कैद में किताब

सुरेन्द्र मनन

सुरेन्द्र मननवह एक छोटा-सा क्यूबिकल था जिसमें आमने-सामने रखी दो कुर्सियां और बीच में एक मेज़ थी. इधर की कुर्सी पर मैं, और सामने की कुर्सी पर बड़ी बिंदी वाली एक महिला बैठी थी. महिला के चेहरे को काली-स्लेटी तारों जैसे बालों ने जैसे बड़ी एहतियात से अपनी अंजुरी में समेटा हुआ था. लिक्विड आईलाइनर से चित्रित उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों के नीचे मांस की छोटी-छोटी सुस्त-सी पोटलियां थीं, जिन्हें उंगली से छूने का बार-बार मेरा मन कर रहा था. उसके शरीर से फूटती मंद-मंद सुगंध क्यूबिकल में फैली थी, जो असहज करने की बजाए बड़ी शांति और सुकून का अहसास करवाती. अंदर आकर कुर्सी पर बैठने से पहले तक मैं दुविधा में थी, और शंकित भी, लेकिन जब तक हमारा परिचय हुआ और संक्षिप्त-सी रस्मी बातचीत, तब तक मेरा मन शांत हो चुका था और मैं विश्रांत. यह ऐसा लक्षण था कि अपनी जिल्द उठा कर पलटने के लिए मन ही मन मैं तैयार हो चुकी हूँ.

“ तो शुरू करें ? महिला के होठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी.

“ मुझे पढ़ कर शायद आपको निराशा ही हो”  मैंने शुरू में ही स्पष्ट करते हुए कहा, “क्योंकि आपको कोई रोचक कथा या रोमांचकारी घटनाएं सुनने को नहीं मिलेंगी.” 

“ जब न कथा है, न ही कोई घटना, तो फिर सुनने को क्या है? उसने उसी तरह से मुस्कराते हुए सवाल किया.

“ कथा और घटना के अलावा वह सब कुछ जिससे कोई कथा बनती है या जो किसी घटना का कारण बनता है” मैंने क्यूबिकल में उसकी उपस्थिति के प्रभाव को छिन्न-भिन्न करते हुए बिलकुल कोरेपन से जबाव दिया और उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगी.

“ इंटरेस्टिंग !” उसने आँखें मटकाईं और फिर दुहराया “तो शुरू करें?”

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ज़ाहिर था कि मेरे रूखे व्यवहार ने उसे निरुत्साहित नहीं किया. मुझे लगा, वह तय करके आई है कि जो  किताब उसने चुनी है उसे वह अपनी मर्ज़ी से पढ़ेगी. हो सकता है वह आखिरी पन्ना पहले पढ़ना चाहे, या मन करे तो बीच के कुछ पन्ने सरसरी नज़र से देखने लगे, या यह भी हो सकता है कि पन्ने ऐसे ही उलटती-पलटती रहे और उसकी रूचि सिर्फ अगला-पिछला कवर देखने में ही हो. उसकी इच्छा पर किताब का कोई बस तो हो नहीं सकता.

यह सब मैंने सोच तो लिया लेकिन इनमें से कोई भी तरीका मुझे मंज़ूर नहीं था. पाठक के लिए मैं इतनी उदार नहीं हो सकती थी कि लगे, पढ़े जाने के लिए उससे याचना कर रही हूँ, या उसकी दया पर आश्रित हूँ. पढ़ना है तो उसे अपना रवैया बदलना होगा और ऐसे नखरे छोड़ कर मुझे गम्भीरता से लेना होगा. मैं किसी के मन-बहलाव के लिए तो यहां थी नहीं. न ही किसी के ऊबने की मुझे परवाह थी. अगर सुनने-पढ़ने वाला किसी जिज्ञासा के कारण यहां आया है तो मेरे यहाँ होने की भी तो कोई खास वजह रही होगी. वर्ना मुझे ‘ह्यूमन-बुक’ बनने का ऐसा क्या शौक चर्राया था ?

अपनी झोंक में जिल्द में से कूद कर मैं बाहर निकल आया. किताब की बजाए अपने असली रूप में आ गया. ‘ई’ से ‘आ’ बन गया और महिला को तौलती नजरों से देखने लगा. उसके चेहरे पर वैसी ही निर्दोष मुस्कराहट अभी भी थी. मुझे लगा कि बात को मैं कुछ ज्यादा तूल तो नहीं दे रहा ? वह यहाँ पर आई है, और उसने मुझे पढ़ने का निर्णय किया है, तो कुछ सोच-समझ कर ही ऐसा किया होगा वर्ना और भी तो किताबें हैं. मैं पहले से ही यह राय कैसे कायम कर सकता हूँ कि उसका रवैया ऐसा है या रूचि वैसी है? ऐसा पूर्वाग्रह रखना एक तरह से उसके प्रति अन्याय ही होगा. मैं चुपचाप फिर से अपनी जिल्द में वापिस आ गया. फिर से किताब की शक्ल ले ली.

मेज़ पर थोड़ा आगे झुक कर ठुड्डी हथेली पर टिकाए वह एकटक मुझे देख रही थी. हमारे बीच का फासला इतना भर था कि मैं सिर्फ उसकी उत्सुक आँखों को देख पा रहा था. कुछ देर के बाद उत्सुकता या किसी और भाव की पहचान भी गुम हो गई. वे आँखें जैसे दो चिकनी, मुलायम, थरथर करती हुई ऐसी अतल गहराइयाँ थीं कि जिनमें मैं एक बार उतरा तो फिसलता चला गया और मारा-मारा फिरता हुआ खुद को ही ढूंढने लगा…

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किसी भागती-लहराती छाया का पीछा करता हुआ अब मैं लगातार कुछ ऐसा बोल रहा था जो खुद मुझे सुनाई नहीं दे रहा था. कारण शायद यह था कि वे शब्द मेरे थे ही नहीं. उन पर तो उस छाया का स्वामित्व था. वे उसकी सम्पति थे, मैं सिर्फ निगरानी करने वाला था. और इस उम्मीद में था कि स्वरों की वे तरंगें छाया से लिपट कर उसे मेरे पास खींच ले आयेंगी. मेरे साथ उसे एकमेक कर देंगीं और उस गहरी कचोट से मुझे छुटकारा मिल जाएगा, जो हर पल मुझे बैचैन किए रखती है. जिसके कारण उस एक साल के दौरान, जो मैंने जेल में बिताया, मेरे अंदर,बाहर, आसपास, दूर-निकट की हर चीज गुंजलकों में उलझ गई थी. हर किसी का सिरा मेरे हाथ से छूट चुका था. मैं न किसी से भिन्न रहा था न अभिन्न, न सम्बद्ध न असम्बद्ध, न मेरी कोई पहचान बची थी न मैं अनपहचाना था, और न मेरा वह परिचय ही था जिससे मैं परिचित था.

