चीनः कैसा है आम आदमी का जीवन!

आसुर्या दिनेश 

 चीन एक समय  दुनिया  भर में  कोरोना  को लेकर  और  बॉर्डर की  तनावपूर्ण  स्थितियों  को लेकर  ख़ासतौर  पर भारत के  लोगों के लिए दुष्ट खलनायक और  विस्तारवादी क्रूर देश बना हुआ था और कुछ मायनों में आज भी  पर चीन की  प्राचीन  संस्कृति, आम लोगों के  सदियों के संघर्ष  पीड़ा  भूख और बेबसी  को नकारा नही जा सकता।  क्या मनुष्य जाति भूल सकती है  कि भले ही 2300  साल पहले काग़ज़  हो या छपाई की तकनीक, 6000 साल पहले  सिल्क हो  या 3700 साल पहले पीतल, 4000 साल  पहले भूकम्प  सूचक यंत्र हो  या 1700 साल  पहले छाता, दिशा सूचक यंत्र हो या पोर्सेलिन,  एक्यूपंचर हो या अल्कोहल इन सबका आविष्कार चीनियों ने ही किया। और यह भी सच है कि दुर्भाग्य से बारूद का आविष्कार भी चीन में ही हुआ। और तो और दुनियाँ में 5000 साल पहले पतंग भी सबसे पहले

चीनियों ने ही उड़ायी थी।

चीन का सामान्य आदमी भले ही खुले तौर पर हम बड़बोले भारतीयों की तरह अपने विचारों को अभिव्यक्त न करे पर वो उतना ही दुष्ट, सहृदय या भला बुरा है जितने हम या दुनिया के किसी भी देश के लोग। साधारणतया सरकारें और सत्ता सम्भाल कर देशों पर शासन करने वाले, जनमानस को दिशा देने वाले लोग अच्छे-बुरे क्रूर या सहृदय होते हैं,  रोज़ी रोटी की चिंता में मुलव्विस आम नागरिक नहीं। नागरिकों के लिए मुल्क के निज़ाम के साथ खड़े होना ख़ासतौर पर वहाँ – जहाँ तानाशाही हो – मजबूरी बन जाता है। उदाहरण के लिए कुछ अपवादों को छोड़कर क्या सारे जर्मनवासी हिटलर की मानसिकता के थे जो यहूदियों के प्रति क्रूर होकर उनके नरसंहार में हिटलर के साथ खड़े नज़र आए ?

2008 के ओलम्पिक की आभा में मेरी यात्रा के जनवरी 2012 का चीन निस्सदेंह बहुत तरतीब से चमका और ख़ूबसूरती से तराशा हुआ था। बीजिंग हवाई अड्डे पर कर्मचारियों की मुस्तैदी देखते ही बनती थी। ओलम्पिक के दौरान बने नए हवाई अड्डे की सुंदरता और चाक चौबंद व्यवस्था वाक़ई चकाचौंध कर देने वाली थी। अमेरिकी यात्रियों के लिए अलग काउंटर था जहां हर अमरीकी यात्री से सीआइए एजेंट होने के शक में गहन पूछताछ चल रही थी। मुझे मुस्कराहटविहीन और भाव शून्य चीनी अधिकारियों की कार्यकुशलता देखकर ज़बरदस्त हैरानी हुई जब मैं सिर्फ़ आठ या नौ मिनट में हवाई जहाज़ में अपनी सीट से उठकर, इम्मिग्रेशन और कस्टम क्लीयर करके, लगेज कोरोसेल से अपना सामान उठा कर एयरपोर्ट से बाहर अपने भारतीय मेज़बान अमित और चीनी महिला मेज़बान लिलिंग से मिल रहा था। शाम का वक्त था। लिलिंग की बड़ी शानदार गाड़ी में बैठ कर होटल की तरफ़ चले तो रास्ते में चौराहे पर हरी बत्ती होने का इंतज़ार करते यात्रियों से ख़ाली बस में कंडक्टर को बड़ी मुस्तैदी से बस के शीशे और सीटें साफ़ करते देखा। मेरे लिए यह एक तस्वीर चीनियों के मेहनती स्वभाव के बारे में बहुत कुछ कह गयी। अपने देश में क्या हम यह कल्पना कर सकते हैं कि ड्राइवर या कंडेक्टर से किसी की सफ़ाई करने को कहने की हिम्मत हो? जवाब आपको पता ही है ‘ये मेरा काम नही है’ – जो बड़े ग़ुस्से में तमाचे की तरह आपके मुँह पर मारा जाएगा।

रास्ते में अंग्रेज़ी भाषा के अर्थ का अनर्थ करते हुए बहुत शब्द ट्रेफ़िक साइन के रूप में दिखे । जैसे यदि सड़क पर आगे चढ़ाई है तो लिखा हुआ था ‘यू विल बी अपग्रेडिंग’ और ढलान था तो ‘यू विल बी डाउन ग्रेडिंग’। मैंने अपने युवा भारतीय मेज़बान अमित बाजपेयी से पूछा कि ये क्या है तो उसने बताया कि ये तो कुछ भी नही इससे भी ज़्यादा हास्यापद चीनी-अंग्रेज़ी अनुवाद पूरे चीन में देखने को मिलता है। मुझे बिजनौर के एक होटल का,  जहां एक विवाह समारोह के दौरान मैं एक रात रुका था, अंग्रेज़ी मेन्यू याद हो आया। मेन्यू में बटर को बैटर,  स्वीट एंड सावर को स्वीट एंड श्योर, स्नैक को स्नेक (साँप) लिखा हुआ था। फ़ीमेल ‘टायलट’ के दरवाज़े पर फ़ीमेल ‘टू-लेट’ की नेम प्लेट चस्पां थी।

