इस्तांबुल:  दो महाद्वीपों का संगम

केशव चतुर्वेदी

Keshav Chaturvedi

दो महाद्वीपों के बीच फैली तुर्की की राजधानी इस्तांबुल बहुत सुन्दर है और इसका इतिहास रोमांचक है। जहाँ एशिया और यूरोप महाद्वीपों की संधि होती है वहीँ समुद्री रास्ते के किनारे ये बसा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस्तांबुल इसका नया नाम है जो करीब सौ साल पुराना है वरना इसके कॉन्स्टेंटिनोपल कहा जाता था और हिंदी एवं उर्दू भाषी इसे कुस्तुन्तुनिया के नाम से जानते थे। असल में इस शहर के पिछले 1500 साल में तीन नाम हुए। पहला था बाइज़ेनटीयम, फिर रोमन साम्राज्य के सम्राट कोनस्टैनटिन के नाम पर कोंस्टनटिनोप्ल और फिर सौ साल पहले इस्तांबुल हो गया। शहर को अगर ठीक से देखना है तो जितना हो सके पैदल चलिए और एक बार फैरी की सवारी ज़रूर कीजिये। इसके बाद पुराने शहर में ग्रैंड बाजार, आया सोफ़िया और ब्लू मोस्क देखने लायक जगह हैं। आया सोफ़िया वास्तु का एक शानदार नमूना है और पश्चिमी सभ्यता में इसकी एक अगल हैसियत है। ये पहले एक गिरजाघर था बाद में मस्जिद में बदल दिया गया और फिर एक संग्रहालय में और आज एक बार फिर इसे मस्जिद में बदल दिया गया है। जब हमने उसे देखा तब वो संग्रहालय था। पूरे इस्तांबुल में सारी मस्जिदें आया सोफ़िया की नक़ल पर ही बनी हैं। पूरे शहर में घूमने के लिए ट्राम, बस और टैक्सी का बड़ा जाल बिछा हुआ है। लेकिन फेरी भी यहाँ एक सस्ता और मज़ेदार तरीका है घूमने का। असल में फेरी की सवारी से आप शहर के वैभव को ढंग से देख सकते हैं। इसके बाद ओटोमन या उस्मान साम्राज्य की शक्ति का केंद्र रहा तोपकापी महल भी देखने वाली जगह है।  इस्लाम के अनुयायियों के लिए ये एक बहुत ही खास जगह है क्योंकि पैगंबर मोहम्मद से जुड़ी कई वस्तुएँ यहाँ के संग्रहालय में रखी हैं और उन्हें देखने के लिए लंबी लाइन लगती है। इसमें तीन से चार घंटे तक लग सकते हैं। 

मैं और मेरी पत्नी को शहर में पहुंचे एक दिन हुआ था कि उनकी तुर्क सहकर्मी ने बताया कि यहाँ जूता पॉलिश करने वालों से सावधान रहना चाहिए।  वे आपके बगल से निकलते समय अपना ब्रश गिरा देते हैं और अगर आप उनका ध्यान उस तरफ दिलाएं या उन्हें उठा कर दें तो वे आप पर ही चोरी का इलज़ाम लगा देंगे और फिर अचानक वहां उनके दो तीन साथी आ जाएंगे और फिर पैसे लिए बगैर नहीं छोड़ेंगे। हमने सुना बात बड़ी अजीब और मज़ाकिया लगी और आई गई हो गई। दो दिन बाद हम दोनों अपने होटल से बाहर निकल कर सीढ़ियों से उतर रहे थे। थोड़ी दूर पर दो जूते पॉलिश करने वाले बैठे थे। उनमें से एक उठा और हमारी तरफ बढ़ने लगा हमें पार करते हुए उसने इतनी सफाई से अपना ब्रश गिराया लगा हो न हो उससे गलती से गिरा होगा और मैं बस झुक कर उसे उठाने ही वाला था कि मुझे उस महिला की चेतावनी याद आ गई और मैं अपनी पत्नी के साथ बिना उस आदमी की ओर देखे आराम से सीढ़ियां उतरता रहा।

लेकिन मेरे मन में अभी भी यही था कि शायद उस आदमी का ब्रश गलती से गिर गया है।  मुझे उसे कम से कम बोल तो देना चाहिए था। लेकिन जैसे ही मैंने मुड़ कर देखा तो पाया वही आदमी  मेरी तरफ देखते हुए लौटा और अपना ब्रश उठा कर वहीँ अपने साथी के पास आ कर बैठ गया जहाँ से वो उठ कर मेरी तरफ चला था और मुझे लगा चलो बाल बाल बच गए। वरना अच्छा खासा बवाल हो जाता। तो इस्तांबूल में पर्यटक को होने वाले खतरे के नाम पर बस इतना ही है।

