कब्रिस्तान में कोयल

मधुसूदन आनन्द

दिल्ली में मेरे दफ्तर की खिड़की से कब्रिस्तान के पेड़ दिखते हैं। अखबार के इस दफ्तर में मुझसे मिलने आने वाले लोग पेड़ों को देखते हैं तो कहते हैं, ‘क्या हर भरा दृश्य है सचमुच का।‘ मेरा मन खुशी से भर जाता है। मैं उन्हें नहीं बताता कि इस दृश्य के नीचे कब्रिस्तान है। ये पेड़ वहीं खड़े हैं। मेरे उनके बीच काँच की एक खिड़की है, जिसकी हिफ़ाजत के लिए बाहर की तरफ लोहे की मजबूत ग्रिल लगी है। पर इससे दृश्य में कोई फर्क नहीं पड़ता है। पेड़ हवा में डोलते रहते हैं। कई बार तो वे बिजली के बिजली के ऊँचे खम्भे को बार-बार छूते हैं, जैसे आमन्त्रण दे रहे हों, ‘ताजी हवा में तुम भी डोल लो भाई। हमारी भी जड़ें तुम्हारी ही तरह जमीन में ही हैं। मगर तुम स्थिर रहते हो, प्रकाश बिखेरते हुए। ऐसी भी कैसी निर्मम तटस्थता? हवा में अपने को बहने दो। बारिश में भीगो और भीगने का सुख अनुभव करो।’

वे पेड़ मुझे बार-बार बुलाते हैं। खासकर जब तेज हवा चल रही हो, तो वे बाकायदी आवाज देते हैं। आओ हमारे साथ नाचो। गाओ। बारिश होती है तो भीगने के लिए बुलाते हैं। बार-बार पुकारते हैं। मैं भाव-विह्वल हो जाता हूं। जी करता है उनसे जा मिलूं। लेकिन उसके लिए पहले बिल्डिंग की तीसरी मंजिल से उतरना होगा और फिर कई विशाल बिल्डिंगों के बाद बाजू की सड़क तक घूमकर कब्रिस्तान के प्रवेशद्वार तक आना होगा। मुझे तो यह भी पता नहीं वहाँ से मेरे कमरे की काँच की खिड़की दिखती भी है या नहीं, जिसके पीछे से मैं इन पेड़ों को देखता रहता हूं। मेरे सहकर्मी समझते हैं कि मैं कमरे में बैठा पढ़ता रहता हूं चुपचाप, जबकि बाहर बड़े हाल में वे अगले दिन का अखबार बनाने के काम में लगे रहते हैं।

महीनों से ऐसा ही चल रहा है। रोज़ मैं अपने दफ़्तर से इन हरे-भरे पेड़ों को देखता हूं। इन्हें देखकर खुश होता हूं। इनके बीच जाना चाहता हूं मगर जा नहीं पाता। नहीं, कब्रिस्तान से मुझे कोई डर-वर नहीं लगता। मैं जर्मनी के कोलोन शहर में अपने प्रवास के दौरान पत्नी के साथ एक कब्रिस्तान देखने गया था और उसकी अपूर्व सुन्दरता और शान्ति देखकर दंग रह गया था। वह शायद इतवार का दिन था और जर्मन स्त्री-पुरुष काले कपड़ों में वहां अपने रिश्तेदारों की कब्रों पर फ़ूल चढ़ा रहे थे और मोमबत्तियां जला रहे थे। कब्रे कीमती पत्थरों से ढंकी थी और उन पर बढ़े-बढ़े अक्षरों में जर्मन भाषा में लिखा था। एक जर्मन से मैंने अनुरोध किया कि कृपया पढ़कर बताओ क्या लिखा है। उसने मुझे आश्चर्य से देखा और फिर विदेशी समझकर बताने लगाः डॉ. वोल्फगांग वाइजे जन्मः 7जून 1887, राइन ब्राइटबाख मृत्यु 17जनवरी 1969 कोलोन। सभी कब्रें एक सी नहीं थी। कुछ नई थीं और उनके आसपास पेड़-पौधे भी थे और ताजे खिले फूलों के गुलदस्ते और गमले भी रखे थे। कब्रों के पत्थर सफेद, काले, भूरे, हरे रंग वगैरह वाले थे। उनके आकार और चमचमाहट से पता चलता था कि मरने वाला किसी अत्यन्त सम्पन्न परिवार का रहा होगा। कुछ कब्रें सादी और छोटी थीं। कब्रों तक जाने के लिए पक्की पतली सड़कें थीं जिनके एक ओर पेड़ भी लगे थे। जहां पेड़ नहीं थे वहां कतार में पौधे थे। अन्दर सभी धीरे-धीरे बोल रहे थे। कुछ वहां उदास बैठे तो कुछ वहां रो भी रहे थे।

