पूर्णमिदम् – अनुपस्थिति में उपस्थिति का अनुभव

महेश दर्पण

Mahesh Darpan

फ्लैश बैक में कथा का आरंभ बंगाल के शहर त्रिवेणी से होता है। यहाँ वीरू अर्थात वीरेश्वर और ऋचा का बचपन गुज़रा है। कथारंभ के उपरांत उपन्यास तीन खंडों में विभक्त है। पहले खंड ‘प्रेक्षा’ से रचनाकार कथा के अतीत में खींच ले जाती हैं। यहाँ त्रिवेणी के सेठ रामदास अपनी बची-खुची संपत्ति के साथ हैं। उनके परिवार में बची है बेटी गौरा। दूसरा विवाह न करने वाले इस ज़मींदार के लिए बुर्जुआ मारवाड़ी समाज का कोई भय नहीं। उनकी पुरुष-दुनिया अलग ही थी। इस व्यक्ति के दो चेहरों में दो अलग व्यक्तित्व झलकते हैं। एक मस्ती भरा है और दूसरा ज्ञान चर्चा में लिप्त। पहले का संबंध शहर से है और दूसरे का गांव से।

नाति विस्तार शैली में कथा बताती है कि गौरा को वीरेश्वर का साथ पसंद है। पं. नवलकिशोर की बेटी ऋचा उसकी सहेली भर है। वह गौरा के साथ बैठ इसलिए पढ़ न पाती क्योंकि गौरा को उसका साथ बैठना नापसंद है। ऋचा का मंदिर में भजन-गायन अद्भुत है। वीरेश्वर उसका सखा है, और प्रिय सखी है टुकटुकी। कुम्हार पुत्र वीरेश्वर बंसी बजाता है तो ऋचा उसकी धुन पर ठुनकती है। पिता से ऋचा को विद्या का संस्कार मिला है। वीरेश्वर उसे अंकुरित करता है। कथा के भीतर का सच यह है कि ऋचा की माँ गरीबी से परेशान होकर पर-पुरुष के साथ भाग गई है। बीमार पिता सेठ रामदास से ऋचा को दूसरी बिटिया के रूप में स्वीकारने को कहते हैं। वह दरअसल, उसे गोपीवल्लम के चरणों में रहने का अधिकार दिलाने आये हैं।

कथा संकेत करती है कि ऋचा का मंदिर में रहने का अर्थ है देवदासी हो जाना और पर-पुरुष से संबंध निषेध। फिर भी ऋचा यह स्थिति स्वीकार लेती है। कारण है- पिता की शांति। वीरू को यह अच्छा नहीं लगता। गुस्से में इसीलिए वह अपनी प्रिय बंसी तालाब में फेंक देता है। पिता के निधन के साथ ही ऋचा को स्वामी जी से अपने लिए मंत्र मिलता है- ‘ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदम…।’ ऋचा में स्वामी जी को अरविंद की सावित्री नज़र आती है। पूर्णता को प्राप्त करने की पहली किरन।

कथा में मोड़ कठिन तब आता है जब मठ में बाबा का महाप्रयाण हो जाता है। वीरू गाँव छोड़ कर चला गया है, पर ऋचा को न दुःख है न पश्चाताप न आश्चर्य।

उपन्यास की कथा में बांग्ला उपन्यासों का-सा प्रवाह और रस विद्यमान है। ट्रेन में मिली महिला व वीरेश्वर का संवाद यह सच खोलता है कि दलित युवक के स्वाभिमान को ठेस लगी है। पर यही महिला मुसीबत में संपर्क करने के लिए उसे अपना कार्ड देती है। यही है इति भार्गव, जो पांडुलिपि संपादित करने का काम करती है।

गांव से शहर आया वीरू हतप्रभ है। वह यहाँ अपमानित, काम-काजहीन और हताश होकर इति के घर जा पहुंचता है। वहां उसका ससम्मान न सिर्फ स्वागत होता है, एक साप्ताहिक में नौकरी का प्रबंध भी हो जाता है। वहाँ के कार्यानुभव उसे घृणित सच से साक्षात कराते हैं। यह बिजनेस का ऐसा संसार है जहाँ किसी का कोई भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यहाँ तक कि स्त्री ही स्त्री का शोषण भी करवा सकती है। अखबार की स्पाँसर दयावती मैम का चरित्र वीरू के लिए हैरानी व दुख का कारण है। वीरू इस्तीफा देकर इति से झाड़ खाता है। पर सौगत दा के यहां जाना, राधा की मूर्ति बनाना, गौरा से भेंट उसके लिए भाग्य बदलने वाले बन जाते हैं। वीरू को स्वतंत्र रूप से एक प्रकाशन गृह चलाने का अवसर गौरा के कारण ही मिलता है। वह एक बड़े अमीर की संतान जो है।

कथा में ब्रेक उसे गांव की ओर शिफ्ट कर देता है। वहाँ ऋचा राधा-मूर्ति के सम्मुख गीत गोविंद के पद गा रही है। टुकटुकी उसका ध्यान इस ओर खींचती है कि राधा की मूर्ति में जैसे ऋचा की छाया मौजूद है। ऋचा का लिखा पुर्ज़ा टुकटुकी के माध्यम से वीरू तक पहुंचता है और वीरू की नवीन जानकारी ऋचा को मिलती है। कहानी ज़िंदगी की तरह सहज गति से बढ़ती है।

