‘ख़तों के आईने में’

योगेंद्र आहूजा

यह किताब जिसका शीर्षक है ख़तों के आईने मेंऔर उपशीर्षक कुछ चेहरे, कुछ अक्स, कुछ हक़ीक़तें, कुछ अफसाने” – एक पत्रों का संग्रह है – हिन्दी के आइकोनिक लेखक, कहानीकार, गद्यकार औरपहलके यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन को पिछले लगभग साठ बरसों की अवधि में विभिन्न लेखकों द्वारा लिखे गए पत्रों में से चुने गए पत्रों का संग्रह। यह पहला खंड है और इसका शीर्षक दिलचस्प है – बुर्जों की निष्कवच परिधियां

इन पत्रों का चयन, संयोजन और संपादन हिन्दी के जाने-माने, महत्वपूर्ण कहानीकार, उपन्यासकार और इतिहासविद और इनके साथ ही प्रमुख साहित्यिक पत्रिका अकार के संपादक प्रियंवद ने किया है । प्रियंवद का परिचय देना अनावश्यक है। वे वहां कैद हैं’, ‘परछाई नाच और छुट्टी के दिन का कोरसउनके चर्चित, बहुपठित उपन्यास हैं। उनके कहानी संग्रह हैं-एक अपवित्र पेड़’, ‘खरगोश’, ‘फाल्गुन की एक उपकथाऔर आईनाघर इसके अलावा इतिहास की दो बहुत महत्वपूर्ण किताबें उनके नाम हैं – भारत विभाजन की अंतःकथाऔरभारतीय राजनीति के दो आख्यानअनवरऔरखरगोश… दो फिल्में भी उनकी कहानियों पर बनी हैं। उनकी कहानियों के बारे में कुछ कहना हो तो… एक कायनात हमारे बाहर है, लेकिन हमारे, हम सबके, इंसान के भीतर भी एक कायनात है । प्रियंवद की कहानियाँ अपने मौलिक शिल्प और अंदाज़ में उस भीतरी कायनात यानी इंसान के मन या चेतना, उसके अंतर्तम में, भीतर के घमासान में उतरती हैं । ऐसा करते हुए कई बार वे हमें ऐसे प्रसंगों या पलों या नग्न सच्चाइयों के रू-ब-रू खड़ा कर देती हैं, जिनसे हम कतराते हैं या जिनका सामना करने का साहस नहीं बटोर पाते । हम स्तब्ध और निर्वाक रह जाते हैं। उनकी कहानियों के बारे में यह एक मुकम्मिल नहीं, अधूरी-सी ही बात है, लेकिन फिलहाल इतना ही ।  

चयन, संयोजन और सम्पादन के अलावा पुस्तक में प्रियंवद की एक ख़ासी लंबी भूमिका है जो अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। भूमिका में ज्ञानरंजन से उनके सम्बन्धों का जिक्र है । वे लिखते हैं कि इस रिश्ते में पहले एक दूरी और अजनबियत थी- एक अकारण, अतार्किक अजनबियत – जो दरअसल सिर्फ अपरिचय और कुछ पूर्वग्रहों का,कुछ बेवजह धारणाओं का नतीजा थी । वक़्त के साथ जब नज़दीकियाँ बढ़ीं तो उन्हें ज्ञानरंजन की मनुष्यता, उदारता और उनके पारदर्शी, स्नेहिल व्यवहार का अनुभव हुआ, आपसी भरोसे और आत्मीयता का एक खूबसूरत रिश्ता उनके बीच बना। भूमिका को इस पूरे प्रकरण के एक मार्मिक संस्मरण के रूप में भी पढ़ा जा सकता है । ज्ञान जी ने पूरे भरोसे से उनको कई दशकों के दौरान मिले हजारों पत्र सौंप दिये । इसके अलावा भूमिका में प्रियंवद ने बताया है कि इन पत्रों में क्या है, और वह भी जो नहीं है ।