कब्रिस्तान के ठीक बाहर कैफे में कॉफी का शोर था। वहां कब्रिस्तान से निकलकर लोग कॉफी, चाय पीते। केक, पेस्ट्री और आइसक्रीम खाते। वह कैफे अपनी आइसक्रीम के लिए प्रसिद्ध था और लोग बड़े-बड़े  काँच के गिलासों में आइसक्रीम खाते थे। कब्रिस्तान से बाहर आने के बाद मैंने भी अपनी पत्नी और बच्ची के साथ वहां आइसक्रीम खाई थी। पत्नी खिन्न थी कि हमें बच्ची के साथ कब्रिस्तान नहीं जाना चाहिए था। मगर मुझे कोई बुरा ख़्याल आया ही नहीं। बच्ची ने बड़े चाव से केक खाया था और वह खुश थी कि घर से बाहर है। वह इधर-उधर दौड़ती। जर्मन स्त्रियाँ उसे देखतीं। कुछ खुश होतीं तो कुछ के चेहरे पर नाखुशी साफ दिखाई देती।

लेकिन कब्रिस्तान के अन्दर लोग प्रायः निरपेक्ष थे। इतने निरपेक्ष तो पेड़ भी नहीं थे। न पौधे। न मोमबत्तियां। मुझे लगा कि तमाम मुर्दे भी अपनी कब्रों में  पड़े खुश होंगे कि उनकी सन्तानों ने उन्हें मरने के बाद खुश रखा है, सम्मान दिया है और वे उनसे मिलने आते रहते हैं-फूलों के बुके के साथ।

वह तो काफी बाद में पता चला कि जर्मन लोग अपने जीते जी अपने लिए अपनी कब्रों की व्यवस्था कर जाते हैं, जब मेरे एक सहयोग रजत यादव ने एक किस्सा सुनाया। बोले, ‘कल मेरे साथ एक बड़ा अजीब मज़ाक हुआ। ’ रजत जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम. ए. किया था। बाद में वे आ गए एक जर्मन लड़की से विवाह कर।

उनकी पत्नी गाबी अपने परिवार की अकेली वारिस थी, जिसके पिता हांस गुडबियर ने मां और बाप दोनों का प्यार दिया। गाबी 10 साल की रही होगी जब उसकी जब उसकी माँ की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। तब यह परिवार म्यूनिख में रहता था। गाबी रजनीश के चक्कर में पुणे आई थी, जहां उसे रजत जी मिल गए जो जिज्ञासा में रजनीश की तरफ आकर्षित हो गए थे। रजत की आँखें भी रजनीश की आँखों-सी गहरी थीं। रजत दाढ़ी रखते थे और उनका चेहरा दार्शनिक सरीखा लगता था। बहरहार वे दार्शनिक तो नहीं बन पाए विवाह के बाद एक ईश्वर भक्त जरूर बन गए। अपने बच्चों के नाम उन्होंने ‘आनन्दा’ और ‘सत्या’ जिसपर उनक ससुर हांस गुडबियर को आपत्ति थी। वे जर्मन नाम रखना चाहते थे। काफी दिनों तक उनका मुँह फूला रहा। फिर उन्होंने दूसरी शादी कर ली। वह पत्नी भी गाबी और उनके दोनों बच्चों के लिए भली माँ ही थी। उसकी भी दूसरी शादी हुई थी और इस दूसरी शादी से भी उसे कोई सन्तान नहीं मिली। हारकर दोनों ने गाबी और उसके दोनों बढ़ते बच्चों आनन्दा और सत्या में ही जीने का सहारा ढ़ूंढ़ लिया।

मैंने पूछा, ‘क्या हुआ?’

