विवेक आसरी

जिगबुर्ग की धुंधली सुबहों में चर्च की घंटियां ऐसे बजती थीं जैसे किसी ने हाथ से हिलाकर जगा दिया हो। अनीता को कई बार वक़्त का अंदाज़ा उन्हीं से होता। क्योंकि 12 बजे जब चर्च की घंटियां बजतीं, उसे काम करते 8 घंटे हो चुके होते थे। हफ्ते में छह दिन उसे सुबह 3 बजे उठकर चार बजे घर से निकल जाना होता था। बाल पीछे कसे हुए, पुराने कोट में बंधा, सिमटा बदन और लॉन्ग बूट पहने जब वह मुंह अंधेरे बाज़ार से गुजरती हुई चौक पार करती तोस्ट्रीटलाइट की पीली रोशनी में सांसों के छोटे-छोटे धुएंसाफ नज़र आते। चौक गोल पत्थरों की पटरियों का जाल था, जिसे पार करते हीफल वाला टूटा हुआ छाता टिकाकर अपनी दुकान खड़ी कर रहा होता।बेकरी की खिड़की पहले बैच की रोटियों की भाप से धुंधली हो जाती। उन्हें देखकर वह सोचती कि इतनी सुबह बस गरीब लोग जगते हैं।
वहकैफ़े अम मार्क्टके दरवाज़े में चाबी घुमाती और हमेशा की तरह थोड़ा-सा सुकून महसूस करती। भीतर की गर्म हवा, परिचित गंधऔर काम की निश्चितता उसे बाहों में भरता कोई अपना सा लगता।
रसोई में जाकर वह कॉफ़ी मशीन चालू करती। काउंटरको पोंछती तो हाथों को फैलाकर दूर तक ले जाती। उसकी मां ने उसे सिखाया था कि झाड़ू लगाते वक्त हाथ को लंबा करो तो सफाई अच्छी होती है।फिर वह कप्स को डिशवॉशर से निकालकरपोंछती और उल्टा रख देती। किसी दिन थोड़ा ज़्यादा वक़्त होता तो पिरामिड बनाती। कम वक़्त होता तो सपाट लहर बना देती।
कैफे का मालिक मिस्टर फोग्ट रोज़ की तरह साढ़े छह बजे आया। कंधे पर थैली और चेहरे पर ऐसी निष्ठुर मुस्कान जो उसकी आंखों तक नहीं पहुंचती थी।
“गुटन मॉर्गन,”उसनेकोट उतारते हुए कहा, “हमें आज और ग्राहक चाहिए, अनीता। काम बहुत धीमा हो गया है।”
“गुटन मॉर्गन मिस्टर फोग्ट,” अनीता ने उत्तर जर्मन में दिया, फिर आदतन अंग्रेजी मेंबोली, “मैं स्पेशल ऑफर्सका बोर्ड बाहर रख दूंगी।”
उसने सिर हिलाया और आगे बढ़ गया। तख़्ती पर अनीता ने साफ़ जर्मन में लिखा:हैम सैंडविच प्लस कॉफी 6 यूरो। सेब की पाई प्लस कॉफी 7 यूरो।
सात बजे दरवाज़ा खुला और पहले ग्राहक अंदर आए। अनीता ने नाम लेकर अभिवादन किया। उसका एक्सेंट अब अभ्यास से नरम पड़ चुका था। स्वर खिंचकर जर्मन रूप ले चुके थे। छह साल से कैफे अम मार्क्ट में काम करते हुए अनीता ज्यादातर ग्राहकों को और ग्राहक अनीता को नाम से जानने लगे थे।
साढ़े नौ बजे वह आया। वही, जिसे अनीता के साथ काम करने वाली जमीला आल्टर काउत्स औरसबीनेआल्टर नैकर कहती थीं। दोनों ही का अर्थ हिंदी में बूढ़ा खूसट जैसा कुछ होगा लेकिन नैकर थोड़ा अपमानजनक हो जाता है, जैसे खूसड़।
बूढ़े ने दरवाज़े पर जूते पटके और कमरे को ऐसे देखा जैसे किसी धोखेबाज़ की दुकान में घुस आया हो।