वह साल ऐसा ही था, जिसने मेरी बाकी जिंदगी को अपने साये तले ढँक लिया था. उस साल के तमाम दिनों और रातों के अंतहीन फैलाव में मैं उस शख्स की काया ओढ़ कर जिंदगी जीता रहा, जिसे न तो मैं जानता था न ही जिसे कभी मैंने देखा था. मैं उस नाम से जाना और पुकारा जाता था जो पैदा होने से लेकर कभी मेरी शख्सियत की पहचान नहीं रहा था. मैं एक ऐसे जुर्म के कारण जेल में बंद था जिसका मतलब उस दिन से पहले तक मुझे मालूम न था. ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ –  मुझ पर लगाए गए आरोप से बरी करते हुए जज ने जब अपना फैसला सुनाया, तभी मेरी भटकन को कोई नाम मिल पाया और मुझे उसकी पहचान हुई. मैं उसे ठीक-ठीक तरह से चिन्हित कर पाया. तभी से उससे छुटकारा पाने, उससे मुक्त होने और अपनी रिहाई की अधूरी प्रक्रिया को पूरी करने के लिए मैं तरह तरह की कोशिशें करता रहा, कई किस्म के तरीके अपनाए, बार-बार असफल होता रहा और आखिरकार अब मैंने ‘ह्यूमन बुक’ के रूप में खुद को प्रस्तुत करने का फैसला लिया था.

लेकिन मुझ पर लगाए गए आरोप से बरी कर दिए जाने के बाद भी मैं खुद को रिहा स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहा था? अपनी रिहाई को महसूस कर पाने में मुझे इतना लंबा और कष्टदायक समय क्यों लग रहा था?

इसका कारण स्पष्ट भी था और अस्पष्ट भी. या मुझे ही चीज़ों को सही ढंग से समझने में इतनीदेर लगती थी. मिसाल के तौर पर हालाँकि माहौल ऐसा था कि रोज़ी-रोटी के लिए

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एड़ियाँ रगड़ता साधारण आदमी भी किसी अनदेखे खतरे, खौफ और अंदेशे की गिरफ्त में था, और इस कदर सहमा हुआ कि मुंह खोलने से पहले दस बार सोचे कि उसकी बात का गलत अर्थ तो नहीं ले लिया जाएगा, और मुंह खोलने वालों पर आये दिन खुलेआम हमला होने की घटनाएँ भी होती ही रहती थीं, फिर भी मैं उनसे अप्रभावित ही बना रहा था. जानते हुए भी मुझे उन पर यकीन न हो पाता था. यकीन न भी कहें, उन्हें लेकर ख़ास चिंतित नहीं होता था. मैं सोचता था कि ऐसी बातों को जानबूझ कर, बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है और मेरा यह भ्रम तब तक बना रहा, जब तक कि मैं खुद भुक्तभोगी न बना. मेरी आँखें तब खुलीं, जब मुझे, मैं जो नहीं था, वह बना कर सींखचों के पीछे डाल दिया गया.                 

वह दिन मेरी जिंदगी के आम दिनों की तरह ही था जब नाटक की रिहर्सल के बाद कालेज से मैं अपने  घर लौट रहा था. नाटक में मेरा एक अत्यंत भावपूर्ण मोनोलॉग था जिसकी अदायगी के बाद मैंने दर्शकों को सम्बोधित करके उनका आह्वान करना था. जिस पात्र का चरित्र मैं अभिनीत कर रहा था, उससे इस कदर मन-प्राण से एकमेक हो चुका था कि वैसा ही व्यवहार करता और अपने संवादों से इतना अभिभूत कि हर समय उन्हें ही दुहराता रहता. उस दिन भी, जब पुलिस की जीप सायरन बजाती हुई मेरी बाइक का पीछा कर रही थी, मैं ऐसी ही मन:स्थिति में था.

अपने तिलिस्म में से बाहर मैं तब आया, जब जीप से छलांगें लगाते हुए वे मुझे घेर कर खड़े हो गए. एक ने मुझे घूँसा जड़ा और इससे पहले कि संभल पाऊं, दूसरे ने कालर से घसीटते हुए मुझे जीप में  पटक दिया. मैंने विरोध में कुछ कहना चाहा तो एक और घूँसा मेरी कनपटी पर वज्र की तरह पड़ा. बेहोश होने से पहले मैं इतना ही सुन पाया कि मेरे इरादों के बारे में उन्हें पता चल चुका है. बस, उस क्षण के बाद से ही, कुछ भी पहले जैसा न रहा. सब कुछ बदल गया – मैं, मेरा नाम, मेरी पहचान, मेरी शख्सियत, मेरी जिंदगी और यहाँ तक कि मेरी सोच भी… 

यह ऐसा था मानो मुझे उठा कर मेरी रोजमर्रा की जिंदगी से काट कर अलग कर दिया गया हो. यह बदलाव इतना अचानक और इतना बड़ा था कि मैं खुद से ही अपना तालमेल खोबैठा. और दिन-ब-दिन बेमेल होने की यह स्थिति बिगड़ती ही चली गई. इन्टैरोगेशन के दौरान.

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मुझसे ऐसी बातों के बारे में सवाल पूछे जाते थे जिनसे अब तक की जिंदगी में कभी मेरा कोई वास्ता न रहा था, उनका मेरे पास जबाव तो क्या होता? क्योंकि मुझे धारा 124-ए के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था, इसलिए कई बार तो मुझे घोर आश्चर्य होता कि क्या मैं सचमुच किसी ऐसे खतरनाक व्यक्ति जैसा दिखता हूँ जो सरकार, और इसलिए जैसा कि वे समझते थे, देश के लिए भी खतरा हो और कि जिसने किसी षड्यंत्र की साजिश रची हो? जबकि मैं अपने आप को एक कलाकार, सीधा-सादा नेक इन्सान और अपने अधिकारों के प्रति सचेत नागरिक ही मानता था. देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी, षड्यंत्रकारी जैसी उपाधियाँ जो मुझे दे दी गई थीं, उन्हें सुन कर ही लगता मानो मेरे शरीर में से कई-कई हाथ निकल आये हों, जिनमें तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र हों. लेकिन मेरे बारे में वे यही तय कर चुके थे. बार-बार मुझसे मेरा ‘मैं’ नोच-नोच कर उतारा जा रहा था और मनवाया जा रहा था कि मैं वो हूँ, जो नहीं हूँ. ज्यों-ज्यों मैं अपने-आप को लुप्त होता हुआ देख रहा था, उतनी ही मेरी छटपटाहट बढ़ती जा रही थी. साल भर मैं इसी यन्त्रणा को झेलता रहा था. 

