
मुझे अब मरना होगा
मुझे उधर जाने से बचना होगा
जिधर नदियाँ हैं
क्योंकि नदियाँ बहा ले जाती हैं
दिखा जाती हैं किनारे बसी दुनिया
मुझे उधर जाने से बचना होगा
जिधर चौराहे हैं
क्योंकि संभावनाओं के रास्ते
चौराहों से ही फूटते हैं
मुझे उधर जाने से बचना होगा
जहाँ दोस्तों के ठिकाने हैं
जुलूस हैं मोर्चे हैं
बहसे हैं असहमतियाँ हैं
क्योंकि लौह बक्से में बंद आत्म का किवाड़
खटखटाते हैं सब मिलकर
मुझे अंतर की घुमड़न कह देती ज़ुबान को
नियंत्रण में रखना होगा
निर्भीकता नहीं प्रशासन को शिरोधार्य करना होगा
मैं वहाँ हूँ अब
जहाँ एकांत है शराब है
जाम से अठखेलियाँ करती
बेग़म अख़्तर की आवाज़ है
और सुनने वाले बस यही दो कान
और भीगती दो आँखें
और एक डगमगाता हुआ दिल
मुझे पचहत्तर पार बूढ़ी आज़ादी को
कंधा देना होगा
मुझे अब मरना होगा।
ईमानदारी की जेब
ईमानदारी की जेब
अंदर से फटी है
कुछ भी थहाता नहीं
सुना है कविगण
कभी तारे तक ठूँस लिया करते थे अपनी जेबों में
मैंने तो कल बस आत्मा रखी थी
वह भी फिसलकर जूते से कुचली गई
आश्चर्य कि चींटी जितनी चीख भी नहीं फूटी
बस इतने भर काम की रह गई है पतलून की जेब
कि दोनों हथेलियाँ घुसाए
खिंचवाई जा सके एक अदद रौबदार तस्वीर
विचार को सड़क पर बिछलने दें
आत्मा को जूतों से कुचलने दें
कोई वांदा नईं
पन तस्वीर खिंचवाएँ एकदम कड़क
भले न बैठे अपने समय से वैचारिक तालमेल ठीक-ठीक
प्रोफाइल पिक्चर अपडेट भोत ज़रूरी है बीड़ू !
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22 वर्ष तक महाराष्ट्र के नागपुर के एक महिला महाविद्यालय में अध्यापन के उपरांत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन. कविता, कहानी और आलोचना में सतत लेखन. कविता की पाँच किताबें, कहानी और आलोचना की एक-एक किताब के अलावा कई संपादित किताबें प्रकाशित।
ई-मेल basantgtripathi@gmail.com