“गुटन मॉर्गन, मिस्टर क्र्यूगर,” अनीता ने नरमी से, अपनेपन से कहा, क्योंकि वह हमेशा कहती थी। बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया,क्योंकि वह हमेशा नहीं देता था। टोपी खालीमेज़ पर फेंक दी और खिड़की के पास रखीकुर्सी पर बैठ गया। वह मेज़ छोटी और चौकोर थी, जिससे चौराहे का क्रॉस और उसके पार आकाश का पतला टुकड़ा दिखता। उसने टोपी एक ओर खिसकाई और अखबार उठा लिया, एकदम रोज की तरह।
अनीता बिना पूछे पानी ले आई।
“आज सूप? या दलिया? अच्छे से गरम कर दूंगी, कल से भी ज्यादा,” उसने पूरे उत्साह से कहा।
बूढ़े ने आंखें सिकोड़कर देखा, फिर सिर हिलाया और बोला, “गरम,”जैसे तापमान स्थिर रखने कीचुनौती दे रहा है, “गुनगुना नहीं, गरम।“
अनीता ने ऑर्डर की पर्ची पर लिखकररसोई में सबीने को दी और काउंटर पर ब्रेड काटते हुए कुछ देर तक उसे देखती रही कि कैसे वह नैपकिन दोनों हाथों से खोलता, जैसे किसी पुरानी चिट्ठी को खोल रहा हो।कैसे वह पानी के गिलास की किनारी अंगूठे से रगड़ता मानो उंगलियों के निशान और रात की थकान मिटा देना चाहता हो। कुछ देर में सबीने ने उसे सूप का कटोरा देते हुए कहा, “लो, झेलो।”
अनीता नेसूप का कटोरा छूकर देखा जैसे रातभर से बुखार में पड़े बच्चे का माथा जांच रही हो। सूप लगभग उबल रहा था। अनीता ने तीन अतिरिक्त सांसें गिनीं और ट्रे लेकर बूढ़े के पास पहुंची। बहुत ध्यान से उसने ट्रे को धीरे से मेज़ पर रख दिया।
“गरम,”उसने लगभग फुसफुसाते हुए कहा।
बूढ़ेने उसकी ओर देखा भी नहीं। उसने झुककर भाप को सूंघा। फिर चम्मच उठाया और सूप के लिए भरने से पहले अनीता को देखा। वह वहीं आरोपी की तरह खड़ी जज के फैसले का इंतजार कर रही थी।
बूढ़े ने चिढ़ते हुए कहा, “अब क्या मेरे सिर पर बैठोगी?“
अनीता हाथ पोंछते हुए चल दी लेकिन ग्राहक की झल्लाहट से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा था। काउंटर तक पहुंची ही थी कि बूढ़े की और ज्यादा झल्लाती हुई आवाज़ आई, “नमक तो ही नहीं है। और ये ब्रेड? परसों की है क्या? मक्खन भी सख्त है, चाकू तक नहीं चलता। रोज़ का यही काम है तुम लोगों का।”
उसने चम्मच को कटोरे में ऐसे पटका कि सूप छलककर तश्तरी में गिर पड़ा। उसके बाद वह काफी देर तक बड़बड़ाता रहा।
यह बूढ़े का रोज़ का काम था। हर दिन किसी न किसी बात पर नाराज़ होना, झल्लाना, चिल्लाना।कभी सूप बहुत गरम, तो कभी फीका, कभी ब्रेड सख़्त, तो कभी कॉफ़ी हल्की। स्टाफ़ उसकी आदत पहचान चुका था और उससे बचने की कोशिश करता था। जब दरवाज़े पर उसकी छाया पड़ती, लड़कियां काउंटर की आड़ में खिसक जातीं या किसी और मेज़ पर व्यस्त होने का बहाना ढूंढ लेतीं। आपस में फुसफुसातीं, “आ गया खूसट। आज किस बात पर झल्लाएगा? इसका तो रोज का काम है।” और बाकी लोग खिलखिला देते। अनीता सिर्फ मुस्कुरा देती।
दूसरी वेट्रेस, जो हमेशा च्यूइंग गम चबाते हुए मोबाइल देखती रहती थी,काउंटर पर टिककर बोली,
“तुम हमेशा क्यों उसे सर्व करती हो? पता है ना, वो कभी टिप नहीं देता और ऐसे शिकायत करता है जैसे यही उसका काम हो। हम क्या उसके गुलाम हैं?”