गलत शिनाख्त ! भ्रांतिपूर्ण पहचान ! ये थे तो शब्द मात्र, लेकिन चूंकि इतने लंबे समय तक मैं उनका शिकार रहा था, इसलिए उन्होंने मेरे समूचे व्यक्तित्त्व को ही बदल डाला था. चाहे मैं अब रिहा था,आज़ाद था, लेकिन वह नहीं रहा था जो साल भर पहले हुआ करता था. मेरी सजा, जैसे मेरा प्रशिक्षण थी. चाहे मेरा समूचा व्यक्तित्व गांठों की गठरी में तब्दील हो चुका था लेकिन अब मैं वह सब देख सकता था जो पहले नहीं देख पाता था. मुझे एक नई दृष्टि मिल गई थी और यहीं से नया संकट भी शुरू हुआ था. 

जेल से बाहर आकर मैंने देखा कि सिर्फ मैं ही इस व्यथा से पीड़ित नहीं था, बल्कि यह समस्या ज्यादातर लोगों के साथ थी. अनेक लोग इस पीड़ा को झेल रहे थे. जेल से बाहर का हर व्यक्ति आज़ाद तो था, लेकिन एक अलग ही तरह से दण्डित और उत्पीड़ित था. या तो ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ उसे दे दी गई थी, या उस खौफ से बचने के लिए उसने खुद ही अपनी ‘आइडेंटिटी’ को कई-कई परदों में ढँक लिया था. कोई भी वैसा व्यवहार नहीं कर रहा था जैसा कि वास्तव में वह सोचता-समझता था. पकड़ लिए जाने, राह चलते धर लिए जाने के डर से हरेक ने अपने चेहरे पर कोई दूसरा चेहरा चिपका लिया था. इस तरह हर कोई अपने-आप सेजुदा हो चुका था, बल्कि जुदा कर दिया गया था. क्योंकि ओढ़ा हुआ नकली चेहरा स्वाभाविक नहीं था,वह प्रकृति के विपरीत था, शारीरिक मुद्राओं से मेल नहीं खाता था, इसलिएहर कोई 

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बौखलाया हुआ अपने-आप को ढूंढ रहा था. हर कोई असली-नकली चेहरे की खींचतान में उलझा हुआ, इसी कशमकश में फंसा छटपटा रहा था. जिस तरह बिना किसी अपराध के, बिना किसी सुनवाई या मुकद्दमे के मैं सजा काटता रहा था, कुछ-कुछ वैसे ही जेल के बाहर मेरे आसपास के लोग भी सजा काट रहे थे. 

क्या असल में ही ऐसा है या अपनी मन:स्थिति के कारण मुझे ऐसा लग रहा है? मैंने इस स्थिति को वस्तुपरक ढंग से समझने की कोशिश की. स्वयं से तटस्थ होकर, ‘स्वयं’ को और आसपास के लोगों को समझने-परखने का प्रयास किया. कभी खुद को झाड़-पोंछ कर निहारा, कभी दूसरों के भीतर तांक-झांक की. उनके व्यवहार से यह अंदाज़ा लगा पाना मेरे लिए  मुश्किल न था कि इस चुप्पी के पीछे क्या-क्या उमड़-घुमड़ रहा है. लेकिन दिक्कत यह थी कि इस संकट के बारे में बात करने से हर कोई बिदक रहा था. कभी कोई कुछ बोलने को होता भी, तो अचानक उसकी आँखों में ऐसा भाव आता मानो हवा में लहराती तलवारें देख ली हों. तुरंत अपनी जुबान को भींच कर वह आँखें चुराता हुआ टालमटोल करने लगता. क्या वे इंसान नहीं रहे, मात्र मांसपिंड हैं? मैं खीझ जाता. एक-दूसरे से बचते-बचाते क्या वे इसी तरह इधर-उधर डोलते रहेंगे? कब उनके मुंह से कुछ शब्द फूटेंगे जिन्हें मैं सुन पाऊंगा या मेरी जुबान कैसे उनके सुन्न पड़े कानों को झिंझोड़ पायेगी? या यूं ही सब मातमपुर्सी में बुत बने एक-दूसरे को ताकते रहेंगे? कई दिनों तक मैं इसी संकट-स्थिति के शिकंजे में फंसा छटपटाता रहा.    

उस रात मैं बड़ी देर तक अपने बिस्तर पर करवटें बदलता रहा था. मेरा मन कई तरह की भावनाओं से लबालब भरा हुआ था. अचानक मैं उठा और कमरे के बीचों-बीच खड़ा होकर तरह-तरह की मुद्राएँ बनाता हुआ कुछ बोलने लगा. दीवार पर नाच रही अपनी कई गुणा बड़ी छाया को सम्बोधित करते हुए जो कुछ मैं बोल रहा था, जब उसकी तरफ मेरा ध्यान गया तो अचकचा कर रुक गया. मुझे याद आया कि मैं वही मोनोलॉग बोल रहा था जिसकी रिहर्सल साल भर पहले नाटक के लिए कर रहा था, और कि जब पुलिस ने मुझे धर दबोचा था. मैं एकाएक सहम गया. दबे पाँव खिड़की तक जाकर मैंने बाहर झाँका कि कोई आस-पास तो नहीं जिसने मुझे बोलते हुए सुन लिया हो? फिर चुपचाप वापिस बिस्तर पर जा लेटा.

कुछ देर बाद मैं फिर उठा और मेज़ की दराज से अपनी नोटबुक निकाल कर कुछ लिखने लगा. दरअसल मैं नहीं लिख रहा था, कुछ ऐसा था जो अपने-आप हाथ में पकड़े पेन के जरिए कागज़ पर इस तरह उतरता चला जा रहा था कि मानो बूंद-बूंद करके मैं खुद रिस रहा हूं. तभी 

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मुझे यह पता चलपाया कि संवादहीनता की स्थिति में दूसरों के साथ जब न किसी तरह का कोई सम्पर्क बचा हो, न सहभागिता, तब आत्मालाप ही तो उस अभाव की जगह लेगा. मुझे यह भी लगा कि अपने अंदर उठते बगूलों को इस तरह कागज पर उतारने से मुझे उनसे निजात मिल जायेगी. यह एक कैथार्सिस की-सी प्रक्रिया होगी और कम-स-कम मुझे कुछ चैन मिल पायेगा. साथ ही यह भी संभव है कि ऐसी कोशिश अपने बहाने दूसरों को ज़्यादा अच्छी तरह से समझ पाने का ज़रिया बन जाए और मैं उनसे अंतरंग हो पाऊँ. कुछ देर तक मैं ऐसे ही लिखता चला गया, फिर अचानक मेरा हाथ रुक गया. 

