श्रीरामनाथ सुमन
जन्म : 1904 निधन : 26 जनवरी 1976
*रामनाथ सुमन ज्ञानरंजन के पिता, समर्पित गांधीवादी, अध्येता, सुप्रसिद्ध लेखक एवं सम्पादक थे।
श्रीरामनाथ सुमन ज्ञानरंजन के पिता थे। इनका नाम श्रीरामनाथ ही था, पर बाद में नाम से श्री हट गया और रामनाथ सुमन हो गया। हम भी आगे यही प्रचलित नाम प्रयोग करेंगे। इनका जन्म वाराणसी के ढोलापुर गाँव में 1904 में हुआ था। सुमन स्वयं तो समर्पित गाँधीवादी थे ही, परिवार भी था। वह कई वर्षों तक महात्मा गाँधी के व्यक्तिगत सचिव रहे। सुमन महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन में बहुत सक्रिय रूप में शामिल थे। ब्रिटिश सरकार द्वारा ने उन्हें अनेक यातनाएँ भी दीं। अजमेर में गांधी आश्रम के वह सक्रिय कार्यकर्ता थे और तत्कालीन ‘सस्ता साहित्य मंडल’ के संचालकों में थे, जिसे ब्रितानी हुकूमत ने गैरकानूनी घोषित कर तालेबंदी कर दी थी। सत्याग्रह आंदोलन चलाने के लिए वह अजमेर-मेवाड़ प्रांत के संचालक नामजद किए गए थे जिसके फलस्वरूप अजमेर केन्द्रीय जेल में तीन महीने का कारावास दंड उन्होंने भोगा था। यहीं रह कर उन्होंने ‘हमारे राष्ट्रनिर्माता’ नाम से स्मरणीय पुस्तक लिखी थी और ‘इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट’ का अनुवाद किया था। उनकी पत्नी सीता देवी, जो उन दिनों गर्भवती थीं, वह भी अजमेर और फतेहगढ़ की जेलों में उन दिनों तीन महीने के लिए बंदी बनाई गई थीं। 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। मृत्यु तक उन्होंने खादी पहनी। उनका शव भी खादी में लपेटा गया। ज्ञानरंजन की दादी ने भी पूरा आए’ की सारी प्रतियाँ अंग्रेज़ सरकार ने जब्त कर ली थीं। विदर्भ प्रवास में वह महात्मा गाँधी के निजी सचिव रहे थे तथा जमनाल बजाज के निजी सचिव के रूप में भी उन्होंने काम किया था। गाँधी जी के आदेश से उन्होंने 1943 में इलाहाबाद में अपना प्रकाशन ‘साधना सदन’ नाम से शुरू किया था। वह दीर्घकाल तक ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ प्रयाग के विविध महत्वपूर्ण पदों पर काम करते रहे। ‘हिन्दी समिति उत्तर प्रदेश’ में भी पाँच वर्ष काम किया लेकिन मुख्य रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन ही उनकी जीविका थी। सुमन जी ‘गाँधी वाङ्मय’ के 6 भागों के प्रमुख संपादक थे। रामनाथ सुमन 1965 में प्रकाशित ‘अहिंसा और सत्य’ ग्रन्थ के प्रधान संपादक थे। इसमें 1916 से लेकर गाँधी के अंतिम समय तक, अहिंसा और सत्य पर उनके विचार, लेख, इंटरव्यू, पत्रों के उत्तर संग्रहीत हैं। इसमें रामनाथ जी की एक लम्बी भूमिका भी है। रामनाथ जी ने गालिब और मीर पर भी बहुत अच्छी किताबें लिखी हैं। अशोक सेकसरिया ने ज्ञानरंजन को एक पत्र में लिखा है कि इन किताबों को पढ़कर ही उनकी रुचि इन दोनों की तरफ हुई। गालिब की किताब में उर्दू-फ़ारसी के बहुत से सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची है। गालिब के बारे में इन किताबों की जानकारी आज उर्दू-फ़ारसी के बहुत से विद्वानों को भी शायद न हो। रामनाथ जी ने विविध विषयों पर लगभग 70 से ऊपर किताबें तो लिखी ही हैं, उन्होंने अर्नॉल्ड टायनबी के विश्व विख्यात