ज्ञानरंजन
बचपन को केवल एक उम्र कहकर नहीं समेटा जा सकता। बचपन कब पकड़ में आया और कब एक डोर बना, यह बहुत दिलचस्प है। रात को जैसे सुबह की किसी संभावित खुशी में कई बार नींद टूटी हो और एक लंबे नींद के टुकड़े ने चौंककर देर सुबह को उठाया हो। उस वक्त धूप बेशुमार थी। चिड़ियों ने तिनके लाना शुरू कर दिया था। एक फेरी वाले की आवाज़ भी आ रही थी और मैं भागा सीधे आम के बगीचे की तरफ। वहां शाम को पत्तों के झुरमुट में एक चुरा हुआ आम देखा था। कहीं वह लुट न गया हो, इस आशंका से मैंने उस दूरी को तीन डग में नापा। चैन मिला जब देखा कि वह आम महफूज़ है। इसके बाद अपना जांघिया कसा और घर लौटे।
मेरा बचपन अकोला, अजमेर और दिल्ली होते इलाहाबाद पहुँचा था। इलाहाबाद के खुमार के अलावा मुझे किसी दूसरी जगह ने कभी इतना नहीं लुभाया। आप एक से अधिक शहर को प्यार भी कैसे कर सकते हैं। इस कथन को मैं एक अच्छी बात और आप बेकार बात में तक़सीम नहीं कर सकते, लेकिन यह ज़रूरी है कि एक समय तक मैं इस शहर के शोहदों और वेश्याओं का भी समर्थक था। इलाहाबाद के अच्छे लगने का एक कारण यह भी था कि यह उन दिनों हिन्दुस्तान का सबसे कम चमकीला शहर था। इसमें पेरिस जैसी अकड़ और गरीबी थी। उत्तर भारत में यह एक सबसे आधुनिक दरवाज़ा था। धीरे-धीरे यह खून मेरी नसों में आने-जाने लगा।
लेकिन बचपन बड़ा गड्डमड्ड था, बशर्ते कि आज की सजग निगाह उस पर न डाली जाए। बचपन से ही जीवन की राह में गड्ढे आने लगे थे। जैसे घर के अंदर ही एक मंदिर था। मंदिर मेरे जीवन के बाहर था। इस जीवन से ज्यादा सुंदर और रहस्यमय मंदिर नहीं है। आप किसी भी खुली खिड़की में देखें, एक चेहरा झाँककर चला जाता है। झलक की तरह आता है और झलक की तरह जाता है। यह जीवन का भूत है, जिसे आप एक पीतल की घंटी बजाते रहने के कारण देख नहीं पा रहे हैं। फिर यह जीवन भी आपके साथ मक्कारी करने लगता है।
मेरे या किसी के लिए भी बचपन में केवल दो ही जगहें होती हैं, जिनका एक बच्चे को सामना करना होता है। एक घर और दूसरा स्कूल। मेरे लिए भी यही दो जगहें थीं। मेरे घर में तीन तरफ़ बरामदा और एक तरफ़ आँगन था। यह घर जैसा भी रहा हो, पर इसमें बाहर जाने के लिए पाँच दरवाज़े थे। यह घर गनीमत है कि जेल के डिज़ाइन से नहीं बना था। उसकी भवन-कला का जन्म चोरों-डाकुओं या चरित्रहीन हो जाने के भय से नहीं उपजा था। इसके नक्शे में आर्थिक और सांप्रदायिक दिमाग भी नहीं था। इस खुलेपन के कारण ही शायद मैं बाद में एक तरह के जीवन का आलोचक बना और दूसरी तरह के जीवन का समर्थक। उन दिनों बस इस फिराक में रहते थे कि कब बड़ों की नज़र चूके और हम दोपहरी में छलाँग लगा दें। जिन तलुओं में सुबह की ओस लगती थी, उन्हीं में पिघलता हुआ कोलतार चिपकने लगा। उन्हीं दिनों भद्रलोक के अलविदा का बीज भी भीतर पड़ रहा था। उन्हीं दिनों कला के पवित्र कंगूरों और बेलबूटों पर लात पड़ रही थी।