नदी किनारे हुए ऋचा-वीरू संवाद में राधा का चेहरा ऋचा सरीखा बनाने पर चर्चा, वीरू की आत्मा में बसी ऋचा, बंसी प्रकरण, ऋचा का बंसी की धुन सुनने का आग्रह, नए महंत के आने से परिवर्तित माहौल का मठ ही नहीं, ऋचा द्वारा आत्मा का स्वर सुनने की इच्छा और बापू का कथन स्मरण- ‘‘आत्मग्लानि से बड़ा दुख और आत्मदया से बड़ा पाप कुछ भी नहीं।’’

पर इस समाज का क्या करें जिसे दूसरों पर नज़र रखना ज़रूरी लगता है। वीरू-ऋचा के एकसाथ घूमने पर आपत्ति कि मंदिर-सेविका पराये छैले के साथ कैसे? पर ऋचा का मत सम्मुख है- ‘वीरू के साथ बैठना, मंदिर के नए महंत के साथ बैठने से कहीं ज्यादा पवित्र है।’ महंत का दशहरे की तैयारी के दिनों में इस कथन को सच कर दिखाना और कहना कि दलित के साथ रहना नियम विरुद्ध है। महंत से बचकर भागती ऋचा को टुकटुकी न सिर्फ देखती है, वह उसे अपने साथी वसु के साथ कलकत्ता चलने को कहती है।

दरअसल, वे ऋचा के अस्तित्व को शक्ति से भरना चाहते हैं। टुकटुकी से सब सूचना पा वीरू उन्हें इति के घर ले आता है। टुकटुकी इति को ऋचा की क्षमता के बारे में सूचित करती है कि वह तैयार है बंधनविहीन जीवन जीने को। मठ के अधर्म का स्थान बन जाने के कारण वह उसे छोड़ आई है। गौरा सब जान कर ऋचा को संगीत सिखाने का काम करने को प्रेरित करती है। वीरू-ऋचा का संवाद पाप-पुण्य की नवीन व्याख्या करता है। कथा का सच यह है कि ऋचा अबॉर्शन और विवाह में से एक विकल्प चुनने की स्थिति में है। निर्णय उसे ही लेना है। 

गौरा द्वारा घर की व्यवस्था के आश्वासन से वीरू खुश है। यहीं वीरू और ऋचा जीने के लिए बचे भविष्य के साथ रह सकेंगे। वीरू का प्रस्ताव है कि बच्चे के जन्म से पहले ही विवाह हो जाए, ताकि समाज की स्वीकृति मिल सके। ऐसे में ऋचा का मत महत्त्वपूर्ण है- ‘‘…हमारी आत्मीयता औरत-मर्द की नहीं है। तुम पलायन कर रहे हो वीरू, लेकिन बाबा के संस्कारों ने मुझे हर स्थिति में सत्य के सामने खड़े होने की शक्ति दी है। वीरू शादी ही यदि प्यार का, इस समस्या का इश्तहार है तो मैं ऐसे किसी विज्ञापन का ‘एड’ नहीं हूँ और न होना चाहती हूँ।’’ वह अपनी लड़ाई समाज, मठ से नहीं, अपने अस्तित्व की लड़ाई उस आवेग से बताती है जो भीतरी बल के माध्यम से एक सार्थकता, एक विज़न, जीवन जीने और आगे ले जाने के तत्त्वों की पहचान कराए।

इस खंड के अंत में अस्पताल में बेटी को जन्म देती ऋचा है और जन्म लेती यह जिज्ञासा भी कि अब आगे जाने क्या होगा! कथा बताती है कि यही है- ‘प्रेक्षा’ अर्थात् सम्यक का विवेक। और इसमें ऋचा की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वह रवीन्द्रनाथ से प्रेरित है और जब-तब उनके गीत गाती और गुनती है। रसीले सुरगान से युक्त यह नायिका इस बात पर यकीन करती है कि अपनी रक्षा हर सच के सामने करते रहना होगा।

खंड-दो का शीर्षक ‘तितिक्षा’ ठीक ही दिया गया है क्योंकि यहाँ द्वंद्वों को सहने की शक्ति सम्मुख होती है। वस्तुतः यह ऋचा के जीवन का एक नवीन अध्याय ही है जहाँ प्रज्ञा का जन्म एक प्रमुख घटना है। यह भी यूँ ही नहीं संभव हुआ। इससे पूर्व ऋचा गहरे ऊहापोह से गुज़री है। गर्भपात न करने के उसके निर्णय के पार्श्व में गर्भस्थ शिशु का स्वर है। यहाँ वीरू का स्वीकार और टुकटुकी की संतुष्टि भी महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ ही ऋचा अपने लेखन में जुट जाती है। बेटी को प्रज्ञा नाम ऋचा ने ही दिया है। वीरू के लिए तो वह पैगी है।

