स्वामी जी

मधुसूदन आनन्द

उन दिनों में मेरे पिता जी बिजनौर के एक नए स्कूल दयानन्द आदर्शन विद्या निकेतन में प्रधानाचार्य पद पर नौकरी करते थे। वे रोज सुबह 8 बजे की गाड़ी से नजीबाबाद से बिजनौर जाते और रात को 8 बजे वापस लौटते। पढ़ाई में मैं बस ठीक ठाक था। गर्मियों की छुट्टियां खत्म हुई थीं और मैं प्रदेश भर में अपने प्रतिभाशाली छात्रों के कारण प्रतिष्ठित माने जाने वाले मूर्तिदेवी सरस्वती इंटर कॉलेज में छठी कक्षा में दाखिल हुआ था। इससे पहले हमें ए.बी.सी.डी. तक की जानकारी नहीं थी। विश्वनाथ नागर और राकेश कपूर जैसे बचपन के सहपाठी थे। 

नजीबाबाद में ऐतिहासिक मालिनी नदी हमारे देखते-देखते ही एक नाले में तब्दील हो चुकी थी। नदी के एक तट पर टीला था और वहाँ कुछ शिव मंदिर वगैरह बने थे। उन्हीं प्राचीन मन्दिरों में से एक मन्दिर के दो छोटे-छोटे कमरों में स्वामी जी रहते थे। विश्वनाथ और राकेश दोपहर बाद स्वामी जी से पढ़ने जाया करते थे। स्वामी जी से ये अंग्रेजी और अन्य विषय पढ़ते थे। उन दोनों के ही परिवार आर्थिक रूप से कमजोर थे। एक दिन मैं भी अपनी छठी कक्षा का बस्ता लेकर उन दोनों के साथ लद लिया। मैं पहली बार स्वामी जी से मिल रहा था। अपने दोनों सहपाठियों के साथ मैंने भी स्वामी जी के  चरण स्पर्श किये और वहीं चटाई पर दोनों की तरह अपना बस्ता खोलकर पढ़ने के लिए बैठ गया। 

स्वामी जी ने गौर से मुझे देखा और फिर बोले, “ तुम तो आनन्द जी के पुत्र हो, जो बिजनौर में नौकरी करते हैं? ”

“जी स्वामी जी” मैंने कहा। 

“तो तुम्हें तो आनन्द जी पढ़ा सकते हैं?” उन्होंने कहा। 

“वो तो रात के 8 बजे वापस आते हैं। मेरी माता जी इतनी पढ़ी- लिखी नहीं हैं” मैंने कहा। 

“तुम्हारे पिता जी तो खुद मास्टर हैं। उन्हीं से पढ़ा करो” स्वामी जी ने दो टूक बात कह दी।

मैंने अपना बस्ता समेटा और स्वामी जी के चरण स्पर्श कर वापस घर आया। मुझे स्वामी जी का यह व्यवहार उचित नहीं लगा।  रात में पिता के लौटने पर उनसे स्वामी जी की शिकायत की तो पिता जी हँसने लगे। उन्होंने बताया कि स्वामी जी केरल के नम्बूदिरिपाद ब्राह्मण थे। इनका पालन-पोषण इनकी माँ और मामाओं ने किया। पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। ननिहाल में उन्हें सात्विक संस्कार मिले। संस्कृत आदि भाषाओं की पढ़ाई की और फिर मद्रास विश्वविद्यालय से स्नातक (बी.ए.) की डिग्री प्राप्त की। स्वामी जी ने एम.ए.(अंग्रेजी साहित्य) में भी दाखिला लिया था, पर तभी माँ भी चल बसीं। सुबह-शाम पूजा-अर्चना करना, वेदों आदि का अध्ययन करना उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग था। माँ की मृत्यु से वैराग्य उत्पन्न हुआ और सबकुछ का परित्याग करके उन्होंने उत्तर भारत के तीर्थों की तरफ पैदल ही प्रस्थान किया। मथुरा, अयोध्या, काशी, बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्राएं की और एक दिन भरी दोपहर में नजीबाबाद आकर लाहौटी सेठ के बाग में बने शिव मन्दिर में आकर रहने ठहर गए। जब काफी दिन वहाँ रहते हो गए तो सेठ ने एतराज जताते हुए कहा कि स्वामी जी कहीं और ठिकाना ढूढ़ लो। यहाँ बने रहे तो आपका इस मन्दिर पर कब्जा हो जाएगा। बाद में सेठ जी की सन्तानों ने धर्मार्थ ट्रस्ट के नाम पर बने इस बाग को भी बेच खाया। पर स्वामी जी ने तत्काल ही वह मन्दिर छोड़ दिया और अपने शुभचिन्तकों के आग्रह पर नदी के किनारे के इस शिव मन्दिर में बिल्कुल अनमने भाव से रहना स्वीकार किया। 