अनीता बस मुस्कुरा दी। लड़की ने आंखें घुमाईं और कहा, “तुम्हें किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं।हम यहां अपना काम करने आती हैं, किसी की धौंस खाने नहीं।”
अनीता फिर मुस्कुरा दी। उसे लड़की की आवाज़ में वह निश्चिंतता सुनाई दी, जो केवल उन्हीं को मिलती है जिन्हें कभी चमत्कार की ज़रूरत नहीं पड़ी। ऐसे लोगों के लिए समय पर बस मिलना ही काफ़ी होता है। ऐसे लोगों के लिए किसी दिन सर्दी का अचानक बढ़ जाना या दरवाजे में चाबी फंस जाना जिंदगी की सबसे बड़ी मुश्किलें होती हैं।
“क्या फर्क पड़ता है। बुजुर्ग है,” अनीता ने कहा। शब्द इतने साधारण थे। उनमें कोई चाह, कोई शिकायत, कोई मांग नहीं थी। वह यह नहीं बोली:क्योंकि मुझे उसकी ज़रूरत है। क्योंकि उसकी झुंझलाहट भी मेरी रोज़ की कमाई का हिस्सा है, और हर छोटा सहारा मेरे भीतर के डर को थोड़ा धीमा करता है कि कुछ तो है जो स्थिर है। क्योंकि वह जानती थी कि जिंदगी में स्थिर कुछ भी नहीं होता। वह जानती थी कि अचानक हवा का एक झोंका आता है और वे सारे पत्ते उड़ा ले जाता है, जो आपने जाने कितनी मेहनत से जमा किए होते हैं। वह जानती थी कि हर दिन जो आराम से गुजर जाए, बड़ा होता है।
अनीता को इस कैफे में काम करते छह साल हो गए थे। छह साल से वह इस बूढ़े को इसी तरह झेल रही थी लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। जैसे उसने अपनी ज़िंदगी से कभी शिकायत नहीं की, जो बार बार बदल जाती थी। 10 साल पहले तब बदली, जब लूकास उसकी जिंदगी में आया था। भारत के कोच्चि में रहने वाली 26 साल की विधवा अनीता की बेरंग ज़िंदगी लूकास के आने से बदल गई थी। अनीता कोच्चि के पास एक गांव में चाय की छोटी सी दुकान चलाती थी। लूकास जर्मनी से भारत घूमने आया था और छह दिन तक रोज़ उसकी दुकान पर नाश्ता करने के बाद सातवें दिन उसने अनीता को बोल दिया, “तुम बहुत प्यारी हो।“
अनीता के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई थी, प्यार की नहीं हैरत की। चार साल पहले उसके पति की मौत हो गई थी। दलित जाति के उसके पति की ऊंची जातिकी अनीता से प्रेम विवाह के सिर्फ तीन महीने बाद सड़क हादसे में मौत को किसी ने असामान्य नहीं माना। हालांकि सच्चाई क्या थी, जानते सब थे। अनीता से उसके परिवार ने नाता तोड़ ही लिया था और तमिलनाडु में उसके पास कुछ बचा नहीं था। तो वह तमिलनाडु छोड़कर कोच्चि चली आई। वहां उसने चाय-नाश्ते की दुकान कर ली थी।उसके बाद वही दुकान उसका संसार हो गई थी। इस संसार में ताने थे, रोज ब रोज आते लोगों के अश्लील इशारे थे, दुत्कार था, लेकिन प्यार नहीं था। इसलिए जब लूकास ने उसे प्यारी कहा तो उसके शरीर में झुरझुरी दौड़ गई और वह मुस्कुरा तक नहीं पाई।
लूकास जिद्दी था। तीन महीने वह वहीं डेरा डाले रहा और आखिरकार उसने अनीता को अपने साथ जर्मनी चलने को मना लिया। अनीता ने भी सब कुछ छोड़कर नई शुरुआत की खातिर यह फैसला कर लिया था। एक साल बीतने से पहले वह लुकास के साथ जर्मनी में फ्रैंकफर्ट के पास छोटे से कस्बे जिगबुर्ग आ गई थी।
जर्मनी आने के शुरुआती महीनों में अनीता को हर चीज़ नई और डरावनी लगती थी। भाषा उसके लिए दीवार जैसी थी, मौसम हड्डियों तक चुभता था और अकेलापन बार-बार कोच्चि की ओर धकेलता था। पर लूकास साथ था, और वह यही सोचकर खुद को दिलासा देती कि कोई अपना साथ हो तो मुश्किलें आसान हो जाती हैं।
