़कर कहानियाँ लिखना सीख जाएँगे या आप उनके जैसी कहानियाँ लिख सकते हैं।

हो सकता है आपके मन में  अब यह सवाल आए कि फिर उन्हें पढ़ा ही क्यों जाए। पढ़ना इसलिए ज़रूरी है ताकि आपके भीतर भाषा की सनझ पैदा हो, आप उनके शिल्प और शैली को समझ सकें, आप उनकी कल्पनाशीलता को देख  सकें और यह समझ सकें कि एक लेखक अपने समय को कैसे दर्ज़ करता है। 

अभी आप युवा हैं। पढ़ना आपके लिए ज़रूरी है। मेरा यह सुझाव है कि आप केवल क्लासिक लेखकों को नहीं बल्कि समकालीन लेखकों को भी पढ़ें ताकि आप दोनों के लेखन के बीच फर्क समझ सकें। तभी आप बेहतर लिख पाएँगे।

तुम्हारा संभावित मित्र

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