मेरी आत्मा पर तुम्हारे लंबे बाल बिछे हैं

-थ्री ऑफ अस
सुमन शेखर 

कुछ फ़िल्में देखने के बरसों बाद भी आँखों के सामने अँधेरे में पानी पर दूर से आती मद्धम, तैरती हुई रोशनी की तरह दिखाई देती रहती हैं। किसी और दुनिया में अपनी व्यस्तता के बीच भी अचानक कोई आवाज़, पत्तों का मात्र खरकना या कोई गंध आपको लंबी दूरी तय कर वहाँ पहुँचा देती है, जहाँ आपकी स्मृति में एक दृश्य है, एक एहसास है। तब कह पाना मुश्किल होता है कि कब कौन-सा दृश्य करवट लेगा, कौन-सा संगीत सीने में बज उठेगा।

पक्षियों का झुंड आकर चक्कर लगाता है, उनकी छायाएं नंगी चट्टानों पर मंडराती हैं और गायब हो जाती हैं, जैसे किसी पुराने स्वप्न का अंश हो। किला, और उसकी दीवार पर पानी की कांपती छाया। सबकुछ एक स्वप्निल, अशरीरी छायालोक में लिपटा हुआ जान पड़ता है। अपने अनुभव पर संदेह ! 

जाने कितने राज़, जाने कितनी चेतना, कितने दृश्य, कितना स्वाद और गंध, कितनी ही चहनाएं, कितना सारा बीता हुआ ‘काश इसे वापस जाकर ठीक कर सकते’ की आश में हमारे भीतर साथ चलता है।  All our inner secrets are the same…’ इस्राइली लेखक एमोस ओज़ एक जगह कहते हैं।

तुम मिले
मिलते ही छूट गए


लिखनी थीं मुझे प्रेम कविताएँ
प्रेम कविताओं के पन्नों पर
बिछी हैं विरह की निरीह पंक्तियाँ।

Memories can be forgotten, but feelings never fade.

“सबने कहा कि अब तक तो तुम मर चुकी होगी!”

“तुमने याद रखा, इसलिए ज़िंदा हूँ… फिर आना।”

three of usकिसी की मृत्यु तब नहीं होती, जब वह देह छोड़ देता है। मृत्यु तब होती है, जब कोई मन और स्मृति से गुम हो जाए। हम एक ही जीवन में न जाने कितनी बार मारे जाते हैं और अपनों को मार देते हैं। भूलना और भुला दिया जाना, इतना कि किसी का अस्तित्व ही गौण हो जाए। 

ज़्यादा आसान क्या है, भूलना या भुला देना?

फिल्म डिमेंशिया और स्मृति के क्षरण से जूझती एक स्त्री की कथा है। उसके पति की भी है, जो अब तक उसकी स्मृतियों की इस अंतरंग दुनिया से लगभग अनजान रहा है। वह उसे हर सुख देना चाहता है, लेकिन अंततः एक पति है, जिसे पत्नी के बचपन के दोस्त की अचानक लौटी मौजूदगी से ईर्ष्या भी होती है। उधर वह दोस्त है, जो शायद अब तक प्रतीक्षा में है। फिल्म का चौथा और उतना ही महत्त्वपूर्ण किरदार उस दोस्त की पत्नी है, जो इस पूरे घटनाक्रम को बहुत पास से देखती है और किसी दार्शनिक की-सी मुस्कान के साथ अपने पति के व्यक्तित्व को एक नए ढंग से समझने की कोशिश करती है।

देह के भीतर एक और देह उग आई है
सोता हूँ तो दूसरी देह जगती है
जागता हूँ तो दूसरी देह सोती है
बैठेबैठे मैं उसी देह का स्मरण करता हूँ
हँसता हूँ तो देह दुगुनी हँसती है
तुम छूट गई हो मुझमें पूरे ख़्वाब की तरह।

Sometimes, the simplest words can carry the heaviest weight.

जब स्मृति खोने लगी, सबसे पहले तुम याद आए। फिर बीते लम्हों का वह गाँव, जहाँ मंदिर था, पतली पगडंडियाँ थीं, छोटा-सा किला, नदी, समुंदर और रेत पर उगे पैरों के वे निशान, जिनकी छाप शायद अब भी समुंदर के भीतर कहीं बची होगी। दीवारों से लिपटी बरगद की जड़ें थीं, और उन जड़ों के भीतर हम, जो एक-दूसरे की स्मृति में जीवित रहे, बिना माफ़ किए, माफ़ी माँगते हुए। घर था, उसके पीछे कुआँ, जहाँ वीणा… पानी के ऊपर झाँकता उसका पैर, जिसने आख़िरी बार कहा था, “शैलजा…” फिर तुम मिले। तुम्हारे साथ बिताए दिन, स्मृति में बचा स्कूल, वही बेंच, जिसे देखते ही सातवीं और आठवीं का असमंजस मिट जाता है।