बोले, ‘कल शाम मेरे ससुर बच्चों से मिलने आए थे। वे बच्चों के बारे में सोचते रहते हैं। अभी पिछले हफ़्ते उन्होंने लकड़ी की एक मेज पर रेलवे स्टेशन, पटरियोंस, पुलों और सिग्नलों का एक जाल बिछाया था। उस पर ट्रेन चलाई थी। बच्चे खुश होक उनसे लिपट गए थे। कहने लगे आज मैंने तीन कब्रों की जगह सस्ते दामों में खरीद ली है। दो जगह बुक कराओ तो तीसरी मुफ़्त मिल रही थी।’ ‘पर तीन क्यों’ रजत जी ने बताया कि मैंने अपने ससुर साहब से पूछा, जिस पर वे बोले, ‘एक अपने लिए और एक तुम्हारी माँ (मेरी सौतेली सास) के लिए लेनी ही थी।’  ‘तो कब्रें तो ठीक हैं मगर यह तीसरी किसके लिए?’ मैंने फिर पूछा, रजत जी ने बताया। जानते हो क्या बोले? तीसरी तुम्हारे लिए। मैं हक्का-बक्का रह गया और फिर हँस दिया तो ससुर साहब भी धीरे-धीरे हँसने लगे। ‘हम भारतीयों को यह विचित्र लगता है। कोई बाप या ससुर  ऐसा समाचार सोच भी नहीं सकता। पर यहाँ तो मेरी वाइफ तक ने कोई एतराज नहीं किया। वह भी हमारे साथ हँस रही थी।’ रजत जी हँसते हुए बताए जा रहे थे।

मैंने पूछा, ‘रजत जी क्या आप वह जगह देख आए हैं?’

बोले, ‘इस वीकएंड में जाना है। बुड्ढा अपने लिए पत्थर आदि भी पसन्द करना चाहता है। उसे दिखाया जाएगा कि उसकी कब्र कैसी लगेगी। यहाँ अन्तिम समय तक कब्र में फेरबदल कराने का प्रावधान रहता है। यह अलग बात है कि कब्र बनती तो मरने के बाद ही है। लेकिन मरने वालों को आभास रहता है कि उसकी कब्र कैसी होगी। ’

मैंने पूछा, ‘क्या आप भी अपने लिए पत्थर वगैरह पसन्द करोगे?’

वे खिसियाकर बोले, ‘कैसी बात करते हो यार। मैं हिन्दू हूं। मेरे दोनों बेटे भी मेरी तरह हिन्दू हैं। हां पत्नी के साथ हम तीनों चर्च भी चले जाते हैं। मगर हैं तो हिन्दू। मेरा तो भई तो दाह संस्कार ही होगा और फिर अस्थियाँ भी गंगा में प्रवाहित करनी पड़ेंगी। मैं अपनी पत्नी को बता चुका हूं। बच्चे तो समझते ही नहीं, बस मुस्कुरा देते हैं। ख़ैर…’

मैंने पूछा, ‘तब उन्होंने तुम्हारे लिए जगह क्यों बुक की?’

वे बोले, ‘बताया तो था दो के साथ तीसरी जगह मुफ्त मिल रही थी। ’

मेरे साथ रजत फिर हँसने लगे थे। मुझे सारी घटना सुनकर ताज्जुब हुआ था मगर रजत जी मस्त थे। मेरे कब्रिस्तान जाकर देखने के पीछे यह भी एक कारण था। रजत जी ने कहा था यार तुम तो अनिश्वरवादी हो, वहीं परिवार को भी ले जाना। जर्मन लोग अपने परिवार को भी वहीं ले जाते हैं।