हर बड़े शहर का एक कोना ऐसा होता है जो उस शहर की जान होता है और शहर उस पहचान से खुद को जोड़ने के लिए मज़बूर हो जाता है। ये कोना कोई बाजार, ईमारत या सड़क हो सकती है। इस्तांबुल की एक ऐसी ही सड़क की बात करते हैं।

 

यहाँ के पर्यटक स्थलों को छोड़ कर बात शहर और उसकी ज़िन्दगी की करें तो तकसीम स्क्वायर और इस्तिक़लाल स्ट्रीट पूरे शहर की जान है। अगर आपको इसका पूरा अनुभव  करना है तो तकसीम स्क्वायर स्थित होटलों में ठहरना चाहिए। रहने को आप पुराने शहर में भी रह सकते और दिन में यहाँ बहुत चहल पहल भी रहती है और कई पुराने स्मारक भी पास में ही हैं लेकिन रात को ये जगह सुनसान हो जाती है। इसीलिए मैं आपसे तकसीम स्क्वायर में रहने की ज़िद कर रहा हूँ।

यहाँ करीब छह सड़कें आ कर एक बड़े खुले इलाके में मिलती हैं।  लेकिन इनमें एक सड़क इस्तिक़लाल स्ट्रीट की बात निराली है। रात जैसे जैसे गहराती है इस सड़क की रौनक उतनी ही बढ़ती जाती है। यहाँ शोरूम हैं, मिठाई और आइसक्रीम की दुकाने हैं, नाईट क्लब हैं और इससे सटी गलियों में रेस्टोरेंट हैं। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि ये तो और भी शहरों में होते हैं तो इसमें कौन सी नई बात है? पहली बात तो है तुर्की के विश्वविख्यात आइसक्रीम वाले। हर आइसक्रीम वाला आपको आइसक्रीम देने से पहले इतने करतब दिखाता है कि आप हैरान रह जाते हैं। आपको लगता है आपने आइस क्रीम का कोन हाथ में पकड़ लिया और तभी वो हाथ से निकल जाता है।  लगातार ये छेड़छाड़ चलती रहती है और आप ज़्यादा चिढ़ते नहीं हैं तो ये खेल थोड़ी देर तक चलता है।  दुनिया भर से लोग आ कर इसका वीडियो बनाते हैं। ये खास इस्तांबुल की अदा है। दूसरा छोटे से छोटे रेस्टोरेंट के कर्मचारी साफ़ सुथरे कपड़े पहनते हैं और सबकी दुकाने एक दूसरे से जुडी होने के बावजूद कोई कहासुनी या पार्किंग को लेकर चिकचिक नहीं होती।  साथ ही एक दूसरे की दुकान के कर्मचारी किसी भी दुकान से जाकर चाय निकाल के पी लेते हैं।  कोई भी मालिक आपत्ति नहीं करता ।

इसके अलावा यहाँ पर यूरोप की तरह लड़के लड़कियाँ अपने अपने म्यूजिक बैंड बना कर रात में सड़क के किनारे गाना गाते हैं, लोग उन्हें कुछ पैसे दे देते हैं या सिर्फ खड़े सुनते रहते हैं, कुछ लोग नाच भी लेते हैं, चारों ओर माहौल ऐसा होता है जैसे सब एक तन्द्रा में हैं।  इतनी भीड़ लेकिन कोई धक्का मुक्की नहीं। इतनी शराब और शबाब लेकिन कोई छेड़छाड़ या बदतमीज़ी नहीं। लड़कों के झुंड, लेकिन उन्हें देख कर कोई घबराहट नहीं। ऐसा लगता है जैसे सभी को रात की ज़िन्दगी जीने और मस्त रहने का सलीका आता हो।

