योगेंद्र आहूजा

ब्रिटिश निर्देशक जोनाथन ग्लेज़र की फिल्म ‘द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’(2023)हाल के वर्षों की सबसे चर्चित, असाधारण और बेचैन करने वाली फ़िल्मों में से है। यह एक ‘इंग्लिश–नॉन–इंग्लिश’ फिल्म है, यानी इंग्लैंड की फिल्म, लेकिन अंग्रेज़ी में नहीं। यह जर्मन, पोलिश और यिददिश भाषाओं में है। फ़िल्म द्वितीय विश्वयुद्ध और होलोकॉस्ट की पृष्ठभूमि में है। इस विषय पर यूरोप में बेशुमार फिल्में बनी हैं, लेकिन इस फिल्म की शैली और संरचना उन तमाम फ़िल्मों से बिल्कुल अलग है।
जोनाथन ग्लेज़र समकालीन सिनेमा के उन विरल निर्देशकों में हैं जो बहुत कम फ़िल्में बनाते हैं। लेकिन उनकी हर फ़िल्म एक महत्वपूर्ण कला-घटना बन जाती है। तीन दशकों के लंबे करियर में उन्होंने केवल चार फ़िल्में बनाई हैं। फिर भी वे इस समय के सबसे महत्त्वपूर्ण निर्देशकों में गिने जाते हैं। उनकी फ़िल्मों की विशेषताएँ हैं कम संवाद, खामोशियाँ और ध्वनियां, धीमी मगर सम्मोहक गति और दर्शक को असुविधा में डालने वाली संरचना। वे दर्शक को यह नहीं बताते कि उसे क्या महसूस करना चाहिए। यानी वे ऐसे निर्देशक हैं जो हमारी भावनाओं या सोच को निर्देशित नहीं करते। वे सिर्फ चुपके से दर्शक को सच्चाई के रू-ब-रू खड़ा कर देते हैं। इसके बाद ‘अर्थ की खोज’ दर्शक को स्वयं करनी होती है।
इस फिल्म की गति भी धीमी है। पारंपरिक नाटकीय घटनाएँ बहुत कम हैं। संवाद सीमित हैं, माहौल और पार्श्व-ध्वनियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण है। कैमरा अक्सर एक दूरी बनाए रखता है, जैसे कोई निगरानी कैमरा ज़िन्दगी को चुपचाप दर्ज कर रहा हो। यही वजह है कि फ़िल्म का असर अचानक नहीं होता; धीरे-धीरे भीतर उतरता है और देर तक बना रहता है।
दर्शक, जो तेज़ रफ़्तार घटनाओं, रोमांचक कथानक और भावनात्मक विस्फोटों वाले सिनेमा के आदी हैं, उन्हें यह फ़िल्म मुश्किल या बोझिल लग सकती है। लेकिन जो सिनेमा को एक गंभीर कला मानते हैं, उनके लिए यह हालिया दौर की सबसे अहम फ़िल्मों में से एक है।
‘द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ को विश्व भर में असाधारण सराहना मिली। 2023 के कान फ़िल्म महोत्सव में इसे ग्रां प्री और फ़िप्रेसी पुरस्कार मिला। 2024 के ऑस्कर में इसे पाँच नामांकन प्राप्त हुए, जिनमें से सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ ध्वनि के पुरस्कार इसने जीते। ब्रिटिश अकादमी (बाफ्टा) पुरस्कारों में इसेसर्वश्रेष्ठ ब्रिटिश फ़िल्म, अंग्रेज़ी के अतिरिक्त भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ ध्वनि सहित तीन बड़े सम्मान मिले। इसके अतिरिक्त यूरोपीय फ़िल्म पुरस्कारों और अनेक अंतरराष्ट्रीय समीक्षक संगठनों ने भी इसे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में शामिल किया।