ग्रंथ ‘ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री’ के सोमरवेल के विख्यात संक्षिप्तीकरण के दूसरे खंड का अनुवाद भी किया है। यह पुस्तक समाजों और सभ्यताओं का बेहद जटिल, गूढ़ और गहन ऐतिहासिक अध्ययन है। इसका हिन्दी अनुवाद तीखी प्रतिभा, अथक श्रम और विपुल अध्ययन की माँग करता है। तिलक, माइकेल मधुसूदन दत्त पर लिखी पुस्तकों के अलावा रामनाथ जी ने हिन्दी साहित्य पर जो काम किया, उसकी सूची अलग है। वह हिन्दी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती, अंग्रेज़ी, फ़ारसी और फ्रेंच भी जानते थे। उनकी लगभग पचास पुस्तकों की सूची मेरे पास है। ज्ञानरंजन इन्हीं रामनाथ जी के मंझले बेटे हैं। यदि लेखन की विविधता, व्यापकता, अध्ययन, श्रम, अनुशासन और विपुलता देखें, तो ज्ञानरंजन अपने पिता के अँगूठे के नाखून पर भी नहीं टिकते। पर शायद यह एक पुत्र के लिए प्रतिद्वन्दिता नहीं, बल्कि सुख और संतोष की बात ही होगी, गर्व की तो है ही
।जीवन खादी पहनी। सुमन जी की ऐतिहासिक पुस्तक ‘जब अंग्रेज़ आए’ की सारी प्रतियाँ अंग्रेज़ सरकार ने जब्त कर ली थीं। विदर्भ प्रवास में वह महात्मा गाँधी के निजी सचिव रहे थे तथा जमनाल बजाज के निजी सचिव के रूप में भी उन्होंने काम किया था। गाँधी जी के आदेश से उन्होंने 1943 में इलाहाबाद में अपना प्रकाशन ‘साधना सदन’ नाम से शुरू किया था। वह दीर्घकाल तक ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ प्रयाग के विविध महत्वपूर्ण पदों पर काम करते रहे। ‘हिन्दी समिति उत्तर प्रदेश’ में भी पाँच वर्ष काम किया लेकिन मुख्य रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन ही उनकी जीविका थी। सुमन जी ‘गाँधी वाङ्मय’ के 6 भागों के प्रमुख संपादक थे।
रामनाथ सुमन 1965 में प्रकाशित ‘अहिंसा और सत्य’ ग्रन्थ के प्रधान संपादक थे। इसमें 1916 से लेकर गाँधी के अंतिम समय तक, अहिंसा और सत्य पर उनके विचार, लेख, इंटरव्यू, पत्रों के उत्तर संग्रहीत हैं। इसमें रामनाथ जी की एक लम्बी भूमिका भी है। रामनाथ जी ने ग़ालिब और मीर पर भी बहुत अच्छी किताबें लिखी हैं। अशोक सेकसरिया ने ज्ञानरंजन को एक पत्र में लिखा है कि इन किताबों को पढ़कर ही उनकी रुचि इन दोनों की तरफ हुई। ग़ालिब की किताब में उर्दू-फ़ारसी के बहुत से सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची है। ग़ालिब के बारे में इन किताबों की जानकारी आज उर्दू-फ़ारसी के बहुत से विद्वानों को भी शायद न हो। रामनाथ जी ने विविध विषयों पर लगभग 70 से ऊपर किताबें तो लिखी ही हैं, उन्होंने अर्नाल्ड टायन्बी के विश्व विख्यात ग्रंथ ‘ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री’ के सोमरवेल के विख्यात संक्षिप्तीकरण के दूसरे खंड का अनुवाद भी किया है। यह पुस्तक समाजों और सभ्यताओं का बेहद जटिल, गूढ़ और गहन ऐतिहासिक अध्ययन है। इसका हिन्दी अनुवाद तीखी प्रतिभा, अथक श्रम और विपुल अध्ययन की माँग करता है। तिलक, माइकेल मधुसूदन दत्त पर लिखी पुस्तकों के अलावा रामनाथ जी ने हिन्दी साहित्य पर जो काम किया, उसकी सूची अलग है। वह हिन्दी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती, अंग्रेज़ी, फ़ारसी और फ्रेंच भी जानते थे। उनकी लगभग पचास पुस्तकों की सूची मेरे पास है। ज्ञानरंजन इन्हीं रामनाथ जी के मंझले बेटे हैं। यदि लेखन की विविधता, व्यापकता, अध्ययन, श्रम, अनुशासन और विपुलता देखें, तो ज्ञानरंजन अपने पिता के अँगूठे के नाखून पर भी नहीं टिकते। पर शायद यह एक पुत्र के लिए प्रतिद्वन्दिता नहीं, बल्कि सुख और संतोष की बात ही होगी, गर्व की तो है ही।
