
- लिख ही नहीं पा रहे मुझे
जो भी प्रमाण जुटाए गए थे
उनसे एक किताब लिखवाकर
कई किताबों को झुठलाया गया था
तब मैं झुठलाए हुए के साथ था
और आज भी हूँ
क्योंकि आज नई किताब लिखी जा रही है
पुरानी किताब रद्द होने वाली है
यह कारोबार जारी रहने वाला हैझुठलाए हुए के पास कोई दावा नहीं रहता
झुठलाए हुए के पास
या क्षोभ होता है या संभावना
मैं संभावना के साथ था और आज भी हूँ
प्रमाण जुटाए जाते रहेंगे
और किताबें लिखी जाती रहेंगीयह यात्रा क्षोभ में कटेगी या संभावना में
क्षोभ की आयु किताब जितनी है
संभावना की आयु ही नहीं
मैं लिखा ही नहीं जा रहा
लिख ही नहीं पा रहे हैं मुझे!2. बाहर की घबराहट
बाहर की घबराहट
भीतर कहां रहने देती है
बाहर एक फ़क़ीर सोया है
पूजास्थल की सीढ़ियों पर
किताब के पन्नों का बिछौना बनाकर;
भीतर शय्या पर
ऋचाओं के कांटे
आनंदोत्सव में विघ्न डाल रहे हैंसामने वाले पेड़ पर मधुमक्खियां
भरे हुए छतों की रखवाली कर रही हैं
घर के किचन में थोड़ा बच हुआ शहद
पूजा की थाली में रख दिया गया है
मीठा प्रशाद में बाँटा जा रहा है मंदिर में
बाहर की घबराहट
अंदर कहाँ बैठने देती है
इसीलिए बाहर घबराहट के बीच
मैंने अपना आश्रम बनाया है3. फोटो
मांगने वाले ने हाथ फैलाए
दाता के हाथ पहले से ही खुले हुए थे
दान का आदान-प्रदान हुआ ही होगा
फोटो पर कुछ छपा ही नहीं
आस्था वालों ने इसी लिए धर्म-ग्रंथ रचा
नास्तिक धर्म-ग्रंथ के विरोधी हो गए
दाता आस्था वालों के साथ हो लिया
मांगने वाले को नास्तिक अपने खेमे में ले गएकहानी फिर शुरू हुई
जिसकी रिपोर्टें समाचारपत्रों में शह-सुर्खियां बटोर रहीं
टीवी पर दिन भर तमाशे होते रहे
मांगने वाला तालियाँ बजाता रहा
दाता विदूषक की तरह ठहाके मारता रहा
आस्तिक फोटो निकालते रहे
नास्तिक वही फोटो बेच कर अपना पेट पालते रहे4. सेतु
वे इतिहास के ही पन्ने पलट रहे हैं
और समय को इन ही पन्नों के संदर्भ में देख रहे हैं
आँखों के चश्मों के नंबर भी इन्हीं पन्नों की संख्या से तय हुए हैं
वे कल के रंगों में कल देखना चाहते हैं
कल, जो धूसर है
कल, जो रंगीन है
इसीलिए उन्होंने आज बिखेर रखी हैं आसपास
इतिहास की ढेर सारी किताबें
जिनमें रंगों के समीकरण ढूँढे जा रहे हैं
रंगों को बिखरने के लिए बाद कैन्वस चाहिए
बाद कैन्वस केवल वर्तमान के पास हैवे सेतु बना रहे हैं
इतिहास से झड़े हुए शब्दों से
फिर इधर से उधर और उधर से इधर सफर में गुज़र जाते हैं
एक किताब से दूसरी किताब तक की यात्रा मेंआज हम जिस जगह पहुंचे हैं
वह जगह किसी देश में नहीं, किसी काल में नहीं
वह जगह इतिहास में आ ही नहीं सकती
आँखों में भी नहीं
इसीलिए हम जहां हैं
वहाँ रंगों की बहार हैइतिहास की किताबों के बीच वे दुर्बल हो गए हैं
दुर्बलता रंग कहाँ परख पाती है
रंग यौवन की मांग करते हैं
हम जहां पहुंचे हैं
वहाँ सेतुओं की ज़रूरत नहीं पड़ती***