जो कुछ मैंने लिखा था, उसे पढ़ कर मुझे सख्त कोफ़्त हुई. कारण यह कि कागज़ पर जो कुछ लिखा हुआ था,वह सब प्रथम पुरुष में था. पढ़ते हुए मैंने पाया कि लिखे हुए हर वाक्य के शुरू या बीच में ‘मैं’ आ रहा है और वह ऐसी अनुभूति दे रहा है मानो अपने सारे परिवेश को मैंने अपने आस-पास लपेट लिया है, किसी खोल की तरह उसे अपने ऊपर चढ़ा लिया है,और उसमें से किसी चूजे की तरह मुंडी बाहर निकल कर आस-पास देख रहा हूँ. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि मानो परिवेश को मैंने अपने अंदर तो समो लिया है लेकिन असल में उस पर अपने ‘मैं’ का खोल चढ़ा दिया है. हालाँकि यह एक बड़ी स्निग्ध किस्म की प्रक्रिया थी,और ऐसे लग रहा था मानो मैं किसी लहर पर सवार हूँ और तन-मन से उसमें सराबोर हो उठा हूं, लेकिन इसी स्थिति से मैं बचना चाहता था. मैं यह बिलकुल नहीं चाहता था कि जो लिख रहा हूँ,उसकी खुमारी में मेरी आंखें इस तरह मुंद जाएँ कि मैं अपने से बाहर निकल कर देखना भूल ही जाऊं. ऐसे तो सारा प्रयत्न ही व्यर्थ, विफल हो जाएगा. मैं कोई आत्मकथा या निजी दास्तान तो लिखना नहीं चाहता था. मेरा मकसद तो तभी पूरा हो पाता, अगर मेरी नज़र अंदर-बाहर दोनों जगह रहती.

उस पन्ने को मैंने फाड़ कर फेंक दिया और कोई दूसरा तरीका सोचने लगा. बड़ी जद्दोजहद से गुजरने के बाद मैंने तय किया कि इस काम के लिए मुझे सर्वनाम का सहारा लेना चाहिए. मुझे लगा कि ‘वह’ के बहाने मैं न सिर्फ अपनी, बल्कि ‘वे’ की, या सबकी बात कर पाऊँगा. 

बार-बार गहरे गोते खा रहे ‘मैं’ को बाहर खींच कर अब मैंने उसे ‘वह’ का जामा पहना दिया. ‘मैं’ की बजाए अब ‘वह’ सड़कों पर भटकने लगा. कभी इस, कभी उस स्थिति में आने-जाने लगा. इससे एक फर्क यह पड़ा कि मैं अब ‘वह’ को भी देखने लगा और उन सब स्थानों, 

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स्थितियों-परिस्थितियों को भी, जिनके बीच ‘वह’ भटक रहा था. सिर्फ देख ही नहीं सकता था बल्कि अब उस पर कटाक्ष कर सकता था, फब्तियां कस सकता था, उसके प्रति क्रूर हो सकता था और उसे लताड़ भी सकता था. जब जी चाहे हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ सकता था और जिन स्थितियों के ताने-बाने में मैं उलझा रहा, उनमें ‘वह’ को, ‘वह’ को और ‘वह’ को भी फेंक सकता था.

लिखने का यह तरीका कारगर तो साबित हो रहा था लेकिन कुछ देर बाद ही मुझे लगने लगा कि ‘वह’ के चेहरे पर झीना-सा पर्दा पड़ा रहता है. उसका चेहरा-मोहरा धुंधलके में घिरा रहता है. बीच-बीच में कई बार वह स्पष्ट दिखाई देने भी लगता है, साफ़ तौर पर पहचान में भी आता है, लेकिन ज़्यादातर समय किसी बुझे हुए बल्ब की तरह कांतिहीन, सपाट और बेगाना ही बना रहता है. उसके भरोसे मैं उन जटिल हालातों, उनसे उपजे रोष, और उस दबी बगावत को कैसे बयान कर करूं? फिर एक और समस्या भी थी. चारित्रिक तौर पर ‘वह’ हमेशा संदिग्ध बना रहता था. वह वफ़ादार नहीं था और मौके पर कभी भी किसी बात से साफ़ मुकर सकता था. ‘वह’ जब कभी किसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में फंसता,तो मेरे सामने यह निर्णय करने का संकट खड़ा हो जाता कि उसका व्यवहार ऐसा होगा या वैसा ! कुछ दूर तक उसके साथ-साथ चलने के बाद मेरा भरोसा उससे उठ गया.

अब मैंने ‘वह’ को एक संज्ञा देने का निर्णय लिया. इस तरह से कही गई बात ज्यादा विश्वसनीय भी लगेगी, मैंने सोचा. लेकिन मुझे कोई ऐसा नाम ही न सूझ पा रहा था जो ‘वह’ के लिए उपयुक्त हो. हर नाम अपर्याप्त, अधूरा, बनावटी-सा लगता. कोई भी नाम देने के बाद जिस तरह का चित्र कल्पना में उभरता, चेहरे-मोहरे की जो रेखाएं बनतीं, और व्यक्तित्व का जो ख़ाका बनता, उसकी विसंगतियों को देख कर मैं खीझ उठता. मेरे कुंठित, जटिल, पेचीदा पात्रों से वे नाम बिलकुल मेल न खा रहे होते. बल्कि उनकी जटिलताओं के समक्ष वे नाम विद्रूप-से लगते. उस तरह के पात्रों-चरित्रों को ठोंक-पीट कर तो ऐसे नामों में ठूंसा नहीं जा सकता और न ही सेहरे की तरह उनके सिर पर बाँधा जा सकता था. ऐसी ही धींगामुश्ती में दर्जनों नाम मक्खियों की तरह मेरे आस-पास भिनभिनाते रहे लेकिन एक भी उन पर टिक कर बैठ न पाया. 

इस नाकामयाबी के बाद मुझे अचानक ख्याल आया कि आखिर नाम को मैं इतना महत्व क्यों दे रहा हूँ?मुझे सिर्फ स्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए क्योंकि सबसे अधिक 

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अहमियत तो स्थितियों की ही है. कोई नाम या ‘मैं’ या ‘वह’ तो सिर्फ एक बिचौला है. अपने इस तर्क का कायल होकर मैंने फिर से लिखना शुरू किया. कुछ देर के बाद दिक्कत यह आई कि किसी बिचौले की अनुपस्थिति में सब कुछ आपस में ही उलझने लगा. स्थितियां बनाई किसने हैं? कौन उन स्थितियों को बनाए रखना चाहता है? स्थितियों से प्रभावित कौन हो रहा है? स्थितियों को बदलेगा कौन..? जो विवरण मैं लिखना चाह रहा था उसमें स्थितियां और विभिन्न पात्र अलग-अलग थे ही नहीं. वे अन्योनाश्रित थे और उन्हें अलग-अलग करके देखा ही नहीं जा सकता था. तो पात्रों का सहारा लिए बिना उन विषम स्थितियों को कैसे वर्णित किया जा सकता था ?