ये दोपहरें और इसमें पुराने क़िस्म के बँगलों का हमारा यह मुहल्ला लगता था कि कलकत्ते के टालीगंज मुहल्ले का एक फ़िल्मी सेट है। वयस्क होने पर गजेंद्रनाथ मित्र का उपन्यास ‘कलकत्ते के नज़दीक ही’ पढ़ा तो भ्रम होने लगा कि मेरा मुहल्ला भी कलकत्ते के नज़दीक है। आप विश्वास करें कि हमारा यह मुहल्ला इलाहाबाद के खाते-पीते लोगों का होने के बावजूद 1930 से 1980 तक एक जैसा बना रहा। अब यह जीवन तो नहीं, म्यूज़ियम ही हो सकता है। यह बंगलेवाले बंगालियों का इलाहाबाद में एक जाना-माना मुहल्ला था। पीतल की परात में मछली बिकती थी सुबह से। विधवाएँ बाहर तख़्त पर सफ़ेद मटमैली साड़ी में ऊँघती रहती थीं। ज़्यादा से ज़्यादा कपड़ा किनारी वाला पंखा होता था उनके हाथ में। इससे मक्खी उड़ती थी दिन में और रात में मच्छर और उमस में हवा मिलती थी। सबसे ज़्यादा यह कि उनके कठिन वैधव्य का रेगिस्तान उस पंखे से थोड़ा आसानी से पार हो जाता था। वे शरतचंद्र की विधवाएँ लगती थीं। उनकी कमर में लोहे की चाभियों का एक सुस्त गुच्छा होता था, जिससे उनकी ताला लगी लोहे की संदूकचियों का अंदाज़ा लग सकता था। वे रवीन्द्रनाथ की वृद्धाएँ नहीं हो सकती थीं। जो शरत की लगती हों, वे रवीन्द्रनाथ की लग भी कैसे सकती थीं। यहाँ सब तार बाबू, रेल बाबू, डाक बाबू, कोर्ट बाबू लोगों के ही घर थे। मेरा बचपन इसी मनहूस लोक के पालने में पला। आज भी मेरी आधुनिकता में जो मनहूसी है, वह शायद इसी बचपन का परिणाम है।
यहाँ लड़कियाँ लगातार पीली और जर्जर पड़ती गईं। वृक्ष ने ही फल दिए और वृक्ष ने ही फल खा लिए। लड़के कबूतर उड़ाते थे और गुड्डी। कनहल खेलते और गुलेल। यहाँ कुछ भी तड़ातड़ी नहीं थी। आज जब मैं बंगला फ़िल्म देखता हूँ तो दम घुटता है। वास्तव में किसी बंगला फ़िल्म को पूरा देखना आज भी मेरे लिए एक सज़ा है। एक कमरा है, दस बाई दस फ़ीट का। उसमें काली पालिस वाला भरकम और वजनदार पाँच बाई सात फ़ीट का एक पलंग है। ऊँचाई इतनी कि बैठने वाला लंबू भी हो तो पैर झूलते रहें। दरवाज़े के पास एक पिंजरा है सुग्गे या मैना का। चौड़े पाड़ की साड़ी है और नायिका 45 फ़ीट की दूरी को पाँच मिनट में पार करती है। पार करते ही पार करने का उद्देश्य गायब हो जाता है। इस धीमी मौत को मैं कभी बर्दाश्त नहीं कर सका।
बनती हुई चीज़ों पर समय और लोगों का असर था मेरा वह स्लीपर, जो काला और लंबोतरा होता था, जिसमें आगे बराबर आँख जैसे दो छेद होते, जो बिल्कुल मत्स्य-मुख जैसे लगते थे। सभी के पास यह स्लीपर होता था उन दिनों। फेरीवाला खोवे का पेड़ा भी जो बेचता था, उसे पीतल की मछली के साँचे से ही निकालता था। अब बचपन में क्या पसंद था और क्या नागवार, तो आज भी वही पुरानी तस्वीर बरक़रार है। साइकिल नई ली और सबसे पहले घंटी को अलग किया। कभी बटुआ नहीं रखा जेब में और घड़ी नहीं रही कलाई पर। जब-जब छाता लेकर चले तुरंत गुमा । जूतों से