जनवरी में सर्दियों में बीजिंग में ठंड बहुत पड़ती है। रात का तापमान शून्य से सात आठ डिग्री नीचे पहुँच जाता है और अक्सर बर्फ़ भी गिरती है। अगले पाँच दिन जिस होटल में मुझे रुकना था वो सवा दो करोड़ की आबादी वाले और सोलह हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैले बीजिंग महानगर के केंद्र में साफ़ सुथरा और लकदक चमकता होटल था। कर्मचारी ज़्यादातर महिलाएँ थीं और अमेरिकी लहज़े और चीनी तलफ़्फ़ुस में काम चलाऊ अंग्रेज़ी बोलकर किसी को भी कनफ़्यूज करने में दक्ष थीं।

अगले रोज़ नहा धोकर कंप्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट खाने नीचे रेस्तराँ में गया तो अनगिनत डिशेज रक्खी थी। ज़्यादातर चीनी लोग तरह तरह के चावल और नूडल्स अलग-अलग सब्ज़ियों -आमिष सामिष डिशेज के  साथ चुपचाप खाने में मशगूल थे। न तो कोई किसी से बात कर रहा था और न ही कोई किसी को देखकर हेलो या मुस्कराहट भरा कोई भाव – जो अमेरिका और बहुत से यूरोपीय देशों में आम है – दे रहा था। नाश्ते के बाद बीजिंग से डेढ़ घंटे की ड्राइव पर तीयानजिन जाना था जहाँ एक सम्पन्न किसान जिसे ‘चेयरमेन’ कहा जाता था से मेरी मुलाक़ात थी।

चेयरमेन बहुत बड़ी ज़मीन का मालिक था और तीयानजिन के फ़्री ट्रेड ज़ोन में अपनी ज़मीन छोटे-बड़े उद्योग लगाने के लिए भारतीय और अन्य विदेशी निवेशकों को लीज़ पर दे रहा था। चेयरमेन साठ साल का हट्टा कट्टा सोने की मोटी मोटी चेन पहनने वाला पूँजीपति टाइप का इंसान था और पहली मंज़िल पर बने अपने बड़े से दफ़्तर में बड़ी-सी चमड़ा मढ़ी महँगी कुर्सी पर बड़ी शान से विराजमान था। बड़ी शालीनता से उठकर उसने हाथ मिलाया। मुस्कराते हुए बिना दूध की चाय और तरह-तरह के बिस्किट सर्व किए और फिर  उसने अपनी मीलों में फैली रियासत दिखाई जिसमें बोरियत से भरपूर उदास चेहरे वाले गरीब चीनी मज़दूर चुपचाप बड़ी मेहनत से काम में लगे थे। मज़दूरों में लड़कियाँ, औरतें, बूढ़े और जवान सब थे। पर एक अघोषित कर्फ़्यू जैसा था। न कोई किसी से बात कर रहा था और न कोई किसी को देखकर मुस्कुरा रहा था। चेयरमेन ने मज़दूरों के रहने के लिए एक बड़ा सा होस्टल दिखाया जिसमें एक छोटे से कमरे में बंक बेड्ज़ पर चार चार मज़दूर रहते थे।

