- रोशनी पर भरोसा रखता हूँ
नाव के छप्पर पर एक दिया बन कर
तुम जब पलटकर आते हो
मछली या मगरमच्छ के चित्र के साथ
उड़ता रहता है झण्डा
रोशनी पर भरोसा रखता हूँ
किनारे की भीड़ बन जाता हूँ
देखने के लिए आ कर
पीछे-पीछे जाता हूँ
रोता हूँ
क्रुद्ध होता हूँ
आकाश के एवज में
ले लेता हूँ अफ्रीका
अंजुली फैलाते हुए
रोशनी पर भरोसा रखता हूँ
(नेल्सन मंडेला की मुक्ति के समय रचित)
2.कवि के घर में आधी रात
आधी रात कवि के घर गया था
क्रुद्ध धमनियों में लहरों को उठते गिरते देखने के लिए
वह बैठे हुए थे
जलकुंभी फूल की तरह मायूस होकर
मूक क्षोभ की ढलान पर
आँखों को चुंधियाने वाली घटना
गर्जन के साथ घटी थी
बालों के सिरे की बिजली
घर की छत को छू रही थी
कोरे कागज़ के ऊपर
उछल रहे थे मेघ
3. बरसाती लग्न
एक
सिंदूरी आम पकने की
बरसाती लग्न
भैंसा दौड़ा कर मेघ उतरता है
धुंधलका बटोरते समय
घोंघे के अंडे की तरह
पत्थर की बारिश
उंगली के पोर में लगता है
मांस का सिरा
जलकुंभी रंग की लहर
भैंसा दौड़ा कर मेघ उतरता है
नाखून मरता है सरकंडा उगता है
दो
नदी के जिस तट पर लोगों की बस्ती
बाँस का अंकुर जिस का पड़ोसी
वहाँ से एक पगडंडी
दीपशिखा के पहाड़ तक
उसी राह से चेरी फूल का स्वर्गारोहण
4. पेड़ की अनुकृति
प्रत्येक नाम कितनी घटनाओं के साथ जुड़ कर जीवित रहता है
प्रत्येक घटना के आलम में छिन्न भिन्न अनेक दृश्य
और दृश्यों की लंबाई चौड़ाई गहराई का परिमाप जटिल ज्यामिति।
पेड़ की अनुकृति में रचित होने की वजह से ही उद्यान में मंचस्थ होगा यह नाटक-
अभिनय-पटु कच्चे-पके फल डालों पर लटकते रहेंगे,
सूत्रधार के मुँह से निकले संवाद से मुखर परिवेश में
फल की तरफ़ निक्षेपित दर्शक का मुग्ध ढेला
अर्थघन टहनी पर अटक जाएगा,
नाम की नृसिंह संख्या का उद्धार करने के लिए चरित्र अभिनेता
नायकोचित जंग लड़ेगा और पराजित होने वाला
शीर्षबिन्दु से उद्यान का गेट खोल कर करेगा प्रस्थान।
5. दौलगोविंद, मैं और मंदिर
मंदिर और मैं इस पार उस पार
तृतीय पार में दौलगोविंद
अपार पानी के हम तल, ऊपर और
अतल के अनुक्रम।
दौलगोविंद आख्यान, मंदिर किंवदंती
और मैं कौतूहल का शिशु।
गुड़हल की एक पंखुड़ी बन कर गोविंद मंदिर में आते हैं
दो नाव दो पाँव बनकर मैं मंदिर में जाता हूँ
मंदिर रहता है अपने स्थान पर।
कल्पकथा में परिणत होते हैं तीन निरंजन
ढ़ोल-झाल की आवाज दीपशिखा और शंख-निनाद की नियति।
दौलगोविंद—गुवाहाटी के उत्तर में ब्रह्मपुत्र के पार एक मंदिर
अनुवाद: दिनकर कुमार
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अनुभव तुलसी (1958-2025)
असमिया भाषा के एक प्रसिद्ध कवि, अनुवादक, फिल्म समीक्षक, कथाकार और संपादक थे। समकालीन असमिया कविता में उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने गुवाहाटी विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होंने 1983 से 2018 तक बुदराम माधव सत्राधिकार कॉलेज, शुवालकुची में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया और सेवानिवृत्त हुए। असमिया कविता की एक विशिष्ट और विचारशील आवाज़ अनुभव तुलसी की पहली कविता पुस्तक का नाम’नाजमा’ है। उन्होंने ‘दोरोन फूल’, ‘जलमग्न दृश्यावली’, ‘जुइचोर’, ‘पनिकाउरी’, ‘शराईर सकुत फूलर बिसना’, ‘देओसेलेंग’, ‘बानान करी पढ़ा लुइतर पानी’, ‘श्रीमंतमनपरुआ’ और ‘जनायखिनी’ सहित कविता की 20 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। कवि अनुभव तुलसी की कविताओं को गुवाहाटी विश्वविद्यालय, कॉटन विश्वविद्यालय और उत्तर लखीमपुर कॉलेज के स्नातकोत्तर असमिया विभागों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। उनकी कविताएँ ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, पेंगुइन, नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आदि द्वारा मानद पुस्तकों में प्रकाशित हुई हैं। उन्हें इस्तांबुल, तुर्की, ऑस्टिन, यूएसए, एथेंस, ग्रीस और ढाका (बांग्लादेश) में विश्व कविता और साहित्य समारोहों में कविता पढ़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। अनुभव तुलसी को मुनीन बरकटकी पुरस्कार, केंद्र सरकार के संस्कृति विभाग का वरिष्ठ फेलोशिप पुरस्कार, अंतरलिपि साहित्य पुरस्कार, साहित्य ज्योति पुरस्कार, असम साहित्य सभा सभापति का शताब्दी साहित्य सम्मान और पद्मनाथ विद्याविनोद स्मृति साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