लेकिन धीरे-धीरे उसने नोटिस किया कि लूकास बदल रहा है। कोच्चि में मिला जिद्दी लेकिन हंसमुख लड़का, जो चाय की दुकान पर घंटों बैठा रहता था, यहां किसी और ही दुनिया में खो गया था। वह देर रात तक बाहर रहता, दोस्तों के साथ पब में बियर पीता, फुटबॉल देखता और घर लौटकर चुपचाप फोन पर बातें करता रहता। अनीता कह देती तो चिढ़कर कहता, “तुम यहां की चीज़ें समझ नहीं पाओगी, अनीता।” उसके शब्दों में थकान से ज्यादा दूरी होती।
छठे महीने की एक सुबह,जब खिड़की के बाहर बर्फ़ की परत सफ़ेद चादर की तरह फैली थी, उसने दरवाज़े पर दो सूटकेस रख दिए।“ये मेरा देश है, मेरी ज़िंदगी है,” लूकास नेबहुत परायेपन से कहा, “तुम्हारे लिए यहां जगह बनाना आसान नहीं होगा। मुझे नहीं लगता कि हम साथ रह पाएंगे।”
अनीता दरवाज़े पर खड़ी रह गई। उसका हाथ अब भी दरवाज़े की चौखट को पकड़े था, जैसे सहारा उसी लकड़ी से मिल रहा हो। उस दिन उसे सिर्फ़ यह लगा कि वह फिर अकेली हो गई है। विदेशी शहर में, बिना किसी सहारे के।कुछ हफ़्तों बाद, जब थकावट और मितली ने उसे डॉक्टर के पास जाने को मजबूर कर दिया, तब पता चला कि वह प्रेग्नेंट है। लूकास जा चुका था, मगर उसकी ज़िंदगी अब फिर से बदलने वाली थी, इस बार अकेलेपन और जिम्मेदारी की मिली-जुली धड़कन के साथ। इससे पहले वह लूकास को वापस पाने की उम्मीद में जी रही थी, लेकिन उस दिन उसनेमन में फिर से घर छोड़ा और नई जिंदगी के लिए निकल गई। इस बार मीरा के लिए। और उसके बाद से अब तक मीरा के अलावा उसने कुछ नहीं सोचा।
इंसान को बस मकसद चाहिए होता है, फिर वह कुछ भी कर जाता है। यह बात कहने की नहीं है, जिन्होंने मकसद पाए हैं वे इसे जानते हैं। और ये मकसद दूसरों की निगाह में छोटे हो सकते हैं, उनकी खुद की निगाह में यही जीवन की धुरी बन जाते हैं। जैसे अनीता के लिए मीरा थी।
12 बजे का घंटा बजा तो अनीता को वक़्त का ख्याल आया। यह घंटा अक्सर उसे कोच्चि की याद दिला देता था। उसे आज मिस्टर फोग्ट से बात करनी थी कि कुछ अडवांस दे दे। मीरा को स्कूल ट्रिप के लिए पैसे देने हैं। पर मिस्टर फोग्ट कुछ देर में आने की बात कहकर गए तो लौटे ही नहीं। उसके शहर भर में पांच कैफे और थे, इसलिए लौटने की संभावना भी कम ही थी। सफाई करने के बाद 3 बजे मीरा ने कैफे बंद कर दिया।
भारत में रहने वालों को अक्सर लगता है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय गरीब नहीं होते। पर अनीता के घर में फ्रिज पर चिपकी वह हिसाब की लिस्ट कुछ और कहती थी।हिसाब अनीता ने जर्मन में लिखा था–किराया, स्कूल-डे-केयर, बिजली का बिल, टेलीफोन का बिल। मासिक बस पास। ग्रॉसरी। इस सब में अनीता की तन्ख्वाह और सरकार से मिलने वाला किंडरगेल्ड यानी बच्चों का भत्ता खत्म हो जाता था। इसके ऊपर से कोई खर्च आ जाता, तो मुश्किल हो जाती। जैसे इस महीने आ गया था, तीसरी क्लास में पढ़ने वाली मीरा के स्कूल का ट्रिप।नौ साल की मीरा ने उन खर्चों के चारों ओर बैंगनी रंग के पेन से सितारे बना दिए थे और कोने में लिखा था:मामा, विअर शाफ़ेन दास -मां, हम कर लेंगे।
मीरा की लिखावट में वह बेपरवाह भरोसा था जो बच्चों के पास होता है, जिन्हें लगता है कि उनकी मांएं ग्रहों की चाल तक नियंत्रित कर सकती हैं।
