उच्च हिमालय की विराट दुर्गमता में मनुष्य पदचिन्ह!

शिवप्रसाद जोशी

हिमांक और क्वथनांक के बीच बुक कवर (1)

घुमक्कड़ी सीरिज़ के तहत नवारुण से प्रकाशित ढाई सौ पृष्ठों की यह किताब जिस मार्ग के दुर्गम सफ़र को समर्पित है वह पर्वतारोहियों और पथारोहियों के लिए सुगम नहीं माना जाता और जैसा कि शीर्षक से ही स्पष्ट है वह उच्च हिमालय के दो छोरों के उच्चतम बिंदुओं को स्पर्श करने, उनसे गुज़रने और उनसे निकल आने की एक अभूतपूर्व दास्तान है। अपार साहस और अदम्य मानवीय ऊष्मा से भरी उच्च हिमालय की यह यात्रा, सिर्फ घुमक्कड़ी नहीं, न उसका रोमांचक वृत्तांत भर है। यह तो ‘समर-गाथा’ है जीवन के उन कुछ कठिन और कल्पनातीत समयों की जब हिमांक और क्वथनांक के बीच अस्तित्व पारे की तरह यहां से वहां लुढ़क रहा था। जिजीविषा का वह अवर्णनीय बिन्दु, जिस पर भौतिकी ठिठक जाती है और अति दुर्लभ राग हिमाला आकार लेने लगता है और उसके आरोह-अवरोह बनते हैं- उन जांबाज़ों के रुकते गिरते, उठते टिकते और बढ़ते क़दमों की तरह। यहां हिमाल को पा लेने की महत्वाकांक्षी ख़्वाहिश नहीं बल्कि ख़्वाब है- सार्वभौम मानवीय सरोकारों को उनकी बुलंदी पर स्थापित करने का। इस नाते शेखर पाठक और उनके तमाम साथी, शेरपा, सहयोगी फ़तहयाब हुए।

गंगोत्री से बद्रीनाथ तक लगभग 99 किलोमीटर लंबा यह हाई एल्टीट्यूड रूट कालिंदी खाल ट्रेक के नाम से भी जाना जाता है और एक बहुत ही ज़्यादा मुश्किल और रोमांचक ट्रेकिंग मार्ग माना जाता है। उच्च हिमालय के ग्लेशियरों से होकर गुज़रते हुए आप मानो जमीन और आसमान को एक साथ मिलते और दूर होता हुआ देखते हैं। यह रास्ता उत्तरकाशी से शुरू होकर 3048 मीटर पर गंगोत्री, 3892 मीटर पर गोमुख, 5300 मीटर पर नंदनवन, वासुकी ताल, 5590 मीटर पर कालिंदी बेस और करीब 5948 मीटर पर कालिंदी खाल तक पहुंचता है। फिर नीचे उतरते हुए अरवा ताल, घसनतोली से होते हुए माणा और बद्रीनाथ पहुंचा जाता है जो 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। उच्च हिमालय की विहंगम चोटियां दिखती हैं और सुदर्शन, मैत्री, चीड़वासा, श्वेतवर्ण, श्रीकैलास, देवदांग, माणा पर्वत, नीलाम्बर, रक्तवर्ण, चतुरंगी, शिवलिंग, भागीरथी, स्वच्छन्द, मन्दानी, चौखम्भा, सुमेरु, खर्चकुंड, महालय, चन्द्रा पर्वत, सेता पर्वत, सतोपंथ, कालिन्दी, केदारनाथ, केदारडोम, कीर्ति, भर्तुकुंड, मन्दा, भृगुपंथ, थलईसागर, जोगिन, गंगोत्री, श्रीखण्ड जैसे ढाई दर्जन से अधिक शिखर इस विराट रंगमंच को बनाते हैं।