मैं भी हठी था. या बार-बार मात खाने के कारण ही हठी बन गया था. जब कोई और नया तरीका मुझे नहीं सूझा तो एक अजीब-सा ख्याल आया कि संज्ञा, सर्वनाम या फलाना-ढिमकाना के चक्कर में पड़े बिना क्यों न पात्रों को संख्या दे दूं ? उन्हें एक, दो, तीन, चार संख्या से ही वर्णित करूं. मुझे याद आया कि जेल में मुझे और अन्य कैदियों को ऐसे ही तो बुलाया जाता था. और वास्तव में मेरे वे पात्र संज्ञाहीन ही तो हो चुके थे. वे सचमुच संख्याएं ही बन चुके थे. इतनी संख्या में लापता थे, जेलों में इतनी संख्या में थे, गोली चलने से इतनी संख्या में मरे थे, इतनी संख्या में उन्होंने आत्महत्याएं की थीं… और चूंकि वे संख्याओं में तब्दील हो चुके थे, इसीलिए हालांकि सड़कों पर, रास्तों में, बस स्टॉप, मेट्रो स्टेशनों पर वे हर रोज़, हर मोड़ पर एक-दूसरे के आमने-सामने पड़ते, कंधे से कंधा घिसटते चलते,फिर भी एक-दूसरे को पहचानते नहीं थे,आपस में बात करने से डरते थे, हर किसी को शक की नज़र से देखते थे.

पात्रों को संख्या देने का औचित्य तो था लेकिन इस तरीके से लिखना बड़े घालमेल का काम साबित हुआ. पात्र संख्या 1 के साथ जो घटना हुई, जब मैं उसका वर्णन कर रहा था तो मन में सवाल उठा कि पाठककिसी संख्या के साथ तादात्म्य कैसे स्थापित कर पाएगा ? संख्या से वह किसी पात्र विशेष के व्यक्तित्व को कैसे कल्पित करेगा? पात्रों को 1, 2, 3… संख्या में पढ़ कर तो उसकी कल्पना में अजीब-से आड़े-तिरछे चित्र निर्मित होंगे. मैं जब इस समस्या का हल ढूंढ रहा था तभी ख्याल आया कि कहीं इसीलिए तो उन्हें संख्या के दर्जे तक नहीं गिरा दिया गया ताकि एक-दूसरे को तो क्या, वे खुद को भी  पहचान न पाएं? पहचानने की कोशिश भी करें तो गड़बड़झाले में फंस कर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाएं?

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      इस सारी मशक्कत के बाद भी, दूसरों से संपर्क स्थापित करने, उनसे समीकरण बिठाने के मकसद से जब भी मैंने अपनी बीहड़, बेलगाम और लगभग विक्षिप्त-सी मन:स्थिति को शब्दों में उतार कर लिखना चाहा तो बुरी तरह से असफल रहा. हर तरह से लिखने के बाद भी उसे पढ़ते हुए मुझे यही अहसास हुआ कि ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ का फंदा हर कहीं झूल रहा था. ‘मैं’ हो या ‘वह’ या इस-उस नाम का, या किसी संख्या के रूप में, – हर कोई या तो गलत पहचान के कारण उस फंदे में फंसा था, या अपनी पहचान ढूंढने को छटपटा रहा था. कागज पर लिखे गए शब्दों पर उस फंदे का साया बराबर मंडरा रहा था. इस लंबे, घुमावदार और कष्टदायक सफर को तय करके अंततः खुद को मैंने फिर से ‘मैं’ के सन्मुख ही खड़ा पाया. घूम-फिर कर बात वहीं पहुँच गई थी. अब मैं सचमुच ऊब चुका था. इस तरह जो कुछ भी मैं कहना-बताना चाहता था, वह सब अनलिखा, अनकहा ही रह गया. 

ऐसी ही उचाट मन:स्थिति में एक दिन जब मैं अपना ई-मेल अकाउंट देख रहा था तो एक मेल का विषय पढ़ कर चौंका. मेल में पूछा गया था कि क्या मैं ‘ह्यूमन बुक’ बनने का इच्छुक हूं ? जब मैंने ब्यौरा पढ़ा, तो पता चला कि ‘ह्यूमन बुक’ के तौर पर मुझे करना सिर्फ यह था कि श्रोता, या कहें पाठक, के सन्मुख बैठ कर अपनी कथा, अपने शब्दों में, अपनी तरह से सुनानी थी. मेरे लिए यह बड़े ताज्जुब की और अनोखी बात थी. क्या ऐसा हो सकता है? क्या व्यक्ति के रूप में मैं कोई किताब हूँ? मुझे लगा मानो कई दिनों से कोई मुझ पर नज़र रख रहा हो, कहीं छिप कर मेरी बैचैनी, मेरी वैफ्ल्यता को भांप रहा हो और सहानुभूति में विशेष तौर पर मुझे यह मेल भेजी हो. 

मेल पढ़ने के बाद एक अजीब बात हुई. अचानक ही मेरे आस-पास का सारा परिदृश्य ही बदल गया. कारण यह कि मैं न सिर्फ खुद को, बल्कि अपने पास-पड़ौस, अपने प्रतिवेश को भी एक नई नज़र से देखने लगा. मैंने दरअसल अपने आप को या आस-पास के लोगों को पहले कभी इस नजर से देखा ही नहीं था.

अब अपने इर्द-गिर्द चलता-फिरता, हिलता-डुलता हुआ हर प्राणी मुझे किसी किताब की तरह दिखाई देने लगा. अनपढ़ी किताब. इधर किताबें, उधर किताबें. कोई चिकनी तो कोई खुरदुरी, कोई आकर्षक तो कोई भद्दी, कोई चमक-दमक तो कोई खस्ताहाल जिल्द वाली किताब. कुछेक की जिल्द देख कर मैं आसानी से अंदाज़ा लगा सकता था कि कंटेंट बहुत उथला-छिछला है, तो कुछ जिल्दें गम्भीरता और गहराई का आभास करवाती थीं. किसी की जिल्द साफ़ बताती 

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थी कि अंदर हर पन्ने पर खून-पसीने के धब्बे हैं, तो किसी के पन्नों में दबे खुशबू से महकते फूल.सम्पन्नता की मौज में फरफराते पन्नों वाली किताबें भी                                      थीं और जिंदगी के बोझ तले दबी रहने से जर्जर हो चुकी किताबें भी, और कुछेक की तो जिल्दों तक को दीमक चाट चुकी थी. लेकिन थीं सब किताबें ही. उन किताबों से हर किसी का, हर रोज़, हर कहीं वास्ता पड़ता था लेकिन फिर भी कोई उनकी जिल्द पलट कर पन्नों पर नज़र नहीं डालता था कि वहां कैसी-कैसी रोचक, रोमांचक, करुण, ह्रदय विदारक और जोशीली कहानियाँ लिखी हुई हैं. वे जिल्दबंद किताबें ऐसे ही अनखुली, अनपढ़ी बनी रह कर विदीर्ण और नष्ट हो जाती थीं. मुझे लगा, निश्चय ही उनमें वे किताबें भी होंगी जिन्हें मैं तलाश कर रहा हूँ, या जो पढ़े जाने के लिए मुझे ढूंढ रही हैं.