क्या एक दिन सब नष्ट हो जाता है? क्या केवल स्मृति ही मृत्यु से बचाती है? और क्या स्मृति सिर्फ़ हमारे भीतर बसती है? नहीं। तभी तो मंदिर, गाँव, कुआँ, झूला, मेले का मैदान और गाँव की हवा में अब भी दर्ज है हमारा बचपन, हमारा होना, हमारी दोस्ती, अनकहा-सा प्रेम… और अब उसी स्मृति का धीरे-धीरे धूमिल होना।

“बचपन में तो सभी दोस्त होते हैं!” कहता हुआ पात्र कितना बेबस दिखाई देता है। पलटकर देखने पर वही सब, जो कभी बहुत बड़ा लगता था, अब छोटा और खुरदुरा दिखाई देने लगता है। बचपन में हर चीज़ बड़ी लगती है, क्योंकि हमारा दिल बड़ा होता है, उसमें सबके लिए जगह होती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, दिल के कमरों की दीवारें छोटी होती जाती हैं।

तुम्हारी उपस्थिति में मैं हमेशा गौण रहा
पाया, कि सदा उपस्थित था
बहुतर से बहुतर
बेहतर से बेहतर
पूर्ण से पूर्णतम
था क्या!

We can never really know another person, only the parts they choose to show us.

“ऐसा क्यों हुआ कि एक दिन तुम अचानक याद आए! तुम्हारा याद आना क्या अपराधबोध का प्रायश्चित्त था! या तुम्हारा याद आना स्मृति को दिया गया एक खूबसूरत भेंट!” 

“तुम वैसे ही अचानक आईं, जैसे अचानक चली गई थीं, ठीक 28 बरस पहले, अचानक! जैसे तुम्हारा जाना आत्मा को निचोड़ देने वाला था, वैसे ही तुम्हारा आना।”

“मैं तुम्हें अब ज़्यादा दिन याद नहीं रख पाऊँगी, मुझे भूलने की बीमारी लग गई है।”

“कोई बात नहीं शैलजा, मैं तुम्हें याद रख लूँगा।”

विस्मृति के अंधकार में डूबने से पहले वह उन स्मृतियों को अनश्वरता में बदल देना चाहती है, किसी भी तरह, अपने ‘लैपटॉप’ के ‘पासवर्ड’ से सुरक्षित किसी फ़ाइल में, या पति द्वारा सुझाए ‘गूगल’ या ‘क्लाउड मेमोरी’ के ज़रिए, या किसी भी दूसरे तरीके से! लेकिन यदि वह ‘पासवर्ड’ ही भूल गई, तो फिर क्या होगा? क्या सभी कुछ तब विस्मृति की किसी अँधेरी गुफा में समा नहीं जाएगा?

जिया हुआ वक़्त, जीते हुए में जैसा लगता है, याद करते हुए ठीक वैसा-सा क्यों नहीं लगता! क्यों उसका सुर बिगड़ जाता है! मेरे माथे पर उग आई लकीरें उस एक क्षण की खुरचन हैं, जब मेरे हाथ में एक गुलाब देख तुम रूठ गईं और नाराज़ हो गईं कि गुलाब तुम्हारी सारी सहेलियों के लिए क्यों नहीं लाया, शेलु! मेरी आँखों में धँसा गड़्ढापन नतीजा है रातों में जागते रहने का, मेरे उस एक वाक्य को रटते जाने का, जो मैं तुमसे कभी कह नहीं पाया।

“पिछले हफ़्ते जब मैं मुंबई में थी, तो यहाँ पहुँचने की बहुत जल्दी थी। जब आ गई, तो मुंबई को बहुत मिस करने लगी। लेकिन अब ये एक ऐसा वक़्त है, जब लगता है कि कोई जल्दी नहीं है… यहीं तो पहुँचना था… पहुँच गई…”

“तुम पहले लौटकर क्यों नहीं आई!”

“पता नहीं… स्कूल के बाद वक़्त ही नहीं मिला। पूरी ज़िंदगी इसी बात में निकल जाती है कि हमें भागदौड़ पसंद है या शांति!”