पिता ने बताया कि स्वामी जी जब केरल में पढ़ते थे तो कितनी ही बार चीज़ें उनकी भी समझ में नहीं आती थीं। संस्कृत के श्लोकों का अर्थ नहीं मिलता था। तब माँ कहती थीं बेटा सुबहनव्यम स्लेट पर सबसे 372 गायत्री  मंत्र लिखो। उसके नीचे खाली जगह छोड़ दो और फिर दोबारा गायत्री मंत्र लिखो। अब मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप करते हुए और उस पर ध्यान केन्द्रित करते हुए खाली जगह पर नज़र डालते हुए नीचेवाले मंत्र तक आओ। एक बार, दो बार, तीन बार जब तक खाली जगह में लिखा उत्तर उभरकर तुम्हारे बंद नेत्रों के सामने न आए। तुम्हारे प्रश्न  का हल या समाधान तुम्हें मिलेगा। मेरे पिता ने मुझसे भी यही प्रक्रिया दोहराने को कहा। पर मुझे कभी कोई ऐसा अपूर्व अनुभव नहीं हुआ। बल्कि हुआ यह कि मैं अपने छोटे भाई के साथ स्लेट पर ही जीरो और गुणा का निशान  बनाकर हार-जीत का खेल खेलने लगा। 

पिता के आग्रह पर स्वामी जी के यहाँ अपने हर जन्मदिन पर मैं केले या काजू खरीदकर ले गया हूँ। स्वामी जी ने हर बार मेरा मन रखने के लिए उसे स्वीकार भी किया, लेकिन न तो कभी एक काजू तक मुझे प्रसाद के रुप में दिया और न ही कोई आशीर्वाद। अलबत्ता आते जाते जब मैं कोरे तख्त पर बैठे स्वामी जी के पैर के अंगूठे को अपने माथे पर लगाकर ऊँ ऊँ उँ कहता तो स्वामी जी भी प्रत्युत्तर में ऊँ ऊँ ऊँ ही कहते थे। न तो उनकी कभी कोई आशीर्वाद देने की मुद्रा बनी और  न ही प्रसाद स्वीकार करने की कोई श्रेष्ठता ग्रन्थि का दिखावा मेरे सामने आया। फिर वे कहते चटाई को लपेटकर अपनी जगह रखना मत भूलना, जो तुम अक्सर भूल जाते हो। यानी अपने जन्मदिन पर जो यह सब जो तुम कर रहे हो, न तो वह मेरे लिए कोई उपहार है और न आभार। यह एक बिल्कुल सामान्य सी व्यावहारिक क्रिया है, जो तुम सिर्फ अपनी खुशी के लिए कर रहे हो। मेरे लिए इसका कोई खास महत्व नहीं है। 