पैर छाले-छाले हो जाते थे। कुत्ता नहीं पाला और रूमाल नहीं रखा। आसपास डॉक्टर का नहीं रहना कभी खला नहीं। मुंडेर पर सोए, गाना गाया, चाँदनी देखी और चाँद को देखकर कभी दुखी नहीं हुए। क्रिकेट कभी नहीं खेला। एक स्थान से दूसरे स्थान तक हमेशा दूर और लंबे रास्तों से गए। पैंट होल्डॉल जैसा था और सरकता-उठता था। वह इतना भद्दा हो सकता है, यह तब पता चला, जब उन दिनों का अपना एक फ़ोटो देखा। पर तब लोग कितने भले थे कि हँसते नहीं थे। आज हँसी आती है। कुत्ता नहीं था, इसलिए हम हवा में लुह-लुह करते थे। जब आप कुछ बंदर जैसे होते हैं, तभी आदमियों जैसे भी हो सकते हैं। बहुत शिष्ट और पेड़ पर चढ़ना न जानने वाले भविष्य में कब पालतू बन जाएँ, कहा नहीं जा सकता। हमने पेड़ पर आम तोड़ा, पेड़ पर आम खाया। कोमल शाखों वाले जामुन के पेड़ पर भी चढ़ लेते थे। उस पर चढ़ते वक्त शरीर का वजन उस तरह कम हो जाता था जैसे हौज में घुसने के बाद आर्किमिडीज़ को लगा था कि वह भारहीन हो गया है, लेकिन मैंने कभी किसी प्रकार की खोज नहीं की, जबकि प्रकृति से वास्ता गहरा था। हमारे घर आम, अमरूद, कटहल, अनार, बेल, आँवला, पीपल—सब तरह के पेड़ थे। इसके बीच एक घर था।
घर और मुहल्ले से जब मैं बाहर आया तो अच्छा लगा। बाहर ताज़गी थी। कॉफ़ी हाउस में इलाहाबाद का सूरज चमकता था। वहाँ ज्ञान और गहमागहमी थी। सार्वजनिक स्थान बहुत अच्छे लगते। निराला को देखने जाते थे और फ़िराक़ को सुनते थे। फ़िराक़ किसी की नहीं सुनते थे। सुबह से दोपहर कर देते थे। साहित्य की जितनी बड़ी आधुनिक कशमकश और हलचल इलाहाबाद में पैदा हुई, वैसी पहले या बाद में कभी नहीं रही। यह दूसरी बात है कि इलाहाबाद अपनी ही कब्र में सो गया, लेकिन कब्र में सोता हुआ इलाहाबाद दिल्ली, भोपाल, लखनऊ, पटना की खिलंदिरी से आज भी ज़्यादा सुंदर है।
जब मैं पहली बार किसी का दोस्त बना तो यह इतराने जैसी हालत बन गई। बुखार और भूख की परवाह नहीं होती थी। मैं उससे प्यार करने लगा था। स्त्रियों से प्यार करना एक विवशता है, दुर्घटना है, अन्यथा यह मेरा पहला मित्रप्रेम का पहला स्पर्श था। उसे हर किसी ने रोते-गाते, हँसते-खिलखिलाते, उदास—सभी तरह की मुद्राओं में देखा था। वह एक सारंगी की तरह भरपूर था, लेकिन वह सारंगी की तरह मैला और साधारण था। उसका घर गोबर-मिट्टी का था। उसके पास ऊँट की कूबड़ जैसी एक ऊँची साइकिल थी। घर में उसके सभी अगवानी करते थे, छिपते थे। वह हमजोली था, पर बड़ी मशक्कत से जिंदा था, क्योंकि उसके पैर साइकिल की पैडल पर कठिनाई से पहुँचते थे और इसीलिए एक दिन वह भरी दोपहर में जानसेनगंज में लगभग अपने घर के पास असंतुलित हुआ और ट्रक के नीचे ख़ून का थक्का बन गया। मैंने उसका सपना जैसा देखा था और उसके घर का, वह बिल्कुल जैसे का तैसा हुआ। हाथ से तोता उड़ गया था, तोता जैसे पिंजरे में चला गया। उसकी कोई भी बात आज तक भूलती क्यों नहीं?
