विजय राही की कविताएँ

Vijay Rahi

ख़ामोशी 

वह कुछ नहीं बोली
अपनी ज़बान तक नहीं खोली
सबने उससे वायदा किया
हम सब तुम्हारे साथ हैं
सबने एक स्वर में दोहराया
हम कोशिश करेंगे कुछ कर सकें
लेकिन बताओ तो सही क्या बात है
हम-उम्र महिलाओं ने उसे गले लगाया
पुचकारा और आँसू पोंछे अपने पल्लुओं से
बूढ़ी औरतों ने हिम्मत रखने को कहा
बच्चियों ने उसके पीछे खड़े होकर
उसके कन्धों पर रखे अपने नन्हें हाथ
बेटे भले ही उदास थे लेकिन उसके पास थे
उन्होंने भी समझना चाहा
अपने-अपने ढब से उसका दुःख
हालाँकि वे यह भी जानते थे
माँ को नहीं मिला जीवन में कभी सुख
घर में ज़मा थे आस-पड़ोस के सब लोग
सबने पूछना चाहा उसके दुख का सबब
बताना चाहा कोई पारम्परिक उपाय
मगर वह कुछ भी नहीं बोली
उसने ज़बान तक नहीं खोली
किसका इन्तज़ार था आख़िर उसे
किसको सुनाना चाहती थी वह अपने बोल

हिंसा

मत मारो! छोड़ो, रहने दो उसे
जाने दो! क्या खाएगा यहाँ
आ गया होगा भूला-भटका
मैं रोक रहा था उनका हाथ
जो लाठी से निशाना साध रहे थे उस पर
अब वह मेरे कमरे में छिपा था
कोने में कचकड़े की बाल्टी के पीछे
जो कुछ देर पहले आँगन में जीभ लपलपा रहा था
बाल्टी टूट जाएगी तो दूसरी कहाँ से लाऊँगा
यह भी मौसी ने दी थी पिछले साल
इसमें ट्रैक्टर का ऑयल-ग्रिस आया होगा
कई दिनों तक आई थी मुझे उसी की बास
लगाना पड़ता था पानी पीते वक़्त नाक पर हाथ
मैं जानता हूँ कितनी बार माँजना पड़ा था इसे
आख़िर बाल्टी को तोड़ दिया गया
और जीव का सर फोड़ दिया गया
उधर सब लोग उसको देख रहे थे हँसते हुए
बच्चों को दिखाकर डरा रहा था मकान मालिक
नन्हें बच्चे गिरते-पड़ते भाग रहे थे रोते हुए
इधर मैं टूटी बाल्टी को देख रहा था
और कमरे में बैठा अकेला रो रहा था

अपराध बोध

आँगन में अनाज का ढेर लगा है
जिसे बरसा रही हूँ खेजड़ी की छाया में
कट्टे-पुआल बिछा कर
घरवाले दोपहर की नींद में डूब रहे हैं
आस-पास बच्चे खेल-कूद रहे हैं
हवा चल रही है मद्धम,कभी तेज़
अनाज बरसता देखकर चिड़ी-कबूतर भी आ गए हैं
जब परात से अनाज बरसाती हूँ
वे मौका देख कर दाने चुगने लगते हैं
मैं चिड़ियों को उड़ा रही हूँ
उनमें से कुछ ज़िद्दी भी हैं
जिनको झाड़ू मार रही हूँ
एक चिड़िया झाड़ू से अधमरी हो जाती है
बाक़ी चिड़िया उड़ जाती हैं
मैं उसके आगे पानी की कटोरी रखती हूँ
वह एक बार पानी में चोंच का झटकारा देती है
और एक तरफ़ लुढ़क जाती है
यह अजीब-सी सनक मुझे तब से है
जब मैं किशोरवय थी
चिड़ियों को पकड़ती थी मारती थी
फिर पानी पिलाती थी
माँ को पता चलता तो डाँटती थी
पिता से शिकायत करती थी
पिता भी पीटते थे पर मैं नहीं मानती थी
मैं दोपहर होने और सबके सोने का
हर रोज़ इंतजार करती थी
मेरे मन में कभी ख़्याल नहीं आया
इन चिड़ियों के बच्चे इनका इन्तज़ार करते होंगे
रोते होंगे और भूखे मर जाते होंगे
शादी के बाद जब मेरे बच्चा हुआ
तो इन सबका ख़्याल आया
मेरा बच्चा मेरे बिना रो-रोकर अधमरा हो जाता है
उन सारे बच्चों की चीत्कार
माँ-माँ की पुकार मेरे कानों में गूँजती है
मैं उन्हें यहाँ-वहाँ
छप्पर, आँगन, बरामदे, नीम-बबूल में
ढूँढती हूँ और रोती हूँ
फिर अपने बच्चे को देखती हूँ
सीने से लगाती हूँ दूध पिलाती हूँ
और दोबारा रोती हूँ