कब्रिस्तान देखकर मुझे लगा कि आदमी मरने के बाद भी बने रहना चाहता है। कब्र में अपनी हैसियत के अनुसार टीमटाम कराई जाती है। कब्र के पत्थरों के साथ-साथ अपने लिए ताबूत भी वह चुनता है। हिन्दू होने ते नाते मेरा अनुभव दाह संस्कार देखने तक ही सीमित था। हमारे यहाँ आदमी तस्वीरों और स्मृतियों में ही जीवित रहता है। सपने में कोई दिख जाए तो मन को अच्छा लगता है। बुरा सपना देख लो तो मन परेशान हो जाता है। लेकन जर्मनी और यूरोप के दूसरे ईसाई देशों में तो जैसे मरने के बाद भी अपनी पसन्द का मकान होता है। नाम और पते के साथ। माने यहाँ ‘हांस गुडबियर’ मरणोपरान्त निवास करते हैं। जैसे आप जीते जी उन्हें फूल देने आते थे, वैसे ही आप कभी आ सकते हैं। चूंकि कब्रिस्तान मुर्दों की बस्ती होता है, इसलिए उसमें  बस्ती की सी सुविधाएँ हैं। साफ सुथरी पक्की पतली सड़कें। पेड़ पौधे। बैठने के लिए बैंच जिनके ऊपर शेड लगे हों। लैम्पपोस्ट वगैरह। बाहर फूलों और मोमबत्तियों की दुकानें। कैफे। पत्थरों की बड़ी बड़ी शिलायों वाली दुकानें। पत्थरों पर उत्कीर्ण करने के लिए कई स्टाइलों में जर्मन लिपि के नमूने। पार्किंग के लिए जगह। बस और ट्रॉम  के स्टॉप। टेलिफोन बूथ। खम्भों पर करीने से लगी कचरा पेटियाँ। और हाँ अखबार खरीदने के लिए दो बक्से जो सिक्के डालने पर खुल जाते हैं। कोलोने के इस कब्रिस्तान को देखकर हिन्दी के चर्चित कवि रघुवीर सहाय की एक पंक्ति मुझे अनायास याद आई थी, जब मैं अपने परिवार के साथ बाहर निकल रहा था। यह पंक्ति उन्होंने अपनी किताब  ‘सीढ़ियों पर धूप में’ के समर्पण में लिखी थीः

‘वह कितना सुन्दर था जो मैंने पाया और मैं चला आया हूँ और दुखा नहीं हूँ। ’ मुझे लगा कि इस पंक्ति की क्या ऐसी परिणति सोच जा सकती है!

मैं सोच रहा था यहाँ दफ्न जर्मन लोग कितने शान्त और प्रसन्न अपनी कब्रों में कीमती ताबूतों में लेटे रहते होंगे। मज़ाल है कि किसी के भी बारे में कुछ पता चले। सब बड़े और संपन्न लोग। साधारण कब्रों जैसे उस कब्रिस्तान ने अपने शान्त ऐश्वर्य में समाहित कर लिया हो। कोई पता नहीं लगा सकता कि इन कब्रों में कितने हत्यारे लेटे होंगे, जिन्होंने  हिटलर के जमाने में यहूदियों, विकलांगों, हिप्पियों आदि को यातनाएँ  दी होंगी और मोत के घाट उतारा होगा। कब्रिस्तान के उस गढ़े गए प्राकृतिक सौन्दर्य और शान्त वातावरण में अपने-अपने ताबूतों में लेटे ये कल के अपराधी लोग आज पूरी तरह निर्लिप्त होकर अपने-अपने रिश्तेदारों और मित्रों के लिए कैसे महान और श्रद्धा के पात्र बने हुए हैं। ऐसी सुन्दर जगह बनाकर क्या सन्देश दिया जा रहा है? यह प्रेम है या धूर्तता? ये दिखावटी वैभव देखकर ये सोचते होंगे कि वह कितना सुन्दर था जो मैंने पाया और मैं चला आया हूँ और  दुखी नहीं हूँ। मैंने अपने मरे हुए बाप को कितनी अच्छी तरह रखा हुआ है।

 मैं अपने आप में लौट आया हूं। मरने वाले भी जानते थे और उनकी संताने भी कि यह कब्रिस्तान नहीं मानव नीर्मित नखलिस्तान है। इस सुन्दरता क पीछे कहीं कुरूप मानसिकता है। अपराधबोध है। दिखावटी सुन्दरता रचकर अपने परिवार और समाज का मनोबल बनाए रखने की कोशिश। बल्कि परम्परा।