कथा बताती है कि ऋचा के प्रति वीरू के निर्दोष आकर्षण को गौरा दी प्रथमतः विवाह में परिवर्तित करना चाहती हैं। यह संभव न हो तो वीरू का मुक्त हो जाना स्वीकार है। असल बात यह है कि खुद गौरा के भीतर उसके लिए आकर्षण मौजूद है। ऋचा निर्णय वीरू पर छोड़ती है और ऐसे में गौरा-वीरू संवाद उल्लेखनीय बन जाता है।

रचनाकार वीरू के बहाने जातिभेद पर भी विचार करती दीखती हैं। इसके लिए वह गौरा से वीरू को कहलाती हैं- ‘‘जात सिर्फ एक कल्पना है वीरू। समाज ने अपने प्रयोजन की वज़ह से जाति भेद किया था।’’

अच्छी बात यह है कि उपन्यास की नायिका ऋचा कमज़ोर स्त्री नहीं है। वह बेटी प्रज्ञा की देखभाल के साथ-साथ लेखन कर्म भी करती रहती है। वीरू गौरा पब्लिकेशन में तो व्यस्त है ही, उसे ‘वास्तव’ में अब एक काबिल संपादक राशिद मिल गया है। राशिद के गायन पर मुग्ध है गौरा। समाज-धर्म से डरने वाले राशिद को गौरा खुद प्रपोज़ करती है। पर गौरा की सोच उसके संवाद में उपस्थित है- ‘‘…यह धर्म ही है, जो सामने होता है तो अवरोध पैदा करता है और पीछे हो तो वार करता है। इसलिए हम दोनों किसी धर्म के साथ संधि नहीं करेंगे। हमारा जीवन हमारा धर्म होगा।’’ उसमें मान्यताओं को लेकर प्रश्नांकन का भरपूर साहस है। उसी के साहस के कारण यह विवाह संपन्न भी हो जाता है।

ऋचा के उपन्यास के चर्चित होने की खबर के साथ ही इति दिल्ली की दो सुख्यात लेखिकाओं के आगमन की सूचना देती है। वही है जो महिला क्लब में ऋचा का वास्तविक परिचय देती है- ‘‘उसकी ऊर्जा फोकस्ड है तभी तो इतनी जल्दी इतना चर्चित साहित्य लिख पाई।’’ बताती है कि ‘‘ऋचा एक रौ में लिखती है- अपना लिखा दोबारा नहीं पढ़ती- सो ग्रामर, पंक्चुएशन आदि को देख लेती हूँ।’’

ऋचा की दो टूक बातें गॉसिपिंग में रस लेने वाली स्त्रियों के लिए करारा जवाब हैं। वीरू ने उसे कलम चलाने के लिए प्रोत्साहित किया है। उपन्यास में अनेक विधाओं का समावेश स्वतःस्फूर्त ढंग से हुआ है। विभा के लॉन में पार्टी का नज़ारा रिपोर्ताज़ शैली में है। यहाँ बाबा की छोटी उपस्थिति भी प्रभावी है। उन्हें ऋचा की रचना-शक्ति पर विश्वास है। पार्टी एक प्रकार से समूचे बौद्धिक समाज की कलई खोल देती है। बांग्ला भाषा कथा में प्रायः सहज है किंतु कहीं-कहीं उसका लंबा प्रयोग भाषा न जानने वाले के लिए जटिल हो सकता है।

संवाद इस उपन्यास के प्राण हैं। वासु-टुकटुकी संवाद में भी बहुत कुछ खुलता है। यहाँ वासु का खिदरपुर का अतीत और स्त्री के फेर में फंसकर इस्तेमाल हो जाना ही नहीं, टुकटुकी का प्रतिरोध भी कि वह फिर वासु के बच्चे की माँ न बनेगी। वासु का प्रायश्चित वीरू से संवाद में सामने आता है- ‘‘मैं तुम्हारी तरह नाम कमाना चाहता था। ऊंचा उठना चाहता था, लेकिन मैं तो निरंतर नीचे गिरता गया। निरर्थक इंसान। लेकिन मैं बना। मैं क्रांतिकारी बना, मैं आतंकवादी बना- मैं माओवादी बना।’’ उसकी भाषा में भरे हैं- क्रोध, घृणा, पीड़ा, निराशा। उसकी दुखद स्थिति का सच कथा खोलती है। जिनके लिए वह काम कर रहा था, वही उसकी जान के दुश्मन निकले। पर टुकटुकी की दृष्टि में तो वासु अपने कृत्य के कारण पहले ही मर चुका था।

ऋचा एक विकासवान चरित्र है। वह न सिर्फ अच्छी हिन्दी सीख चुकी है, उसकी दृष्टि में साहित्य वीरू के विचारों से सहमति है- ‘‘जीवन का सुख-दुख, उसके समस्त योग-वियोग की विच्छिन्नता और उन सब को एक अखंड सूत्र में गूंथना ही साहित्य है। जीवन को आश्रित करके लिखा साहित्य सच्चा हो सकता है, वरना सब शब्द विलास।’’