प्रियंवद ने एक लंबे समय तक इन पत्रों पर एक शोधछात्र की तल्लीनता से काम किया है । इसका नतीजा यह है कि यह केवल पत्रों का एक संग्रह या जमावड़ा नहीं है, बल्कि अपनी तरह की एक खास, विशिष्ट किताब है । इस पहले भाग में जिन लेखकों के पत्र हैं वे हैं – रामनाथ सुमन, भवदेव पांडेय, शील, अशोक सेकसरिया, सईद, काशीनाथ सिंह, कमलेश्वर, विजयदान देथा, नेत्रसिंह रावत, मणि कौल, कुमार विकल, हृदयेश, वीरेन डंगवाल, सुमति अय्यर, भीष्म साहनी और राजेन्द्र यादव । लेकिन किताब में, जैसा इसके उपशीर्षक से स्पष्ट है, इन लेखकों के पत्रों से इतर भी बहुत सारी सामग्री है – चेहरे, अक्स, हक़ीक़तें और अफसाने । यह सामग्री परिमाण में शायद पत्रों के बराबर ही होगी । हर लेखक के पत्रों से पहले खतों से पहले कुछ बातेंशीर्षक से उन लेखकों का, उनके कृतित्व और जीवन का सुदीर्घ परिचय है, जो या तो प्रियंवद ने लिखा है या उनके अनुरोध पर कुछ मित्र लेखकों ने । जैसे, उदाहरण के लिए राजकुमार राकेश, जितेंद्र भाटिया और देवेंद्र ने क्रमशः कुमार विकल, कमलेश्वर और कुमार संभव पर लिखा है । अशोक सेकसरिया के परिचय में उनके एकमात्र कहानी संग्रह लेखकी की भूमिका, प्रयाग शुक्ल द्वारा लिखित, दी गयी है, साथ ही रमेशचंद्र शाह का उन पर एक लंबा आलेख। शील जी के परिचय में वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की लिखी एक भूमिका अविकल प्रकाशित है । राजेंद्र यादव के पत्रों के साथ उनका पहल और ज्ञानरंजन के बाबत एक साक्षात्कार प्रकाशित है । इसके अलावा पत्रों में आए तमाम प्रसंगों की प्रामाणिक जानकारियाँ और उन पर प्रियंवद की टिप्पणियाँ इस किताब को बहुत मूल्यवान बनाती हैं । इस तरह यह सिर्फ पत्रों का संकलन नहीं, एक गुजर चुके समय में हमारा जो साहित्यिक, सांस्कृतिक परिवेश या बौद्धिक पर्यावरण था, उसकी एक अंतरंग झलक है ।   

किताब में एक परिशिष्ट है जिसमें हम पढ़ सकते हैं –ज्ञानरंजन के पिता,गांधी युग के समादृत लेखक रामनाथ सुमन का वसीयतनामा, उन पर ज्ञानरंजन का एक संस्मरणात्मक आलेख, अशोक सेकसरिया की एक कहानी जिसका शीर्षक है – प्रिय पाठक, सुधीर विद्यार्थी का एक लंबा यादनामा वीरेन डंगवाल पर, जितेंद्र भाटिया का कमलेश्वर, मोहन राकेश इत्यादि और समानांतर कहानी के गहमागहमी वाले दौर की तमाम यादें समेटे एक लंबा आलेख, और बहुत सारे पुराने फोटोग्राफ्स और कुछ लेखकों के पत्र उनकी अपनी हस्तलिपि में । 