अनीता की जर्मन छह तेज़ सर्दियों में सीखी हुई थी। मेन्यू के लिए,नया सिम कार्ड लेने के लिए, या नर्स से सुनने के लिए कि बच्चे का बुखार रात तीन बजे उतर जाएगा। इसके लिए वह अच्छी थी। लेकिन कुछ दस्तावेज, जॉबसेंटर से आए धूसर पत्र,छोटे-छोटे क़ानूनी जालों से भरे हुए बिल उसे ऐसे लगते मानो वह अंधेरे कमरे में बिना रास्ते के ठोकरें खा रही हो। वह चाय बनाती, पत्र मेज़ पर रखती और हर वाक्य को दो बार अनुवाद करती। पहले अंग्रेज़ी में, फिर अपनी ज़िंदगी में।
लूकास जिगबुर्ग छोड़कर हैम्बर्ग चला गया था, जिसे अनीता ने कभी नहीं देखा। शुक्रवार की शाम को वह बेटी को उससे वीडियो कॉल करने देती। कॉल छोटी लेकिन हंसी-मजाक से भरी होतीं। उसके बाद मीरा कुछ देर चुप रहती। कभी-कभी रसोई की मेज़ पर चीनी केछोटे चौकोर टुकड़े जोड़कर घर बनाती और फिर एक-एक करके खा जाती।
छह साल से ज़िंदगी लगभग यूं ही चल रही थी। जब तक मीरा चाइल्डकेयर जाती थी, अनीता सुबह आठ बजे तक कैफ़े पहुंच पाती थी। तब पैसों की तंगी और भी गहरी थी। लेकिन जैसे ही मीरा ने स्कूल जाना शुरू किया, मिस्टर फोग्ट ने तन्ख़्वाह थोड़ी बढ़ाने के बदले कैफ़े को खोलने और बंद करने की ज़िम्मेदारी उसी के हवाले कर दी। अब सुबह चार बजे से उसका दिन शुरू होता। पहले सैंडविच तैयार करना, फिर सूप चढ़ाना और कॉफ़ी मशीन को गरम करना। शाम तीन बजे, आख़िरी कप धोकर और फ़र्श पोंछकर वही ताला भी लगाती।
यह सब एक बंधी-बंधाई लय में चलता। सुबह की भाप, दोपहर की थकान, शाम की सफ़ाई। और इस लय का हिस्सा था वह बूढ़ा भी, अपनी रोज़ की खीझ और शिकायतों के साथ।
छह साल बीतते-बीतते बूढ़ा अनीता की दिनचर्या का उतना ही हिस्सा बन गया था जितना सुबह की घंटियां या कॉफ़ी मशीन की गुनगुनाहट। वह उससे कभी मीठा बोलता नहीं था, हर बार शिकायत ही करता, फिर भी उसकी अनुपस्थिति की कल्पना अनीता को अधूरा सा कर देती। किसी दिन उसे देर हो जाती, तो अपनी बार-बार खाली मेज़ को साफ करती। अखबार को उसी के लिए संभालकर रखती। उसकी झुंझलाहट में भी एक तय समय,तय अंदाज़ था, और वही अनीता के भीतर एक अजीब-सी स्थिरता लेकर आता। वह बूढ़ा उसका अपना नहीं था। उसे तो यह भी नहीं पता था कि वह कहां रहता था, क्या करता था। कई बार उसके साथ काम करने वाली लड़कियां कहतीं कि मिस्टर फोग्ट क्यों उस बूढ़े को इतना भाव देता है, उसे मना क्यों नहीं कर देता। पर अनीता कुछ ना कहती। उस बूढ़े में कोई अपनापन नहीं था। पर उसकी मौजूदगी से अनीता को एक अनजाना सा अहसास दिया था कि जिगबुर्ग में कोई उसे पहचानता है,चाहे केवल शिकायत करने के लिए ही क्यों न हो।
नवंबर के तीसरे गुरुवार को,जब दोपहर का उजाला भी आधे में बुझने लगता था, अनीता ने अलग अंदाज़ अपनाया। उसने मेज़ पर दो उंगलियां थपथपाईं और जर्मन में बहुत सावधानी से पूछा,
“वी गेट्सइन्हेन, हेर क्र्यूगर?” आप कैसे हैं, मिस्टर क्र्यूगर?
वह एक पल सामान्या से ज़्यादा चुप रहा। काग़ज़ पर एक पल कुछ नहीं होता, लेकिन कमरे में, जब भाप उठ रही हो और किसी का हाथ हवा में थमा हो, वह एक पल जीने की जगह बन जाता है।बूढ़े आदमी का मुंह हल्का-सा कांपा, जैसे वह ऐसा जवाब देना चाहता हो जिसे बहुत पहले दफ़ना चुका था। फिर उसने रूखी आवाज में कहा,“गरम।”
और अनीता ने सिर हिलाया,मानो उसने पूरी कहानी सुन ली हो।