मुझे लगा था कि मैंने माफ़ी भी नहीं माँगी और तुम हमेशा के लिए यहाँ से चली गईं और मुझे ज़िंदगी भर यूँ ही जलना पड़ेगा। तुम लौटीं, अब, 28 बरसों बाद, अचानक। शुक्रिया कि आख़िर तुम आईं… ठीक इस वक़्त मुझे बहुत अच्छा लग रहा है, जब वक़्त थम-सा गया है। मैंने माफ़ी माँग ली है, तुमने शायद माफ़ भी कर दिया है।

“तुम मुझे भूल गई थीं न!”

“नहीं, शायद ज़िंदगी के फ़ैसलों और उम्मीदों ने याद करने का मौक़ा ही नहीं दिया। लगा जैसे अब तक किसी रेस में ही थी। थककर किनारे खड़ी हुई, तो 28 साल गुज़र गए।  मैं खुद को इसी गाँव में तलाश रही हूँ… मेरा खुद केवल मुझ तक ही नहीं है… पूरा बचपन है, और बचपन तुम्हारे बिना अधूरा है…..”

Love is all a matter of timing.

आत्मा के पंख पर तुम्हारे लंबे बाल बिछे हैं…

इंतज़ार की जड़ें इतनी गहरी हुईं कि हमारी स्मृति का सारा सिरा बंधा भी है, ढीला भी है। 

“तुम्हें डर लगता है!”

“हाँ, जब-जब स्कूल की ड्रॉइंग की क्लास में जाने के बाद याद आता है कि कलर बॉक्स घर ही भूल आई हूँ।”

“फिर मैम क्या कहती हैं!”

“कुछ नहीं, उन्हें बताती हूँ कि भूल गई।”

“वो मान जाती हैं!”

“हाँ, वो भी तो कभी-कभी कुछ भूल जाती होंगी न!”

कौन सी आवाज़ शैलजा की है, कौन सी मेरी, कहना आसान नहीं है। कौन सा भाव मेरा है, कौन सा उसका, ये भी अलग अलग नहीं कह सकता। 

संवाद आत्मा की आवाज़ है, जो जितना सटीक हो, मन उतना ज़्यादा हल्का लगता है। संवाद का अधूरापन समय रहते पूरा न हो, तो ग्लानि और तकलीफ़ के सिवा कुछ नहीं देता। तुमसे मिलते हुए आज मुझे लगा कि शायद अगर मैं उस वक़्त किसी भी तरह संवाद की स्थिति बना पाता, तो आज तक मुझे उन-उन संवादों की जुगाली न करनी पड़ती। मन और आत्मा का हाज़मा इतना बिगड़ा न होता।

तुम्हारे लौटने के बाद बचपन लौट आया है। लेकिन बचपन के हिस्सों में तुम्हारा पति और मेरी पत्नी, दोनों साथ साथ लौटे हैं। कितनी अद्भुत बात है ना!

तुम्हारी वापसी को मैंने जिया है कई-कई बार, लेकिन आज जब तुम आईं, मैं इसे स्वीकार नहीं कर पाया! क्या वापसी संभव है! तुम्हारा वापस अचानक आ जाना मेरे घर को बड़ा अजीब-सा लगा। कितनी ज़ोरों की चाह रही होगी न! तुम आईं और मुंबई से अब तक न आ पाने के सारे बहाने धरे के धरे रह गए… न कर पाने के कई-कई बहाने निकल आते हैं, करने के सामने कोई बहाना नहीं टिकता।

Sometimes, the most profound conversations are the ones that remain unspoken.

एक राज़ की बात कहूँ!
तुम्हारी मुस्कान पर चिड़ियों का बसेरा है
हँसती हो, तो झट से खिलखिलाते उड़ आते हैं सब
तुम्हारा हँसना सबके हँसने की उम्मीद बन जाता है।

“मेरा लिखा कैसे पहचान जाती हो तुम!”

“जिसे हम आत्म की नज़रों से देख लेते हैं, उसके शब्दों की आकृति घने अँधेरे में भी आकार ले लेती है। तुम्हारे लिखे को कहीं और भी पढ़ती, तो पहचान जाती कि यह तुम्हारी लिखी हुई है। तुम्हारी वाली मासूमियत है इसमें….”

हमें जोआओ ग्विमारेज़ रोसा की ब्राज़ील-पुर्तगाली कहानी ‘नदी का तीसरा किनारा’ याद आती है, जिसमें एक पिता परिवार को छोड़कर एक नाव में रहने निकल जाता है और फिर कभी वापस नहीं लौटता। पीछे रह जाता है उसका अचंभित और व्यथित पुत्र, जो प्रतिभाशाली होने के बावजूद जीवन की तमाम महत्वाकांक्षाओं की निरर्थकता को महसूस करता है और अंततः उस जगह से दूर चला जाता है। ‘थ्री ऑफ अस’ में भी कुछ ऐसा ही संबंध दिखाई देता है। यहाँ भी एक पिता है, उसका पलायन है और एक पुत्र है, जो परछाईं की तरह जीवन भर पिता का पीछा करता रहता है। अंततः वह आई.आई.टी. जाने जैसी बड़ी आकांक्षा को भी छोड़ देता है और बैंक की एक ऐसी नौकरी स्वीकार कर लेता है, जो धीरे-धीरे उसके भीतर की ऊर्जा को कुंद कर देती है।

We are all prisoners of our own emotions.

