शिवप्रसाद जोशी

द टाइम फॉर क्वारल झगड़े का समय
इज़ गॉन ख़त्म
नेक्टर पोर्स लाइक अ फ़ाइन मिस्ट. कुहासे की बारीक फुहार जैसा छितरता है मकरंद.
अंग्रेजी कवि-लेखक, प्रोफ़ेसर प्रशांतो चक्रवर्ती की इन अभिव्यक्तियों या कविता-चिंतन को ‘कोड-डिकोड’ करने की ज़हमत न उठाकर बस गहरे इत्मीनान और सब्र के साथ उन पंक्तियों को पढ़ना शुरू कर दीजिए तो कुहासे की बहुत महीन फुहारें गिरने लगती हैं और आप भीगते चले जाते हैं.
ये है उनका जादू.
उस्ताद अमीर ख़ान के गाए तरानों जैसा, वो कहते थे कि लोग तरानों को अर्थहीन समझते हैं लेकिन मुद्दत की रिसर्च से उन्होंने पाया कि वे अर्थवान कविताएं हैं, फारसी में जिनके गहरे फलसफ़ाई मायने हैं.
प्रशांतो की कविताओं का भी अपना एक दर्शन है जो उनकी अभिव्यक्तियों या उद्गारों में झिलमिलाता तो रहता है लेकिन दिखता नहीं. प्रशांतो इस तरह हिंदी कवि शमशेर बहादुर सिंह के पास से गुज़रती कविताओं के कवि हैं. “नेक्टर पोर्स लाइक फ़ाइन मिस्ट” की छोटी छोटी, चार पंक्तियों वाली अभिव्यक्तियों को पढ़ते हुए शमशेर जी की लंबी कविताः ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ सहज याद आने लगती है.
आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं…
न जाने कहाँ।
या ये पंक्तियां-
मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,
ताकि उसकी दबी हुई ख़ुशबू से अपने पलकों की
उनींदी जलन को तुम भिगो सको, मुमकिन है तो।
लेकिन प्रशांतो बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहने वाले असाधारण कवि हैं और उनका कविता का भूगोल नितांत वैयक्तिक और अपने ही न जाने कितनी भीतरी गहराइयों से निर्मित हैं. वो प्रकट कविता नहीं है. उसका सफ़र कहीं भीतर ही भीतर है. जैसे पहाड़ों की अंतहीन खोहों से होती हुई कविता गुज़रती है. पहाड़ों की ढलानों पर खिंची लकीरों जैसी पगडंडियां, भेड़-बकरियों और चरवाहों के बारीक रास्ते, दूर से देखो तो जैसे पहाड़ पर हरी चादरों को जोड़ने वाली सिलाई.
उनकी अभिव्यक्तियां या रिफ़लेक्शन्स अंदर ही अंदर, अदृश्य आवरणों के भीतर हैं जैसे फूल के भीतर महक रहती है. जैसे हवा के भीतर धुंध. जैसे जीभ के भीतर राख और रात के भीतर प्रेम.
द क्लैरिनेट–आर्किटेक्ट क्लैरिनेट– फ़नकार
यूनाइट्स जोड़ता है
विद हिज़ इन्स्ट्रूमेंट अपने साज़ से
वास्ट ब्लैंक्स सुरों के बीच
बिटवीन नोट्स. विशाल अंतराल.
प्रशांतो की इन पंक्तियों में मौजूद कविता वहीं की वहीं ख़त्म नहीं हो जाती है, असली सफ़र तो उसके बाद शुरू होता है, जब वो जितना बाहर की ओर उतना या उससे ज़्यादा भीतर की ओर यात्रा कर रही होती है. उसकी ये अंतर्यात्रा कितनी दूर तक और कहां तक जाती है यह कवि पर निर्भर करता है और पाठक-पर्यवेक्षक पर भी कि वे कहां तक उसे ढूंढते रह पाते हैं. कवि को भी पहली बार में हो सकता है ये अनुभव न होता हो लेकिन धीरे-धीरे उसके सामने अपनी ही लिखी पंक्तियों के नये-नये अर्थ खुलने लगते हैं. वो एक उसका अपना ही निजी तराना बन जाता है. भले ही उसे अपना अमीर ख़ान न मिले लेकिन उसकी अर्थवत्ता कायम रहती है. हालांकि ये अलग बहस है और कविता की अंतर्वस्तु, उसकी सच्चाई, ईमानदारी और उसके यथार्थ का इम्तहान भी है.
कम टू मी मेरे पास आओ
आई कैननॉट गिव यू सहानुभूति नहीं
सकर, मेरे पास
आई हैव अ सॉन्ग. संगीत है.