चीन में जिस कम्यूनिजम के बारे में अक्सर सुनता था – क्या वो सिर्फ़ ग़रीबों और दबे कुचले लोगों के लिए था – अगर सब के लिए था तो चेयरमेन जैसे बेपनाह दौलत वाले पूँजीपति कहाँ से अवतरित हो गए थे! एक ख़ास बात जो मैंने नोट की वो ये थी कि चेयरमेन के दफ़्तर में हर पद पर कम उम्र और खूबसूरत लडकियां ही थी। थीं। जब मेरे भारतीय मेज़बान ने इस बारे में पूछा तो चेयरमेन ने साफ़गोई से मुस्कराते हुए जवाब दिया कि ‘वो सब लड़कियाँ उसे जवान रखती हैं’। रियासत घुमाने के बाद चेयरमैन हमें वहीं थोड़ी दूर पर एक क़स्बे में दोपहर का भोजन कराने ले गया। गाँव-क़स्बों की सड़कें भी चौड़ी पक्की और साफ़ सुथरी थीं। छोटे से क़स्बे के रेस्तराँ के बाहर महँगी से महँगी विदेशी गाड़ियों बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज़, आउडी, राल्स रॉयस से पार्किंग ठसाठस भरी थी। रेस्तराँ में भी नीचे के तल पर आम चीनियों के लिए बड़ा हॉल था और ऊपर के तल पर व्यापारियों और अमीरों के लिए छोटे से लेकर बड़े बेहद सुरचिपूर्ण सज्जा से दमकते विशिष्ट चैम्बरस थे। हर कमरे में भोजन सर्विस करने के लिए दो से चार लड़कियाँ थीं। चेयरमेन को सब लोग पहचानते थे तो हमें एक ख़ास कमरे में बैठाया गया। जब भारतीय मेज़बान अमित ने यह सोचकर मुझे बताया कि शायद कहीं मुझे अजीब न लगे कि परम्परा के अनुसार ड्राइवर भी हमारे साथ ही बैठकर भोजन करेगा, तो मैंने हिंदी में उससे कहा कि चलो कहीं तो वामपन्थ के दर्शन हुए। अमित ने यह भी बताया कि चेयरमेन का लंच ढेर सारे व्यंजनों के साथ बहुत देर तक चलता है तो मैं हर डिश में थोड़ा-थोड़ा ही चखूँ वरना बाद में आने वाली डिशेज मेज़बान के सम्मान के लिए पेट भरा होने के बावजूद थोड़ी-बहुत खानी ज़रूर पड़ेंगी। बीयर पीने में चीनी लोगों का कोई जवाब नहीं। पीते हैं तो पीते ही जाते हैं। पर अगली सुबह तय वक्त पर बिना किसी बहाने या कोताही के चुस्ती से हाज़िर हो जाते हैं। अमित की सलाह बहुत काम आई। कुल मिलाकर बीस से ऊपर डिशेज आईं और थोड़ा-सा चखने के बावजूद भी पेट गले तक भर गया। स्वीट्स भी खानी पड़ीं। फिर वो कलात्मक चाय भी पी जिसमें चाय का एक छोटा लड्डू गर्म पानी में डाल दें तो वो धीरे धीरे खुलता है और चाय के पानी पर तैरता एक खूबसूरत फूल जैसा बन जाता है। बचा हुआ खाना जो बहुत सारा था, ड्राइवर साहब उनके परिवार और दोस्तों के लिए पैक करवा दिया गया।

सामान्यतया चीन के लोग अपरिचितों को भोजन के लिए घर आमंत्रित नही करते। दरअसल घर आने का आमंत्रण सिर्फ घनिष्ठ सम्बन्धियों और बहुत प्रगाढ़ मित्रों को ही देने की परम्परा है। घर पर खाना बनाने और रसोई सम्भालने का ज़िम्मा ज़्यादातर पुरुष सदस्यों को ही उठाना पड़ता है। चीनी महिलाएँ व्यापार और बच्चे सम्भालती हैं।

तानाशाही के चलते और सरकारी नीतियों के मद्देनज़र चीन में लेखकीय अभिव्यक्ति तो बहुत घुटी घुटी और कंडीशंड है पर कलात्मकता ख़ास तौर पर रंगों के ज़रिए – अत्यंत वैविध्यपूर्ण है। चीनियों का पेपर वर्क  और प्रिंटिंग दोनों ही उत्कृष्ट हैं। चीनी भाषा 80,000 प्रतीकों वाली संसार की सबसे प्राचीन लिखित भाषा है जिसमें न तो लिंग होता है और न ही एक वचन या बहुवचन या फिर भूत या भविष्य काल। शब्द को जिस तरह उच्चारित किया जाता है उसी से उसके अर्थ भिन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि विदेशों में रहने वाले चीनी सुविधा के लिए अपना नाम अंग्रेज़ी में बताते हैं।

भोजन के बाद अमित जी मुझे अच्छी तरह समझा कर, कि वहाँ बारगेनिंग यानी मोल भाव बहुत होता है, एक शॉपिंग सेंटर में ले गए। सारी दुकानदार लड़कियाँ ग्राहकों को लुभाते हुए बाँह पकड़ कर अपनी दुकान में खींच रही थीं। काफ़ी देर घूम-घाम कर मैंने एक ड्रेस पसंद की जिसकी क़ीमत लड़की  ने 200 युवान यानी 2200 रुपए बतायी। अमित जी ने 50 युवान से शुरू किया और फ़ाइनल 75 युवान कहा।

लड़की 100 युवान पर अटक गयी तो अमित जी ने हिंदी में कहा, जैसे ही हम दुकान से बाहर निकलेंगे ये पीछे से आवाज़ लगाकर 75 युवान में ही दे देगी। और वही हुआ। लड़की ने हमारे बाहर निकलते ही पीछे से आवाज़ लगाकर बुलाया नब्बे बोला। आख़िर में सौदा जब अस्सी युवान पर तय हो गया तो लड़की ने बड़ी रोनी सूरत बनाकर यह कहते हुए पैक किया कि नुक़सान में बेचना पड़ रहा है। इसी तरह मोल-तोल करते और भी खरीदारी हुई।