सर्दी उनके इस क्रम में बढ़ती चली गईं। सड़क पर बर्फ़ का नमक बिखरा, चौक की मूर्ति पर सफेद तह जम गई। मीरा लाल कोट में बस का इंतज़ार करती, उस अकड़ के साथ जिसे हम बच्चों में बहादुरी समझ लेते हैं।रविवार को अनीता उसे मठ की पहाड़ी तक ले जाती। वे भीतर नहीं जाते, बस रेलिंग से नीचे जिगबुर्ग देखते, छतें ऐसी दिखती जैसेंकिसी ने काग़ज़ मोड़ रखे हों। ट्रेनें शहर को आज्ञाकारी टुकड़ों में काटतीं।
“जब मैं बड़ी हो जाऊंगी तो हम पेरिस जा सकते हैं?” मीरा ने पूछा।
“जब हम जा पाएंगे, तो जरूर जाएंगे,” अनीता ने कहा, क्योंकि झूठ बहुत भारी होता है और बहुत हल्का भी, न पकड़ा जाता है, न टिकता है।
जनवरी ने जिगबुर्ग पर हथौड़े की तरह ठंड गिरा दी। सुबहें ऐसी लगतीं जैसे कारें चीनी में लपेटी हों।पहले सोमवार को बूढ़ा नहीं आया। अनीता ने इंतजार किया।मंगलवार को भी वह नहीं आया। बुधवार को अनीता ने उसकी मेज़ पोंछी और उस पर पानी का गिलास वैसे ही रख दिया, मानो सावधानी से निभाई गई रस्म उसे लौटा लाएगी।
“वह बीमार होगा,” अनीता ने दूसरी लड़की से कहा।
लड़की ने होंठ सिकोड़कर कहा, “या आखिरकार मर ही गया।”
उस मासूम-सी क्रूरता पर अनीता ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी दादी का चेहरा याद किया। वह पल जब उसने एक घंटे तक उनकी नब्ज़ थामे रखी थी, क्योंकि कमरे में और कोई नहीं था। वह जानती थी चुप रहना भी कभी-कभी प्रार्थना जैसा होता है।
गुरुवार को उसने ब्रेक लिया और डाकघर चली गई,जहां उसने कभी उसे बिल भरते देखा था। हल्के, छिछले बालों वाले क्लर्क ने हमेशा की तरह कागज़ों के ढेर को सीधा करते हुए कहा कि उसने तो मिस्टर क्र्यूगर कोहफ्तों से नहीं देखा। अनीता ने उसके घर का पता मांगा तो क्लर्क ने साफ इनकार कर दिया।
शुक्रवार को अनीता ने उस लालईंटोंवाली इमारत पर दस्तक दी जहां बूढ़े लोग शाम के वक्त शतरंज खेलते थे। वहां किसी ने उसका नाम नहीं पहचाना।
जब कोई चला जाता है, तब उसके आस-पास की चीज़ें अपना आकार बताने लगती हैं। उसकी टोपी में हमेशा एक छोटा-सा धंसाव रहता था। पानी का गिलास आधा भरा और उंगलियों के निशान से घिरा रहता।नैपकिन को मोड़ने का उसका तरीका एक निजी-सा गणित था।पर अनीता चाहकर भी उसकी आंखों का रंग नहीं बता सकती थी, हालांकि वह हर रोज़ देखती थी।हां, वह उसके हाथों का आकार बता सकती थी।
शनिवार और रविवार बहुत बेचैनी में गुजरे, जैसे कोई अपना खो गया हो।
सोमवार दोपहर बाद जब ग्राहकों का आना कम हुआ तो अनीता सांस लेने के लिए बैठ गई। वह बूढ़े के बारे में ही सोच रही थी। उसने अखबार उठाया, जिसे आज किसी ने नहीं पढ़ा था। बीच के पन्नों में, विज्ञापनों और नोटिसों के बीच एक पासपोर्ट साइज फोटो छपी थी। साथ में एक कैप्शन था – जिगबुर्ग निवासी विल्हेल्म क्रूगर, 78, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मन सेना से रिटायर हुए, कल अपने घर में निधन।”
अनीता के हाथ ठिठक गए। वही बूढ़ा, वही खिड़की वाली मेज़। वही अख़बार। खबर में और कुछ नहीं लिखा था। कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं। कोई याद नहीं। कोई श्रद्धांजलिनहीं। उसका पूरा जीवन इन तीन पंक्तियों में सिमट गया था। अनीता देर तक अक्षरों पर उंगली फिराती रही और फिर उसकी आंखें डबडबा गईं।
घर आकर उस शाम अनीता खूब रोई।
अगले हफ़्ते, बिना किसी भूमिका के, फैसला सुनाया गया। बंद होने के समय मिस्टर फोग्ट ने अनीता को बुलाया और उसके हाथ में एक काग़ज़ देते हुए कहा, “मुझे अफ़सोस है अनीता, लेकिन महीने के अंत में हमें तुम्हें निकालना पड़ेगा। कारोबार नहीं चल रहा। मैं मजबूर हूं।”