कविता के लिए मानवीय और वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के साथ-साथ वैचारिक प्रगाढ़ता भी जरूरी है. पृथ्वी के अनंत रहस्यों का फ़ाश न होता अगर वैज्ञानिक मान बैठते कि नयी दुनियाएं नहीं हैं. लेकिन तारों के पार नये ब्रह्मांडों की तलाश हुई और ब्रह्मांड अपनी विशेषता में ही नहीं वैज्ञानिक महत्वाकांक्षाओं और इरादों में भी फैलता ही चला जाता है. और उसकी गुत्थियां हैरान कर रही हैं. विज्ञान में ये ख़ूबी कविता ने पैदा की है. वह कविता के बिंदु पर पहुंच जाता है जब गुत्थियों को सुलझाता हुआ नयी गुत्थियों का रुख़ करने लगता है. वह कविता है जो उसे चैन नहीं लेने देती.
उनकी कविताएं आप पढ़ते जाएं, उनमें डूबते जाएं तो उन्हें पकड़ सकते हैं और उनके सहारे नयी खोजों पर निकल भी सकते हैं. अगर वे आपसे छूट न जाएं…
मिडनाइट मालकौंस आधी रात का मालकौंस
ऐपरिशन्स स्नीक इन उतर आती हैं छायाएँ
हैव यू नॉट फ़ेल्ट क्या तुम्हें नहीं महसूस हुई
देयर प्रेसेन्स? उनकी मौजूदगी?
चार पंक्तियों का यह जादू प्रशांतो सिर्फ़ इसलिए नहीं पैदा कर पाए कि वो संगीत के गहन रसिक और जानकार हैं, ये जादू उनकी कविता का भी है जो उनकी वैचारिकता में निबद्ध है. अपने अनुभव से जानता हूं कि एन राजम का वॉयलिन पर मालकौंस ऐसी ही कौंध जगाता है.
क्षणिका के फॉर्म वाली इन कविताओं के साथ उतनी ही असाधारण और अनूठी तस्वीरें है जिन्हें राजर्षि दासगुप्ता ने खींचा है. ये तस्वीरें मानो उन कविताओं को पूरा करती हैं या नये रास्तों में ले जाती हैं, नये सवालों की ओर, नये बिंब बनाती हुई. कुछ तस्वीरें तो कविता के साथ एक बड़े पोस्टर आकार में आ जाएं तो क्या कहने1 वह एक निराला कलात्मक-काव्यात्मक अनुभव होगा. इस नाते मेरी पर्सनल फेवरेट 50-51 पेजों पर फैली हुई तस्वीर है जिसके साथ ये कविता दर्ज हैं-
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ड्राइड ब्लड सूख चुका ख़ून
इज़ स्लश कीचड़ है
काउंटलेस थॉ साइकिल्स अंतहीन गलन चक्र
बिफ़ोर टर्निंग लिक्विड द्रव बनने से पहले
अगेन. दोबारा.
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युअर बीमिंग फेस तुम्हारा दमकता चेहरा
एंड ऑल विज़डम और समस्त ज्ञान–ध्यान
इल्यूड्स मी छूटता मुझसे
थैंक हैवन्स! शुक्र है!
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लिटिल फ्लावर्स नन्हें पौधे
हिट बाइ मोर्टार तोप के धमाके से
सकंब इन्स्टैन्टली. मर जाते फ़ौरन.
स्टिल, फ्लावर्स कंटीन्यू फिर भी, जारी है फूलों का
टू ब्लूम. खिलना.
प्रशांतो की ये पंक्तियां भावनाओं को अभिव्यक्त ही नहीं करतीं बल्कि उनका सूक्ष्म परीक्षण भी करती हैं. एक लिहाज से ये अकेलेपन में गहराई से सोचने की और आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया है और इस नाते एंटी-फासिस्ट कविता है. फासीवाद ऐसे अंतर्द्वद्वों से परहेज़ करता है. जर्मन दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने इस बारे में एक बात कही थी जिसके आशय ये हैं कि फासिस्टों को अगर आत्म-मंथन या अपने भीतर झांकने के लिए कहा जाए तो वे बगले झांकने लगते हैं या भयानक क्रोधित हो उठते हैं. क्योंकि अडोर्नो के मुताबिक अगर वे ऐसा करने लगेंगे तो उनकी गुटीय या गिरोही पहचान काम करना बंद कर देगी.
प्रशांतों की कविता अपने भीतर कई तहों में उतरती जाती अभिव्यक्ति ही नहीं, संदेह और सवालों से भी घिरी कविता है, बाज़दफ़ा उसके पास जवाब के तौर पर सवाल ही हैं. वो निश्चित या निश्चिन्त कविता नहीं. संदेह के बहुत बारीक फाहे उसे घेरे रहते हैं. इन्हीं विशेषताओं के कारण प्रशांतो की कविता नामीगिरामी कवियों के रहस्यवाद से अलग हो जाती है. यहां मिस्टिसिज्म का आलोक या प्रभामंडल नहीं है, संदेह और छानबीन के छल्ले हैं बनते हैं और मिटते हैं और फिर बनते हैं. प्रशांतो मानो अपने ही भीतर एक कुएं में उतरे हैं. वो अपने अकेलेपन की हिफ़ाज़त करते हैं. इस काम में उनके साथ आ जुड़ती हैं दिक्-काल के अज्ञात आयामों को उद्घाटित करती तस्वीरें.