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शायद मार्च का महीना था। मैं दफ्तर पहुंचा ही था और मैंने शीशे पर बड़ा सा पर्दा हटाया ही था कि बाहर क्या देखता हूं पेड़ धीरे-धीरे हवा में हिल रहे हैं। मैंने झांककर नीचे  देखा। वहाँ कुछ मटमैले से घर, ढाबे और चाय पानी की दुकानें थीं। एकाध नाई की दुकान, मोची का अड्डा, मोटरों और स्कूटरों की मरम्मत करने वालों के ठीये वगैरह थे। अखबारी कागज की विशाल रीलें यहाँ वहाँ पड़ी थीं। जब भी कोई  मुर्दा उधर से आता तो वहां एकदम सन्नाटा छा जाता है। मुसलमान लोग भारी संख्या में मैयत में शरीक होते हैं। वे भी चुप रहते हैं। दिन में औसतन चार-पाँच मुर्दे तो वहाँ जरूर लाए जाते होंगे। पर यहाँ तीसरी मंजिल से नीचे का दृश्य नहीं दिखता। लगता है जैसे मैं कोई पक्षी हूं और दूर ऊँचाइयों पर बैठा सिर्फ पेड़ों, खम्भों तथा बिजली और टेलीफोन के तारों को ही देख रहा हूँ। पर कुल मिला कर दृश्य हरा भरा ही लगता है। मुझसे आने मिलने आने वाले लोग कहते  हैः दिल्ली में ऐसी जगह हरियाली बहुत अच्छी लगती है। मैं उन्हें नहीं बताता कि इस हरियाली का उद्गम स्थल कब्रिस्तान है। दिल्ली में लोग कब्रिस्तान के नाम पर मुँह बिचकाते हैं। सब जानते हैं कि यही अन्तिम सत्य है मगर कोई उसे स्वीकार नहीं करता। हरेक की ज़िन्दगी में ग़मों की कमी नहीं है इसलिए यहाँ कोई किसी की ज़िन्दगी तक में झाँकना तक नहीं चाहता। फिर फुर्सत किसे है? हरेक आदमी घोड़े पर सवार है। जल्दी में। दिल्ली के कई मार्गें पर दोनों ओर छायादार पेड़ लगे हैं। वे ग़जब  की शोभा रचते हैं मगर अपनी बसों, कारों पर बैठे लोगों को उन्हें देखने की फुर्सत नहीं होती। सड़कों पर वाहनों की भीड़ है। शोर है। साल में आठ महीने तो गरमी रहती है। लोगों को आते हुए सिर्फ एक दफ्तर और जाते हुए सिर्फ घर दिखता है। कुछ लोग अपने दफ्तर का सिर पर उठाए घर लौटते हैं। बुझे हुए। पके हुए। मेरी स्थिति भी इनसे कोई ज्यादा अलग नहीं है। मेरे पास कार है, अपना मकान है और दफ्तर है। यह कमरा है जिससे पेड़ दिखते हैं। और मैं इसे सांत्वना की बात मानता हूँ। लोगों पर मुझे यकीन रहा है मगर उनसे दुख मिलता है। पेड़ों पर मेरा कोई ख़ास यकीन नहीं है फिर भी पता नहीं क्यों उन्हें देखकर हमेशा अच्छा लगता है। अतः मैं कभी याद नहीं करना चाहता कि ये पेड़ कब्रिस्तान में खड़े हैं। मैं कभी वहीं गया नहीं। जाना भी नहीं चाहता। मैं तो दफ्तर के पीछवाड़े की इस गली में भी नहीं जाना चाहता, जहां गरीब लोग रहते हैं कब्रिस्तान की दीवार पर टीन वगैरह लगाकर छोटे-छोटे घौंसलों में।