द्वंद्वों को सहने की शक्ति ही नहीं, तितिक्षा का एक अर्थ धैर्य भी है और कष्ट को चुपचाप सहन करने की क्षमता जुटा लेना भी। इस अर्थ में रामदास का चरित्र अद्भुत है। नए महंत की वज़ह से वह गाँव का मकान बेच देने की सोच रहा है, गाँव से उचट गया है उसका मन। गौरा-राशिद की मकान में कोई दिलचस्पी नहीं, गाँव में अब बस अपने मूल रूप में राधा-कृष्ण ही शेष हैं। रामदास को स्मरण रहती है स्वरूपानंद की शिक्षा कि मन का भाव मनुष्य का स्वरूप निर्धारित करता है। वह ऋचा की सहायता का अधिकार अर्जित किए रहता है।

राशिद का चरित्र अलग ढंग का है। यही कारण है कि उस पर इति का संदेह है कि वह गौरा के साथ रह भी पाएगा! सच यह है कि वह स्वयं राशिद के प्रति आकर्षित है उसका रोमांटिक चरित्र विचित्र है।

उपन्यास अनेक स्थलों पर संकेतों में भी बात करता दीखता है। जैसे शिक्षा के नाम पर गरीब बच्चों को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना। टुम्पा-ऋचा का संवाद इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। संवादों के सहारे ही उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है। सामान्य जीवन के मध्य बाबू सा तमाम दायित्व निभाते दीखते हैं। राशिद-इति संबंध की भनक भी उन्हें लग गई है। तभी वह गौरा के चाहने पर तलाक कराने को तत्पर हैं। पर गौरा यह चाहती कहाँ है! वह विश्वास करती है कि राशिद को इति जैसी स्त्री नहीं चाहिए। उधर ऋचा की नज़र में भी राशिद-इति संबंध केवल वासना के धरातल पर हैं! उसका यह सोचना गलत भी नहीं क्योंकि इति द्वारा विवाह की मांग करने पर राशिद का अस्वीकार सामने हो आता है। यही फिर इति द्वारा संबंध तोड़ देने का कारण भी बन जाता है।

अनुभवों से सीख, उपन्यास के मिजाज़ में है। भटकन के उपरांत राशिद गौरा के पास लौटता है, जो माँ बनने को है। वह इति-राशिद को क्षमा कर नए रिलेशनशिप के लिए तैयार है। इस स्थिति में ऋचा-इति संवाद महत्त्वपूर्ण है। ऋचा साफ कहती है- ‘‘सपने देखना ही है तो बड़े आकार के देख। भाव जगत से हटकर कर्म जगत के देख, जहाँ पर चार चैकीदार हमेशा तैनात रहते हैं। पहला चैकीदार सत्य, वह असत्य से बचाता है। दूसरा स्नेह, वह घृणा से बचाता है। तीसरा न्याय, वह अन्याय से बचाता है और चैथा त्याग, वह स्वार्थी होने से बचाता है।’’ वह इति को कर्म-जगत में लग जाने को प्रेरित करती है। इसका इति पर प्रभाव भी सकारात्मक पड़ता दीखता है।

दरअसल, ऋचा ही है, जो सबको बांधकर चलना चाहती है। उसका इति से संवाद बहुत कुछ कहता है- ‘‘तू शब्दों का पांडाल बना। वीरू दुर्गा की प्रतिमा बनाएगा। टुकटुकी प्रसाद और मैं अर्चना-पूजा करूंगी।’’

कथा में चरित्रों की टकराहट है, संघर्ष है और मेल भी। यहाँ सौगत दा सरीखे चरित्र पुल का काम करते हैं। वह ऋचा से श्रद्धा का परिचय कराते हैं। उसे सुषमा के अनुवाद के बारे में बताते हैं। यह दीगर बात है कि परस्पर बातचीत में दूसरों के चरित्र पर चर्चा भी होती चलती है। स्त्री विमर्श की लड़ाई पर सब सोच रहे हैं। श्रद्धा का विचार है- वह इस लड़ाई में इसलिए है कि स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता, परिष्कृत शिक्षा मिले और पुरुष का स्वामित्व हटे।

स्त्री विमर्श पर परिचर्चा एक रिपोर्ट की शक्ल में उपन्यास में प्रस्तुत है। इसमें ऋचा के विवेकशील विचार प्रभावित करते हैं। वह बहस को एक सांस्कृतिक आयोजन भर बना देने के स्थान पर नर-नारी को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए चाहती है कि पुरुष भी नारी के तेजस्व, उसके त्याग को सहर्ष स्वीकार करे। वह प्रेमचंद की ‘कफन’ की आलोचना करते हुए अपना तर्क प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि सौगत दा भी उसके प्रशंसक हैं- ‘‘ऋचा जैसी स्त्री हो जिसे रोने के लिए कोई अवलंबन, पकड़ने के लिए सहारे की, सृजन के लिए घोस्ट राइटर की ज़रूरत महसूस न हो। तभी स्त्री समृद्ध होगी।’’

गौरा की बेटी होने पर सबके साथ बाबू सा भी खुश हैं। रशीद को देख ऋचा भी खुश है- ‘‘लगता है, तुम्हारी जिंदगी की दिशा बदल रही है।’’ पर वह ‘वास्तव’ में दलित की चर्चा से उद्विग्न है। यहाँ बचपन में आंबेडकर साहित्य पढ़ लेने के कारण वीरू जाति व्यवस्था से पीड़ित नहीं है, पर ऋचा परेशान है कि ‘‘दलित शब्द वर्ण व्यवस्था को ही क्यों कहा जाता है? जबकि इसका अर्थ है वे व्यक्ति जो शोषित-उत्पीड़ित हैं।’’ वह सोचती है कि जब पहले भेद नहीं था तो फिर अब क्यों है?