फ़िल्म का केंद्रीय किरदार है रूडोल्फ़ होस, जो नाज़ी यातना-शिविर औश्वित्ज़ का कमांडेंट था। वह अपने परिवार के साथ शिविर की दीवार के ठीक बगल में बने एक सुंदर घर में रहता है। परिवार एक साधारण, आरामदेह, लगभग आदर्श जीवन जीता दिखाई देता है। वे गार्डनिंग करते हैं, पिकनिक मनाते हैं, बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। अपने बच्चों से किसी भी साधारण माँ-बाप की तरह प्रेम करते हैं। रूडोल्फ रात को सोते समय अपनी बच्ची को ‘हैन्सल और ग्रेटल’ की परी-कथाएँ सुनाता है। लेकिन उसी दीवार के पार इतिहास के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक घटित हो रहा है।
फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह होलोकॉस्ट को या अत्याचारों को प्रत्यक्ष नहीं दिखाती। इस विषय पर बनी अधिकांश फिल्में ज़ुल्म और अत्याचारों और क़त्लेआम को सीधे पर्दे पर दिखाती हैं। मगर यह फ़िल्म ख़ामोशियों, दूर से आती आवाज़ों और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के मामूली लम्हों के ज़रिये एक ऐसी दहशत पैदा करती है जो फ़िल्म ख़त्म हो जाने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती। कैमरा कभी भी शिविर के भीतर नहीं जाता। दर्शक गैस-चैम्बरों, हत्याओं या कैदियों की यातना को नहीं देखते। वे केवल दूर से आती चीख़ें, गोलियों की, ट्रेनों की आवाज़ें, और भट्टियों की गूँज सुनते हैं। यही आवाज़ें धीरे-धीरे फ़िल्म का सबसे ख़ौफ़नाक हिस्सा बन जाती हैं। जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे ज़्यादा परेशान करता है। ध्वनि-डिज़ाइनर जॉनी बर्न ने महीनों तक शोध करके ऐसी ध्वनियाँ तैयार कीं कि दर्शक चाहे कुछ देख न रहा हो, लेकिन उसे लगातार महसूस होता रहता है कि दीवार के उस पार कुछ भयावह घट रहा है।
फ़िल्म का केंद्रीय विचार है – “बुराई की सामान्यता”। भयानक अपराध हमेशा ऐसे लोग नहीं करते जो देखने में दरिन्दे हों। अक्सर बिल्कुल आम, शरीफ़ और घरेलू ज़िन्दगी जीने वाले लोग भी ख़ौफ़नाक ज़ुल्मों का हिस्सा बन जाते हैं। कई बार उन्हें एहसास तक नहीं होता कि वे किसी ग़ैर-इंसानी अमल में शरीक हैं। वे अपने आपको फ़र्ज़ अदा करने वाला जिम्मेदार नागरिक समझते हैं। अत्याचार करते हुए वे उसे अत्याचार की तरह महसूस नहीं करते, बल्कि उन्हें यकीन होता है कि वे राष्ट्र, व्यवस्था या किसी उच्चतर उद्देश्य की सेवा कर रहे हैं, अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। फ़िल्म सवाल उठाती है कि मनुष्य अपने निजी जीवन और सुख-सुविधाओं में कैसे इतना डूब सकता है कि ठीक बगल में घट रही भीषण अमानवीयता या तो उसे दिखती नहीं, या सामान्य लगने लगती है।