इसलिए आयोजकों के प्रस्ताव से मैं बहुत उत्साहित हो उठा. मुझे उनका यह विचार बहुत पसंद आया कि उन्होंने न केवल व्यक्ति को एक किताब के रूप में पहचाना, बल्कि बिना किसी बनावटी प्रस्तुतिकरण के वे उसे हूबहू पढ़ने का अवसर भी मुहैया करवा रहे थे. उनका यह कदम मुझे बहुत साहसिक भी लगा, क्योंकि मैं जानता था कि वे समय की धारा के विरुद्ध तैरने की कोशिश कर रहे हैं. समय बदल चुका है, संवेदशक्ति और संवेदनशीलता में परिवर्तन आ चुका है, हर चीज़ को देखने का नज़रिया बदल चुका है, अभी तक के मान्य मूल्य भरभरा कर गिर रहे हैं और धारणाएं भी बदल चुकी हैं. जो संगीन हालात हैं उनमें ‘ह्यूमन बुक’ पढ़ने के लिए कोई पाठक या श्रोता बन कर किसी के सामने बैठने की जहमत क्यों उठाना चाहेगा?

मेरी जो शंकाएँ थीं, दरअसल वही आयोजकों के लिए प्रस्थान बिंदु था. उनका मानना था कि आज का पाठक वैसा नहीं रहा, जैसा कभी हुआ करता था. और न ही उसके पास उस लंबी, उबाऊ प्रक्रिया से गुजरने का धैर्य बचा है, कि किसी पुस्तकालय में या पुस्तक विक्रेता के पास जाए, फिर मनपसंद किताब ढूंढे, फिर कहीं बैठ कर पन्ने पलटता हुआ उसे पढ़े. इसीलिए वह चाहेगा कि किताब पढ़ने की बजाए सीधा उस व्यक्ति के रू-ब-रू होकर वह सब कुछ सुन ले, जो उसने किताब में लिखना-कहना है. उनका यह भी दावा था कि इन्सान आत्माभिव्यक्ति के बिना रह ही नहीं सकता, और स्थितियां कैसी भी दमनकारी हों, पत्थरों को काट कर बहते हुए पानी की तरह हर अवरोध, हर रूकावट में से गिरते-पड़ते आख़िरकार वह अपनी बात कहने का तरीका और रास्ता ढूंढ ही लेगा. इसलिए उन्हें विश्वास है कि उनका यह आयोजन सफल रहेगा.

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यह बड़ा आशावादी रवैया था. मेरी आँखों के आगे वे तमाम चित्र उभर आये जो मेरे आसपास हर जगह व्याप्त थे और इसी स्थिति को कुछ दूसरी तरह से बयान करते थे. व्यक्ति का व्यक्ति से ‘सन्मुख’ संवाद बेशक नदारद हो चुका था, फिर भी स्वयं को व्यक्त करने और दूसरे की सुनने के लिए हर किसी के हाथ में ऐसी छोटी-छोटी मशीनें थीं जो जब तक चाहो सुन सकती थी और बोल भी सकती थी. घरों में परिवार के सदस्य तक एक दूसरे से विमुख होकर बेशक अलग-अलग कोनों में सिर झुकाए बैठे रहते, लेकिन वह छोटी-सी मशीन हमेशा हरेक के सीने से सटी रहती थी. ज़ुबान की बजाए उनकी उँगलियाँ सम्प्रेष्ण का ज़रिया बन चुकी थीं जो टिकटिकटिकटिक…हरदम मशीन से खेलती रहती थीं. सब मशीन के साथ ही खाते-पीते-सोते-जागते, और यहाँ तक कि उसे साथ लिए ही हगने-मूतने के लिए जाते थे. सब इतनी शिद्दत से उसके इश्क में गिरफ्तार थे कि उसकी जुदाई में जैसे सांस रुक जाने की तरह छटपटाने लगते थे. यहाँ तक कि घुटनों पर घिसटता बच्चा भी खिलौनों की बजाए उस मशीन से खेलने को मचलता था. इस सबसे यही ज़ाहिर होता था कि व्यक्ति, व्यक्ति के सम्पर्क में बने रहने के लिए किस कदर तड़प रहा है, और जब बाकी सब सूत्र नष्ट हो गए हैं तो मशीन को आखिरी सहारे की तरह कैसे उसने जकड़ रखा है. 

…तो ऐसे मंज़र में आयोजकों का यह प्रयास देख कर, और यह कल्पना करके मुझे बड़ा अदभुत लगा कि दो अजनबी लोग आमने-सामने बैठे हों, उनमें से एक अपनी कथा कह रहा हो, दूसरा उसे सुन रहा हो. इंसान के रूप में एक जन किताब हो, और दूसरा जन अंतरंगता से उसे पढ़ रहा हो. क्या सचमुच ऐसा संयोग संभव है? मुझे लगा मैं जो अभिनीत नहीं कर पाया, जो लिख कर नहीं कह पाया, जिसे कहने की लालसा को दबा नहीं पाया, जिस आवेग को अभी तक वश में नहीं कर पाया…शायद यही उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम हो ! मैंने आयोजन में ‘ह्यूमन बुक’ की हैसियत से शामिल होने के लिए अपनी सहमति और परिचय भेज दिया और जबाव का इंतजार करने लगा. 