तभी सोचने का क्रम भंग हुआ। पेड़ों के पीछे से मन को प्रसन्न करने वाली कोयल की आवाज़ आ रही थी। ‘ कू s s s ऊ कू s  s ऊ…’ वर्षों बाद मैंने यह अद्भभुत आवाज़ सुनी। बचपन में अपने कस्बे में आम की बौर आने के समय बागों से यह आवाज़ आती थी-मन में अजब उमंग भरते हुए। हमारे शहरी जीवन में ये आवाज़ें दुर्लभ हैं। यहाँ न मुर्गे के बांग देने की आवाज़ आती है, न मोर की। सुबह-सुबह कई चिड़ियों की आवाज़ आया करती थी।  गूँ- गुटर गूँ करते कबूतर। चीं चीं करती चिड़िया। मगर अब तो गौरेया भी गायब हो गई है। मैंने तो मेंढक की आवाज़ भी सुनी है और तोते की भी। कौवे हर सुबह काँव-काँव करते थे। यहां ज्यादा से ज्यादा आप कौवों और कबूतरों की आवाज सुन सकते हैं। मोहल्लों में कुत्ते भौंकते हैं और रातों में बिल्लियां लड़ती हैं। घरों की अपनी विचित्र आवाजें होती हैं। पानी की मशीन की आवाज़। मिक्सी और माइक्रोवेव की आवाज़। भिखारी की आवाज़। फेरीवालों की आवाज़। माँ की आवाज़। बच्चों की आवाज़ और खुद टेलीफोन पर अपनी चीखती हुई आवाज़। कोयल की आवाज़ तो सचमुच अद्भुत है। ये सारी आवाज़ें हमें बाँधती हैं लेकिन कोयल की आवाज़ तो हमें भीतर से सींचती है। ‘ कू s s s ऊ कू s  s ऊ s s s। ’

मुझे नहीं मालूम, मैं कैसे खिचता चला गया और कब्रिस्तान चला गया। कोयल की आवाज़ रहृ-रहकर आ रही थी मगर कोयल कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। यह दिल्ली के गरीब मुसलमानों का कब्रिस्तान था-उनके घर और जीवन की तरह ही जर्जर और गरीब। सदियों से कब्रों में पड़े लोग कोयल की आवाज का आनन्द ले रहे लगते थे। कब्रों की कोई तरतीब नहीं थी। ऊँचे-ऊंचे पेड़ों के नीचे यहाँ-वहाँ कब्रें बनी हुई थीं, ज्यादातर कच्ची मिट्टी-ढुये कुछ पक्की के भी। कब्रिस्तान में एक के ऊपर एक आदमी चढ़ा हुआ था। जैसे ये लोग बाहर रहते हैं वैसे ही अन्दर। जो पक्की कब्रें थीं उनमें न कोई स्थापत्य था, न सौन्दर्य। ऐसा लगता था कि तमाम देहों और मिट्टी के ठुहों के बीच पूरा तादात्म्य है। वहाँ पेड़ों के बावजूद घुटन होती थी। कुत्ते इधर-उधर घूम रहे थे और बीच-बीच में भौंकते थे। अधिकांश कब्रों पर न किसी का नाम था, न पता। न जन्म की तारीख न मरण की तिथि। अजब सा वातावरण। जैसे ये अनाम जिए। वैसे ही अब यहां मुर्दों की बस्ती में रहते हैं। मरकर वे और भी अप्रासंगिक हुए। टूटी फूटी कब्रें। किसी के लिए कोई जमीन रिजर्व नहीं। एक मरा तो साल दो साल बाद उसी की कब्र खोदकर आगे-पीछे किसी दूसरे को लिटा दिया जाएगा। इनके लिए किसी के पास जमीन नहीं है। कहीं कोई दीया नहीं, कोई फूल नहीं, कोई अगरबत्ती नहीं, कोई लोवान नहीं। पत्तों पर धूल जो हवा के साथ उड़ती थी। आदमी की मिट्टी और मिट्टी की कोई पूछ नहीं।

मैंने सोचाः यह कैसा न्याय है इस जगत में। यहाँ कब्रिस्तान में कोयल गाती है जबकि वहां कोलोन में कोई चिड़िया तक नहीं थी। यहाँ रविवार को मुर्दों के अलावा कोई नहीं आता जबकि कोलोन में लोगों का तांता लगा रहता था। कैफे में आइसक्रीम खाते अकेले उदास बूढ़े या फिर कुछ भावुक परिवार अपने में डूबे हुए।

कोयल की कूक यहाँ जीवन के प्रति अद्भुत उमंग से भरी हुई है। वह हर किसी  को पुकारती है। मुर्दे जैसे उसके इंतजार में सांस रोके पड़े रहते हैं। मुझे रूसी कवि मारीना त्स्वेतायेवा की एक पंक्ति याद आती है, जो कब्रों में सोये हैं क्या वो सच में मर चुके हैं और जो कब्रों के बाहर हैं क्या वे सचमुच ज़िन्दा हैं

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