धैर्य और कौशल की परीक्षा लेने वाले इस ट्रैक में एक वास्तविक पर्वतारोहण जैसा अनुभव मिलता है लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं रहतीं- रास्ते को थामे रखना, नैविगेट करना आसान नहीं क्योंकि मौसम बड़ा ही अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण रहता है, तेज़ हवाएं चलती हैं, तीखी ठंड रहती है और अचानक बर्फ़बारी हो जाती है। शेखर लिखते हैं- हिमालय में कुछ घाटियां अभी भी मानव स्पर्श से बची हैं। ऐसी ही घाटियों से गंगोत्रीकालिन्दीखालबद्रीनाथ मार्ग गुज़रता है। यह कहीं से भी तीर्थयात्रा मार्ग नहीं है। व्यापार मार्ग है। यहां मनुष्य हैं और देवता। भूगर्भ और भूगोल तो हैं पर गिनी चुनी जीववनस्पतियां। इस मार्ग के साथ पुण्य या परलोक कुछ भी जुड़ा नहीं है। पौराणिक कथाओं से भी यह बच गया है। यह मार्ग स्वर्ग को भी नहीं जाता है। इसीलिये पाण्डव इस मार्ग में नहीं आये। हिमालय यहाँ आदिम राग गाता है, अत्यन्त विलम्बित आवाज़ में। बीच बीच में गल और पहाड़ टूटकर अलग तरह के वाद्ययंत्रों की आड़ीतिरछी झनकार पैदा करते हैं। यह एक तरह का राग हिमालय है।

बेचैन घुमक्कडों ने इस मार्ग को नक्शे में डाला। फिर अपने कदमों से उसे नाप लिया। कहानी 1931 में शुरू हुई। यह मार्ग हिमालयी अन्वेषण का परिणाम है। यह तीर्थों से बाहर के हिमालय को समझने में मदद करता है। दर्जनों हिम शिखरों, गलों और दर्रों से भरपूर गंगा के दो अति अन्तर्वर्ती जलागमों वाले क्षेत्र की यात्रा का गहन अनुभव देने वाली इस किताब के पथिक-रचयिता हिमालयी सौंदर्य के साथ-साथ मौत को भी साक्षात देखते हुए गुज़रते हैं। फिर वह पथारोहण का सिलसिला नहीं रह जाता, एक विकट दुर्गम दुर्लभ अभूतपूर्व यात्रा अपने ही भीतर चलती हुई उद्दाम जिजीविषा और ज़िद का दस्तावेज बन जाती है।

###

‘ज़रा सा’ शीर्षक के तहत किताब की भूमिका में शेखर लिखते हैं- मैंने इससे पहले सिर्फ़ कैलासमानसरोवर यात्रा पर किताब लिखी थी। उसमें प्रकृति, इतिहास तथा संस्कृति में विचरण की बहुत अधिक गुंजायश थी। गंगोत्री से बद्रीनाथ मार्ग में शिखरों और गलों की बेमिसाल उपस्थिति और भौगोलिक मोनोटनी के साथ सूरज और चांद के कारनामे थे अपार। पर मनुष्य की अनुपस्थिति उसे अन्टार्कटिका का हिस्सा बना देती थी। उस मोनोटनी में किसी पाठक को टिकाए रखने का इम्तहान तो यह किताब है ही।बेशक किताब के जरिए पर्वत गलों की यह यात्रा, मनुष्य, प्रकृति और अस्तित्व के बीच संवाद में बदल जाती है। गंगोत्री से कालिंदीखाल होते हुए बद्रीनाथ तक की हिमालयी यात्रा, किताब का बाहरी ढांचा है लेकिन उसकी वास्तविक यात्रा भीतर घटती है- दृष्टि, संवेदना और आत्मबोध की। पुस्तक का शीर्षक ही इसके अर्थ-संसार का संकेत देता है। हिमांक और क्वथनांक केवल तापमान की दो सीमाएं नहीं, वे मनुष्य की बाहरी और भीतरी अवस्थाओं के रूपक हैं। एक ओर बर्फ़, मृत्यु, निर्जनता और प्रकृति की कठोरता है तो दूसरी ओर भावनाओं का उफान, मित्रता, स्मृति, करुणा और जीवन के प्रति गहरा लगाव। साथी पर्वतारोही नीतेश की मृत्यु के प्रसंग में लेखक लिखते हैं, मौत हमारे आसपास मँडरा रही थी। वह किसी को भी दबोच सकती थी। यहाँ आज उसी का राज़ था, हमारे शरीर लगातार हिमाँक के पास थे और हमारे मनमस्तिष्कों में भावनाओं का उबाल क्वथनांक से ऊपर पहुँच रह था। नीतेश के जीवन का हिमाँक लगातार हमारे चेतनअवचेतन के क्वथनांक को बढ़ा रहा था। जैसे थर्मामीटर का पारा 105, 106, 109 पार कर काँच को फोड़कर बाहर निकल गया हो। मैंने इतना बदहवास, पराजित और हतप्रभ अपने को जीवन में कभी नहीं पाया था।