बाहर निकले तो अमित जी ने मुझे बाहर प्रतीक्षा करने को कहा क्योंकि उन्हें टॉयलेट इस्तेमाल करना था। मैंने इधर-उधर टहलक़दमी करते हुए थोड़ी दूरी पर एक बूढ़े को टोकरी में कुछ बेचते देखा जिसे कुछ जवान लड़के-लड़कियाँ पेपर कप में चॉपस्टिक द्वारा बड़े चाव से खा रहे थे। मैंने सोचा शायद नमकीन जैसा कुछ है क्योंकि बूढ़ा उसमें लहसुन, हरा धनिया और सिरका जैसा कुछ छिड़क कर बेच रहा था। पास पहुँचा तो देख कर हैरान हो गया क्योंकि टोकरी में तरह-तरह के बिलबिलाते ज़िंदा कीड़े थे  जिन्हें लड़के-लड़कियाँ गप्पें हांकते बड़े मज़े ले लेकर खा रहे थे।

140 करोड़ की आबादी वाला और एक करोड़ वर्ग किलोमीटर में फैला चीन तेइस प्रदेशों में बँटा हुआ ऐसा देश है जिसने 2200 वर्ष पहले से लेकर 1400 वर्ष पहले तक सिल्क रूट द्वारा अफ़्रीका, इटली और मेसोपटेनिया तक व्यापार किया। सदियों तक राजशाही, विदेशी आक्रमणों ने चीन को कई बार तबाह किया और मंगोलों के लगातार आक्रमणों के दौरान तो एक बार तो ऐसा भी हुआ कि चीन की बारह करोड़ की आबादी घट कर आधी रह गयी। 21196 किलोमीटर लम्बी जिस ग्रेट वाल आफ चाइना यानी चीन की अभेद्य महान दीवार को मैं दूसरे दिन देखने गया, वो बननी तो 2700 साल पहले ही शुरू हो गयी थी पर उसका मुख्य कार्य चिन शी हुआन के राज में 1200 बरस पहले शुरू हुआ। इसके 8850 किलोमीटर लम्बे निर्माण का बड़ा कार्य 650 साल पहले मिंग साम्राज्य में हुआ जब एक साथ तीन लाख सैनिक, पाँच लाख मज़दूर और तक़रीबन सारे सज़ायाफ़्ता अपराधी और अन्य लोग निर्माण कार्य में झोंक दिए गए। ऐसा भी कहा जाता है कि ऐसा भी दौर आया जब चीन की बीस फ़ीसदी आबादी सिर्फ़ दीवार बनाने के काम में लगा दी गयी थी। सोच कर देखिए कि जिस दीवार के निर्माण में चार लाख लोगों की जान गयी हो उसका निर्माण कितना मुश्किल और तकलीफ़देह रहा होगा।

अगले दिन सुबह नाश्ता करके बाहर निकला ही था कि अमित और लिलिंग मुझे लेने पहुँच गए। बाहर मौसम ख़राब था। रुक-रुक कर बारिश और बर्फ़बारी हो रही थी और ठंड भी ख़ासी थी। डेढ़ घंटे बाद  जब चीन की  दीवार  पर पहुँचे तो चीनी और विदेशी पर्यटकों की ख़ासी भीड़ थी। एक ही रंग के झंडे थामे बहुत से छोटे-छोटे स्कूली बच्चे स्कूलों की बसों में अपनी अध्यापिकाओं के साथ पहुँचे हुए थे। अलग-अलग बसों से निकलने  वाले बच्चों की पोशाकें और झंडे मुख़्तलिफ़ और ख़ास रंगो के थे ताकि बच्चे दूसरे ग्रुप में मिलकर ग़लत बस में सवार न हो जाएँ। अध्यापिकाओं के आदेश  के मुताबिक़ बच्चे एक हाथ में छोटी सी झंडी और दूसरा  हाथ आगे वाले बच्चे के कंधे पर रक्खे धीरे-धीरे सरक रहे थे। शुक्र था कि  बारिश बंद हो गई थी पर ठंड अभी भी ख़ासी थी। इसी बीच अमित जी हम सब के लिए ऊपर दीवार पर जाने के लिए प्रवेश टिकट ख़रीद लाए थे।

ऊपर पहुँचे तो उन मज़दूरों के, जिनकी हड्डियाँ आज भी दीवार के नीचे दफ़न हैं,  खून पसीने के कठोर परिश्रम को देख कर मन बोझिल हो गया। क्रूर मौसम, क्रूर अधिकारी आधे पेट खाना और दिन रात कड़ी मेहनत – यही  उनकी नियति बन गयी थी जब तक उनकी साँसे चलती रहीं। उन्होंने मनुष्य जाति के इतिहास की ऐसी भूतों-न-भविष्यति   रक्षात्मक दीवार बनायी जिसे 2700 बरसों के इतिहास में बड़ी मशक्क्तों के बाद सिर्फ़ चंगेज़ खान ही ध्वस्त कर पाया। दीवार की चौड़ाई कहीं छब्बीस तो कहीं चव्वन फ़ीट और कहीं-कहीं सिर्फ़ चार फ़ीट है। ऊँचाई कहीं भी बीस फ़ीट से कम नहीं और कहीं-कहीं छियालीस फ़ीट भी है। बीच-बीच में दूर से आते शत्रुओं पर निगाह रखने के लिए नियत दूरी पर वॉच टावर्स और सैनिकों के रहने के लिए बैरक भी बने है। टावर्स की छत पर शत्रु के आक्रमण की सूचना देने के लिए धुआँ पैदा किया जाता था ताकि दूर-दूर तैनात सब सैनिक सावधान हो जाएँ। वाच टावर्स से आने-जाने वाले व्यापारियों और देश में प्रवेश करने वाले अन्य लोगों  पर भी नियंत्रण किया जाता था।  