हमारे घर और स्कूल के पास या बीच समझें, एक रेल लाइन भी थी। हर दस मिनट पर गाड़ी निकलती थी। मिलिट्री का यार्ड भी था, जहाँ गाड़ियाँ, बड़ी नावें और छोटे टैंक चढ़ाए जाते थे। कभी-कभी मालगाड़ियाँ लंबे समय तक खड़ी हो जाया करती थीं और हम उनके नीचे से निकलने का खेल खेलते थे। बंगाली बच्चे कोयला चुराते थे। कभी-कभी पूरी मालगाड़ी केलों से लदी खड़ी रहती। शहर के बीच नहीं, लगभग एकांत में, सिग्नल के लिए खड़ी हुई। लोहे की मोटी गोल चादरों को भेदकर केला महक रहा है। कहाँ से नंगे बूचे पहुँच गए हैं और उन्होंने लौह कपाट खोल लिए हैं। एक गश्ती पुलिस है और एक गार्ड। वे क्या कर लेंगे? अब केलों पर इन नंगे-बूचों का हक़ नहीं बनता क्या? कितना केला खाएँगे! उससे ज़्यादा नहीं जितना ख़ुशबुओं का ब्रह्मांड है। उससे बहुत कम, बहुत-बहुत कम, लगभग नापता। फिर रेलगाड़ी तो चली जाएगी। यह एकांत और ज़्यादा एकांत होगा। हम मध्यवर्गीय बच्चे तो केले इस तरह से नहीं खा पाते थे, पर केलों के संसार की लूट देखकर बहुत तृप्ति होती थी। केले के व्यापारियों का मुनाफ़ा तो कम नहीं होता, भले चोर पर अख़बार वाले लेख छापते हों।
हाँ, इस बीच घर के बाद स्कूल भी आया था। स्कूल ज़्यादा दूर नहीं था। घर और स्कूल को कभी भूल नहीं सके। तब स्कूल बहुत फीकी जगह था। उस समय तक स्कूल आज जैसी हत्यारी जगहें नहीं बने थे। ज़्यादा से ज़्यादा वे एक बेबस जगह थे। घर से स्कूल के बीच हम टमाटर या खीरे का टुकड़ा होते थे या ज़्यादा से ज़्यादा दो गोल पोस्ट के बीच की गेंद। फिर भी घर से निकलकर स्कूल जाना नयापन तो देता ही था। स्कूल में हमारे एक सहपाठी थे, हरिप्रसाद। बहुत गरीब घर के थे, लेकिन इस तंगी में मुरली बजाने की लत पड़ी। निकर के अंदर छिपा कर बंसी स्कूल लाते थे। बंसी एक फ़ुट की थी। छोटी-बड़ी रिसेस में हम बंसी सुनते थे। क्लास में तो पूछा जाता था कि ‘इज़’ वर्ब है या नाउन, राणा प्रताप ने क्या प्रतिज्ञा की थी और पानीपत की तीसरी लड़ाई कब हुई थी। हरिप्रसाद की बंसी कई बार तोड़ताड़ दी गई। कई बार किताब की जगह बंसी लाने पर उसकी पिटाई हुई। अब वह या तो किताब खरीद सकता था या बंसी। उसकी बंसी में आत्मा का सुर था। वह कृष्णजी जैसी बंसी बजाता था। आज वही लड़का विश्व-प्रसिद्ध हरीप्रसाद चौरसिया है। बाधा दौड़ में विजयी होने वाले यही इक्का-दुक्का बचपन के लोग हैं, बाकी तो सब काल के गाल में समा गए।
आजकल तो अख़बारों से काफ़ी पता चल जाता है कि उस स्कूल के बच्चों ने ‘अलविदा मेरे स्कूल’ लिखकर भूसे की एक निर्जन कोठरी में आत्महत्या कर ली, कि एक बच्चे ने परीक्षाफल के तुरंत बाद कुएँ में अपने को फेंक दिया, कि एक बच्ची क्लासरूम की दीवारों पर यह लिखते-लिखते पिंजर हो गई कि माँ भूख लगी है, माँ मुझे प्यास लगी है, मुझे इस कोठरी से बाहर निकालो। उन दिनों किताबों का आतंक उतना नहीं था। हाँ, पिट-पिटकर बुखार बहुत से बच्चों को आ जाता था या पिटकर चोट और दाग लिए लौटने वाले बालक बहुत सारे होते थे। स्कूल अस्पताल तो नहीं लगता था, पर एक जल्लाद अध्यापक स्कूल में सदा मंडराता रहता था। इस