कहने को बचा रह गया एक वाक्य की जड़ कई जड़ो के सिरों फैल गई। अब इस पर खिली हुई स्मृति का वरण मैं मुझमें हम की तरह करूंगा। वापसी हमेशा सुखद होती है। तुम हमेशा जीवित रहीं जैसे वीणा, बुढिया, गाँव  और मैं। 

(ऊपर दिए गए अंग्रेजी के वाक्य वोंग कर वाई की फिल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ के हैं।)

समाप्त

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फिल्म: थ्री ऑफ अस (Three of Us)

निर्देशक: अविनाश अरुण
वर्ष: 2023 (फिल्म का निर्माण 2022 में पूरा हुआ था और इसका भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शन 3 नवंबर 2023 को हुआ।)

थ्री ऑफ अस एक बेहद संवेदनशील और धीमी गति से आगे बढ़ने वाली फिल्म है, जो स्मृतियों, अधूरे प्रेम, रिश्तों और जीवन में पीछे छूट गई इच्छाओं की कहानी कहती है। फिल्म की मुख्य पात्र शैलजा देसाई (शेफाली शाह) शुरुआती अवस्था के डिमेंशिया से जूझ रही हैं। उन्हें महसूस होता है कि उनकी यादें धीरे-धीरे उनसे दूर जा रही हैं, इसलिए वह अपने बचपन और युवावस्था से जुड़े स्थानों को एक बार फिर देखना चाहती हैं।

शैलजा अपने पति दीपांकर (स्वानंद किरकिरे) के साथ महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र स्थित अपने पुराने शहर लौटती हैं। वहाँ उनकी मुलाकात अपने पुराने प्रेम प्रदीप कामत (जयदीप अहलावत) से होती है। यह मुलाकात केवल पुराने प्रेम को फिर से पाने की कोशिश नहीं है, बल्कि अपने अतीत, अपने दुखों और उन भावनाओं से सामना करने की यात्रा है जिन्हें समय ने दबा दिया था। 

फिल्म यह दिखाती है कि इंसान के भीतर कुछ रिश्ते और कुछ स्मृतियाँ हमेशा जीवित रहती हैं। शैलजा का अपने अतीत की ओर लौटना दरअसल अपनी पहचान को बचाने का प्रयास है, क्योंकि बीमारी उनकी यादों को धीरे-धीरे मिटा रही है। पति और पुराने प्रेमी, दोनों के साथ उनके संबंध जीवन के अलग-अलग पड़ावों और प्रेम के अलग-अलग रूपों को सामने रखते हैं। 

थ्री ऑफ अस प्रेम कहानी से अधिक यादों, क्षमा, स्वीकार और जीवन में अधूरे रह गए अध्यायों को शांत भाव से विदा करने की कहानी है। अविनाश अरुण ने कोंकण के प्राकृतिक परिवेश और बेहद सूक्ष्म अभिनय के माध्यम से एक ऐसी फिल्म बनाई है, जिसमें संवादों से अधिक खामोशियाँ बोलती हैं।

संक्षिप्त परिचय 

सुमन शेखर मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और फ़िल्म लेखन, निर्देशन तथा अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले एक दशक से रंगमंच से जुड़े सुमन ने लेखक और निर्देशक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी रचनात्मक यात्रा सिनेमा और साहित्य, दोनों माध्यमों में समान रूप से विस्तृत है। उनकी फ़िल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। अभिनीत फ़िल्म ख़्वाबिदा को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं ‘The Saddist’ और फ़ीचर फ़िल्म लाइफ टाइम डेथ में उनके अभिनय को सराहा गया।

सुमन शेखर की कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कहानी कथादेश की ‘कथा-समाख्या’ में, बया और पाठ में आई हैं, कविताएं वागर्थ, आलोचना, सरस्वती पत्रिका समेत कई बड़ी पत्रिकाओं और बेव में आई हैं। सिनेमा, रंगमंच और साहित्य के बीच सक्रियता बनी हुई है।  वर्तमान में वे मुंबई में रहकर लेखन और सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

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