उपन्यास की अच्छी बात यह है कि यह अनेक स्थलों पर व्यवस्था पर भी कटाक्ष करता चला है। हर स्कूल प्रज्ञा के पिता का नाम जानना चाहता है। रचनाकार की दृष्टि में यह सरस्वती की बेटी का अपमान है। प्रज्ञा एक अपराजित आत्मा की संतान है। परेशानी में हल यहाँ निकालता है वीरेश्वर, जो आगे बढ़कर अपना नाम देता है। ऋचा की चुप्पी पर, वीरू से संवाद तनाव भरा है। सच यह है कि ऋचा इतनी बड़ी यात्रा वीरू पर विश्वास के कारण ही तो कर सकी है। उसका यकीन है- ‘‘इंसान को उन कारणों को अस्वीकार करना भी आना चाहिए जिस वज़ह से उसे समझौता करना होता है।’’ इस स्थिति के उपरांत ही पूर्णमिदम् की सुगंध-सा साथ मिल पाता है। जैसा उसे वीरू का प्राप्त हुआ है। 

ऋचा स्वयं पर ही नहीं, अपने लेखन पर भी विचार करती है- ‘‘जाने कौन से लोक की गाथा है जिसका अंतर्दर्शन कर कलम लिखती जा रही है।’’

चरित्र नए जुड़ते जाते हैं, कथा अगली राह पकड़ती जाती है। प्रज्ञा-मिन्नी की कथा में प्रज्ञा अलग किस्म की है। उसे गोल्ड मेडल मिला है। वह आवेग, सार्थकता और अपना विज़न साथ लिए है। उसके आर्ट क्लासिक्स की प्रदर्शनी लगती है। प्रदर्शनी मंे उसकी चित्रकार अपूर्व से भेंट लगभग साक्षात्कार में बदल जाती है। अपूर्व उससे मिल इसलिए भी प्रसन्न है कि वह प्रसिद्ध लेखिका ऋचा शर्मा की बेटी है। परिवार के सब सदस्य शांति निकेतन गए हैं, प्रज्ञा नहीं। संयोग से वह और अपूर्व शिष्य मित्र निकलते हैं। दोनों में निकटता आती है।

शांति निकेतन यात्रा का विवरण कथा-रस को बदलता है। वहां सौगत दा का इतिहास पढ़ाने वाला भांजा शंकर सहज है। उसके और टुकटुकी के संवाद में आत्मीयता का विस्तार हो रहा है। ऋचा को शांतिनिकेतन का वातावरण मोहता है। प्रभावित तो वह रवीन्द्रनाथ से पहले ही थी, अब उसकी आत्मा भी उन से जुड़ा गई है।

कथा ऋचा-वीरू संवाद में खुलते वीरू के मन के साथ मुरशेद के गायन-अध्यात्म दर्शन में नई गति अर्जित करती है।

कथा-कभी शांति निकेतन तो कभी प्रज्ञा-अपूर्व प्रसंग में शिफ्ट करती चलती है। अपूर्व कला में ऐसी लड़की का अंकन करता है जो अपने पास्ट, प्रेजेंट और फ्यूचर को डिस्टिंगुइश नहीं कर पा रही। यह एब्सट्रैक्ट आर्ट है। प्रज्ञा अब हर वक्त अपूर्व पर ही सोच रही है।

शांतिनिकेतन के वातावरण में ही आकर्षण है। वहाँ बाउल गायन, बांग्ला उच्चारण, टुकटुकी का शंकर पर आकर्षण खुल रहा है।

हर पात्र के साथ उसका मनोजगत खोलती कथा है। राशिद को मिन्नी की चैकीदारी में फिक्र है। जाने कैसा होना चाहती है वह! दोस्तों के साथ पब में नौकरी और अड्डा मारना, बड़ों की अनसुनी करना और अपनी बात स्पष्ट कहना उसके मिजाज में है। मिन्नी पर गौरा-ऋचा का संवाद नई पीढ़ी को टैकल करने का नायाब तरीका सामने रखता है। ऋचा की गौरा को सलाह महत्त्वपूर्ण है- ‘‘धैर्य रखें गौरा दी। मिन्नी को थोड़ा स्पेस दो। जितना जकड़ोगी बालू की तरह आपके हाथ से निकल जाएगी।’’