 मुझे याद है एक दिन इस्तिक़लाल स्ट्रीट  में एक लड़का तुम्बा या अफ़्रीकी ड्रम बजा रहा था।  लोग उसे सुन रहे थे तभी एक बूढी महिला, उसकी दो जवान बेटियां वहां से गुज़रीं जिनमें एक बेटी अपने बच्चे को प्रैम में लिए हुए थी। तुम्बा की धुन ऐसी थी कि सबका थिरकने का मन कर रहा था और कुछ लोग उसकी सहमी सी कोशिश भी कर रहे थे।  तभी उन दो लड़कियों में से एक लड़की आगे बढ़ी और उसने बेली डांस शुरू कर दिया।  लोग ताली बजा कर उसका साथ देने लगे वो अगले दस मिनट तक नाचती रही और क्या गज़ब का नाची। थोड़ी देर में तुम्बा बजाने वाला रुका साथ ही उस लड़की का नाचना बंद हुआ और वो अपनी माँ, बहन और उस बच्चे के साथ आगे बढ़ गई।  बाकि लोग भी अपने काम पर लौट गए।  न किसी ने सीटी बजाई, न कोई फिकरा कसा, न लड़के उस लड़की के पीछे पीछे ये कहते हुए चलने लगे कि अपना नंबर दे दो या मेरे साथ सेल्फी खिचवा लो।उस लड़की को जाते हुए देख मुझे दिल्ली का एक किस्सा याद आ गया जब मैं एक विदेशी महिला को शाम को इंडिया गेट घुमाने ले गया था। कुछ जवान लड़कों ने दो तीन बार मेरे पास आ के कहा वे उस महिला के साथ सेल्फी खिचवाना चाहते हैं।  मना करने के बावजूद वो पीछे पड़े रहे और हमें फिर वहां से लौटना पड़ा।  उस दिन मुझे इस्तिक़लाल स्ट्रीट की वो सहजता बड़ी प्रिय लगी और यही सहजता हमारे समाज को अभी सीखनी है।

 

अग्रेंज़ी में एक अभिव्यक्ति खूब चलती है — पैलेस इंट्रीग यानि महल में होने वाले षड्यंत्र।  मुझे लम्बे अरसे से ये जानने के चाह थी कि महल हमेशा षड्यंत्र का ही केंद्र क्यों होते हैं? लेकिन मुझे कभी इसका सही जवाब नहीं मिला। फिर मेरा जाना हुआ इस्तांबुल। ये शहर करीब 600 साल ओटोमन या उस्मान साम्राज्य का केंद्र रहा है।उस दौर में  साम्राज्य की सारी ताकत एक महल में बस्ती थी जिसका नाम है तोपकापी महल। यहाँ पहुँचने पर आपको एक बड़ा आहता मिलता है जिसके बाएं ओर हरम है और दाएं ओर शाही रसोई।  इसके बाद एक गेट से आप अंदर जाते हैं तो सम्राट की लाइब्रेरी, उसका दीवान-ए -आम और कुछ बाग़ हैं।  एक नज़र में तो महल कोई खास नहीं लगता। एक आधुनिक रिसॉर्ट होटल जैसा ही दीखता है। लगता ही नहीं कि ये इस्लामिक युग के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य का केंद्र था। इससे ज़्यादा बड़े और आकर्षक महल तो भारत में मुगलों ने बनाये थे।  लेकिन गौर से देखने और यहाँ की कहानियां सुन कर पता चलता है  क्यों ये जगह इतनी ख़ास है?

 

महल में दी गई जानकारी के मुताबिक महल के हरम में सिर्फ राजमाता होती थीं जो हर हफ्ते इस्तांबुल में पूरे साम्राज्य से लाई गई लड़कियों की मंडी में जाती थीं और वहां से राजा के लिए एक लड़की चुन कर लाती थीं।  लड़की कुछ हफ्ते राजा के साथ रहती थी और अगर वो गर्भवती हो जाती तो उसे राज महल में ही एक बैरक में रखा जाता था। नौ महीने बाद अगर वो लड़की को जन्म देती तो उसे पैसा और कुछ सामान दे कर साम्राज्य के उस कोने में भेज दिया जाता जहाँ से वो आई थी। लेकिन अगर उसके लड़का होता तो फिर उसे महल के हरम की पहली मंज़िल पर एक कमरा दिया जाता और ये कहा जाता की ये राजा की प्रिय है। ओटोमन साम्राज्य का ये रिवाज मुझे बहुत अजीब लगा जहाँ रानी और पटरानी जैसी कोई चीज़ नहीं थी। सिर्फ राज माता और तमाम बांदियाँ। इसका एक कारण ये भी  हो सकता है कि ओटोमन सम्राट खुद को दुनिया का बादशाह समझते थे और इस कारण उन्हें लगता था कि कोई और राजवंश इस काबिल नहीं है कि उससे विवाह के सम्बन्ध बनाये जाएं।