लेकिन जैसा कि एडमंड हिलेरी ने कहा था कि पहाड़ चढ़ना उसे जीतने का नहीं बल्कि ख़ुद पर जीत हासिल करने का उपक्रम है, शेखर और उनके साथ उसी भावना को याद करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं। नीतेश को मन ही मन अलविदा कहते हुए मुझे रौजर डुप्लाँ की कविता याद आई। एक बार मुझे लगा कि मेरी आँखें गीली हो गई हैं पर शायद दिन भर हमने इस क़दर पस्ती झेल ली थी कि एहसास होता था पर आँखें सूखी थीं। पता नहीं पथराना किसे कहते होंगे। रो तो मैं गया ही था। डुप्लां 1951 में फ्रांसीसी नन्दादेवी पर्वतारोहण अभियान में भारत आये थे। टिलमैन और ऑडैल के 1936 के पहले अभियान के बाद यह दूसरा था। वे और उनके साथी गिल्बर्ट विग्नेस ने नन्दादेवी के मुख्य शिखर पर सफल आरोहण किया, फिर दोनों शिखरों को जोड़ने वाली लगभग तीन किमी लम्बी धार (रिज) को पारकर वे नन्दादेवी के पूर्वी शिखर पर चढ़ना चाहते थे। यह नियति को और शायद नन्दादेवी को मंज़ूर था। इस रिज में चलते हुए 29 जून 1951 के दिन विपरीत मौसम में ये दोनों पर्वतारोही बर्फ़ में दफ़न हो गये। उनको खोजते हुए उनके टीम मेम्बर तेनजिंग नोर्गे और लुइस डुबोस्ट नन्दादेवी के पूर्वी शिखर पर चढ़ गये। वह उनका अपने खो गये साथियों को ग़ज़ब का अन्तिम सलाम था। ऐसे ही 8 जून 1924 को उत्तर यानी तिब्बत की रौंगबूक गोम्पा की तरफ़ से चोमोलंगमा के शिखर के पास पहुंचने वाले जॉर्ज मैलोरी और एण्ड्रयू इरवीन के साथ हुआ था।

आज भी डुप्लां और विग्नेस के शरीर नन्दादेवी गल में समाधिस्थ हैं। डुप्लां की लम्बी कविता का पहला पद था

मेरे साथी
अगर मैं मर जाऊँ एक दिन पहाड़ों में
तो तुम्हारे लिये
मैं यह वसीयत दर्ज करता हूँ
मेरी माँ से मिलना
और उसे बताना कि
मरते वक़्त मैं ख़ुश था
और यह कि मेरा इकलौता दुख
उसके नज़दीक हो सकना था

(अनुवादः अशोक पांडे)

###

लेखक हिमालय को दृश्य नहीं, जीवित सत्ता की तरह देखते हैं। उनके यहाँ ग्लेशियर भूगर्भीय संरचना नहीं रह जाता, वह बोलता और बात करता है और अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। “कहीं कहीं से कोई आवाज़ रही थीगल तरहतरह से बोल रहा था। कुछ हम सबके साथ, कुछ अपने आप से।चौखम्भा, शिवलिंग, भागीरथी, सतोपंथ, थलईसागर और अनेक शिखरों से घिरा ग्लेशियर एक विराट रंगमंच में बदल जाता है और शेखर पाठक बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि प्रकृति को पूरी तरह देखा या समझा नहीं जा सकता। बहुत कुछ हम सतत यात्रियों की आँखों और अनुभवों में आने से इस बार भी रह जायेगापूरी प्रकृति का डॉक्युमेंटेशन मनुष्य द्वारा संभव नहीं है।