स्वामी जी ने मेरे पिता और उनके एक मित्र को गीता भी पढ़ाई। दोनों मित्र रोज शाम को स्कूली बच्चों के से उत्साह के साथ गीता पढ़ने जाते और स्वामी जी की सांध्य-वंदना से पहले पहल वापस  आ जाते। कभी मुझे स्वामी जी ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह आदेश या निर्देश नहीं दिया कि सुबह-शाम पूजा-अर्चना किया करो। अलबत्ता एक बार गर्मियों की छुट्टियों में उनके यहाँ जाने पर उन्होंने पूछा था कि इन छुट्टियों में तुम कौन सी किताबें पढ़ रहे हो। जब मैंने बताया कि कोई भी नहीं तो उन्होंने कहा कि यह तो उचित नहीं है। तुम्हें कुछ तो पढ़ना ही चाहिए-कोर्स के अलावा। स्वामी जी ने बताया कि वे अपने बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में पढ़ने के लिए सारे साल पैसे जोड़ते औऔर एक से एक से एक चर्चित पुस्तकें मंगाते थे। 

तब भी मेरा पुस्तकें पढ़ने का कोई नियमित संस्कार नहीं बना। बाद में पत्रकारिता में आने पर मैंने पढ़ना-लिखना जरूर शुरू किया। मगर ज्यादातर साल मैंने यों ही गवां दिए। हमारे कस्बे में स्वामी जी के  कुछ शुभचिंतक शुरू से ही  रहे, जब आजादी से कुछ साल पहले यह  सुदूर केरल से हरिद्वार के पास स्थित हमारे कस्बे नजीमाबाद में रहने आए।  वे लोग दूसरे या तीसरे दिन नार्दर्न पत्रिका या ऐसा ही कोई अंग्रेजी का अखबार स्वामी जी के लिए लाते थे। स्वामी जी की आँखें तब तक कमजोर हो गई थीं। वे मैग्नीफाइंग ग्लास की सहायता  से दो-तीन दिन पुराने अखबारों को पढ़ते। उनके पास लकड़ी का एक बड़ा सा बक्सा था, जिसमें संस्कृत के ग्रन्थ रखे रहते थे। एक या दो बार उस बक्से को खोलकर मैंने स्वामी जी के लिए उनकी जरूरत की किताब निकालकर दी है। मैं संस्कृत के उन ग्रन्थों को देखकर अवाक् रह जाता हूं।

चीज़ों के नाम पर स्वामी जी  के पास एक कांच का गिलास और एक भोथरा सा चाकू था। कपड़े धोने के साबुन की टिक्की। दो या तीन लंगोट, दो गेरुआ धोतियां, लकड़ी का किताबों का सन्दूक, एक तख्त, एक बैठने की चौकी, एक तिपाई, चटाइयां, एक काला कम्बल वगैरह नगण्य सा सामान था। उन दिनों टीला काफी निर्जन सा था। मन्दिर के अन्दर एक काआँ था। एक बार जाड़े के मौसम में कोई उनका कम्बल उठाकर ले गया तो स्वामी जी ने फिर आजीवन कम्बल नहीं लिया। ज्यादा जाड़ा पड़ने पर वे कुएं की हौज या टंकी में बाल्टी से खींचकर पानी भर लेते और ठंडे पानी में बैठकर ध्यान करते और शीत भगाते। यह सब  खुद मैंने देखा है। मुझे तब बहुत ताज्जुब होता था कि भला ऐसे भी कहीं जाड़ा भागता है। बाद में दिल्ली में बस जाने के बाद मैंने शायद डिसकवरी चैनल एक विदेशी पत्रकार द्वारा बौद्ध मठों और भिक्षुकों पर बनाई गई एक डॉक्यूमेंट्री देखी थी। इसमें एक बौद्ध मठ में एक साधु शून्य से कहीं नीचे के तापमान पर रात को खुले  में आसमान के नीचे सिर्फ एक लंगोट पहने और एक गीली चादर को  लपेटकर  लेट  जाता है। उसकी गतिविधियों पर ध्यान रखने के लिए कैमरे लगे हुए हुए हुए हैं। सुबह सूरज उगने पर वह उठता है। चादर को झाड़कर लपेटता है और मठ के भीतर चला जाता है। उसका बाल भी बांका नहीं होता। बाद में स्वामी जी भिक्षा करने तक के लिए मन्दिर से बाहर नहीं निकलते थे। वहीं मन्दिर में ही उनके भक्त या शुभचिंतक दूध या फल ले जाते थे जो दिन में सिर्फ एक बार ही ग्रहण करते थे। इस कारण उनका नाम ही फलाहारी बाबा पड़ गया था। लम्बे खिचड़ी बाल कमर के ऊपर नंगा दमकता शरीर। स्वामी जी जाड़े की दोपहर में धूप सेंकते और पढ़ते रहते। सौम्यता, गाम्भीर्य और तटस्थ करुणा की वे निर्भीक त्रिमूर्ति थे। मुझे हर बार यही लगता जैसे वे मेरे  सगे बाबा हों। न कोई ज्ञान का प्रदर्शन न कोई अहं का पटाक्षेप। सादा, साधारण, सात्विक माहौल। स्वाध्याय करता एक संत। 

