भुवनेश्वर

(एक प्राचीन नगर जो हजारों बरसों बाद भी समृद्ध कलिंग वास्तु की धरोहर को थामे है।)

आसूर्य दिनेश 

जहां संपूर्ण उत्तर भारत खास तौर पर मेरा शहर ऋषिकेश अभी भी ठंड में सिकुड़ा पड़ा है, भुवनेश्वर में होटल के कमरे में लगातार AC चल रहा है। सुबह शाम तो हल्की शीतल बयार बहती है पर दोपहर एक बजते बजते गर्मी वापस होटल के ठंडे कमरे में लौटने को मजबूर कर देती है।

भुवनेश्वर भारत के प्राचीनतम शहरों में शुमार है। इसी के क्षेत्र में कलिंग युद्ध के बाद 2200 वर्ष पहले सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया। कलिंग स्थापत्य के प्राचीनतम सुंदर मंदिर,अवशेष तथा पूर्ण दोनों रूपों में, जहां तहां दिखाई देते हैं। सोमवंशी सम्राट ययाति द्वारा बनवाया लिंगराज मंदिर “एकाम्र क्षेत्र” यानि भुवनेश्वर का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। विशिष्ट कलिंग शैली में बना 180 फीट ऊंचा यह भव्य मंदिर भगवान हरिहर (शिव और विष्णु का संयुक्त रूप) को समर्पित है।

इस क्षेत्र के देऊला कलिंग शैली के बने मंदिरों में मात्र पूजा ही नहीं होती थी बल्कि महत्वपूर्ण सभाएं लगती थी, विवाह होते थे, ओड़िशी शैली के नृत्य और गायन प्रस्तुत होते थे और बाद में “महाप्रसाद” का भोजन बंटता था। वस्तुतः उस दौर में मंदिर सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और महत्वपूर्ण राजनैतिक गतिविधियों के संयुक केंद्र के रूप में विकसित होते थे।

सबसे अंदर के हिस्से जिसमें देवता का विग्रह स्थापित होता था उसे “गर्भगृह”, उसके पूर्व के बड़े हाल को, जिसमें सभाएं होती थी, उसे “जगमोहन”, उसके पहले के हाल को जहां नृत्योत्सव होते थे उसे “नाटमंडप” तथा सबसे बाहर वाले आहाते में जहां महाप्रसाद बंटता था उसे “भोगमंडप” कहते थे। कलिंग शैली के तकरीबन हर बड़े मंदिर में कमोबेश रूप में यही व्यवस्था प्रचलित थी।

मंदिर में प्रवेश से पूर्व भयंकर दुर्व्यवस्था के शिकार एक स्टाल पर मोबाइल जूता बैग इत्यादि जमा कराने की लाइन में लगने के बाद निरपेक्ष और आलसी सुरक्षाकर्मियों और लगातार बीप बीप की ध्वनि पैदा करते एक सुरक्षा द्वार से गुजर कर ही मंदिर में प्रवेश मिलता है। जूता मोबाइल स्टॉल पर दुर्व्यवस्था इतनी थी कि मंदिर में घूमते मेरा मन लगातार इस शंका से जूझता रहा कि बाहर आकर मेरा महंगा फोन मुझे वापस मिलेगा भी या नहीं ? अगर ऐसा हुआ कि वहां कार्यरत कर्मी ने कोई सस्ता सा फोन मेरे हाथ में देकर टरका दिया कि यही मेरा फोन है तो मैं क्या करूंगा। मेरे पास प्रमाण रूप में सिवाय प्लास्टिक के छोटे से 67 लिखे टोकन के क्या है? आजकल क्योंकि मोबाइल में ही बैंक, पैसा, हवाई टिकट, होटल टैक्सी रिज़र्वेशन , सारा व्यक्तिगत महत्वपूर्ण डेटा संचित रहता है तो भाई सच में मोबाइल ही प्राण और भगवान है। जब तक मैैं कदम कदम पर पडों से जूझता अंदर देखता घूमता रहा मेरे प्राण बाहर जूता स्टॉल में ही अटके रहे। जब ज्यादातर पण्डों को अपने अपने महंगे मोबाइल फोनों पर आराम से बतियाते देखा तो और भी कोफ्त हुई। हालांकि भारी नाश्ते के भूख भी नहीं लगी थी पर सच यह है कि इसी चक्कर में “महाप्रसाद” जिसके बंटने में अभी भी काफी समय था, उसे भी भूल गया। सोचा महाप्रसाद तो फिर कभी भी ग्रहण कर लूंगा पर मोबाइल बदला हो गया तो क्या करूंगा?