यात्रा-वृत्तांत अपने सौन्दर्य-बोध, आध्यात्मिक विवेक, काव्यात्मकता, आख्यानात्मकता, इतिहास-बोध, मनुष्य गरिमा, मानवीय सरोकारों के लिए भी ध्यान खींचता है। लेखक जानते हैं कि कैमरा और भाषा दोनों की सीमाएँ हैं। वो मानते हैं कि “जो आँखों को दिख रहा था वह कैमरे में नहीं आया, जो फ़ोटो में आया वह उससे कम था जो हमने देखा।इसी तरह ताल, बादलों और बदलते रंगों का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं, “हवा अभी कम चल रही थी। ताल में भी कोई हलचल नही थी। ताल में कोई प्रतिबिंब या दृश्य नहीं उतरा था। ताल अवश्य एक महादृश्य का हिस्सा था और हो सकता है चाँद इसमें अपने को देखे। कुछ घंटों के बाद। पश्चिमी क्षितिज में कुछ बादल गुलाबी, साँवले हुए और फिर पुराने सफ़ेद रंग में लौट आये। कायनात का यह रोज़ का खेल है। हमारे लिए कोई स्वतंत्र आयोजन हीं हो रहा था।

किताब पर्वतारोहण के इतिहास और उसकी मानवीय परंपरा को भी सम्मानपूर्वक याद करती है। तेनजिंग नोर्गे, जॉर्ज मैलोरी, एंड्रयू इरविन, रोजर डुप्लां, गिल्बर्ट विग्नेस और अनेक पर्वतारोहियों की उपस्थिति पुस्तक को व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ प्रदान करती है। मैं ख्यालों में ही हिमालय के आरपार खो गया। डोकमो किंजो और घांगला मिंगमा के बेटे तेनज़िंग की याद एक मानवीय भ्रंश की तरह हिमालय को जोड़ देती है। सोनाचांदीसा हुआ बादल जैसे मेरे सामने से उठा और धीरेधीरे पूरब की तरफ़ को उड़ने लगा। मैं उसे जाता हुआ देख रहा हूं।और शेरपा और पोर्टर अपन तेनज़िंग को सलाम करते हुए गाते हैं-हमरो तेनजिंग शेरपाल चढ़्यो हिमाल चुचूरा। गम्केर बजा खंजड़ी, झम्केर नाचा मुंजूरा…”

शेखर लिखते हैं कि ये दरअसल तेनजिंग नोर्गे की सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने की कथा को अमर करने की लोक कोशिश थी। मूलतः नेपाल के मोहिले गायक धर्मराज थापा ने यह गीत गाया गया है। तेनजिंग के बेटे और उनकी ही तरह पर्वतारोही जामलिंग तेनजिंग नोर्गे ने कहा है कि उनके पिता तेनजिंग नोर्गे शेरपा कभी पहचान या मान्यता के पीछे नहीं भागे, फिर भी उन्हें विश्व समुदायों और विश्व नेताओं से पुरस्कार और सम्मान मिलते रहे हैं। वो बहुत ही साधारण शुरुआत से उठे पहले एशियाई थे जो आगे चलकर एशिया के एक प्रतीक बन गए, लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन गए और एक बेशकीमती मिसाल छोड़ गए कि दृढ़ता, साहस और सही प्रेरणा हो तो रोमांच की पुरजोर भावना की कोई सीमा नहीं। एक लिहाज से यह विचार पुस्तक की मूल चेतना से मेल खाता है। शिखर केवल भौतिक ऊंचाई नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक संभावनाओं का प्रतीक बन जाता है।