स्वामी जी में निश्चय ही कुछ ऐसा अतिरिक्त सा था, जिसका कम से कम मेरे पास कोई जवाब  नहीं है। स्वामी जी उस व्यक्ति से दूध लेते थे, जिसके पास कोई अपनी दूध देनेवाली  गाय हो। एक बार एक सज्जन की गाय ने दूध दुहते समय लात मार दी और पर्याप्त दूध नहीं दिया। तो उसने बाजार से दूध खरीदकर स्वामी जी को पहुँचाया। उसे देखते ही स्वामी जी बोले, ‘जब गाय ने लात मार दी थी त बाजार से दूध खरीदकर लाने की क्या जरूरत थी? इसे वापस ले जाओ।’ स्वामी जी की बात सुनकर वह व्यक्ति दंग रह गया। पिता जी जानते थे कि लल्लू सोडे वाला नामक यह व्यक्ति जबसे उसकी गाय ब्याही थी, स्वामी जी से दूध लेने का आग्रह कर रहा था। आखिर स्वामी जी मान गए पर जब गाय ने लात मार तो उसने दूध बाजार से खरीदा और उसी समय पर दूध को इसी तरह ढककर उसी बर्तन में स्वामी जी के लिए वह दूध ले गया। तो स्वामी जी को देखते ही पता चल गया और उन्होंने दूध वापस कर दिया। मेरे पिता को उसने यह सारी बात बड़ी पीड़ा से सुनाई। पिता नत मस्तक थे। उसका कहना था कि स्वामी जी अन्तर्यामी हैं और यह बात स्वाभाविक रूप से उनके मुँह से निकल गई। उनका आशय शेखी बघारने से नहीं था। 

हमारे कस्बे में होम्योपैथी के एक चमत्कारिक डॉक्टर थे। डॉ. रमेशबल कृष्णाप्रेम सूफी। उनका परिवार जमींदारों का परिवार था। एक बार अपने यहाँ पारिवारिक उत्सव में उन्होंने स्वामी जी से अपने घर आकर भोजन करने का आग्रह किया। स्वामी जी मान गए क्योंकि डॉ. सूफी की उन्हें नजीबाबाद  में रहने के लिए तैयार करने में बड़ी प्रमुख भूमिका  रही थी। स्वामी जी को भी औरों की तरह पत्तल और मिट्टी के सकोरों में पंगत में भोजन परोसा गया। भोजन में हरी मिर्च काफी ज्यादा थीं जो स्वामी जी नहीं रखते थे। स्वामी जी ने पंगत में बैठकर सबके साथ सामान्य रूप से भोजन किया। जैसे वे सबका मान रख रहे हों। बाद में प्रक्षालन के लिए उन्होंने एक बाल्टी पानी और एक लोटा मंगाया। उन्होंने दो लोटे पानी पिया और सड़क पर नाली के किनारे उल्टी कर दी। उल्टी में सिर्फ पानी और हरी मिर्च के टुकड़े देखकर सभी लोग स्तब्ध रह गए। मगर स्वामी जी कोई चमत्कार दिखाने नहीं गए थे। सब सहज सामान्य था। उन दिनों स्वामी जी कस्बे में आए ही आए थे। एक मुस्लिम परिवार ने उन्हें रोटी के साथ मछली  भिक्षा में दी। स्वामी जी ने भिक्षा हाथ में ली और गहरी पीड़ा के साथ मछली को नदी में बहा दिया। इसके बाद  उन्होंने अगले रोज तक उपवास किया जैसे अपने से कोई अपराध अनजाने ही हो गया हो! संन्यासी के लिए क्या खाद्य और क्या अखाद्य, यह उनके बचपन के संस्कार का हिस्सा था। 