रिश्ते 

वह अपने प्रेमी से मिलकर आई है
भाई बहन को पीट रहा है
बहन भाई से कमज़ोर नहीं है
एक भड़बेटा दे तो भाई दोबारा सँभल नहीं पाए
लेकिन कोई अदृश्य काण है
जिसका वह पालन कर रही है
बेल्ट के सड़ाकों की आवाज़ के साथ
उसकी चीख पुकार धीरे-धीरे बढ़ती है
फिर धीरे-धीरे मद्धम होकर शान्त हो जाती है
अंत में रह जाती है सिर्फ़ सड़ाकों की आवाज़
मेरा डील उधड़े जा रहा है
घटनाक्रम बदल गया है
ग्यारह दिन पहले बड़ा भाई मर गया है
भतीजे के पगड़ी बाँधी जा रही है
मैं नहीं जानता कि मैं दुखी क्यों नहीं हूँ
सोच रहा हूँ आख़िर ये हमारे जीवन में क्यों आए
बहन भी दीवार से सटकर बैठी है चुपचाप
गोया सोच रही हो क्या ज़रूरी है
जीवन में गर पिता नहीं तो बड़ा भाई ज़रूर हो
बहन प्रेमी से मिलकर आई है
मैं उससे चुहल करता हूँ कि
मुझे बताओ उसके बारे में
मुझे भी मिलना था उससे
बहन शरमाकर चली जाती है घर के भीतर
घटनाक्रम फिर बदलता है
भाई बेल्ट फेंककर चले जाते हैं खेत पर
आस-पड़ोस की औरतें घर आ गई हैं
वे बहन के मुँह पर पानी के छीटें दे रही हैं
मेरे गाल गीले हो रहे हैं

इन्तज़ार 

कुएँ में कूदी तो मरने के लिए थी
पर बच गई उसका क्या करूँ
सो अब जीना पड़ रहा है
अस्पताल में सबने मन चाहे बयान दिलवाए
मैंने बयान दिए यह सोचते हुए
किमर जाती तो वैसे भी
बयानों की जरूरत नहीं रहती
उसके करीब जाती हूँ गालियाँ बकता है
ख़ुद भी नहीं बुलाता है अपने पास
फ़ोन पर दो घड़ी घरवालों से बात करती हूँ
सिर पर सवार रहती है सास
सुन्दर बाईसा !
मुझे अब किसी का इंतज़ार नहीं
तुम्हारा भाई अगर सोने का भी हो जाए
मेरे कोई काम का नहीं

***

कविपरिचय

जन्म 03 फ़रवरी, 1990 को बिलौनाकलॉ, लालसोट, दौसा, राजस्थान

हिन्दी-उर्दू केसाथ-साथ राजस्थानी भाषा में समानान्तर लेखन।प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और वेबसाईट्स पर कविताएँ-ग़ज़लें और आलेख प्रकाशित।कविताओं का अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी,पश्तो, मराठी, कन्नड़, मलयालम, नेपाली और मंदारिन में अनुवाद।राजस्थान साहित्य अकादमी-उदयपुर, रज़ा फाउंडेशन, इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल- जयपुर,संगत नेशनल यूथ पोयट्री फेस्टिवल- पटियाला, विदेशमंत्रालय- भारत सरकार,नई दिल्ली में कविता पाठ।दूरदर्शन और आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण।

पहला हिन्दी कविता संग्रहदूर से दिख जाती है बारिश’ (2026) प्रकाशित

सम्प्रति राजकीय महाविद्यालय, कानोता, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी) के पद पर कार्यरत।

ईमेल: vjbilona532@gmail.com

2 thoughts on “विजय राही की कविताएँ”

  1. Chandreshwar चंद्रेश्वर

    विजय राही सभी कविताएं अपनी अभिव्यक्ति की सरलता -सहजता एवं मार्मिक कथ्य के चलते प्रभावशाली हैं। युवा कवि विजय राही को बधाई एवं शुभकामनाएं।

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