प्रज्ञा का आकर्षक पक्ष यह है कि वह अपनी पीढ़ी के नवीन इतिहास से परिचित कराती है। अपनी पसंद का परिचय देती है। दिक्कत तब दरपेश होती है जब रात के वक्त अजाने संवादों में उसके पिता को लेकर प्रश्न उठ खड़े होते हैं। परेशान प्रज्ञा टुकटुकी से पिता की जानकारी चाहती है, पर वह उसे मां की दृढ़ता से परिचित करा कहती है कि उस जैसी पवित्र आत्मा कहाँ मिलती है! वहीं ऋचा से प्रज्ञा के सम्मुख होने पर प्रश्न उठता है तो ऋचा का उत्तर भी आता है- ‘‘मैंने न लोगों की परवाह की न उन सवालों का जवाब दिया। जवाब वह देता है जो गुनहगार होता है गुड़िया- और मैंने कोई गुनाह नहीं किया था।’’ बताने के लिए वह प्रज्ञा के बड़ी होने की प्रतीक्षा कर रही थी। वह बाबुम के साथ की पवित्रता को महत्त्व देती है। वह बताती है प्रज्ञा को साफ-साफ कि उसे जन्म देने के निर्णय पर उसे कोई पछतावा नहीं है। कहती है कि ऐसे हादसों को झेलने के लिए भीतर से मजबूत होना होगा। अपने चरित्र व व्यक्तित्व को विकसित करना होगा। दुख व कष्ट को कभी अपने वज़ूद से बड़ा मत होने देना।

चरित्रों की सोच कथा में उनके विचारों में सामने आती है। अपूर्व जैसे चरित्र का मत उसकी बात में उभरता है- ‘‘जानती हो प्रज्ञा किसी ऊंचाई को पाना सिर्फ उसे छूना नहीं है। वहाँ खड़े रहना भी है। तुम्हारा प्रश्न कहीं तुम्हारी माँ को डगमगा न दे। तुम्हें अपनी माँ की तरह बहादुर और संवेदनशील होना होगा।’’ वह ऋचा माँ जैसी अमूल्य निधि को अपनी मूढ़ता, अज्ञानता से फेंक न देने की सलाह देता है। इससे प्रज्ञा की समझ में विस्तार भी होता है। अपूर्व से मिलने पर उसे पेंटिंग में सावित्री नज़र आती है। पंेटिंग में अपूर्व अपने साथ उसका नाम भी रख, उसे अपनी प्रेरणा तो बताता ही है, जीवन में एक जनतांत्रिक मूल्य भी स्थापित करता है।

शंकर के आगमन से टुकटुकी स्वभावतः खुश है। पहचान को एनजीओ दर्ज़ा मिलने की सूचना पर ऋचा चाहती है कि टुकटुकी, प्रज्ञा, मिन्नी को उसका दायित्व सौंप दिया जाए। लंदन जाने की भी वह इच्छुक नहीं। उसे वहां का नाम, धाम, मानपत्र नहीं चाहिए। उधर वीरू खुद ‘पूर्णमिद्म’ के प्रकाशन को लेकर गंभीर है, इसलिए वह ऋचा के साथ जा नहीं सकता। ऋचा अपनी आत्मा हाॅलीवुड-बाॅलीवुड के पास गिरवी रखना नहीं चाहती। वह ‘युद्ध के कगार पर’ को लेकर बनने वाली फिल्म के प्रति बहुत उत्साहित नहीं है। इति ही है जो उसे कायदे से समझाकर काँट्रैक्ट साइन करने को किसी तरह राज़ी करती है।

अंततः लंदन जाते समय ऋचा प्रज्ञा को नॉर्थस्टार गिफ्ट करती है। उसे हरदम साथ रखने को कहती है। बताती है कि यह उसे गाइड करेगा। प्रज्ञा खुश है, वह बाबुम की बात का मर्म समझ रही है- ‘‘हम अपने जीवन के खुद ही लेखक हैं और खुद ही पाठक।’’

कथा में स्थितियों के अनुरूप मनःस्थितियाँ अंकित करने में उपन्यासकार ने पूरे मन से काम किया है। जैसे ऋचा के लंदन जाने के बाद वीरू की उदासी। उसका ऋचा से फोन पर संवाद। अनुपस्थिति को असहनीय पाना। परस्पर पत्र लिखने का वादा करना।

ऐसे ही एक प्रारंभिक पत्र में ऋचा का मन खुलते हुए दिखता है- ‘‘…ये पत्र नहीं, सूर्य का पृथ्वी को देखने के लिए झुकने की क्रिया है। पे्रक्षा-तितिक्षा की यात्रा के बाद अब मुमुक्षु की यात्रा पर आ गए हैं मित्र। तुम्हारे साथ मुझे एक गहरी आश्वस्ति, एक पूरा विश्वास- यात्रा की पूर्णता का पूर्ण सामथ्र्य मिला है पूर्णमिदम् की यात्रा।’’

इस क्रम का विस्तार है तीसरा खंड- ‘मुमुक्षा’। यह मोक्ष की कामना से जुड़ा है। यह खंड पत्र शैली में है। अधिकांश पत्र ऋचा द्वारा लिखे गए हैं। प्रायः ये पत्र वीरू को संबोधित हैं। कुछ ही पत्र हैं जो इति या प्रज्ञा द्वारा लिखे जाने के संकेत देते हैं। ऋचा विदेश की धरती पर अपनी यात्रा को मुमुक्षा की यात्रा कहती है। अपनी धरती से उसका गहरा लगाव उल्लेखनीय है।