मेरा चयन कर लिया गया था. चयन के बाद मेरा एक ट्रेनिंग सेशन भी हुआ जिसमें बताया गया था कि किस तरह अनावश्यक विवरणों से परहेज़ करते हुए एक ही मुद्दे पर केंद्रित रह कर, आधे घंटे में अपनी कथा पाठक को सुनानी है. आयोजन के लिए जो ‘ह्यूमन बुक्स लाइब्रेरी’ तैयार की गई, उसमें शामिल किताबें विविध क्षेत्रों और पृष्ठभूमि से थीं. एक किताब ‘सोलो ट्रैवलर’ थी, जो दूर दराज़ के दुर्गम इलाकों और बस्तियों में कई महीने उन लोगों 

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के बीच रह कर आई थी जिन्हें शहर के लोग आदिवासी कहते थे और जानते नहीं थे कि वे इसी देश के नागरिक हैं. अपने पन्नों पर लिखे अनुभवों को वह इस समाज के नागरिकों के साथ साझा करना चाहती थी. एक अन्य किताब थी जो दिमाग पर गहरा आघात लगने के बाद ‘कोमा’ में चली गई थी और तीन साल तक ‘कोमा’ में रहने के बाद आखिकार अस्पताल से निकली थी. इस बीच हुए परिवर्तनों को अचानक देख कर उसने जो प्रभाव ग्रहण किए, और बदले हुए परिदृश्य के बारे में जो जाना-समझा, वह उसे बयान करना चाहती थी. एक दुबली-पतली किताब भी थी जो एक जानलेवा हमले में मरते-मरते बची थी. उसमें कुछ ऐसे लेख और टिप्पणियाँ दर्ज थीं जिनसे हमला करने वाली अन्चिन्हित-अनपहचानी भीड़ सहमत नहीं थी. ऐसी ही कुछ और किताबें और मैं, ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ के कारण जेल में साल भर बिता कर आई एक किताब, या कैदी.      

     मेरे मन में कहीं शंका थी कि यह एक फ्लॉप शो होगा, लेकिन बताई गई तारीख और समय पर मैं जब वेन्यू पहुंचा तो वहां का नज़ारा ही कुछ और था. वेन्यू के बाहर, पंजीकरण करवाने के लिए पाठकों की लम्बी कतार लगी थी. कुछ उत्सुकता से बोर्ड पर लगाये गए किताबों के पोस्टर देख रहे थे. हर पोस्टर में ‘ह्यूमन बुक’ का परिचय और उसकी विशेषता का वर्णन किया गया था, जिसे पढ़ कर पाठक चयन कर रहे थे कि उन्हें कौन सी किताब पढ़नी है. यह सब देख कर मैं हैरान रह गया. क्या सचमुच ही वे अभी भी इतने जिज्ञासु थे, किताबें पढ़ने के लिए इतने लालायित थे, अभी भी किसी तरह के संवाद में उनका यकीन बाकी था, दूसरों में उनकी कोई दिलचस्पी बची थी? अचानक मैं उत्साह से भर उठा. अपने निर्णय पर मुझे तसल्ली हुई और मन में एक नई उम्मीद जागी.      

दिन में मुझे पांच सेशन करने थे. यह पहला सेशन था और मेरी पहली पाठक यह महिला थी, जिसकी आँखों की गहराइयों में मैं बार-बार डूब-उतरा रहा था. 

घंटी बजने की आवाज़ सुन कर मैं चौंका. पकड़म-पकड़ाई के जिस खेल में मैं गुम था, वह मालूम नहीं कब तक चलता रहता, लेकिन एक झटके से मैं उन फिसलती गहराइयों में से बाहर निकल आया. मेरी नज़र सामने की दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ गई. आधा घंटा गुज़र चुका था. मेरा सेशन खत्म हो चुका था. 

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मैं ऐसे बैठा था जैसे मेरे साथ छल हुआ हो. अतृप्त, असंतुष्ट और कुछ-कुछ निराश. मुझे लगा, मैं हांफ रहा हूँ. मानो कोई लंबी दौड़ लगाने के बाद कहीं से वापिस लौटा हूँ. एक  ऐसी बेचारगी का अहसास मुझ पर तारी था कि पहुंचा तो कहीं नहीं, और यह भी भूल गया होऊं कि चला कहाँ से था? व्यर्थताबोध के बोझ से मेरा सिर भारी हो रहा था और मन में गहरा विक्षोभ था. मेरे सामने दो आँखें थीं जो अपनी चंचलता भूल कर हठात-सी ठिठकी हुई थीं. उनमें अब न कोई उत्सुकता थी, न हैरानी. उनका सम्मोहन टूट चुका था और मैं जड़मति होकर निरुपाय-सा बैठा था.   

“इट वाज़ अ प्लेज़र रीडिंग यू !” तभी महिला ने धीमी आवाज़ में कहा और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. 

मैंने चिहुंक कर उसकी तरफ देखा जैसे कि शैतानी में उसने मुझे कोई पिन चुभो दी हो. वह मंद-मंद मुस्करा रही थी. उसकी मुस्कराहट में मैं व्यंग्य खोजने लगा. क्या उसके समक्ष मैं मात्र उपहास का पात्र बन कर रह गया हूँ ? मेरी सारी कोशिश उसकी नज़र में क्या सचमुच हास्यास्पद रही है? उसका ठंडा, गुदगुदा हाथ मेरे हाथ में था. सहसा मेरा मन किया कि अपने नाखून उसकी गुदगुदी हथेली में गड़ा दूं. शायद उसकी आँखों का भाव बदले. शायद वह अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांग ले. या शायद उसके चेहरे की त्योरियां सिमटें और बड़ी-सी बिंदी नीचे आ गिरे. शायद वह तमतमा कर उठ खड़ी हो और लिपग्लौस से तरल हुए उसके होठों में से मेरे लिए कोई कटु बात निकले. 

“रियली?” मैंने उफनते हुए गुस्से पर काबू रखते हुए पूछा “क्या सचमुच तुमने मुझे पढ़

लिया ?”

“मैं यह दावा तो नहीं कर सकती” उसने कुछ सोचते हुए कहा “ लेकिन कोशिश मैंने ज़रूर की.” वह फिर मुस्कराने लगी.

मैं गौर से उसका चेहरा देखने लगा कि उसके पीछे छिपी उसकी मंशा को भांप पाऊं. लेकिन न तो वहां मुझे किसी छल-कपट की छाया दिखी, न कोई बनावटीपन, और न ही किसी दुराचार का आभास मिला.  मेरे गुस्से पर जैसे एकाएक पानी की बौछार पड़ गई. कुछ बोलने के लिए मैंने मुंह खोला लेकिन कुछ न सूझा तो इधर उधर ताकने लगा. 

वह उठी और दरवाज़े की ओर चल दी. मैंने उसे वापिस बुलाना चाहा लेकिन चुपचाप 

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उसकी पीठ को घूरता रहा. सहसा मेरे मन में कुछ खटका.

“सुनो, तुम यहाँ किताब पढ़ने के लिए ही आई थी या…” इससे पहले कि वह दरवाज़े से बाहर निकले, मैंने उसकी तरफ सवाल फेंका.

वह रुकी, रुकी रही, फिर पलटी और दरवाज़े का सहारा लेकर खड़ी हो गई. मैंने देखा उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में बाढ़ आई हुई थी और लहरें उछल उछल कर किनारों को तोड़ रही थीं. उसका मेकअप जगह-जगह से दरक गया था और चेहरे पर आड़ी-तिरछी लकीरें उभर आई थीं. मानो चेहरे की चमड़ी को नाखूनों से खरोंच दिया गया हो. उन लकीरों के पीछे से कोई दूसरा ही चेहरा झाँक रहा था.