जर्मन कवि और नाट्यकार बर्तोल्त ब्रेख्त ने कहा हैः ऐंड यू सी ऑनली दोज़ हू स्टैंड इन द लाइट, व्हाइल दोज़ इन द डार्कनेस नोबॉडी कैन सी. (और तुम सिर्फ़ उन्हें देखते हो जो खड़े हैं उजाले में, जबकि वे किसी को नहीं दिखते जो अंधेरों में हैं.) प्रशांतों की कविता ब्रेख्त की इन लाइनों के हवाले से कहें तो व्यक्ति और मनुष्य जीवन से आगे जाकर समूची कायनात में छोटे-छोटे बिंदुओं, अणुओं और धड़कनों को देखती और चिन्हित करती है.
पलसेशन इन द वेन नसों की धड़कन
टेन थाउसेंड इयर्स दस हज़ार साल
ऑफ़ विलोसटी का संवेग
इन अ ग्लोब्यूल समाया एक बूँद में.
कला में क्यूबिज्म यानी घनवाद ने रिनेसॉ यानी पुनर्जागरण काल से चली आ रही कला में स्पेस की निरंतरता को तोड़ा. प्रशांतो कविता की निरंतरता में बहुत सारे कोने खोल देते हैं. उसे कहीं से भी देखा-परखा जा सकता है. चार पंक्तियां अंतर्गुम्फित भी हैं और अलग-अलग रास्तों पर भी जा रही हैं. ब्रिटिश चिंतक और कला मर्मज्ञ जॉन बर्जर अपने एक निबंध में बताते हैं कि यथार्थ की ज्यादा पेचीदा तस्वीर दिखाने की क्युबिस्ट पेंटरों की जद्दोजहद को समझने के लिए हमें सदियों की उस आदत को छोड़ना होगाः हर ऑबजेक्ट या बॉडी को ऐसे देखने की आदत जैसे कि वो अपने आप में मुकम्मल या पूर्ण है, अपनी पूर्णता में वो अलग है- इस तरह. जबकि क्युबिस्ट कलाकार वस्तुओं के बीच अंतःक्रिया को लेकर परेशान थे. कला को कई नज़रियों से देखा जा सकता है, और कविता को भी.
द क्लॉइंग ख़ुशामदी
स्टेंच सड़ांध
ऑफ़ अनसीज़िंग ग्ली अनवरत उल्लास की.
‘तनहाई की सच्ची गरिमा और अर्थवत्ता भी ऐसी ही कविता में रौशन होती है.” हिंदी कवि नरेन्द्र जैन की कविता पर उनके ही समकालीन कवि असद ज़ैदी की उपरोक्त टिप्पणी संयोगवश प्रशांतो के काव्य-व्यवहार को समझने में भी काम आ सकती है. छोटी-छोटी कविताओं के ज़रिए प्रशांतो अपने ढंग से तनहाई की छानबीन करने वाले एक बेचैन कवि हैं.
नो साउंड कोई ध्वनि नहीं
ऑल समर सारी गर्मी
अ सॉफ़्ट नॉक एक हल्की दस्तक
ऑन माई डोर, मेरे दरवाजे बजती हुई,
रेन बारिश.
इस कविता-फोटो पुस्तक में प्रशांतो ने अपने मित्र लेखक-छायाकार प्रोफेसर राजर्षि दासगुप्ता के साथ मिलकर एक ऐसा विहंगम काव्य-परिदृश्य उभारा है जो प्रयोग के तौर पर अनूठा और असाधारण तो है ही, अभिव्यक्तियों की अंतःक्रिया का एक विरल कैनवास भी है. यहां निरंतरताएं टूटी हुई बिखरी हुई हैं और फिर कहीं अंधेरों, अकेले, अदृश्य कोनों से झांकती हुई नयी टूट की सघनता में खुद को उड़ेल रही हैं. प्रशांतो के लिए उनकी ही चंद लाइनों के ज़रिए एक प्यारा सा संदेशः
सिंग अनदर सॉंग दूसरा गाना गाओ
लेट मी मेक मैं सेंकता हूं ब्रेड और बनाता हूं
टोस्ट एंड टी चाय
फ़ॉर यू. तुम्हारे लिए.
इस किताब के अलावा प्रशांतो के दो कविता संग्रह और हैं- निबंध से जनवरी 2024 में “द अरावली क्वाट्रेन्स” शीर्षक से प्रकाशित एक काव्य पुस्तिका है. “टीदरिंग्स” नाम से एक काव्य संग्रह शशि प्रकाशन और अंतिका प्रकाशन से 2018 में प्रकाशित है जिसमें प्रशांतो की लिखी एक बेहद खास और असाधारण प्रस्तावना भी है जो समकालीन समय पर एक प्रखर अन्वेषी चिंतन है.
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कविता संग्रह-Nectar pours like a fine mist (नेक्टर पोअर्स लाइक अ फ़ाइन मिस्ट)
प्रशांतो चक्रवर्ती,
रेड रिवर प्रकाशन,
(कविताओं के अनुवाद– शिव)