एक पत्र में प्रज्ञा और वीरू का पत्र मिलने का संकेत है। ऋचा यहाँ अपने पत्रों को सहेजकर रखने का आग्रह तो करती ही है, खुद भी पत्रों को सहेजकर रखने का आश्वासन देती है। सच यह है कि इन पत्रों को वह इस यात्रा-समय का दस्तावेज़ ही बना देना चाहती है। पत्र बता रहा है कि प्रज्ञा ने उसे भारत की गतिविधियों की जानकारी दी है। पहचान संस्था में विशेषतः टुकटुकी की व्यस्तता। पत्र में ऋचा प्रज्ञा को ओल्ड होम में आकर रहने वाले लोगों की विवशता से परिचित कराती है। इसे समझने की ज़रूरत पर वह संजीदगी से बल देती है। सबसे बड़ा प्रश्न वह बताती है बुजु़र्गों की उपेक्षा और नकार को। बताती है कि उन्हें दरकार इंसानियत की है, दया की नहीं। उन्हें संस्था का अतिथि समझना ज़रूरी है। उन्हें यह अनुभव कराना होगा कि संस्था उन्हें उनका गौरव लौटा रही है। पत्र यहाँ भारत से विदेशी धरती की तुलना भी करता दीखता है। ऋचा बताती है कि वहाँ कुंवारी माँ चर्चा का विषय नहीं होती। उसे स्वीकृति मिल चुकी है। वह यह भी स्वीकार करती है कि भारत का इतिहास वहाँ कम ही लोग जानते हैं।

विदेश में माहौल ऐसा है कि किसी से आत्मीय वार्तालाप तक संभव नहीं। ऋचा वहां भारतीय बच्चों को संस्कार देने का काम भी कर रही है। उसे ‘लेखक’ किसे कहेंगी? सरीखे सवालों के जवाब भी देने होंगे। एक पेपर भी उसे पढ़ना है। यह पेपर ऋचा वीरू को भेजती है। विषय है- ‘वाॅट इज़ रिलिज़न’। इसका मर्म है- धर्म का स्वरूप कुछ भी हो परंतु धर्म का पालन प्रत्येक देश और जाति में सदा से चला आया है। जो योग्यता मनुष्य में है, उसके अनुरूप आचरण न करना धर्म से गिर जाना है। आदर्शों पर बने रहना पथभ्रष्ट होने से बचाता है। यह पत्र धर्म को बोझ न समझने और उसे मुक्ति की राह दिखाने वाला बताता है। कर्म का महत्त्व समझाता है। सरेंडर विदाउट कंडीशन पर यकीन करता है। इसका सार है- सब धर्म एक हैं, हमारी समझ का फर्क है। आनंद को यह पत्र विश्वचेतना के रूप में रेखांकित करता है। 

कभी-कभी ऋचा खुद कुछ विशेष न लिखकर अपने नाम आये प्रज्ञा के पत्र का उल्लेख करते हुए, उसकी बातों से वीरू को परिचित कराती है। साथ ही उसे मिली उन नसीहतों का ज़िक्र आता है जो उसे अपूर्व और टुकटुकी से मिली हैं। ऋचा टुकटुकी द्वारा प्रज्ञा की जिम्मेदारीपूर्वक देखरेख को महत्त्व देती हे। वह यह सब वीरू के साथ साझा करना चाहती है। उसका अनुभव है कि विदेश की इस धरती के लोग हँसना जानते हैं न रिश्ते बनाना। सब कुछ वहाँ व्यावसायिक है। अकेलापन नियति बन गया है। ऋचा को वीरू के साथ हुए अनुभवों की स्मृति अधिक स्मरणीय लगती है। वह बताती है कि वहाँ इंसान टुकड़ों-टुकड़ों में ही दिखता है। लगता है, जैसे इस समाज की रीढ़ ही गायब है। सब कुछ वहाँ अप्राकृत है। लाइफलेस शहर और लोग टैक्नीकल फूल्स।

ऋचा को यकीन है कि अपूर्व से प्रज्ञा को दिशा व शक्ति मिलेगी। वह पत्र में लंदन घूमने का ज़िक्र करती है। बताती है कि उसके उपन्यास अंग्रेजी में छप रहे हैं। ‘पूर्णमिदम्’ उसे भेजने को कहती है। बस रिव्यूज़ पर उसका यकीन नहीं, लेखन ही उसे आंनदित करता है। उसका कम बोलना वहां वाणी की कब्ज़ मान लिया जाता है। कब, कहाँ और क्या बोलने वाली है, वह पत्र में वीरू को बराबर बता रही है।