उन दिनों मेरे छोटे भाई के दांतों पर कुछ भूरे काले धब्बे उभर आए थे तो स्वामी जी ने उससे कहा कि रोज  सवेरे एक आंवला खाया करो और फिर उसके ऊपर पानी पिया करो। उसने हिदायत पर अमल करना शुरू किया और ठीक हो गया। उसके दांत  सचमुच मोती की तरह चमकने लगे। स्वामी जी ने पूरे भारत की दो बार  तीर्थ यात्राएं करने के बाद हरिद्वार के इस पार जिला हमारे बिजनौर में तराई के जंगलों में पेड़ों पर अपने ठहरने का ठिकाना बनाया था, जहाँ हाथी, बाघ, गुलकार आदि हिंस्र पशु बहुतायत में पाये जाते थे। स्वामी जी दिनभर पेड़ों पर चढ़े रहते और पास बहती कलकल करती गंगा नदी का पानी पीते और भूख लगने पर आंवले खाते। वहाँ से जब वे हमारे कस्बे की ओर आ रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक कच्ची सड़क के दोनों ओर एक-एक बाघ खड़ा है। स्वामी जी ने बताया कि पहले तो उन्हें कुछ डर लगा। वे अकेले थे। एक हाथ में लाठी और दूसरे में कमंडल था। पर शीघ्र ही उन्होंने उस पर काबू पा लिया और लाठी टेकते हुए साफ सड़क पर आगे बढ़ गए। उनके मन ने कहा कि मृत्यु तो एक दिन आती ही है अगर बाघों का भोजन बनना ही है तो बन ही जाएं। पर उन पर कोई हमला नहीं हुआ।

फिर एक दोपहर वे नजीबाबाद आ गए जो हरिद्वार के समीप ही है। हरिद्वार में संयोग से उनकी भेंट केरल के अपने एक निकट के रिश्तेदार से हुई, जिसने उनके ननिहाल का हाल सुनाया और चलते वक्त कुछ रुपए उन्हें दिए। उनके एक मामा त्रिवेंद्रम में पद्मनाभ के ऐतिहासिक और भव्य मन्दिर के पुजारी थे और नाना स्थानीय वैद्य थे। तब सांपों का केरल में बहुत प्रकोप था। नाना जी सांपों के काटे का इलाज करके लोगों में काफी लोकप्रिय हो गए थे। फिर पद्मनाभ के ऐतिहासिक मन्दिर से भी उनका कुछ सम्बन्ध था। स्वामी जी सब कुछ छोड़छाड़कर आए थे। उनका मोह तो रहा होगा मगर बंधन नहीं रह गया था। उन्होंने पहला काम हरिद्वार में यह किया कि रिश्तेदार जो रुपए दे गए थे उसे वापस केरल मनीऑर्डर कर दिया। वे कहते थे कि मैं संन्यास ले चुका था। माँग कर खाता था। जहाँ जगह मिल जाए, वहाँ सोता था और खूब भजन करता था। तीर्थों की यात्राएं भी मैंने पैदल की थीं। उन रुपयों की मुझे कतई जरूरत नहीं थी, सो मैंने लौटा दिए। यह बताकर स्वामी जी आनन्द से भर उठे थे। वे हँसे। निर्मल हँसी, जिसमें एक आश्वस्तकारी आवाज थी। न पीछे लौटना है न देखना है। मगर मैं जानता हूं कि केरल कहीं न कहीं उनके अवचेतन में जरूर अटका रह जाता था। उनकी माँ और मामा बार-बार उनकी स्मृतियों में लौटते थे। वे हिन्दी में बात करते थे पर अखबार अंग्रेजी का पढ़ते थे। संस्कृत और मलयालम पर उन्हें गर्व था तो तमिल और तेलुगु भाषाएं भी वह जानते थे। बेशक कोई पूर्वाग्रह नहीं बचे थे। या शायद  सच ह कि आदमी अपनी जगहें नहीं भूलता। 