उसी रात एक और चीनी सज्जन ने बीजिंग के मशहूर भारतीय रेस्तराँ ‘ताज पेवेलियन’ में दावत दी जहां भारतीय भोजन का स्वाद दिल्ली में मिलने वाले अच्छे से अच्छे रेस्तराँ से इक्कीस ही था। एक ग़ज़ल गायक और गायिका संगत में फ़िल्मी गाने भी गा रहे थे। ग्राहक अधिकांश विदेशी या भारतीय थे। मेरा मेज़बान इकलौता चीनी था। पता लगा कि रेस्तराँ किसी भारतीय राजनेता के पुत्र का है और उन्होंने दिल्ली के कनाट प्लेस में एक चाइनीज़ रेस्तराँ भी खोल रक्खा है। पर जो भी हो खाना वाक़ई लाजवाब था और कमाल की बात ये कि महँगा नहीं था।

अगली सुबह क्योंकि अमित जी और लिलिंग व्यस्त थे, एक अधूरी सी अंग्रेज़ी जानने वाली  लड़की- जु ड्राइवर के साथ मुझे घुमाने के लिए आयी। लड़की कुछ भी बोलने से  पहले मुस्कराती थी और अपनी बात कह कर मेरे चेहरे के भाव पढ़ती थी कि मुझे कितना समझ आया। आज सुबह का कार्यक्रम बीजिंग से दो घंटे की ड्राइव पर एक क्विनदवांगहाओ वाइल्ड सफ़ारी देखने का था। टिकट ख़रीद कर जब सफ़ारी के अंदर घुसे तो औटोमटिक बंदूक़ थामे गार्ड ने लोहे का भारी भरकम दरवाज़ा खोलने से पहले ड्राइवर को बड़े सख़्त और शुष्क लहज़े में एक छोटी सी तक़रीर की। जु ने अनुवाद किया – गाड़ी  के दरवाज़े लॉक रखने है, शीशे बंद रखने हैं और चाहे जो भी हो भूलकर भी गाड़ी से बाहर पैर नही रखना है। मैं साफ़ देख सकता था कि यह सब सुनकर और मुझे बताकर जु ज़बरदस्त दहशत में आ गई थी। उसने बताया कि वो इससे पहले यहाँ कभी नहीं आई और पूरी सफ़ारी घूमने को बड़ी उत्सुक है। गार्ड ने बटन दबाया तो दरवाज़ा खुला। पचास फ़ीट दूर पर एक और वैसा ही भारी भरकम दरवाज़ा था जो अभी बंद था। जैसे ही ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ायी, पीछे वाला दरवाज़ा सरक कर बंद हो गया। थोड़ी देर बाद सामने वाला दूसरा दरवाज़ा खुला। गाड़ी ने जैसे ही दरवाज़ा पार किया, वो भी बंद हो गया। अब हम अपनी कार में सफ़ारी में घूमने को अकेले थे।

गौर से देखा तो आसपास मचानों पर लापरवाही से ऑटोमेटिक बंदूकें थामे गार्ड्स तैनात थे। पहला सेक्शन शेरों का था। जैसे ही कार थोड़ा आगे बढ़ी इधर-उधर न जाने कहाँ से तीन बड़े बड़े शेर कार के आस पास आ गए। एक शेर तो हमारी छोटी सी कार से भी बड़ा लग रहा था। मैंने बहुत से वाइल्ड सफ़ारी घूमे हैं पर अपने  जीवन में कभी इतने बड़े और भयंकर शेर न तो कभी उससे पहले देखे थे और न ही उसके बाद कभी देखे। अचानक मुझे अपनी बाँह पर कसाव महसूस हुआ तो देखा जु थर-थर डर से काँप रही थी  और उसकी  सही मायनों में घिग्घी बंधी हुई थी। उसने दोनों हाथों से कसकर मेरी बाँह को जकड़ रखा था। जैसे ही  एक शेर ने अपने लम्बे चौड़े जिस्म को कार से रगड़ना शुरू किया और कार ने हिचकोले खाए तो जु ने चीनी भाषा में बोलते हुए हिचकियाँ ले ले कर रोना शुरू कर दिया। मेरा और ड्राइवर का समझाना किसी काम न आया। जैसे ही ड्राइवर ने हॉर्न बजाया तो शेर चौंक कर एक तरफ़ हट गए और कार आगे बढ़ी। पर गार्डस को ड्राइवर का हॉर्न बजाना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने वहीं ऊपर मचान से ही चिल्लाकर चेतावनी दी कि सफ़ारी में हॉर्न बजाना वर्जित है। शेरों के पाँच सौ मीटर लम्बे सेक्शन से वैसे ही दो भारी भरकम दरवाज़ों के बीच से बाहर निकले जैसे अंदर घुसे थे। पाठकों को याद दिला दूँ – 2015 में चीन की एक सफ़ारी का विडियो सोशल मीडिया पर जम कर वायरल हुआ था जिसमें सफ़ारी में एक लड़की ने कार से बाहर निकलने की जैसे ही बेवक़ूफ़ी की – एक शेर ने झपट्टा मार कर उसे दबोच लिया और उठा ले गया। ये वही क्विनदवांगहाओ वाइल्ड सफ़ारी थी जिसमें से हम अभी अभी बाहर निकले थे। शेष सफ़ारी में सामान्य हिरन, हाथी, जिराफ़ वग़ैरा जानवर थे।