बात को अच्छी तरह याद रखना ज़रूरी है कि थानों के बाद सबसे ज़्यादा क्रूरता के अड्डे हमारे स्कूल ही हैं। मेरे स्कूल में दंड के लिए हॉकी का उपयोग किया जाता था और इसके लिए दो मास्टर नियत थे। जब चतुरसेन शास्त्री ने सुप्रसिद्ध मास्टर नौरंगीलाल का ज़िक्र किया था, तब मुझे याद आता है कि अब एक नौरंगीलाल नहीं हैं, बहुत हैं। जगूड़ी की कविता भी याद आती है कि बच्चों को चारों ओर से खींचो, वे कहाँ-कहाँ से उग रहे हैं।
और एक कविता मिरोस्लाव होलुब की मैंने छापी थी, जो हमारे बचपन के स्कूलों की ख़बर देती है :
“एक वृक्ष झुकता है और
सिर झुकाकर कहता है,
मैं एक वृक्ष हूँ।
एक काला आँसू आसमान से गिरता है
और कहता है, मैं एक चिड़िया हूँ।
मकड़ी के जाले के नीचे से
प्यारी जैसी कोई चीज़ पास आती है
और कहती है, मैं खगोलशास्त्री हूँ।
लेकिन एक राष्ट्रीय जनतांत्रिक घोड़ा
अपनी सदरी पहने हुए
ब्लैकबोर्ड के सहारे पसर जाता है
और हर तरफ अपने कानों को
डन्टेरे हुए दोहराता है,
बार-बार दोहराता है—
मैं इतिहास का इंजन हूँ,
मैं इतिहास का इंजन हूँ।
क्लासरूम के दरवाज़े के नीचे
ख़ून की एक पतली धार रिसती है,
क्योंकि यहीं से शुरू होता है
बेगुनाहों का कत्ल।”
मेरे मदरसे में समय और समाज की कोई धुन या तरंग नहीं थी। यहाँ धार्मिक नैतिकता और अनुशासन की प्रेत-छाया मंडराती रहती थी। मैं तो काफ़ी दीनदयाल टाइप का बच्चा था, इसलिए मुसीबतें मेरे ऊपर कम आईं, पर रेखाओं के बाहर शरीर निकालने वाले बच्चों की शामत तो आती ही थी। उनमें से कई पिट-पिटाकर दुनियादार ख़बरदार हो गए। जिन बच्चों को पैदा होने मात्र के बाद से ही सज़ा मिलनी शुरू हो जाती हो, वे और क्या होंगे इससे ज़्यादा। इन सबके बीच रज्जू, पुक्कू और रघुराज बच्चे हैं, जिनको मैं बड़े और ठन-ठन सिक्कों की तरह चमकदार पाता हूँ। एक असली सिक्के की आज हम सबको कितनी ज़्यादा ज़रूरत होती है।
अपने बचपन के जिस वक्त को मैं देख रहा हूँ, यह गनीमत है कि उसको देख पा रहा हूँ। स्याह हिंसाओं के साथ अब अपने अतीत की तरफ़ देखना कठिनतर होता जा रहा है। मैं इतना शक्तिशाली तो नहीं हूँ कि बर्बरता के पार बचपन को पारदर्शी तरह से देख लूँ। यह तो मित्रों, बचपन की रेखा मात्र है। अब खंडहरों पर ग्रेस गार्बो और नरगिस की मुस्कराहट को ज़्यादा चिपकाना मुमकिन नहीं है। कैरिकेचर करते हुए भी जिस तरह चार्ली चैप्लिन अपनी बड़ी और उदास आँखों से मनुष्य को देखते थे, वह आज दुर्लभ है। अब बिना मुखौटे के कोई सच्चाई प्रदर्शित करना कठिन है। यह मुखौटा लगातार विकसित होता जा रहा है। अब किसके पास है दौड़ता, छलाँग लगाता, तैरता, उड़ता और चढ़ता-गिरता बचपन। सभ्यताएँ जब विशाल करवट लेती हैं तो इसी तरह हम पिस जाते हैं। इस करवट को निराशाजनक न मानते हुए भी इतना ज़रूर कहूँगा कि आज हमारे बच्चों का भविष्य जनतांत्रिक घोड़ों के हाथों में कैद है।
मेरे साथ यह दिक्कत है कि जब मैं सच लिखता हूँ तो यह झूठ जैसा लगता है लोगों को। जब झूठ लिखता हूँ तो सच लगता है सबको। फिर भी कहता हूँ कि बचपन को लेकर मैंने यहाँ जो कुछ भी लिखा है, वह सच है।
***