ज्ञानरंजन का व्यक्तित्व, रुचि, विचार, पिता से विपरीत थे। रामनाथ सुमन के पत्रों में अपने इस ‘बिगड़ते हुए पुत्र’ के लिए मन के कोने में एक चिंता और बेचैनी छुपी दिखती है। उसके भविष्य के प्रति आशंका भी। उनका पहला पत्र इसी चिंता और बेचैनी से भरा है। ज्ञानरंजन 1960 में जबलपुर में नौकरी करने चले गए थे। रामनाथ जी का पहला पत्र 1960 का ही है। इस पत्र में परिवार के कुछ नाम आए हैं। उन्हें देखें, तो मुदुला, ज्ञानरंजन की छोटी बहन हैं। आजकल मुम्बई में रहती हैं। चुन्नू ज्ञानरंजन के छोटे भाई हैं। उनका नाम बालकृष्ण है। वह बहुत अधिक नहीं पढ़ पाए थे, शायद हाई स्कूल भी कई बार में पास किया था। उनका बौद्धिक व शैक्षिक विकास अधिक नहीं हुआ था। बाद में उन्होंने ही अंतिम समय में रामनाथ जी की पूरी देखभाल की। उनका प्रकाशन, पुस्तकें, पत्र सब सँभाले। अंत तक पिता की सेवा की, फिर माँ की भी अंतिम समय तक सेवा की। उन्होंने विवाह नहीं किया। रामनाथ जी वसीयत में अपने इस बेटे को ही एक तरह से सब कुछ दे गए थे, (यह वसीयत परिशिष्ट -1 में दी जा रही है)। उनके पास कुछ बहुत अच्छी कम्पनियों के शेयर थे। चुन्नू को वे सब मिले। अब वे इलाहाबाद में अपने पुराने मित्र वेद प्रकाश के घर पेइंग गेस्ट की तरह रहते हैं। शेयर से उनको जो भी 15-20 लाख रुपए मिले उसी के सहारे जीवन यापन करते हैं। निक्कू और छन्नू ज्ञानरंजन के चचेरे भाई हैं। वास्तव में ज्ञानरंजन की माँ और चाची सगी बहनें थीं। इसलिए दोनों परिवार एक ही परिवार की तरह रहते थे। रामनाथ जी इस परिवार के मुखिया थे। सब बच्चों की देखभाल करते थे। छन्नू का नाम मनोरंजन और निक्कू का चितरंजन था। ज्ञानरंजन के बड़े भाई का नाम श्रीरंजन था। छन्नू और निक्कू की मृत्यु हो गई है। श्रीरंजन ने परिवार को दुःख ही दिए। उन्होंने पिता की वसीयत न मानकर लूकरगंज का मकान अपने हिस्से में लेकर बेच दिया। वह मकान अब नहीं है।
रामनाथ सुमन और ज्ञानरंजन के पिता-पुत्र के सम्बन्ध रोचक हैं। ज्ञानरंजन की ‘पिता’ कहानी, पिता प्रेम की नई और जटिल अभिव्यक्ति है। काफ्का का पिता के नाम पत्र भी पितापुत्र सम्बन्ध के इस सिलसिले में पढ़ा जाना चाहिए।
रामनाथ सुमन के तीनों पत्र ज्ञानरंजन के जीवन के बहुत कम ज्ञात पक्षों और व्यवहार की ओर इशारा करते हैं। ये पत्र बिगड़ते हुए स्वास्थ्य वाले अनुशासनहीन पुत्र के लिए एक पिता की उद्विग्नता और पिता के प्रति पुत्र की उग्रता, उपेक्षा और आक्रामकता का प्रामाणिक वाचन हैं। पर दोनों के बीच सम्बन्धों का यही अंतिम सत्य नहीं है। इस सम्बन्ध के दूसरे पक्ष भी हैं। ‘कबाड़खाना’ में ज्ञानरंजन ने रामनाथ जी पर संस्मरण लिखा है। उसमें हम पिता-पुत्र के सम्बन्धों की आत्मीय तरलता का अनुभव कर सकते हैं। (देखें परिशिष्ट-2)