सफ़ारी से बाहर निकले तो बड़ी मुश्किल से जु के चेहरे की हंसी और रंगत लौटी और खिसियाकर खेद व्यक्त करने लगी। हालाँकि अमित जी ने सफ़ारी में शेरों की लाइव फ़ीडिंग वाला शो देखने की हिमायत की थी पर मुझे ये विचार ही बहुत हिंसक और जुगुप्सा पूर्ण लगा। जंगल के भीतर जानवरों द्वारा जानवरों का शिकार एक  प्राकृतिक कृत्य है पर चीनियों द्वारा पर्यटकों के लिए ऐसे प्रदर्शन की व्यवस्था करना गले नही उतरा।

वहाँ से जु तियानमिन चौक, जहां हज़ारों चीनी युवाओं को गोली से भून दिया गया था और टैंकों से कुचल दिया गया था, दिखाने ले गयी। चीनी राजनीति पर बात नहीं करते- पूछने पर या तो चुप हो जाते हैं, या बात को घुमा देते हैं। जब मैंने लड़की से उस भीषण नरसंहार के बारे में बात करनी चाही तो उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया। दो तीन बार दोहराने पर इतना ही बोली कि वो दुर्भाग्यपूर्ण था।

वहाँ से थोड़ी दूर पर ड़ेंगचिंग डिस्ट्रिक्ट में चीन की ऐश्वर्यपूर्ण मिंग राजशाही का प्रतीक सात सौ साल पुराना 980 भवनों और  9000 कमरों वाला 180 एकड़ में फैला फ़ोर्बिड़न सिटी यानी वर्जित शहर देखने गये जिसकी कलात्मक भव्यता देखकर कोई भी आश्चर्य से भर जाए। सौ वर्ष पहले इसे म्यूज़ियम बना दिया गया था और अब यह यूनेस्को द्वारा नामित विश्व धरोहर है और हर साल करोड़ों पर्यटक इसे देखने पहुँचते हैं। क्विंग राजशाही द्वारा निर्मित समर पैलेस यानी ग्रीष्मऋतु प्रासाद भी क़रीब 3000 भवनों वाला भव्य महल है जो 540 एकड़ में फैली मानव निर्मित विशाल झील के किनारे एक अत्यंत रमणीय और दर्शनीय स्थल है। यहाँ चालीस हज़ार ऐतिहासिक अवशेष संरक्षित हैं और इसे भी विश्व धरोहरों में सम्मिलित किया गया है।

चीन बहुत विशाल देश है और संस्कृति रूप से बहुत समृद्ध भी। गाँवों क़स्बों के पारम्परिक चाय घर देखना और वहाँ बैठकर आम आदमियों को चाय पीते देखना, उनके चेहरों की तनाव रेखाओं को शांत स्निग्ध मुस्कराहटों में परिवर्तित होते देखना – ख़ासा रूमानी अनुभव है। लम्बी नलकी वाली चाय की केतली, जिसका आविष्कार कभी दूर खड़े होकर मद्य पेश करने के लिए हुआ था – अब चीन की सांस्कृतिक धरोहर  का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लम्बी नली वाली केतली से चाय पेश करने की प्रतियोगिताएँ होती हैं  जिनके लिए लोग बड़ी गम्भीरता से तैयारी करके इनाम जीतते हैं। बीजिंग शंघाई और दूसरे बड़े शहरों के विशिष्ट रेस्तराओं में इसे ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए भी प्रयोग किया जाने लगा है। दूर खड़े होकर आपकी प्याली में लम्बी नली वाली केतली से इस तरह चाय पेश की जाती है कि आप सराहना किए बिना नहीं रह पाते। और कमाल की बात ये कि क्या मजाल है एक बूँद चाय इधर उधर गिर जाए या बिखर जाए।

हालाँकि जापान या दक्षिण कोरिया की तरह चीन में चाय पीना कोई धार्मिक आयोजन नहीं होता पर फिर भी चाय पीते समय – ख़ास तौर पर परम्परागत चाय घरों में -सामान्यतः लोग एक विशिष्ट  प्रकार की शांत  आभा से सहज हो जाते हैं। कहते हैं कि बहुत समय पहले जब चीन के एक सम्राट का सेवक पानी उबाल रहा था तो पास ही से जंगली चाय के पौधे की कुछ सूखी पत्तियाँ उड़ कर बर्तन में गिरी तो पानी हल्का गुलाबी हो गया जिसका रंग शाम के धुँधलके में नज़र नही आया। सम्राट ने जब उसे पिया तो उसे मन और शरीर में एक विशिष्ट प्रकार की चुस्ती फुर्ती का अहसास हुआ। यही से चा यानी चाय पीने की शुरुआत हुई।