नेपाल में बीसवींइक्सीसवीं सदी में हुए राजनीतिकआर्थिक परिवर्तनों ने प्रवास पर असर नहीं डाला। जैसे नये उत्तराखंड राज्य ने भी इसे रोकने में कोई कामयाबी नहीं पाई। उत्तराखण्डियों के मुक़ाबले नेपालियों में शारीरिक श्रम के प्रति उदासी नहीं है। वे हर तरह का काम कर लेते हैंवे पर्वतारोहण में प्रशिक्षित हो गये और होटलरेस्टोरेंट व्यवसाय में भी। वे कुछ भी सीख लेते हैं और यूरोपअमेरिका में रेस्टोरेंट चला सकते हैं। चला रहे हैं। स्विटज़रलैंण्ड में वे पर्वतारोहणपथारोहण के गाइड बने है।लेकिन वो पर्वतारोहण उद्योग में मौजूद शोषण की ओर भी संकेत करते हैं- अपर्याप्त मेहनताना, बीमा का अभाव और असुरक्षित कार्यस्थितियां। रोमांच के चमकीले आवरण के पीछे छिपे श्रम और असमानता भी सामने आती है। ये मेहनतकश भी बहुत से षडयंत्रों के शिकार हैं। उन्हें उनका पूरा मेहनताना नहीं मिलता। उनके जीवन का बीमा नहीं होता। उन्हें ज़रूरी साधन भी मुहैया नहीं कराये जाते। जैसा हमने देखा कालिन्दीखाल वाले मार्ग में ऑस्ट्रियाई दल के अधिकांश सदस्य बिना स्नोबूट के थे।नेपाली शेरपा खिमराज को याद करते हुएवो लिखते हैं, वह एक साथ सरल, कर्मठ, मददगार, तीमारदार, साहसी और दुस्साहसी था। वह एक मौलिक पर्वतपुत्र था। हम उसे कभी नहीं भूल सकेंगे।

###

भूगर्भशास्त्र, इतिहास, संस्कृति और अनुभूतियों में पिरोई हुई किताब अनुभव की प्रामाणिकता के साथ लिखी जाकर अंततः हिमालय की ओट में मनुष्य की अथक यात्रा बन जाती है और बताती है कि तकनीक चाहे कितनी भी विकसित हो जाए, अंततः मनुष्य का साहस, धैर्य, कल्पनाशक्ति और जिज्ञासा ही निर्णायक होते हैं। एवरेस्ट शिखर के शुरुआती अन्वेषकों में एक जॉर्ड मेलरी से जब पूछा गया कि वो एवरेस्ट पर क्यों चढ़ना चाहते हैं, तो उनका मशहूर जवाब थाः “बीकॉज़ इट इज़ देअर” (“क्योंकि वो वहां है।”) राहुल सांकृत्यायन अपनी मशहूर किताब, घुमक्कड़ शास्त्र में लिखते हैं- कमर बांध लो भावी घुमकक्कड़ों, संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है। राहुल के लिए यात्रा, मनुष्य संकीर्णताओं से मुक्ति का आह्वान और उस मुक्ति की प्रक्रिया थी। शेखर पाठक की पुस्तक इसी घुमक्कड़ी परंपरा का आधुनिक हिमालयी विस्तार प्रतीत होती है। वो पर्वतारोहण को वीरगाथा नहीं बनने देते। उनके यहाँ हिमालय न विजय का भूगोल है, न पर्यटन का दृश्य। वह मनुष्य की जिज्ञासा, उसकी नश्वरता, उसकी करुणा और उसकी सीमाओं का एक व्यापक नैरेटिव बन जाता है। यही वजह है जिसकी बदौलत किताब, पर्वतों-शिखरों की नहीं बल्कि उन मनुष्यों की कथा भी बन जाती है जो हिमांक और क्वथनांक के बीच अपने-अपने अर्थों की तलाश करते हैं।

किताब के अंत में कुछ तस्वीरों से सजे पन्ने हैं। इन रंगीन तस्वीरों के रचयिता लेखक के अलावा अनूप साह, प्रदीप पांडे और नीरज पंत प्रमुख रूप से शामिल हैं। नीरज इस यात्रा में शामिल नहीं थे, वह पहले जा चुके थे और उनके पास नायाब अनुभव, तस्वीरें और जानकारियां थीं जो इस दल के बख़ूबी काम आईं। अनूप साह जानेमाने प्रकृति छायाकार हैं। किताब के अंत में प्रकाशित ‘हमारे सुझाव’ शीर्षक से इस यात्रा पर एक विस्तृत नोट तैयार किया गया है जो यात्रा दस्तावेज की कड़ी में बड़ी अहमियत रखता है। अनूप साह, शेखर पाठक और प्रदीप पांडे ने संयुक्त रूप से ये नोट उत्तराखंड सरकार को भी भेजा था जिसमें अपनी यात्रा का विस्तारपूर्वक वर्णन करने के अलावा कुछ बुनियादी और दूरगामी महत्व के सुझाव भी शामिल थे।