एक बार मेरी माँ को पता चला कि मैं मुंबई रहते हुए सिगरेट पीने लगा हूं। खूब फिल्में देखता हूं और पारिवारिक संस्कारं से च्यूत हो रहा हूं। माँ बहुत दुखी हुई। जब मैं किसी त्यौहार पर उनसे मिलने आया तो माँ ने बहुत चुपचाप संकल्प किया कि स्वामी जी को बताना भी न पड़े और मुझे खुद ही समझाएं। माँ मेरे साथ स्वामी जी के दर्शनों के लिए टीले पर स्थित मन्दिर तक आई। स्वामी जी ने उनके सामने पूरी तटस्थता से बिना किसी भूमिका के मुझसे कहा, ‘जैसे तुम आजकल सिगरेट पीने लगे हो। तुम क्या समझते हो, तुम्हारी माँ नहीं जानती। क्या माँ अनुपस्थित होती है जब तुम सिगरेट पी रहे होते हो? माँ की जान तुममें पड़ी रहती है उसे तुम्हारी हर हरकत का भान हो जाता है’ । अतः जब भी सिगरेट सुलगाओ तो जान लो दूर बैठी माँ यहीं से सब कुछ देख रही है। उसका कलेजा जल  रहा है। फौरन वह सिगरेट फेंक दो। माँ का मुस्कुराता चेहरा तुम्हें आशीर्वाद दे रहा होगा। स्वामी जी ने यह भी कहा कि हम जो दंडी स्वामी कहलाते हैं उसका आशय तुम समझते हो? साथी भाव से कोई हम पर निगाह रख रहा है वो तुम भी समझो कि माँ साथी भाव से हमेशा तुम्हारे साथ खड़ी रहती है। स्वामी  ने  और भी एक दो बार मुझे बिना किसी भूमिका के ऐसे ही सावधान किया। जब वे इस दुनिया को छोड़कर चले गए तो तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी में मेरे सपने में आए। जहाँ मैं रेडियो में नौकरी करने गया था। सपने में उन्होंने कसकर अपनी छाती से मुझे लगा लिया।  मुझे लगा कि मुझे उनकी धड़कन तक सुनाई दे रही है। फिर उन्होंने मेरे कान में यह मंत्र पढ़ाः

‘ उतिष्ठत। जागृत। प्राप्य कर बरन्निबोधत’

(अर्थात उठो, जागो और ध्येय की प्राप्ति तक रुको मत)

मैं स्वीकार करता हूं  कि मैं सुपात्र नहीं था। न तो मैं अभी तक उठा हूं, न जागा  हूं और न मैंने जानकार और श्रेष्ठ पुरुषों के बीच रहकर कोई ज्ञान प्राप्त किया है। मैं नितान्त सांसारिक पुरुष हूं और अपने मित्रों और परिवार से दुनियावी ज्ञान ही सीखता आया हूं। लेकिन संकट के समय स्वामी जी पता नहीं क्यों मुझे संभालने आ जाते हैं। मैं पूजा, अर्चना, ज्ञान, ध्यान की ओर नहीं मुड़ता था बस चुपचाप एक डरे हुए मनुष्य की  तरह वह सब करने का प्रयास करता हूं जो मुझे थोड़ा बहुत आता है। यानी पढ़ना और लिखना। काश मैं भी स्वामी जी की तरह दो टूक और निर्भय मनुष्य होता। स्वामी जी का रास्ता भी मैंने देखा होता। 