अनीता ने सिर हिलाया। उसने यह नहीं कहा कि उसने जाने कब से इस बात का डर था। उसने यह नहीं कहा कि वह अब मीरा को नया स्वेटर कैसे दिलाएगी। बस उसने थकान से हाथ नीचे गिरा दिए, जिनके गिरने का पता किसी को नहीं चला था।थकी हुई औरत में अक्सर एक गरिमा होती है। इतनी थकान कि सफ़ाई देने की ज़रूरत ही नहीं।
उसने जर्मन में कहा, “मैं समझती हूं, मिस्टर फोग्ट।”
आवाज़ वैसी थी जैसे धीरे से दरवाज़ा बंद हो रहा हो।
घर लौटते वक्त उसने आलू और दूध खरीदा।
घर पर मीरा स्कूल के लिएनदीपर प्रोजेक्ट बना रही थी। “मां, गंगाको जर्मन में कैसे लिखते हैं?” उसने पूछा।“उसी तरह,” अनीता ने कहा, और कोने में लिख दिया।वह बेटी को नीली रेखा खींचते हुए देखती रही, कागज़ पर किनारे जोड़ती, पेड़ बनाती। अनीता फ्रिज पर लगी लिस्ट को देखने लगी।
फिर भी वह जनवरी का महीना पूरा करने आई। हर दिन कैफ़े ऐसे संभालती जैसे किसी घर को छोड़ने से पहले संभालते हैं। उसने दरवाज़े की पीतल की कुंडी चमकाई, हालांकि किसी ने गौर नहीं किया। शक्कर के पाउच गिने।और हमेशा की तरह हर रोज मिस्टर क्र्यूगर की मेज़ को सबसे आख़िर में साफ़ करती। इस उम्मीद में कि शायद वह आज आ जाए।
जनवरी के आख़िरी बुधवार को चौक लगभग खाली था। फूलों की बाल्टियों के किनारों पर गंदी बर्फ़ जमी थी। अनीता रसोई में प्याज़ काट रही थी और सोचने से बच रही थी। मिस्टर क्रूगर काउंटर पर बैठा हिसाब कर रहा था। तभी कैफ़े का दरवाज़ा खनककर खुला। अनीता ने सिर उठाया।
दरवाज़े पर एक अधेड़ आदमी खड़ा था। उसका कोट राख जैसे रंग का था। बालों की मांग करीने से खिंची हुई थी, हाथ में पुराना लेकिन चमकाया हुआ ब्रीफ़केस था।
“क्या आप फ़्राऊ (श्रीमती) थॉमस हैं?” उसने अनीता की ओर देखते हुए पूछा।
“हां,” अनीता ने अपना नाम याद करते हुए कहा। वह भूल ही गई थी कि लूकास थॉमस से शादी के बाद वह अनीता थॉमस हो गई थी।
“मैं एडवोकेट पीटर श्टाइन हूं,” उसने कार्ड आगे बढ़ाया। अनीता ने उसे लिया और काउंटर के पास रख दिया।
“क्या मैं आपसे बात कर सकता हूं?” उसने पूछा।
अनीता ने मिस्टर फोग्ट की ओर देखा।
“बिलकुल,” उसने उठते हुए कहा, “पीछे वाले दफ़्तर में चलिए।”
ऑफ़िस कॉफ़ी और पुराने काग़ज़ों की गंध से भरा था। वकील ने बिना पूछे कुर्सी खींच ली, फ़ाइल खोली और दो काग़ज़ बहुत संभालकर सामने रख दिए, मानो काग़ज़ ही अपनी बात के ज़िम्मेदार हों।
“यह मिस्टर विल्हेल्म क्र्यूगर की वसीयत से जुड़ा मामला है,” उसने कहा।
अनीता कोकुछ समझ नहीं आया लेकिन नाम ऐसे गूंजा जैसे घंटी के पीछे दूसरी घंटी बज उठी हो।विल्हेल्म।उसने मन ही मन दोहराया, जैसे किसी कविता का टुकड़ा।
“वसीयत?” उसने दोहराया। शब्द सुनते ही हल्की-सी घबराहट उसके भीतर उठी।
“उनका निधन 4 जनवरी को हुआ,” वकील ने कहा, “कोई नज़दीकी परिवार नहीं था। उन्होंने एक वसीयत लिख छोड़ी थी।”
अनीता की पीठ के नीचे अचानक गर्मी-सी फैल गई। उसके हाथ कांप रहे थे। इसलिए उसने उन्हें एक दूसरे में उलझा लिया ताकि दिखाई न दें।
वकील ने सिर हिलाया। “आपजानती हैं ना उन्हें,” उसने कहा, ऐसे ज़ोर देकर कि कमरा थोड़ी देर के लिए झुक-सा गया।उसने पहला काग़ज़ आगे बढ़ाया। यह एक पत्र था। लड़खड़ाती लिखावट, पुरानी जर्मन लिपि में लिखी हुई। अनीता को पढ़ने के लिए ध्यान लगाना पड़ा।
फ़्राऊ थॉमस,