फ़िल्म में दिखाया गया घर, बगीचा, परिवार और औश्वित्स की दीवार से सटा निवास, ये सब ऐतिहासिक और वास्तविक हैं। जोनाथन ग्लेज़र ने उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहियों और होस परिवार से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री का उपयोग किया था। यही फ़िल्म की सबसे विचलित करने वाली बात है कि यह किसी काल्पनिक खलनायक की कहानी नहीं है। यह वास्तविक लोगों की कथा है, जो एक ओर सामान्य पारिवारिक जीवन जी रहे थे और दूसरी ओर बिना किसी दुविधा या नैतिक कचोट के, निर्विकार भाव से, इतिहास के सबसे बड़े नरसंहार में शरीक थे।
इसका विषय सिर्फ़ होलोकॉस्ट नहीं है। यह इंसान की नैतिक बेहोशी, उसकी आत्म-छलना, ‘सभ्यता के भीतर छिपी क्रूरता” और कला में ‘अनुपस्थिति की ताक़त’ के बारे में है। यह जितना पर्दे पर घटती है, उससे कहीं ज़्यादा दर्शक के मन और कल्पना में घटित होती है।
दिलचस्प बात यह है कि इसके अधिकांश दृश्य पारंपरिक फ़िल्म की तरह नहीं फिल्माए गए थे। जोनाथन ग्लेज़र ने होस परिवार के घर का पूरा सेट बनवाया और उसके भीतर-बाहर लगभग दस स्थायी कैमरे लगा दिए। अभिनेता उन कैमरों की मौजूदगी को लगभग भूलकर घर में रहते, चलते-फिरते, खाना खाते, बच्चों के साथ समय बिताते और बातचीत करते थे। निर्देशक हर समय कैमरे के पीछे खड़े होकर निर्देश नहीं दे रहे थे। कैमरे दूर से सब-कुछ दर्ज कर रहे थे। इसका मक़सद था कि दर्शक को ऐसा महसूस हो कि यह कोई फ़िल्म नहीं, इतिहास की एक भयावह वास्तविकता आँखों के सामने प्रत्यक्ष घट रही है। नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म में एक अजीब-सी निगरानी (surveillance) कैमरे जैसी निष्पक्षता आ सकी। कैमरा पात्रों के साथ भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता, न ही उन्हें जज करता है। वह बस देखता है। इस तरह यह फिल्म फिल्म देखने के हमारे तरीके या अभ्यास को भी बदलती है। यहाँ कैमरा किसी इंसानी नज़र की तरह नहीं, बल्कि ‘इतिहास की नज़र’ की तरह काम करता है।
और सबसे विशिष्ट बात यह है: अधिकांश होलोकॉस्ट फ़िल्में पीड़ितों के बारे में हैं। द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट पीड़ितों की अनुपस्थिति के बारे में है। फ़िल्म में यहूदियों की मौजूदगी अदृश्य है-वे दिखते नहीं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति हर फ़्रेम में मौजूद है। यही अनुपस्थिति फ़िल्म को इतना बेचैन कर देने वाला अनुभव बनाती है।
फिल्म की खासियत और उसका विशिष्ट पक्ष यही है कि इसके खलनायक भयानक या विकृत चेहरों वाले दैत्य या मॉन्स्टर नहीं, आम, सामान्य लोग हैं जो एक सामान्य पारिवारिक जीवन जीते हैं। अक्सर फिल्मों में खलनायक असाधारण रूप से क्रूर या विकृत चरित्र होते हैं। तब दर्शक एक तसल्ली महसूस कर सकता है। उसे लगता है कि उस बुराई और उसके अपने जीवन के बीच एक स्पष्ट दूरी या अलगाव है, जैसे वह अंधकार किसी दूसरी दुनिया की चीज़ हो, जो उसे स्पर्श नहीं कर सकता। किन्तु यह फिल्म ऐसा कोई आत्मसंतोष नहीं देती। इसमें हम साधारण लोगों को ही अत्यंत जघन्य अत्याचारों में सहभागी होते देखते हैं। यही बात दर्शक को असहज करती है और उसे यह सोचने के लिए विवश