“तुमने ठीक समझा” उसने कहा “ शायद तुम्हारी जगह मैं वहां बैठी होती…और मेरी बजाए तुम मुझे सुन रहे होते. लेकिन मैं फैसला नहीं कर पाई थी. दरअसल मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि ऐसा हो सकता है या मैं ऐसा कर पाऊँगी या ऐसा करने से मेरा मकसद पूरा हो पायेगा…”

कुछ देर तक मैं उसकी कही बात को लेकर सोचता रहा. क्या मैं वही समझ रहा हूँ जो वह कहना चाह रही है? वह भी रुकी रही. शायद यही आंकती हुई कि क्या मैं वही समझ रहा हूँ, जिस तरफ वह इशारा कर रही है. झूलते हुए पलड़े कुछ देर तक यूं ही ऊपर-नीचे होते रहे और जब तक वे सम होकर रुके नहीं, क्यूबिकल में चुप्पी छाई रही. 

    “तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए”. आखिर अपने संशय से उबर कर मैंने मानो उसे दिलासा देते हुए कहा “हमें यह कोशिश तो करनी ही होगी, कोशिश किए बिना हम रह भी तो नहीं सकते…जानती हो एक लेखक ने ऐसे ही हालात में क्या कहा था ?”

उसने एक बार आँखों के किनारों को पोंछा और टकटकी लगाए चुपचाप मुझे देखती रही. 

“उसने सवाल किया था कि क्या अंधकारपूर्ण समय में भी गीत गाये जांएगे? और खुद ही जबाव दिया था कि हाँ, तब गीत अंधकारपूर्ण समय के बारे में गाये जाएंगे ” मैंने उसे बताया और फिर अचानक ही जैसे किसी रौ में बह कर बोलने लगा “गीत तो हर समय में गाये जाएंगे, उन्हें गाये जाने से कोई नहीं रोक सकता, जो भी जिंदा है वह गीत रचेगा और 

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गायेगा, उन्हें न बनने से कोई रोक सका है न गाने से, समय ऐसा हो या वैसा, गीतों को न कोई खत्म कर पाया है न ही कर पायेगा, वे तो हवा में गूंजते ही रहेंगे…” 

उसकी आँखों में एक चमक कौंधी और वह संभल कर खड़ी हो गई. होंठों पर उसकी स्वाभाविक मुस्कान अब देर तक ऐसे ही खिंची रही. फिर अपने पर्स में से छोटा-सा शीशा निकाल कर वह चेहरे का मेकअप ठीक करने लगी. जहाँ दरारें पड़ गई थीं, उन्हें भरने के बाद उसने दरवाज़ा खोला और बाहर चली गई.

मैं देर तक ऐसे ही बैठा रहा.

दूसरा सेशन शुरू होने तक बहुत कुछ बदल चुका था. मेरे ऊपर जमी पपड़ी तड़क चुकी थी और भीतर मुद्दत से जमा हुआ कुछ स्वत: ही आहिस्ता-आहिस्ता बहने लगा था. मेरे बोलने में रवानगी आ गई. शब्दों का जैसे अभाव न रहा. चौथे सेशन तक तो मेरा अंग-अंग मानो बोलने लगा था.

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शाम को वेन्यू से मैं जब बाहर निकला तो बड़ा हल्का और प्रफुल्ल महसूस कर रहा था. ऐसा अहसास हो रहा था मानो मैंने खुद को वापिस पा लिया हो. मन में कहीं गहरी संतुष्टि का भाव था. लेकिन बाहर का मंज़र बिलकुल विपरीत था और मेरी मन:स्थिति ज़्यादा देर तक टिक नहीं पाई. गहरे काले बादलों के झुंड आसमान में जगह-जगह घात लगाए बैठे थे और ज़मीन तक उनके साये मंडरा रहे थे. सारा माहौल जैसे उनकी छाया से ग्रसित होकर मलिन और निष्प्रभ हो चुका था. हर चीज़ बेरंग, बेरौनक थी. हर तरफ मुर्दनी-सी छाई थी. मैं फुटपाथ पर खड़ा था और मेरे दांयें-बांयें, आगे-पीछे, यहाँ-वहां…हर जगह लोग ही लोग थे. दीवारों के साथ लगे खड़े शून्य में घूरते, खोये हुए से इधर-उधर भटकते, पटरियों पर अपने-आप में गुम हुए बैठे, खिड़कियों में से उदासीन-से झांकते, फुटपाथों पर हारे हुए- से चलते, सिग्नल पर मूक ठिठके खड़े. भागती हुई बसों में ठुंसे हुए… हर तरफ आशंकित, सहमे, मायूस चेहरों की भीड़ थी. उन्हें देख कर मुझे लगा मानो हर जगह अनपढ़ी किताबों के अंबार बिखरे पड़े हों, हर तरफ जिल्दों की कैद में बंद पड़ी किताबें छटपटा रही हों, बोझ के नीचे दबे उनके पन्ने दर्द से ऐंठ रहे हों और कैद से मुक्त होने के लिए रह-रह कर तड़प रहे हों. जब तक मैं चौराहे पर पहुंचा, काले बादलों ने आसमान को ढंक लिया था और वातावरण में सनसनाहट-सी आ गई थी. 

तभी हवा का एक झोंका आया और मैं चौंक गया. मुझे किसी किताब की जिल्द फड़फड़ाने की आवाज़ सुनाई दी थी. मैंने आस-पास देखा. सब कुछ वैसा ही था. मैंने सोचा शायद मुझे भ्रम हुआ हो. तभी हवा का एक और तेज़ झोंका आया और इस बार मैंने दो तीन किताबों की जिल्दों के फड़फड़ाने की आवाज़ें साफ़-साफ़ सुनीं. मैं अचानक वापिस मुड़ा और भागते हुए किताबों के अंबार के बीचोंबीच पहुंच गया. हवा के झोंके अब हर दिशा से उठने लगे थे और मेरे शक की कोई गुंजाइश नहीं रही. मैं साफ़ तौर पर देख पा रहा था कि बिखरे अंबारों में से किताबों की जिल्दें हल्के-हल्के खुल रही हैं. हवा ज्यों-ज्यों तेज़ होती गई, जिल्दें एक के बाद एक खुलती गईं. देखते ही देखते हर तरफ मोटी, पतली, चौड़ी, लंबी, छोटी, बड़ी… हर तरह की जिल्दें फड़फड़ाने लगीं और अनावृत हुई किताबों के सैंकड़ों, हज़ारों फड़फड़ाते पन्नों से ऐसी आवाज़ें उठने लगीं मानो हू-हू करती हुई कोई तेज़ आंधी आने वाली हो !

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सुरेन्द्र मनन
surmanan@gmail.com

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