रामनाथ सुमन अपने अंतिम दिनों प्रबल रक्तचाप, खाँसी, गुर्दे के दर्द, खून की कमी और प्रोस्टेट की बीमारियों से त्रस्त रहे। बीमारी के इलाज और घर खर्च के लिए धन जरूरी था जो उनके पास नहीं था। उनकी पत्नी भी बीमार थीं। इलाहाबाद का उनका लूकरगंज का मकान नजूल की ज़मीन पर बना था और उसे बेचने की उनको सरकार से अनुमति नहीं मिली थी। दिसम्बर 1975 में उन्होंने भवानी प्रसाद मिश्र को एक मार्मिक पत्र लिखा।
आप जानते होंगे, मैं दो बार जेल जा चुका हूँ, मेरी पत्नी भी जा चुकी हैं। मेरा सामान कुर्क हुआ है। मुझे कालकोठरी नसीब हुई है, राष्ट्र के प्रति और भी मेरी सेवाएँ हैं। लगभग 55 वर्ष से मैं साहित्य की सेवा करता रहा हूँ। मेरी लिखी पुस्तकें लोकप्रिय हुई हैं, अनेक भाषाओं में उनके अनुवाद हुए हैं, सैकड़ों जीवन का उनसे निर्माण हुआ है–अनेक मंत्रिगण मुझे निजी रूप से जानते हैं, केन्द्रिय मंत्रियों में तथा प्रांतों में भी कई जेल में मेरे साथी थे। मुझे राजनैतिक पेंशन भी मिल सकती थी परन्तु जिस ढंग पर वह दी जाती है, उसे मेरा आत्माभिमान स्वीकार नहीं करता। देने का अभिनय गर्व में नहीं, नम्रता में व्यक्त होना चाहिए। …दो वर्ष पूर्व मैंने आप को लिखा था कि कोई काम मिल जाए तो श्रम करके मैं जीविकोपार्जन ज्यादा अच्छा समझता हूँ…. मैं तो बीमारी में भी चारपाई पर, घोर व्यथा में कुछ न कुछ लिखने पढ़ने का काम करता ही रहता हूँ। श्मशान की यह साधना है। मेरी एक पुस्तक अभी निकली है, मैकमिलन से, ‘छायावादयुगीन स्मृतियाँ‘। कृपया पढ़ियेगा। एक दूसरी संस्मरणों की पुस्तक ‘मैंने स्मृति के दीप जलाये‘ खत्म कर के राजपाल को दी है, पुस्तकालय ‘कल्याण‘ को दे दिया है। उस पैसे से कुछ दिन का रोटी का प्रबंध हो सका है। अन्य एक पत्र में लिखा : मुझे राजनैतिक पेंशन की अपेक्षा साहित्य सेवा के लिए पेंशन प्राप्त करना अधिक समीचीन लगता है, क्योंकि देश की अपेक्षा साहित्य की सेवा का कार्य मैंने अधिक किया है।
भवानी प्रसाद मिश्र को लिखे इस पत्र में रामनाथ सुमन ने अपना पुस्तकालय ‘कल्याण’ को देने की बात लिखी है। अगस्त 1975 में गीता प्रेस, गोरखपुर ने पाँच हजार रुपए में उनका पुस्तकालय खरीद लिया था। उनका हनुमान प्रसाद पोद्दार से पुराना सम्बन्ध था और अपनी ज़रूरत के हिसाब से ही उन्होंने यह राशि माँगी थी। उनकी मृत्यु के तीन महीने बाद तक पुस्तकें बंडलों में ही बँधी पड़ी थींथीं। उन पुस्तकों की एक सूची सुमन जी ने अपने हाथ से ख़ुद बनाई थी। उसके अनुसार कुल मिलाकर 1814 पुस्तकें थीं। इनके अलावा ‘हरिजन’ की 9 मोटी जिल्दें भी थीं। बहुत-सी अन्य प्रसिद्ध पत्रिकाओं के अंकों की जिल्दें भी थीं। पुस्तकों में विविध विषयों पर बहुत महत्वपूर्ण कृतियाँ और अनुपलब्ध पुस्तकें भी थीं। उस समय ‘गीता प्रेस गोरखपुर’ ने आश्वासन दिया था कि इन पुस्तकों के बंडल खोल कर उनके पुस्तकालय की पुस्तकें पाठकों को उपलब्ध कराएँगे। उन पुस्तकों की क्या स्थिति है पता नहीं है। कई सालों से सुमन जी ‘पेसमेकर’ के सहारे चल रहे थे। नया पेसमेकर लगाने की तारीख मई 1976 थी। पर 26 जनवरी 1976 को ही उनका निधन हो गया।
ख़तों के आइने में… पुस्तक से साभार