करती है कि आखिर वह कौन-सी प्रक्रिया है जो सामान्य मनुष्यों को इस तरह चरम बुराई में डुबो देती है। उन्हें जघन्यतम अपराधों का सहभागी बना देती है। फिल्म का सवाल यही है कि हमारे बीच, हमारे जैसे लोगों के भीतर किस प्रकार यह जघन्य हिंसा जन्म लेती है। ये पात्र अपने परिवारों से प्रेम करते हैं, बच्चों की परवरिश करते हैं और एक सामान्य सामाजिक जीवन जीते हैं, फिर भी वे ऐसी विनाशकारी और अमानवीय व्यवस्था के पुर्ज़े बने रहते हैं जो असंख्य लोगों के जीवन को नष्ट करती है। ऐसा इसलिए संभव होता है क्योंकि वे अपने भीतर झाँकना छोड़ चुके हैं; उन्होंने आत्म-परीक्षण और नैतिक सजगता का परित्याग कर दिया है तथा आज्ञाकारिता को ही सर्वोच्च मूल्य मान लिया है।
इस प्रकार यह फिल्म केवल इतिहास या किसी विशेष घटना की कहानी नहीं कहती, बल्कि दर्शक को स्वयं अपने भीतर देखने के लिए बाध्य करती है। यह चेतावनी देती है कि यदि इंसान अपने भीतर झांकना छोड़ दे, कोई भी इंसान- नैतिक सजगता त्याग दे और अपने कर्मों और उनके नतीजों पर प्रश्न उठाना छोड़ दे, तो आसानी से एक विशाल बुराई का, evil का हिस्सा हो सकता है। फिल्म की सबसे गहरी और बेचैन करने वाली बात यही है। औश्वित्स की असली भयावहता गैस चैम्बरों में नहीं, बल्कि उस बगीचे में है जहाँ फूल खिल रहे हैं और लोग ख़ुद को अच्छा इंसान समझ रहे हैं। बुराई का सबसे ख़तरनाक रूप वह नहीं है जो खुलकर सामने आता है, बल्कि वह है जो अपने आपको भलाई, कर्तव्य और सामान्य जीवन के रूप में छिपा लेता है।
फिल्म हमें अपने समय और समाज के प्रति सचेत रहना याद दिलाती है। हमारे अपने करीब, हमारे घरों की दीवारों के पार भी कितने ही अन्याय, शोषण और अत्याचार घटित हो रहे होते हैं। वे होलोकॉस्ट जैसे भीषण न भी हों, लेकिन अत्याचार, अत्याचार ही होता है। जब आसपास अन्याय घट रहे हों तो क्या एक व्यक्ति केवल इसलिए नैतिक रूप से निर्दोष माना जा सकता है कि वह उन अन्यायों में सीधे शरीक नहीं था, वह अपने परिवार, कामों और दिनचर्या में डूबा था, जबकि उसकी आँखों के सामने दूसरों के अधिकारों और मानवीय गरिमा का हनन होता रहा? इस तरह फिल्म केवल एक एतिहासिक त्रासदी का चित्रण नहीं करती, हमारे वर्तमान से भी एक असुविधाजनक संवाद स्थापित करती है। नैतिक जिम्मेदारी केवल अपने कर्तव्य-पालन तक सीमित नहीं होती; उसमें अपने समय के अन्याय को, पहचानना और उसके प्रति संवेदनशील बने रहना शामिल है।
बाद में रूडोल्फ़ होस के दस्तावेज़ों से ज़ाहिर हुआ कि वह स्वयं को एक “कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी” मानता था। इसी को दार्शनिक हाना आरेन्ट ने “बुराई की सामान्यता“ की धारणा के माध्यम से समझाने का प्रयास किया था- कि भयावह अपराध करने वाले लोग हमेशा दरिंदे दिखने वाले नहीं होते; वे कई बार साधारण और आम मनुष्य भी हो सकते हैं।