बहुत से मित्र जिन्हें मेरी चीन यात्रा की जानकारी है अक्सर पूछ लेते हैं कि मेरे दृष्टिकोण से चीन की आर्थिक और भौतिक प्रगति के क्या कारण हो सकते हैं। हालाँकि न तो मैं चीन सम्बन्धी मामलों का जानकार हूँ और न ही किसी देश की आर्थिक और भौतिक प्रगति पर कोई भी राय देने के काबिल हूँ पर फिर भी जो बात मेरी छोटी सी समझ के दायरे में न चाहते हुए भी अक्सर मेरे मुँह से निकल जाती है वो है वामपन्थी सोच के कारण  -लगभग एक शताब्दी तक चीन का भगवान और भाग्यवाद को नकारना। पिछले कुछ दशकों में नयी-नयी  प्राप्त हुई सम्पन्नता के कारण चीन के लोगों में भी और ज़्यादा प्राप्त करने का लालच और प्राप्त हुए को खोने का भय जबसे पनपा है तब से कुछ लोग चोरी छुपे धार्मिक होकर हम भारतीयों की तरह मन्नतें माँगने लगे हैं।

हो सकता है मैं ग़लत हूँ पर मुझे लगता है कि चीन ने भले ही बहुत आर्थिक और भौतिक प्रगति कर ली हो पर विचारशीलता जन्य बौद्धिक लेखन में तानाशाही शासन के कारण चीन लगातार पिछड़ रहा है। मार्क्सिज़म के प्रबल प्रभाव के बावजूद  यूरोपीय देशों से घिरे रहने के कारण रूस के लोग बौद्धिक रूप से लगातार जागृत रहे और साहित्य में अमूल्य योगदान दिया। दूसरी तरफ़ चीन – जहां कनफुशियस,  लाओत्ज़ु, जुआंग जु, मोजि, वांग चोंग और जुशी जैसे महान दार्शनिकों ने जन्म लिया – पिछले कई दशकों में कोई ऐसा लेखक  विचारक पैदा नही कर पाया जिसने सीमाओं के पार अपना स्थान बनाया हो। शायद आर्थिक और भौतिक प्रगति की  – ख़ास तौर पर तानाशाही के निज़ाम में ऐसी ही क़ीमत चुकानी पड़ती हो।

कुछ दिनों में राजधानी बीजिंग के आस पास जितना कुछ देख सकता था – देखा। जिस किसी भी ज़रिए से जब भी कभी किसी चीनी व्यक्ति का भारत के बारे में नज़रिया जानने की कोशिश की तो कुछ दिलचस्प बातें पता लगीं। उनमें सबसे मज़ेदार यह थी कि भारत नाचने गाने वालों का देश है। इसकी वजह भी ख़ास है। कुछ अपवादों को छोड़ दें – जितनी भी भारतीय फ़िल्में चीनी भाषा में डब होकर वहाँ रिलीज़ होती हैं उनमें नाच – गाना  भरपूर होता है। ये वैसे ही है जैसे जितनी चीन या हांगकांग में बनी फ़िल्में  भारत में रिलीज़ होती हैं  वे सब कुंग फ़ू क़राटे मार्शल आर्ट से भरपूर होती हैं और इसी के आधार पर हमारे मन में चीनियों की छवि मार्शल आर्ट में माहिर लोगों की है।

आज मेरी चीन में आख़िरी शाम थी। लिलिंग और अमित जी मुझे बीजिंग के प्राचीन और पारंपरिक चीनी  रेस्तराँ में डिनर कराने ले गए। भोजन के साथ साथ संगीत और नृत्य का आयोजन भी था। पारम्परिक लाल  पीले रंग की चटकीली वेशभूषा में चीनी लड़कियाँ वाद्य यंत्रों से निकल रही सवार लहरियों पर छोटे-छोटे पंखे हाथ में लेकर बड़ा मोहक नृत्य कर रही थी। कई बार एक छोटे से तानपुरे सरीखा वाद्य यंत्र लिए कुछ लड़कियाँ हमारी मेज़ के पास आकर कोई धुन बजाने लगती थी। जितना उत्कृष्ट संगीत नृत्य और वेशभूषा का सामंजस्य था, उतना अच्छा भोजन नहीं था।