बाद में मैंने अपने इस स्वप्न के बारे में पिता को पत्र लिखा था। पता चला कि स्वामी जी तीन दिन से  बेहोश थे। शाम उनकी कुटिया पर लौटने के बाद उन्होंने घर  पर बताया था कि आज की रात स्वामी जी के लिए बड़ी कठिन होने वाली है। दो लोगों की रात की ड्यूटी लगाई गई है। पिताजी के घर लौटने के बाद राजाराम जी चक्की वाले दौड़ते-भागते आँसुओं से भीगा चेहरा लिए पिताजी को बुलाने आए। उन्होंने बताया कि मास्टर साहब आपके घर लौटने के कुछ देर बाद ही स्वामी जी अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठे। उन्होंने वहीं समाधि लगाई। तीन बार ओंकार मंत्र का उच्चार किया और उसी मुद्रा में पीछे की ओर गिर पड़े। जैसे उन्हें पता चल गया हो कि जाने का समय अन्तिम रूप से आ गया है और उन्हें जानते हुए पूरे होशोहवास में ही जाना है।

उसी मुद्रा में स्वामी जी को समाधि दे दी गई। वह बिल्कुल मामूली सी समाधि उसी मन्दिर में स्थित है, जहाँ आज भी कोई अनुयायी शाम को दीया बाती कर आता है। 

ज्यादातर  लोगों को मालूम ही नहीं कि स्वामी जी कौन थे, कहां से आए थे। क्यों उन्होंने नजीबाबाद को चुना था। बहरहाल16मार्च 1980 को रात 11 बजे के करीब स्वामी जी अपने मुट्ठी भर शुभचिन्तकों को को रोता-बिलखता छोड़कर अन्तिम यात्रा पर चले गए। उनके जाने के बाद एक अन्तर यह आया कि उस इलाके के प्रायः सभी मन्दिरों का कायान्तरण हुआ और नदी तट का वह उजाड़ इलाका एक सात्विक धार्मिक स्थल के रूप में धीरे-धीरे तब्दील होने लगा। वहाँ रामलीला का मंचन तो पहले से ही होने लगा था हालांकि स्वामी जी इतने आत्म  केन्द्रित थे कि मन्दिर से बाहर निकलकर उस तरफ कभी उन्होंने झांका तक नहीं। चाहे वहाँ रामलीला हो रही हो या किसी नेता का भाषण। वह जीवन भर गायत्री मंत्र और  ओंकार का जाप करते रहे। बीत रागी संत।  स्वामी जी ने गीता की अपनी टीका भी वहाँ रहते लिखी थी। उनके शुभचिंतकों ने उसे  छपवाने के लिए जब आग्रह किया तो उन्होंने पांडुलिपी को मालिनी नदी में विसर्जित करा दिया और बताया कि यह मैंने सन्तोष के लिए लिखी थी। कोई यश पाने के  लिए नहीं। वे न ही कोई नियमित उपदेश देते थे। गुरुपूर्णिमा आदि पर कोई दर्शन करने कभी आता भी था तो उसे निराश लौटना पड़ता था। मेरे पिता और उनके मित्र यमुनाप्रसाद कात्यायन को भी उनके अनुरोध पर गीता पढ़ाई थी पर उन्हें भी संन्यास से सम्बन्धित श्लोक उन्होंने नहीं पढ़ाए और तर्क दिया कि यह तो  सद्गृहस्थों का विषय ही नहीं है। उनका आशय यही था कि जीवन जिस रूप में मिला है, उसी में रहते  हुए अपनी मुक्ति की तलाश करो। नहीं तो दुनिया का कारोबार कैसे चलेगा? न उन्होंने कोई मठ या आश्रम बनाया और न ही कोई शिष्य!

 

 

 

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