फ़िल्म के सबसे रहस्यमय और चर्चित वे ‘ब्लैक एंड व्हाइट दृश्य’ हैं जिनमें एक छोटी लड़की रात के अँधेरे में कहीं जाती हुई दिखाई देती है। इनका प्रेरणा-स्रोत एक वास्तविक पोलिश किशोरी आलेक्सांद्रा बाइस्ट्रोन-कोवोजाइचिक(1927–2016) थीं। वे एक वास्तविक पोलिश प्रतिरोधकर्मी थीं, जो औश्वित्ज़ के पास ब्रेश्चे नामक कस्बे में रहती थीं। किशोरावस्था से ही वे नाज़ी शासन के विरुद्ध काम करने लगी थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे औश्वित्स के आसपास कैदियों के लिए भोजन और छोटी-मोटी सहायता गुप्त रूप से छोड़ जाया करती थीं। फ़िल्म में लड़की द्वारा सेब और भोजन छिपाकर रखना उसी ऐतिहासिक प्रसंग का रूपांतरण है।
जोनाथन ग्लेज़र ने इन दृश्यों को इन्फ्रारेड कैमरे से फिल्माया, जिससे वे स्वप्न-जैसे प्रतीत होते हैं। इन दृश्यों का एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। पूरी फ़िल्म में हम रंगों, फूलों और घरेलू सुख-सुविधाओं से भरी सुंदर दुनिया देखते हैं, लेकिन उस दुनिया के भीतर घोर darkness, एक नैतिक अंधकार है। इसके उलट ये दृश्य बाहरी तौर पर अँधेरे में डूबे हैं, लेकिन इन्हीं में एक मानवीय और नैतिक रोशनी है। फ़िल्म में यही एकमात्र पात्र है जो दूसरों के लिए जोखिम उठाकर कोई मानवीय कार्य कर रही है। यही दृश्य फ़िल्म का नैतिक केंद्र हैं या उम्मीद और प्रतिरोध का छोटा सा द्वीप है।
फ़िल्म में प्रयुक्त साइकिल वास्तव में उनकी अपनी साइकिल थी। लड़की द्वारा पहनी गई ड्रेस भी उनकी वास्तविक पोशाक पर आधारित थी। 2024 के ऑस्कर समारोह में पुरस्कार स्वीकार करते समय ग्लेज़र ने फ़िल्म को उन्हें समर्पित किया। फ़िल्म का नैतिक केंद्र आलेक्सांद्रा हैं। वे उस मानवीय रोशनी का प्रतीक हैं जो सबसे अँधेरे समय में भी बुझती नहीं।
ऑस्ट्रियाई मनोविश्लेषक विल्हेल्म राइख की प्रसिद्ध किताब है- “द मास साइकोलॉजी ऑफ़ फ़ासिज़्म” जो 1933 में छपी थी। इस फिल्म और हाना आरेन्ट की “Banality of Evil” अवधारणा और विल्हेल्म राइख की इस किताब के बीच एक गहरा रिश्ता दिखाई देता है, हालाँकि तीनों की दृष्टियाँ अलग हैं। हाना आरेन्ट कहती हैं कि बड़ी बुराइयाँ हमेशा राक्षसी लोगों द्वारा नहीं की जातीं। कई बार साधारण, आम, नियम-पालक और ‘अच्छे नागरिक’ भी भयावह अपराधों के सहभागी बन जाते हैं। वे सोचना बंद कर देते हैं और अपने विवेक या अंतरात्मा को ताक पर रखकर सिर्फ आदेशों का पालन करने लगते हैं। यह फिल्म इसी विचार का सिनेमाई रूप है। लेकिन राइख इससे एक क़दम आगे जाकर पूछते हैं कि लोग तानाशाही या तानाशाहों का विरोध क्यों नहीं करते? वे फ़ासीवाद का समर्थन क्यों करने लगते हैं? उनका उत्तर था कि फ़ासीवाद केवल ऊपर से थोपी गई राजनीतिक व्यवस्था नहीं है; उसकी जड़ें इंसान के चरित्र, परिवार, परवरिश और मानसिक संरचना में होती हैं। कठोर पितृसत्तात्मक परिवार, अंध-आज्ञाकारिता, सत्ता-भय, इस भय के कारण आत्म-दमन, सामाजिक दमन… ये सब मिलकर ऐसे व्यक्तित्व गढ़ते हैं जो किसी मज़बूत नेता के आगे समर्पण करने के लिए तैयार रहते हैं।