दूसरी कहानी और भी दिलचस्प है। कितनी सच है ये तो नहीं पता क्योंकि दुनिया भर के गाइड कितना सच और कितनी गप्प हांकते हैं ये आप नहीं बता सकते फिर भी कहानी बड़ी गज़ब की है। इसके मुताबिक जब ओटोमन राजा ये तय करता था कि उसे अब अपना उत्तराधिकारी चुनना है तो वो चुपचाप एक लड़के के लिए मन बना लेता था। और फिर सभी राजकुमारों को एक रात राजा के महल पर खाने के लिए बुलाया जाता था।  राजकुमार शहर के अलग अलग हिस्सों में ठहराए जाते थे। एक निश्चित समय पर चुने हुए राजकुमार को बहुत ही गोपनीय ढंग से महल में सम्राट के सामने लाया जाता था।  सम्राट के डाइनिंग हॉल में उस राजकुमार का प्रवेश करना सैनिकों और सेनापति को एक इशारा होता था कि उसी समय शहर के बाकी हिस्सों में ठहरे सारे राजकुमारों को एक साथ मौत के घाट उतार दिया जाए। इधर चुना हुआ राजकुमार गद्दी के नए वारिस बनने की ओर बढ़ता उधर उसके सारे सगे सौतेले भाइयों की वो अंतिम रात होती। 
दोनों कहानियां सुनने के बाद मुझे लगा गरीबी से उठ कर महल में आई एक लड़की जिसने बेटे को जन्म दिया है और बरसों यहाँ के ठाठ बाट में रही है उसकी ये स्वाभाविक इच्छा होगी कि वो यहीं रहे और उसका बेटा ही सम्राट बने। और इसके लिए वो बेटे के पैदा होने के अगले दिन से ही सियासत के सारे पैंतरे अपनाने लगती थी। इस खेल में वो अकेली नहीं थी। ऐसी तमाम औरतें थीं जो अपने बेटों के भविष्य को संवारना चाहती थीं। उधर दरबारी अपनी राजनीति के लिए इन महिलाओं का साथ देते या उनके खिलाफ काम करते थे। इस खेल में महल का हर दरबारी, सेनापति, रसोइया, खोजा, द्वारपाल, बांदियाँ, दास हर कोई एक मोहरा होता था। उधर सम्राट को भी ये पता रहता था कि ऐसे ही खेल चल रहे होंगे तो उसके गुप्तचर इन कथित रानियों के बीच अपनी पैठ बनाये रहते थे। हर समय हर इंसान शतरंज की बिसात पर या तो चाल चल रहा होता था या जाने अनजाने मोहरा बन गया होता था। 

जहाँ हर बेटे की माँ ये जानती हो कि उसके पास दो विकल्प हैं — या तो सब कुछ या कुछ भी नहीं। या तो उसका बेटा सम्राट बनेगा और वो राजमाता या बेटा जान से हाथ धोएगा और वो खुद गरीबी और गुमनामी में खो जाएगी तो वो राजमाता बनने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देती थी । ऐसे में हर व्यक्ति हर समय चौकन्ना रहता था। सबकी नज़रें और कान एक दूसरे की टोह लेते रहते थे। “धीरे बोलो कि दीवारों के भी कान होते हैं,” ये शब्द हमने कभी न कभी ज़रुर सुने होंगे। इनकी जड़ें असल में इन जैसे ही महलों में हैं जहाँ हर समय षड्यंत्र चला करते थे।

तोपकापी में उन कहानियों को सुनते हुए मुझे लगा मुझे अपने सवालों का जवाब शायद मिल गया है। 

इस्तांबुल शहर घूमते हुए एक बात समझ आई कि यहाँ के वैभव में जितना योगदान उसके इतिहास का है उतना ही उसके भूगोल और शहर भर में फैली सुंदरता का भी है। शहर बोस्फोरस जलडमरूमध्य के किनारे बसा है जो काला सागर और मरमरा सागर को जोड़ता है। यहाँ से दिनभर बड़े पानी के जहाज़ गुज़रते रहते हैं जो शहर को एक अलग ही खूबसूरती प्रदान करते हैं। शहर का एक भाग यूरोप में आता है और दूसरा एशिया में। तो समुद्री जलमार्ग के दोनों और शहर का विस्तार और उस शहर को जोड़ने के लिए बने पुल उसे गज़ब का वैभव देते हैं। चूँकि शहर बहुत साफ़ सुथरा है, इमारतें विशाल और वैभवशाली हैं इसलिए शहर के बहुत से सामान्य स्मारक भी बहुत शानदार लगते हैं।  पूरे शहर की सुंदरता उनकी सामान्यता को भी ऊपर उठा देती है। जबकि दिल्ली जैसे शहर में जहाँ हमारे स्मारक तो बेइंतेहा खूबसूरत हैं लेकिन शहर की गन्दगी, अव्यवस्था, बदहाली उनके वैभव को धूमिल कर देती है।

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संपादकीय टीम
हमिंग वर्ड

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