अगले रोज़ एयरपोर्ट पहुँचा तो पहले तो बताया गया कि एयर चाइना की फ़्लाइट ठीक टाइम पर यानी चार बजे रवाना होगी पर थोड़ी देर बाद एक एक घंटा सरक कर तीन घंटे देर बाद शाम सात बजे उड़ी। इसी बीच लाउंज में बैठे अहमदाबाद के एक गुजराती व्यापारी सज्जन से मित्रता हो गयी। मैंने अपना चीन का सिम कार्ड अमित जी को यह सोचकर वापस कर दिया था कि अब मुझे इसकी क्या ज़रूरत है। उदार हृदय गुजराती सज्जन के फ़ोन से  घर फ़्लाइट लेट होने की सूचना दी। दरअसल मुझे पता नही था कि एक अच्छी ख़ासी मुसीबत की शुरुआत हो चुकी है। बीजिंग से दिल्ली की नॉन-स्टॉप फ़्लाइट का टाइम था आठ घंटे का। लेकिन फ़्लाइट उड़ने के सिर्फ़ चार घंटे बाद ही सीट बेल्ट बांधने की घोषणा हुई और बताया गया कि टेक्निकल वजहों से जहाज़ को कुन्मिंग हवाई अड्डे पर उतारा जा रहा है। एयर होस्टेस कुछ बताने को तैय्यार नहीं थी। थोड़ी देर में जब जहाज़ झटके खाता हुआ आधी रात के वक्त सुनसान कुन्मिंग हवाई अड्डे पर उतरा तो सब यात्री पशोपेश में थे कि क्या हुआ। कोई कुछ  बताने को तैयार ही नहीं था कि क्या हो रहा है। सबको अपना हैंड बैग उठा कर हवाई जहाज़ से उतरने का निर्देश हुआ। बताया गया कि कुछ टेक्निकल प्रोब्लम है जो एक डेढ़ घंटे में दुरुस्त हो जाएगी और जहाज़ वापस उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाएगा।

एक बार फिर गुजराती सज्जन के फ़ोन से सारी वस्तुस्थिति की घर सूचना दी। आठ दस चीनी युवाओं का एक व्यापार मंडल भी दिल्ली जाने वाले यात्रियों में शुमार था। वो लोग एयर लाइन के अधिकारियों को ढूँढ रहे थे पर कोई हवाई अड्डे पर मौजूद नही था। ख़ैर! सुबह चार बजे कहा गया कि अब टेक्निकल समस्या सुलझा ली गयी है और उड़ान तैयार है। एक बार फिर जहाज़ ने उड़ान भरी। यात्री आँख बंद करके सोने की तैयारी में हाई थे कि  आधा घंटे बाद फिर सीट बेल्ट बांधने का निर्देश हुआ। पता लगा कि विमान वापस कुन्मिंग हवाई अड्डे पर लैंड करेगा। जब तक एक बार फिर कुन्मिंग हवाई अड्डे के लाउंज में पहुँचे तो सुबह होनी शुरू हो गयी थी क्योंकि  चीन तो वैसे ही सुदूर पूर्व में है। अब चीनी व्यापार मंडल के युवाओं ने ज़ोर ज़ोर से शोर करके पूरा हवाई अड्डा सा पर उठा लिया। सह यात्रीयों में एक भारतीय लड़की ने, जिसे थोड़ी बहुत मेंडेरिन यानी चीनी भाषा आती थी, बताया कि चीनी लड़के कह रहें है कि एयर चाइना एयर लाइन ने बीजिंग से ही जानते बूझते ख़राब विमान भेजा है क्योंकि वहाँ भी तीन घंटे की देरी इसी वज़ह से हुई और वे यह भी कह रहें हैं कि इसी विमान कम्पनी का एक जहाज़ कुछ महीने पहले ऐसी ही लापरवाही के चलते क्रेश हुआ था जिसमें सारे यात्री मारे गए थे।

यात्रियों  को शांत करने के लिए हवाई अड्डे की छोटी सी लाउंज में बेस्वाद नाश्ता सर्व  हुआ। यात्री क्योंकि रात भर से भूखे थे बिना शिकायत से चुपचाप खा गए। एयर लाइन वाले कह रहे थे कि रात के वक्त टेक्निशियन ठीक से समस्या ढूँढ नही पाए थे और अब होशियार लोगों ने समस्या ढूँढ़ ली है। एक पुर्ज़ा है जिसे लेकर एक विमान बीजिंग से चल चुका है। जहां चीनी युवाओं ने एयर लाइन कर्मचारियों की बात पर  विश्वास करने से और इंतज़ार करने से साफ़ मना कर दिया वहीं मेरे और गुजराती सज्जन समेत सारे भारतीय यात्री पशोपेश में थे कि क्या करें। दोपहर तक सारे चीनी यात्री लड़ते झगड़ते वापस बीजिंग की फ़्लाइट लेकर चले गए। कुछ भारतीय यात्री कलकत्ते की फ़्लाइट में सवार होकर निकल गए। बीस पच्चीस भारतीयों के अलावा पूरा लाउंज ख़ाली हो गया। मैं कृतज्ञ भाव से बार-बार गुजराती सज्जन के फ़ोन से हालातों की सूचना घर देता रहा। साँझ हो आयी। इसी बीच बेस्वाद लंच जैसा कुछ भी सर्व हुआ। आख़िरकार शाम सात बजे फिर उद्घोषणा हुई कि अब विमान दिल्ली जाने के लिए पूरी तरह दुरुस्त है। शंकित भाव डरे डरे से बचे खुचे यात्री विमान में तीसरी बार एक बार फिर सवार हुए। गुजराती साहेब ने पूछा क्या लगता है इस बार ठीक ठाक पहुँच जाएँगे। मैंने ऊँघते हुए जवाब दिया भाई देखो चार घंटे बाद मिलेंगे ज़रूर – या तो दिल्ली हवाई अड्डे पर या फिर उपर वाले के निज़ाम में!

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