“होस और उसकी पत्नी कुछ महसूस क्यों नहीं करते? इस सवाल पर आरेन्ट कहेंगी – अगर अपराध को साधारण बना दिया जाए तो साधारण लोग भी अपराधी हो सकते हैं। लेकिन राइख यह सवाल करते हैं कि वे करोड़ों साधारण लोग कौन थे जो ऐसे अपराधियों का साथ देते रहे? फिल्म The Zone of Interest पहला सवाल पूछती है, जबकि राइख दूसरे सवाल की पड़ताल करते हैं, और कहते हैं- क्योंकि वे एक ऐसी मानसिक और सामाजिक संरचना के उत्पाद थे जिसमें सत्ता के प्रति समर्पण, अनुशासन और आदेश-पालन को सर्वोच्च मूल्य बना दिया गया था।
मनोवैज्ञानिक कार्ल गुस्ताव युंग के विचारों में भी एक निकटवर्ती अवधारणा मिलती है – “Shadow” या छाया। हर व्यक्ति और समाज अपने भीतर मौजूद हिंसा, क्रूरता, लालच और विनाशकारी प्रवृत्तियों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें अचेतन में धकेल देते हैं। बाद में यही दबी हुई ‘छाया’ सामूहिक रूप से विस्फोट कर सकती है। इस धारणा के अनुसार औश्वित्ज़ केवल जर्मनी की त्रासदी नहीं था; वह यूरोपीय सभ्यता की सामूहिक छाया, उसके collective shadow का विस्फोट था।
“Wotan” (1936) उनका प्रसिद्ध निबंध है जो नाज़ी जर्मनी को समझने की कोशिश करता है। युंग का तर्क था कि जर्मन समाज में एक प्राचीन सामूहिक मिथकीय शक्ति जाग उठी थी, जिसे उन्होंने नॉर्स देवता Wotan (ओडिन) के प्रतीक के रूप में देखा। उनके अनुसार हिटलर केवल एक राजनीतिक नेता नहीं था; वह उस सामूहिक अचेतन (collective unconscious) का माध्यम बन गया था जो जर्मन जनता के भीतर लंबे समय से दबा पड़ा था। पूरी क़ौम उसके सामूहिक सम्मोहन में आ चुकी थी। ऐसा होने पर लोग व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि भीड़ की मानसिकता के तहत व्यवहार करने लगते हैं।
आधुनिक राज्य और फासीवाद जैसी विचारधाराएँ व्यक्ति को भीड़ में बदल देती हैं। आदमी अपनी स्वतंत्र नैतिक चेतना खो देता है और समूह की चेतना अपना लेता है। उनकी धारणा थी कि खतरा केवल ‘बुरे’ व्यक्तियों में नहीं, बल्कि उन साधारण मनुष्यों में भी है जो अपनी आंतरिक हिंसक प्रवृत्तियों और ‘छाया’ का सामना करने से इंकार करते हैं।
हाना आरेन्ट कहती हैं कि होस जैसे लोग “सोचना बंद कर देते हैं”। इसे युंग कहते कि उन्होंने अपनी छाया (Shadow) को पहचानना और उसका सामना करना बंद कर दिया है। हर व्यक्ति के भीतर हिंसा, क्रूरता, लालच, सत्ता-लिप्सा और विनाश की संभावनाएँ मौजूद रहती हैं। सभ्य मनुष्य इन प्रवृत्तियों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें अपने अचेतन में धकेल देता है। लेकिन वे नष्ट नहीं होतीं; वे छाया बनकर जीवित रहती हैं। जब पूरा समाज अपनी सामूहिक छाया का सामना करने से इंकार करता है, तब नाज़ीवाद जैसी घटनाएँ जन्म ले सकती हैं।
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