पत्रों के अनेक संकलन प्रकाशित होते रहे हैं, और यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के पत्र बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। वे हमें अपने समय की धड़कनों को सुनने का एक विरल अवसर देते हैं। उन्हें पढ़ते हुए हम इतिहास को फिर ज़िंदा हो गया महसूस कर सकते हैं । लेकिन लेखकों, कलाकारों, कवियों और शायरों के पत्र और भी महत्वपूर्ण होते हैं । पत्र साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है, अफसोस, एक विलुप्त होती हुई विधा, क्योंकि पत्र हमारी ज़िंदगियों से धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं । उनकी जगह ‘ईमेल्स और ‘व्हाट्सअपआदि ने ले ली है… मगर ये अधिकतर सिर्फ़ सूचनाएँ या त्वरित संवाद होते हैं, चिट्ठियाँ नहीं, जिनमें व्यक्ति समाचारों के साथ अपनी रूह, तन्हाई और अपने हाथों का स्पर्श और गर्माहट भी साथ भेजता था। शायद इसी कारण संकलित पत्रों की तरह ‘संकलित मेल्स या संकलित व्हाट्सअप संदेश’ जैसे किसी संग्रह की कल्पना भी अजीब लगती है।

दुनिया के बहुत-से बड़े लेखकों और कलाकारों के पत्र, उनकी अन्य रचनाओं के साथ, एक साहित्यिक रचना की तरह ही पढ़े जाते हैं । काफ्का, ग़ालिब, वैन गो, हेमिंग्वे… इनके पत्रों को उनके शेष कृतित्व से अलग नहीं किया जा सकता । यहाँ तक कि कई बार पत्र लेखकों के शेष कृतित्व से भी अधिक readership हासिल कर लेते हैं । उदाहरण के लिए रिल्के की ‘Letters to a young poet’ हमारे देश में उनकी कविताओं से भी अधिक पढ़ी गयी किताब रही है । पत्र यूं तो एक निजी विधा है, लेकिन निजी, यहाँ तक कि गोपनीय पत्र भी अपने समय का एक सार्वजनिक दस्तावेज(public document) होते हैं । इस किताब में संकलित पत्र भी निजी और सार्वजनिक आयामों को आपस में जोड़ते और हमारे अतीत और वर्तमान– और भविष्य में भी –बदलते आए और बदल रहे मानव-संबंधों और समाज को, घटनाओं के समय की भावनाओं और स्थितियों को और उनके काम के पीछे छुपी अदृश्य कहानी को समझने के लिए मूल्यवान जानकारी देते हैं। वे साहित्य से परे अन्य ज्ञानानुशासनों, इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, सांस्कृतिक अध्ययन और अनेक अन्तः-अनुशासनिक अध्ययनों (Inter-disciplinary studies)के लिए भी प्रचुर संभावनाएँ और नई दिशाएँ खोलते हैं।

गुज़रे दौर के इन महत्वपूर्ण लेखकों के ये पत्र वक्त और स्थान की कितनी ही सरहदें पारकर हम तक पहुंचे हैं और जैसे एक अतीत को, बहुत पुराना अतीत नहीं, हाल का ही – हमारे वर्तमान में ले आए हैं । कह सकते हैं कि इन पन्नों में अतीत और वर्तमान juxtaposed यानी एक दूसरे के ऊपर रखे हुए हैं, अंतर्गुम्फित हैं और हम अपने समय को उस अतीत के बर-अक्स देख सकते हैं । लेखकों के पत्र उनकी शख्सियत और सोच और नज़रिये को जानने-समझने का सबसे विश्वसनीय माध्यम होते हैं। रचनाओं में जहाँ कई बार सार्वजनिक छवि, विचारधारा या साहित्यिक अनुशासन बाधा बनते हैं, वहीं पत्रों में आदमी अक्सर अपने अधिक वेध्य,सच्चे और मानवीय रूप में सामने आता है।लेकिन इन पत्रों का महत्व सिर्फ़ इतना ही नहीं। उनका एक बड़ा महत्व यह भी है कि बहुत-सी आवाज़ें, जो साहित्य में कुचल दी जाती हैं, या जिनके बारे में किसी वजह से चुप्पी बरती जाती है, वे निजी पत्रों में अपनी जगह बना लेती हैं। अनेक अनकही तकलीफ़ें, रिश्तों की दरारें, साहित्यिक दुनिया की अंतर्कथाएँ, वैचारिक टकराव, असुरक्षाएँ, ईर्ष्याएँ, प्रेम और विफलताएँ – सब कुछ इन पत्रों में एक दबे हुए मगर सच्चे और प्रामाणिक स्वर की तरह दर्ज हो जाता है।