लंबी लाइन में लग कर मंदिर में प्रवेश किया तो हजारों वर्ष पुरानी “गंध” ने नथूनों को स्पर्श किया। पंडे यहां भी “विशेष पूजा” का आग्रह कर रहे थे। जिन्हें विशेष पूजा करनी होती थी उन्हीं के लिए गर्भ गृह में विधिपूर्वक प्रवेश व्यवस्था थी बाकी सब विग्रह को नमन कर आगे बढ़ते बाहर निकलते जा रहे थे। मैं तो मंदिर के कलात्मक शिलाओं से निर्मित खंभों, ऊपर विशाल छत में पत्थरों पर उत्कीर्ण विभिन्न मोहक आकृतियों को देखकर ही अभिभूत और आश्चर्यचकित होता रहा। अंदर लगातार होती विशिष्ट पूजाओं के घृत दीपों, पुष्पों, इत्रों इत्यादि की सुगंध चारों तरफ फैली थी।

बाहर आया तो मंदिर प्रांगण के खुरदरे पत्थर तपने लगे थे। मंदिर परिसर में ही तकरीबन 150 और छोटे मध्यम आकार के मंदिर चारों तरफ फैले हुए हैं। उन्हीं के बीच से परिक्रमा करता जल्दी जल्दी बाहर आया, जूता स्टॉल पर भीड़ और भी बढ़ गई थी। बारी आने पर टोकन थमाया और जैसे ही मेरा फोन दूर से कर्मी के हाथ में दिखा और मुझ तक पहुंचा दिल धक धक करता ही रहा। आखिर मोबाइल हाथ में आया तो मेरी जान में जान आई।

शाम पांच बजे Uber के ज़रिए तिपहिया पकड़ कर (उबर app के ज़रिए तिपहिया या टैक्सी पकड़ना हमेशा से मुझे आज तक भी बेहतर विकल्प लगता है क्योंकि ड्राइवरों से खामख्वाह की माथापच्ची नहीं करनी पड़ती और रेट भी वाजिब होते हैं) पहुंच गया लिंगराज मंदिर से भी पुराने और बेहद खूबसूरत मुक्तेश्वर मंदिर में जो लिंगराज मंदिर के नज़दीक ही बिंदुसागर तालाब के दूसरे छोर पर स्थित है। मैने सोचा था शायद यहां भी वही भीड़ की रेलम पेल होगी पर लिंगराज मंदिर परिसर के कोलाहल पूर्ण वातावरण की तुलना में यहां का बेहद शांत वातावरण और दिव्य ऊर्जा की अनुभूति से सराबोर है! 

ओडिशा का बहुमूल्य रत्न कहा जाने वाला मुक्तेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित विशिष्ट और जटिल वास्तुकला वाला कलिंग शैली का ही एक महत्वपूर्ण स्मारक है, जिसमें शानदार नक्काशी और खूबसूरत तोरण द्वार है। मंदिर 1100 साल पहले सोमवंशी राजवंश द्वारा बनवाया गया था और अपने अद्भुत और समृद्ध वास्तु के लिए अद्वितीय है। मंदिर की दीवारों पर पंचतंत्र की कहानियों के पात्रों को बेहद खास और बारीक नक्काशी से पत्थर पर उकेरा गया है। लिंगराज मंदिर की तुलना में यह मात्र 35 फीट ऊंचा भले ही हो पर इसमें पत्थर की अत्यंत आकर्षक जालीदार डिजाइन वाली खिड़कियां हैं। असल बात जिसने मुझे गहरे अंदर तक छुआ वह थी अस्त होते सूर्य की रोशनी में सम्पूर्ण मंदिर प्रांगण की गुलाबी आभा।

अगले दिन सुबह निकला जैन तपस्वियों की 2200 वर्ष पुरानी गुफाओं को देखने। स्वभावतः शांति की तलाश में हम एकांत ढूंढते हैं। कभी वनों में तो कभी पर्वतों में। शास्त्रों में वर्णित सनातन धर्म में जीवन के 25, 25 वर्ष के चारों आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास अपना अपना उद्देश्य और महत्व रखते थे। वानप्रस्थ में दो शब्द हैं वन और प्रस्थ ! यानि सब कुछ त्याग कर वन को प्रस्थान की तैयारी।

भुवनेश्वर के एकदम समीप के वन में स्थित आमने सामने की उदयगिरी और खंडगिरी पहाड़ियो पर 2200 वर्ष पुरानी मानव द्वारा चट्टानों को काट कर बनाई छोटी बड़ी 33 गुफाएं हैं। गुफाओं में ब्राह्मी लिपि के शिलालेख, विभिन्न आकृतियां, तीर्थंकरों के भित्ति चित्र, उस समय की महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख है। उस दौर के कलिंग सम्राट खारवेल द्वारा जैन तपस्वियों के लिए इनका निर्माण करवाना बताया जाता है। यदि प्राचीन समय की मनुष्य की अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन पद्धति को जानने समझने में आपकी रुचि है तो इन गुफाओं को अवश्य देखें। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि तकरीबन इसी दौर में 1250 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में बौद्ध धर्म से संबद्ध अजंता एलोरा गुफाओं का निर्माण हुआ।

इन गुफाओं को, जिन्हें प्राचीन समय में गुम्फा कहा जाता था, देखते हुए यह विचार मन में आया कि हमारे पूर्वजों ने हजारों बरस पहले परजीवियों का भोजन न बनने के लिए जीवन की शुरुआत, गुफाओं में छिप कर और वृक्षों पर चढ़ कर ही की थी। संख्या बल और शारीरिक बल में परभक्षियों से कम होने के कारण, अपने अस्तित्व को बचाने का उन दिनों यही तरीका उन्हें सूझा था। इन्हीं गुफाओं में रहते रहते अगले हजारों बरसों में धीरे धीरे पीढ़ी दर पीढ़ी विकासक्रम में उनका इवोल्यूशन हुआ और देखिए आज हम कहां पहुंच गए हैं।

(अगली श्रृंखला में पुरी का समुद्र तट, जगन्नाथ मंदिर, सतपुड़ा की विशाल झील और कोणार्क का सूर्य मंदिर)

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