आप ही थीं जो हर दिन मुझसे पूछती थीं कि मैं कैसा हूं। मैंने जवाब नहीं दिया क्योंकि मैं खुद भी भूल चुका था। मेरे पास अब ऐसी बहुत चीज़ें नहीं हैं जिनकी किसी को परवाह होगी। थोड़े पैसे हैं। और, कुछ और भी है।
अनीता ठिठक गई। हवा भारी लगने लगी। उसने पंक्तियां दोबारा पढ़ीं और फिर आगे पढ़ना शुरू किया।
मार्क्ट 4 की इमारत मेरी है। युद्ध के बाद जब कोई खंडहर देखना नहीं चाहता था, तब मैंने इसे खरीदा था। मैंने इसे दुकानों को किराये पर दे रखा था, जिनमें कैफ़े अम मार्क्ट भी है। अब मैंने लिख छोड़ा है कि यह इमारत, और इसके साथ कैफ़े अम मार्क्ट, आपको मिले। अगर आप चाहें तो बेच दीजिएगा। लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप कभी-कभी खिड़की वाली मेज़ पर बैठेंगी और अख़बार पढ़ेंगी। भले ही अब आप ही उसकी मालकिन हों। यह मेरे साथ अच्छा मज़ाक़ होगा। धन्यवाद कि आपने सूप हमेशा गरम रखा। उसका स्वाद किसी पुरानीयाद जैसा था।
नीचे टेढ़ा-मेढ़ा हस्ताक्षर था, अपरिपक्व-सा, मानो आख़िरी बार कोई रेखा खींचना चाही हो।
अनीता देर तक चुप रही। उसकी छाती कस गई थी,फिर भी उसमें जैसे हवा भर आई। वह पन्ना रखती, उठाती, फिर रख देती।
“यह इमारत…” उसने धीरे से कहा, “मतलब…?”
“अब आपकी है,” वकील ने सपाट स्वर में कहा। “काग़ज़ी औपचारिकताएं हैं, टैक्स, रजिस्टर, नोटरी। लेकिन अधिकार साफ आपका है। कोई क़र्ज़ नहीं है।”
“क्यों?” अनीता ने पूछा। यह सवाल वकील से नहीं, खुद से था।
“मुझे नहीं पता,” उसने कहा, “शायद उन्हें लगा कि आप… दयालु थीं।”दयालुशब्द उसने ऐसे बोला जैसे जेब से कोई पुराना सिक्का निकाला हो।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई। वहां मिस्टर फोग्ट खड़ा था। उसने कमरे में पांव नहीं रखा, बस चौखट से टिक गया। चेहरे से हिसाब-किताब उड़ गया था।
“यह इमारत?” उसकी आवाज़ बमुश्किल स्थिर थी, “यानी, यह इमारत?”
वकील ने सिर हिलाए बिना कहा, “हां।”
“पर हमारा तो करार था,” फोग्ट बोला, “लीज़ थी।”
“वह बनी रहेगी,” वकील ने कहा। “लेकिन अब फ़्राऊ थॉमस के साथ।”
कमरा एक ऐसी चुप्पी से भर गया जो दवा जैसी लगती थी। अनीता ने अपने हाथों को देखा। चाकुओं के छोटे निशान, केतली की जलन का दाग़। ये हाथ अब किसी इमारत के मालिक के हाथ लग रहे थे।
“मैं… मैं मालिक नहीं बन सकती,” उसने जर्मन में कहा, “मुझे नहीं आता…”
“सीख जाएंगी,” वकील ने बिना किसी भावना को जोड़े कहा, “लोग सीख जाते हैं।”
उसने फ़ाइल से दूसरा काग़ज़ निकाला। मुहर लगा हुआ, नोटरी की औपचारिक भाषा में लिखा कागज। तारीख़ें, दस्तावेज़, पासपोर्ट, रजिस्ट्रेशन, सबकी सूची। शब्द पंछियों जैसे थे। अलग-अलग उड़ते हुए लगते, मगर साथ में ठहरे हुए।
उसने कागज पर अनीता के दस्तखत लिए, फिर फ़ाइल बंद की, हाथ बढ़ाया। अनीता ने हाथ मिलाया। उसे लगा कोच्चि से कोई आया है, जो उससे हाथ मिला रहा है। वकील उतनी ही सफ़ाई से चला गया जितनी सफ़ाई से आया था।
फोग्ट अभी भी चौखट पर खड़ा था। उसके चेहरे पर एक खोखली-सी मुस्कान आई।
“बधाई हो,” उसने कहा, “अब हमें… भविष्य की बातें करनी होंगी।”
अनीता ने सिर हिलाया। फिर कपड़ा उठाया। एक आदत, जो अचानक बेमानी लगने लगी। उसने कपड़ा लिया और बूढ़े की कुर्सी पर जाकर बैठ गई। बैठे-बैठे ही उसने लंबा हाथ करके मेज को साफ किया। फिर कपड़े को तह कर दिया, जैसे पुरानी चिट्ठी को बंद कर रही हो।