ज्ञानरंजन के पिता रामनाथ सुमन – जो गांधी जी के सहयोगी और गांधी-युग के महत्वपूर्ण लेखक थे –के पत्रों का मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहता हूँ। ज्ञान जी के नाम लिखे गए उनके ये ख़त मुझे सिर्फ़ पत्र नहीं, पत्रों के ‘फॉर्म’ में लिखी गई एक मर्मस्पर्शी कथा जान पड़े। इन्हें पढ़ते हुए ज्ञान जी की अप्रतिम कहानी पिताके कितने ही प्रसंग और वाक्य शिद्दत से याद आते रहे । ज्ञान जी की उस कहानी को कहीं-कहीं पिता और उनके जीवन-मूल्यों के विरोध की कहानी के रूप में पढ़ा गया है, जो मेरी दृष्टि में उसका एक उथला, भोंडा पाठ है। वह पिता के प्रति बेटे के गहरे प्रेम, स्वीकार और समादर की एक विलक्षण कहानी है, उनके जीवन-मूल्यों के प्रति भी –  सिर्फ इतना ही है कि कहानी में वह प्रेम असहमति, असंतोष, शिकायत और विरोध की भाषा में व्यक्त हुआ है। वह कहानी पढ़ने के कई दशकों के बाद, सुमन जी के इन पत्रों को पढ़ते हुए एहसास हुआ कि वह कहानी जैसे कहीं अधूरी रह गई थी। ऐसा महसूस हुआ जैसे उस कहानी के पिता, जिनसे बेटे को तमाम शिकायतें हैं – कहानी से बाहर आकर खुद अपनी आवाज़ में बोल रहे हों, और इस तरह यह कहानी अब मुकम्मिल हुई हो।जैसे उस कहानी का एक खोया हुआ हिस्सा अब आकर जुड़ा हो । इन पत्रों को पिता कहानी के साथ पढ़ना मेरे लिए एक मार्मिक, हृदयस्पर्शी पाठ रहा और इसने उस कहानी को मेरे लिए और भी व्यापक, विराट, और कहीं अधिक मानवीय बना दिया।

इन पत्रों से ये दो अंश देखें : 

मुझे दुःख इसका बिल्कुल नहीं कि तुम मुझे इतने विष बुझे बाण मारते हो। दुःख मुझे इसका है कि तुम अपने लिए विषमय क्यों हो रहे हो; यौवन में अमृत भी तो होता है। बल्कि विष भी अमृत बन जाता है। कभीकभी लोग विष से भी अमर हो जाते हैं किन्तु तुम तो उसमें अवसाद ढो रहे हो। तुममें जिजीविषा क्यों मर गई है? क्या मनुष्य किसी चोट से कभी उबर नहीं सकता ? निराशा, क्षय, अनुशासनहीनता क्यों ? जीवन का चांचल्य क्यों नहीं? शक्ति का स्फुरण और उन्मेष क्यों नहीं ?

जब अपने में, अपनी नियति में, अपनी अन्तःस्वीकृति में आस्था है, तो उस आस्था में कठिनाइयों के दर्प को चूर कर देने की चुनौती होनी चाहिए, मन आनन्द से उद्भासित होना चाहिए। मैं तुमसे कोई बदला, कोई गारण्टी नहीं चाहतातुमसे क्या किसी से नहीं चाहता। पर पिता होने के नाते इतनी कामना करता ही हूँ कि तुम उभरो, अवसाद और पीड़ा से ऊपर उठो इंसान बहुत बड़ा है दुनिया भी बहुत बड़ी है

***

पुस्तकख़तों के आईने में”, 2024,
प्रकाशक : नवारुण प्रकाशन

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top