यह नोट न सिर्फ सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए योजना बनाने के लिहाज से बुनियादी महत्व का है बल्कि यात्राकारों, पर्वतारोहियों, क्लबों, संस्थानों और रोमांचक यात्रा के शौकीनों और दुस्साहसियों और शोधार्थियों के लिए भी उतना ही ज़रूरी है। इस दुर्गम पथ पर पूरी तैयारियों और सावधानियों और ज़रूरतों और शेरपाओं की आर्थिक सहूलियतों का ध्यान रखते हुए जो टिप्स दी गई हैं वे बेशक उपयोगी बनी रहेंगी। लेखक का कहना है कि महत्वपूर्ण सुझावों की रौशनी में कोई स्पष्ट नीति उनकी जानकारी में अभी तक नहीं बनाई जा सकी हैं और ना ही उन्हें पत्र के रूप मे भेजे गये इस नोट की कोई पावती मिली। उनके मुताबिक तब से उत्तराखंड राज्य में छह मुख्यमंत्री बदल गये हैं।

एवरेस्ट शिखर के प्रथम विजेता एडमंड हिलेरी ने कहा था कि सपनों और ज़िदों और रोमांच के आनंद को समझने वाले लोग भी होंगे जो हिमालय को अपने अपने ढंग से देखेंगे, टटोलेंगे। 1955 में प्रकाशित अपनी किताब “हाई एडवेंचर” के 2002 में आए एनिवर्सरी एडिशन के आमुख में सर का खिताब पाए हिलेरी ने लिखा थाः 

पचास साल पहले जब मैं माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचा था तो मीडिया ने मुझे हीरो का दर्जा दिया, लेकिन मैंने ख़ुद को हमेशा सबसे साधारण क्षमताओं का व्यक्ति ही माना है। मेरी उपलब्धियां अपार कल्पनाशक्ति और अपार ऊर्जा की मिलीजुली भागीदारी का हासिल हैं। प्रौद्योगिकी और उपकरण के आधुनिक विकास ने अन्वेषण की तकनीक में प्रमुख बदलाव ला दिए हैं। विमान और वाहन, कई मामलों में मानव पैरों की जगह ले रहे हैं, ऑक्सीजन की बोतलें, सबसे ऊंची चोटियों को ढंकने वाली महीनसी हवा में ऑक्सीजन के लिए तरसते फेफड़ों को नयी ताक़त दे रही हैं, और उपग्रह संचार ने सबसे सुनसान जगहों से भी अकेलेपन को निकाल फेंका है। लेकिन इन सबके बावजूद मैं दृढ़तापूर्वक मानता हूं कि अंत में इंसान ही है जिसका महत्व है। जब हालात दुष्कर हो जाते हैं और सबकुछ गलत होता चला जाता है, तो जीतने के लिए वही गुण आवश्यक होते हैं जो अतीत में भी ज़रूरी थेसाहस का गुण, सूझबूझ, असुविधा और कठिनाइयों को सहने की क्षमता और एक आदर्श को मजबूती से थामे रखने का उत्साह और उसे पाकर रहने की ज़िद और दृढ़ता। अतीत के अन्वेषक महान व्यक्ति थे और हमें उनका सम्मान करना चाहिए, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी भावना आज भी जीवित है। आज भी ऐसे व्यक्ति हैं जो एक सपने की खातिर रोमांच के सफ़र पर निकल पड़ेंगे या ऐसे व्यक्ति जो कुछ पाने के लिए कुछ खोजने नहीं निकलेंगे बल्कि उस खोज का आनंद उठाने को निकलेंगे।

ऐसा ही तो है, हिमांक और क्वथनांक के बीच शेखर पाठक और उनके साथियों और सहयोगी शेरपाओं का वो असाधारण सफ़र!

***

पुस्तकः हिमांक से क्वथनांक के बीच (गंगोत्रीकालिन्दीखालबद्रीनाथ यात्रा के निर्जन सौन्दर्य और मौत से मुलाक़ात का वृत्तांत)
लेखकः शेखर पाठक
प्रकाशनः नवारुण प्रकाशन

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top