उसके ‘चक्रवात’ का नाट्य रूपांतर प्रारंभ हो चुका है। उसका यह अनुभव कि संसार कितना भी क्यों न सिकुड़ गया हो, देशों के सोचने के ढंग और आदर्श बिलकुल भिन्न हैं। लंदन ऋचा को नीरस लगा है। प्रवास में भी उसे प्रज्ञा की फिक्र रहती है। फिर भी, वह टुकटुकी और अपूर्व के कारण निश्चिंत है। उसे लगता है कि अंग्रेजों की सोच में परिवर्तन ला पाना कठिन है। रेसिस्म, ड्रग्स, बेकारी और सेक्स जैसी बुनियादी समस्याओं से घिरे रहते हैं वे। ये सत्य का सामना करना चाहते हैं न उसे थामना। भावनाहीन, दयाहीन, सहानुभूतिहीन परिस्थिति में कोई विवेकपूर्ण विश्लेषणात्मक साहित्य कैसे रच सकता है! ऐसे परिवेश में ऋचा को अपने लोगों का अभाव परेशान किए है।

अच्छी बात यह है कि ये पत्र अपने प्रिय की स्मृति में डूबे रहने भर का अंकन नहीं करते। बताते हैं कि अकेली ऋचा को लंदन में भारत की तमाम सूचनाएँ पत्रों के माध्यम से उपलब्ध हैं। जैसे इति के भेजे पत्र से उसे पता लगता है कि सौगत दा का देहांत हो चुका है। अपने पत्रों में भी ऋचा अनेक के हाल-चाल जानने को उत्सुक रहती है। यह अवश्य है कि अधिकांश पत्र वीरू को संबोधित हैं। पर वे सिर्फ उसके व वीरू के बारे में नहीं हैं।

एक पत्र में प्रज्ञा के एक अन्य पत्र का ज़िक्र आता है। इसमें यह उल्लेख है कि अपूर्व को विश्वास है कि प्रज्ञा जीवन की सफलता छू लेगी। वह ऋचा की बेटी है और माँ से पूरी तरह प्रभावित भी। वह अपूर्व के साथ मर्यादा में रहकर करीबी मित्र है। कथा का सार्थक पक्ष यह है कि ऋचा के आने की प्रतीक्षा भारत में सभी को है।

प्रज्ञा की बीमारी की खबर पाकर ही नहीं, उसकी समुचित तीमारदारी के संदेश से भी ऋचा प्रसन्न है। वीरू के पत्रों से उसे सब पता लगता रहता है। वीरू को भी ऋचा आराम की ज़रूरत समझाती है। उसे भारत लौटकर शंकर-टुकटुकी के विवाह की चिंता भी है।

ऋचा के पत्र से जाहिर होता है कि समीक्षकों ने उसके काम की प्रशंसा की है। बस डर उसे उस शहर से लग रहा है। पर उसे यकीन है बाबा की वाणी के सत्य पर कि वह मोक्ष प्राप्त करेगी। पत्रांतों में ऋचा कहीं ‘तुम्हारी मैं’ लिखती है तो कहीं ‘तेरी ऋचा’। कहीं केवल ‘ऋचा’ भी। उसका वीरू से आग्रह रहता है कि वह मुरली न छोडे़। प्रज्ञा की तरक्की को वह वीरू का कमाल मानती है। अपूर्व को भी स्वदेश लौट कर वह अपने नज़रिए से देखने का मन बना चुकी है। प्रज्ञा के बारे में सोचते हुए उसे अपना बचपन याद हो आता है। भारत लौटने के दिन करीब आने से ऋचा अतिरिक्त उत्साहित है। वीरू के साथ मिलकर वह प्रज्ञा-अपूर्व की शादी करना चाहती है। वीरू के अवदान के प्रति वह कृतज्ञ है। बल्कि स्वयँ को तो वह वीरू की सृष्टि ही कहती है। स्वयँ तो वह बात समझ न आने पर मूर्ख कहलाने तक को भी स्वीकार करती है।

पत्रों वाले इस खंड में माँ के नाम प्रज्ञा का पत्र बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इसमें वह अपनी कुंठा व उदासी को उजागर करती है। अपने बाबुम व माँ के बीच के आत्मिक प्रेम को वह खूब समझती है। माँ-बाप के हाथों ही अपना विवाह संपन्न होते देखना चाहती है। इसी खंड में इति के नाम ऋचा का पत्र, बरमिंघम से रवाना होने से पूर्व भारत आ रहे किसी व्यक्ति के हाथ भिजवाया गया है। इसमें यह खुशी व्यक्त की गई है कि प्रज्ञा-अपूर्व के विवाह में अपने सपनों को साकार होते देखा जा सकेगा। अपने भारत लौटने को वह वीरू के लिए एक सरप्राइज़ के रूप में रखना चाहती है। यह अपेक्षाकृत अधिक खुलकर लिखा गया पत्र है।

पत्रों की यह दुनिया उपन्यास की एकरसता तो तोड़ती ही है, उपन्यास खत्म हो जाने के बाद भी पाठक कथा में आगे विचार करने को बाध्य हो जाता है उसकी दुनिया में डूबा हुआ-सा। सोचता हुआ कि ऋचा के साथ जाने कितने सपनों का अंत हुआ होगा! यदि वह बची रहती तो? इसे हम अनुपस्थिति में उपस्थिति का रचनात्मक अनुभव कह सकते हैं। ऋचा का शरीरांत भले हो गया हो, यह उपन्यास उसके बहाने एक स्वस्थ स्त्री विमर्श अवश्य प्रस्तुत करता है।

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